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05 जुलाई 2011

डीयूःकरियर बड़ा या कैंपस

डीयू की कट ऑफ जितनी हाई जाती है स्टूडेंट्स में इसका क्रेज बढ़ता जाता है। सिर्फ स्टूडेंट्स ही नहीं पैरंट्स भी चाहते हैं कि उनके बच्चें डीयू में ही पढ़ें। डीयू एक स्टेटस सिंबल बनता जा रहा है। चाहे किसी भी कोर्स या कॉलेज में एडमिशन हो जाए बस डीयू का ठप्पा लगना चाहिए। अगर डीयू में अपने फेवरिट सब्जेक्ट में एडमिशन नहीं मिल रहा तो किसी और कोर्स में एडमिशन लेने में भी स्टूडेंट्स हिचकते नहीं हैं।

ज्यादातर पैरंट्स का मानना है कि डीयू में पढ़ने वाले बच्चों की पर्सनैलिटी काफी अच्छी तरह से डिवेलप होती है। ऐसे ही एक पिता राजेश का कहना है कि बच्चों के पर्सनैलिटी डिवेलपमेंट के लिए डीयू में एडमिशन काफी जरूरी है। डीयू से ग्रैजुएशन करने के बाद स्टूडेंट्स पीजी लेवल पर अच्छा परफॉर्म करने के लिए तैयार हो जाते हैं। चाहे किसी भी कोर्स में एडमिशन मिले स्टूडेंट्स को ले लेना चाहिए। मेरे बच्चे को डीयू में एडमिशन मिलने से उसके करियर को लेकर मेरी टेंशन दूर हो गई।


ऐसा भी नहीं हैं कि लोग सिर्फ डीयू के ही पीछे हैं। ऐसे कई पैरंट्स भी हैं जिनका मानना है कि पढ़ाई में स्टूडेंट्स की चॉइस काफी मैटर करती है। ऐसी ही सोच रखने वाली अंजना का कहना है कि बच्चों की भी अपनी चॉइस होती है। जो वे करना चाहते हैं उन्हें करने देना चाहिए। इससे उनका करियर काफी जल्दी आगे बढ़ेगा। यूनिवर्सिटी सभी अच्छी होती हैं बस बच्चे का इंट्रेस्ट किस कोर्स को करने में हैं वहीं एडमिशन कराना चाहिए। 
कई पैरंट्स का यह भी मानना है कि बच्चों का करियर बार-बार नहीं बनाया जा सकता। इसलिए जरूरी है कि पैरंट्स और बच्चे आपस में बात करके कोई डिसीजन लें। खुली सोच रखने वाले भगवान दास का मानना है कि पैरंट्स हमेशा बच्चे के लिए अच्छा सोचते हैं पर कभी-कभी वह बच्चों को प्रेशराइज कर देते हैं। ऐसे हालात से बचने के लिए जरूरी है कि पैरंट्स और बच्चे मिलकर कोई डिसीजन ले। डीयू में एडमिशन होना काफी अच्छी बात है लेकिन डीयू लास्ट ऑप्शन नहीं है। 

कई ऐसे पैरंट्स भी हैं जो बच्चों को करियर चुनने की खुली छूट देते हैं। ऐसे ही एक पिता सुभाष कहते हैं कि डीयू हो या कोई और यूनिवर्सिटी पढ़ाई तो स्टूडेंट्स को ही करनी है। सभी को तो डीयू में एडमिशन नहीं मिल सकता इसलिए बच्चों पर डीयू में एडमिशन के लिए प्रेशर नहीं डालना चाहिए(शिल्पी भारद्वाज,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,5.7.11)।

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