मुख्य समाचारः

सम्पर्कःeduployment@gmail.com

17 जुलाई 2011

बिहारःखेतों में उतरे उच्च शिक्षा के नामवर

चलन में भले आज उच्च शिक्षा प्राप्त कर डालरों में कमाई को लेकर होड़ मची हो, लेकिन इन सभी के बीच कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो पुरानी कहावत यानी उत्तम खेती की बानगी बने हुए हैं। ये वे नामवर हैं जिन्होंने उच्च ज्ञान तो हासिल किया, लेकिन अपनी इस मेधा का उपयोग अपनी धरती यानी किसानी के क्षेत्र में किया। खास कर ऐसे समय में जब बिहार की इन्द्रधनुषी क्रान्ति का फलाफल को देखने पूरा देश इंतजाररत है। दूसरी हरित क्रांति के लिए पूर्वोत्तर राज्य उसमें भी खासकर बिहार की ओर देश की नजर खाद्यान्न आपूर्ति को ले कर बंध चुकी है। ऐसे में इन पढ़ो लिखों का फसल उत्पादन के क्षेत्र में बढ़ना समाज को आनंदित करने लगा है। साथ ही आम किसानों विास भी होने लगा है कि देश की बढ़ती जनसंख्या के सापेक्ष अनाजों की पूर्ति बिहार सक्षम से ही संभव होने जा रहा है। इन्हीं मसलों की मिसाल लिए आगे बढ़ रहे हैं मनीष कुमार और शशांक कुमार व मधुकर सिंह। मनीष कुमार के पिता शशिभिूषण प्रसाद सेवानिवृत्त किरानी हैं। शशांक कुमार भी सेवानिवृत्त अधिवक्ता आर.एन.पाण्डेय के पुत्र हैं। मनीष कुमार ने बी.टेक, एम.टेक आई.आई.टी. खड़गपुर से तो शशांक कुमार बी.टेक व एम.बी.ए आई.आई.टी. दिल्ली से किया है। मधुकर सिंह के पिता स्व.एच.डी. सिंह सचिवालय में ही पदाधिकारी थे। उन्होंने भी पटना विविद्यालय से एम.बी.ए. किया है, लेकिन इन तीनों ने आराम की जिन्दगी को नकारा और मिट्टी से जुड़ कर फसल उत्पादन के नये तरीकों को स्वीकार आम किसानों को भी प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया। हालांकि शुरुआती दौर में परिवार वालों का विरोध भी सहना पड़ा। मनीष व शशांक ने तो जुलाई 2010 में वैशाली जिले के 3 गांवों के 15 किसानों के साथ फार्म्स एण्ड फार्मस संगठन को शुरू किया है। अभी 10 माह के अंतराल में ही इनकी पहुंच 6 जिलों के कई गांवों तक पहुंच चुका है। इन दो युवाओं द्वारा जो प्रयोग किये गये उससे वैशाली जिले में किये गये प्रयोग में संस्था ने किसानों को 100 प्रतिशत तक की वृद्धि दिखाई है। इस संस्था द्वारा गेहूं के बदले राजमा की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जिससे किसानों को कम मेहनत व लागत में ही ज्यादा आय हुई। कृषि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए सार्क देशों के लिए पहली बार आयोजित होने वाले दक्षिया एशिया युवा सम्मेलन में ये दोनों भारतवर्ष के प्रतिनिधित्व के लिए चुने गये। यह सम्मेलन आईएमए बंगलोर में हुआ था जहां 8 देशों के कुल 120 प्रतनिधि ने भाग लिया था। इसी जोश-खरोश के साथ मधुकर सिंह ने भी आराम की नौकरी के बदले कृषि फर्म में भागीदारी निभाई। पढ़ाई-लिखाई पटना में करने के बावजूद श्री सिंह ने मोतिहारी के मधुबन क्षेत्र को इस फर्म के लिए उपयुक्त समझा। उन्होंने कहा कि मोतिहारी गांधी की कर्म भूमि है इस लिहाजन भी उन इलाकों के प्रति मन में विशेष लगाव भी था। उन्होंने इलाके के किसानों के साथ हल्दी की खेती को नये तरीके से किया, जिसमें उन्हें अपार सफलता भी मिली। पहले जिन खेतों में प्रति कट्ठा 6 से सात मन हल्दी की उपज होती थी उन खेतों में 13 से 14 मन तक की उपज होने लगी। आज स्थिति यह है कि मधुबन के कई किसान इनकी अगुआई में हल्दी की खेती करने में लगे हैं। हाल यह है कि इनके कृषि कर्म से प्रभावित कई युवा इनसे खेती के गुर सीखने आते हैं। यहा प्रेरणादाई यह भी है कि इस हल्दी खेती को जैविक माध्यम से किया गया। जिसमे वर्मी कम्पोस्ट खाद व ढैंचा का भी प्रयोग किया गया। हल्दी की खेती से किसानों को काफी फायदा भी हुआ(चंदन,राष्ट्रीय सहारा,पटना,17.7.11)।

1 टिप्पणी:

  1. ऐसे लोग ही नमन के योग्य है और देश के सच्चे पुत्र उनको शत शत प्रणाम .......

    उत्तर देंहटाएं

टिप्पणी के बगैर भी इस ब्लॉग पर सृजन जारी रहेगा। फिर भी,सुझाव और आलोचनाएं आमंत्रित हैं।