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28 जुलाई 2011

निजीकरण की तलवार लटकने से खादी कर्मचारी परेशान

क्या कहते हैं कर्मचारी
सरकार अगर कॉरपोरेट लुक देकर खादी की बिक्री बढ़ाना चाहती है, तो यह होना नामुमकिन है। खादी से लोगों का जुड़ाव उसके स्टोर की खूबसूरती से नहीं है। लोगों का खादी से भावनात्मक जुड़ाव रहा है।

खादी आश्रम के कर्मचारी हर ग्राहक को समान नजर से देखकर व्यवहार करते हैं। इसके साथ ही वहां जाने वाले ग्राहकों को इस बात का पूरा भरोसा होता है कि जो सामान वे ले जा रहे हैं, वह शुद्ध है।

अंदेशा :- ज्यादातर खादी आश्रम में 25-30 साल से लोग काम कर रहे हैं जो सरकार के कर्मचारी हैं। यदि सरकार इसे निजी हाथों में सौंप देती है, तो उनके रोजगार पर संकट आ सकता है।

सरकार को भले ही यह भरोसा हो कि खादी के कारोबार को निजी हाथों में सौंपने से उसका कायाकल्प हो जाएगा, लेकिन खादी आश्रम में काम करने वाले कर्मचारी इससे इत्तेफाक नहीं रखते हैं। कर्मचारी जहां इस बात को लेकर आशंकित हैं कि निजी हाथों में सौंपने से उनके रोजगार का क्या होगा, वहीं वे यह भी कहते हैं कि खादी को शॉपर्स स्टॉप और फैब इंडिया के नाम से नहंीं बेचा जा सकता है।

यदि ऐसा होता तो खादी आश्रम के उत्पाद बड़े राजनेताओं और फिल्मी हस्तियों के पसंदीदा नहीं बने होते। इसके बजाय वे शॉपर्स स्टॉप और फैब इंडिया में जाकर खरीदारी कर रहे होते।
दिल्ली के सबसे पहले खादी आश्रम (रीगल के पास) में काम करने वाले एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यदि सरकार कॉरपोरेट लुक देकर खादी की बिक्री बढ़ाना चाहती है, तो यह होना नामुमकिन है।


खादी से लोगों का जुड़ाव उसके स्टोर की खूबसूरती से नहीं है, बल्कि लोगों का खादी से भावनात्मक जुड़ाव रहा है। यहां पर लोग शुद्धता और गुणवत्ता के साथ-साथ कहीं न कहीं देश भक्ति की भावना से भी आते हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो बड़े राजनेता और फिल्मी हस्तियां यहां खरीदारी के लिए नहीं आतीं।

वे तो कहीं से भी महंगे से महंगा उत्पाद खरीद सकते हैं, इसके बावजूद वे यहां आते हैं। इस कर्मचारी के अनुसार ज्यादातर खादी आश्रम में 25-30 साल से लोग काम कर रहे हैं जो सरकार के कर्मचारी हैं। यदि सरकार इसे निजी हाथों में सौंप देती है, तो हमारे रोजगार के लिए असमंजस की स्थिति आ सकती है। कई ऐसे कर्मचारी भी हैं, जिनके पिता भी खादी आश्रम के लिए काम करते थे, अब वे काम कर रहे हैं। अनेक कर्मचारियों का खादी से जुड़ाव कई पीढिय़ों से है।

चांदनी चौक स्थित खादी आश्रम के भी एक कर्मचारी ने खादी आश्रम को निजी कंपनियों के हवाले करने का विरोध करते हुए बताया कि यह कदम सही नहीं है। कई ऐसे ग्राहक हैं, जो हमारी दुकान पर पिछले 25 साल से आ रहे हैं। वे इसलिए लगातार आते हैं क्योंकि उनका न केवल खादी के उत्पादों से जुड़ाव है, बल्कि कर्मचारियों से भी एक तरह का लगाव है। खादी आश्रम के कर्मचारी हर ग्राहक को समान नजर से देखकर व्यवहार करते हैं।

इसके साथ ही ग्राहकों को इस बात का पूरा भरोसा होता है कि जो सामान वे ले जा रहे हैं, वह शुद्ध है। खादी को इसी रूप में पसंद करने वालों की लंबी फेहरिस्त है। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तक खादी के प्रमुख खरीदार थे। देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, पूर्व राष्ट्रपति आर.वेंकट रमन, शंकर दयाल शर्मा भी इस सूची मे शामिल थे।

कर्मचारियों के रोजगार के सवाल पर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि पीपीपी मॉडल के जरिए प्रमुख रूप से सर्विस कंसेशन मॉडल, कर्मचारियों को बनाए रखने और खादी ग्रामोद्योग की खाली जमीन का कोई दूसरा इस्तेमाल न करने के भी प्रस्ताव शामिल किए गए हैं। ऐसे में कर्मचारियों की स्थिति में किसी तरह का बदलाव आने की कोई संभावना नहीं है(प्रशांत श्रीवास्तव,बिजनेस भास्कर,दिल्ली,28.7.11)।

1 टिप्पणी:

  1. इस तरह की पी पी पी की तो मां की....
    कुछ लोग चार पैसे खाकर हर चीज़ को ही तबाह-बर्बाद करने पर तुले हुए हैं और कोई इस पर बोलने को तैयार नहीं सरकारों में, न्यायालयों से ही एक मात्र आशा की किरण दिखाई देती है आज...

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