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19 जून 2011

डीयू के अधिकतर प्राचार्यो के 65 फीसदी से कम अंक

अपनी शिक्षा व्यवस्था की हम चाहे कितनी भी आलोचना क्यों न कर लें। लेकिन दिल्ली के नामी कॉलेजों की जो कट ऑफ लिस्ट आई है, उससे इसका एक सकारात्मक पहलू भी उभर कर आया है। जागरण की खोजबीन से यह बात सामने आई है कि जिन कॉलेजों की कट ऑफ लिस्ट 96 फीसदी तक आई है, खुद उनके प्राचार्यो ने पढ़ाई के दौरान अपने समय में 11वीं की परीक्षाओं में 65 फीसदी से अधिक अंक प्राप्त नहीं किए थे। कृपया इसे अन्यथा न लें, इससे नौजवानों के लिए बढ़ी प्रतिस्पर्धा की स्थिति तो स्पष्ट होती ही है, साथ ही शिक्षा व्यवस्था में हुई तरक्की की तस्वीर भी खुलती है। यह भी पता चलता है कि मूल्यांकन पद्धति में कितनी दरियादिली हुई है। एसआरसीसी के प्राचार्य डा. पी.सी. जैन ने बताया कि उन्होंने अजमेर बोर्ड से प्रथम श्रेणी में बारहवीं पास की और राजस्थान-जयपुर विश्वविद्यालय से बीकॉम व एमकॉम में टॉप किया। उस समय टॉपर के अंक 60 से 70 फीसदी के बीच होते थे। चालीस साल पहले डीयू में गोल्ड मेडलिस्ट रहे डा. गौरी शंकर के अंक 60 फीसदी थे। रामजस कॉलेज के प्राचार्य डा. राजेंद्र प्रसाद बताते हैं कि 1969 में उन्हें सेंट स्टीफंस में 62 फीसदी अंकों पर दाखिला मिल गया था। उस दौरान इतने अंक पाने वाले छात्र इक्का-दुक्का ही हुआ करते थे। डीयू के डीन स्टूडेंट वेलफेयर प्रो. जेएम खुराना बताते हैं कि इंटर कॉलेज में उनके अंक 60 फीसदी से अधिक थे। सन् 1971 में उन्हें रामजस कॉलेज के कैमिस्ट्री ऑनर्स कोर्स में आराम से दाखिला मिल गया था। भारती कॉलेज की प्राचार्य डा. प्रोमोदनी वर्मा बताती हैं कि उन्होंने कैंब्रिज बोर्ड से पढ़ाई की थी। वह फ‌र्स्ट डिविजनर रहीं 60 फीसदी अंक पर आपको हर कॉलेज में आसानी से दाखिला मिल जाता था। जाकिर हुसैन कॉलेज के प्राचार्य डा. मो. असलम परवेज बताते हैं कि उन्होंने 70 के दशक में जाकिर हुसैन कॉलेज में दाखिला लिया था। गणित में कम अंक आने से उनके 60 फीसदी अंक नहीं बन पाए थे। घर से नजदीक होने के कारण बडे़ भाई साहब ने कहा इस कॉलेज में दाखिला लेना है और उनके आदेश अनुसार यहां दाखिला ले लिया। आज इसी कॉलेज में प्राचार्य हूं। रामलाल आनंद कॉलेज के प्राचार्य डा. विजय शर्मा ने बताया कि 1968 में इंटर में करीब 59 फीसदी अंक आए। इसके आधार पर उन्हें जाकिर हुसैन कॉलेज में अंग्रेजी ऑनर्स में दाखिला मिल गया। आज तो छात्रों के अंक और कट ऑफ को देखकर हैरानी होती है। श्यामलाल कॉलेज के प्राचार्य डा. जी.पी. अग्रवाल ने बताया कि उन्होंने 1964 में एसआरसीसीसी कॉलेज में 52 फीसदी अंकों के आधार पर आवेदन किया और बीकॉम ऑनर्स में उन्हें तुरंत दाखिला मिल गया। स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज के प्राचार्य डा. एस.के. कुंद्रा बताते हैं कि 1966 में साइंस स्ट्रीम से इंटर करने पर उन्हें 61 फीसदी अंक मिले थे। इसके बाद डीयू के कैमिस्ट्री विभाग से उन्होंने बीएससी कैमिस्ट्री की थी। तब लोग सोचते ही थे कि 100 में से 100 किसी के नहीं आ सकते। लेकिन आज 100 फीसदी कट ऑफ जाती है। छात्रों के एक नहीं कई-कई विषयों में सौ फीसदी अंक आते है(एस.के. गुप्ता, दैनिक जागरण ,नई दिल्ली,19.6.11)।

2 टिप्‍पणियां:

  1. ...तब तो इन प्राचार्यो को निकाल देना चाहिये.

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  2. रोचक खोजबीन है!
    लेकिन पुराने दिनों में प्रथम श्रेणी आना ही बहुत बड़ी बात होती थी.आज की तरह उन दिनों इतनी ट्यूशन/कोचिंग /गाईड/आदि की सुविधा भी नहीं होती थी.अब तो कोर्से /एक्साम के लिए पोर्शन भी इतना कम है.....
    मुझे याद है कि यू पी दसवीं बोर्ड में नवीं और दसवीं दोनों साल का कोर्स और बारहवीं में ग्यारहवीं और बारहवीं दोनों साल का कोर्से याद करना पड़ता था ....हिंदी में तो जीवनियाँ भी याद करनी पड़ती थीं!
    आज के १००% तब के कितने प्रतिशत प्राप्तांक के बराबर होंगे यह शोध का विषय होना चाहिए !

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