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06 अगस्त 2011

यूपीःहिन्दी प्रदेश में हिन्दी माध्यम उपेक्षित

बारहवीं तक हिन्दी माध्यम में पढ़ाई। स्नातक में प्रवेश लेते ही भारी भरकम पाठ्यक्रम, वह भी अंग्रेजी में। प्रश्नपत्र हिन्दी व अंग्रेजी में दोनों में जबकि परीक्षा देते हैं हिन्दी में। इस खाई को पाटने में जूझ रहे हैं प्रदेश के सत्तर फीसदी स्नातक के छात्र। अभी तक छात्र किसी प्रकार अंग्रेजी में दिए गए विस्तृत पाठ्यक्रम को हिन्दी में पढ़ने का जुगाड़ तलाशते रहे हैं। राज्य सरकार ने प्रदेश में कॉमन मिनिमम सिलेबस लागू करने की कवायद तो शुरू कर दी है, लेकिन छात्रों के इस पहलू को दरकिनार कर दिया गया है। नया पाठ्यक्रम भी अंग्रेजी में आने के बाद अब हिन्दी माध्यम के छात्रों की मुश्किलें और बढ़ने वाली हैं। प्रदेश में नए पाठ्यक्रम की पहल का स्वागत तो किया ही जा रहा है लेकिन साथ ही अब इसे हिन्दी में बनाने की मांग की जाने लगी है। बहुसंख्य शिक्षक कक्षाओं में हिन्दी में ही पढ़ाते नजर आएंगे। अंग्रेजी के पाठ्यक्रम को छोड़कर छात्र हिन्दी में दिए गए पुराने प्रश्नपत्रों को ही पाठ्यक्रम का अहम हिस्सा मानकर उससे तैयारी करते रहे हैं। परीक्षा के लिए छात्रों को हिन्दी माध्यम ही रास आता है। लखनऊ विवि में हिन्दी माध्यम चुनने वाले छात्र अस्सी फीसदी हैं। प्रदेश के अन्य विवि का भी यही हाल है। राज्य सरकार का कॉमन मिनिमम सिलेबस विस्तृत है, किन्तु अंग्रेजी में ही तैयार किया गया है। बेहतर अध्ययन और अध्यापन के लिए यह निर्धारित करना आवश्यक है कि क्या पढ़ना जरूरी है और क्या नहीं? हिन्दी माध्यम से जुड़े छात्रों के लिए अचानक इस बदलाव को स्वीकारना सहज नहीं है। ऐसे में राज्य सरकार का कॉमन मिनिमम सिलेबस हिन्दी माध्यम में भी उपलब्ध होने पर छात्रों को इसका सही लाभ मिल सकता है। इस संबंध में लखनऊ विवि के परीक्षा नियंत्रक मानते हैं कि छात्र अकसर अंग्रेजी में पाठ्यक्रम को लेकर अपनी परेशानी बताते रहते हैं। अधिसंख्य शिक्षक भी हिन्दी में ही पढ़ाते हैं। अंग्रेजी में पढ़ने पर यदि छात्र प्रश्न समझ नहीं पाता तो उत्तर भी स्पष्ट नहीं लिखता और इसका असर अंकों पर पड़ता है। पाठ्यक्रम हिन्दी में न होने से एक बड़ा गैप बना हुआ है, इसे खत्म करना जरूरी है। पाठ्यक्रम हिन्दी में होगा, तभी हिन्दी भाषी क्षेत्र के विद्यार्थी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे(पारितोष मिश्र,दैनिक जागरण,लखनऊ,6.8.11)।

1 टिप्पणी:

  1. हिन्दी के बिना हमारी शिक्षा अधुरी है....किसी विषय को समझने के लिए हिन्दी साहरा लेना पड़ता है.. इसलिए हमारे पाठ्यक्रम मे साधारण शब्द हिन्दी में और तकनीकी भाषा अंग्रेजी में होना चाहिए. या कोष्ठक में हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी शब्द हों.... ज्यादा शुध्व हिन्दी भी नही होना चाहिए.. जिससे विद्या्र्थी को समझने में कठिनाई हों......हिन्दी है हम...........अंग्रेजी में होने के कारण विद्यार्थी समझने के वजाय रटने का साहरा लेता है. जो कि ठीक नही है...अतः हमारे देश में मातृभाषा में ही पढ़ाई होनी चाहिए। तभी देश का भला होगा। क्योकि हमकों देश में काम करना है न कि विदेशों में, जिनकों विदेशों में जॉब करना है तो स्वेच्छा से अंग्रेजी में पढ़ाई कर सकता है यह विकल्प खुला होना चाहिए.. तभी शिक्षा का विकास होगा।

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