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14 सितंबर 2011

बिहारःखस्ताहाल हैं हिंदी संस्थान

राष्ट्रभाषा हिंदी से जुड़े संस्थान खस्ताहाल हैं। समारोही मौकों पर हिंदी की दुहाई दी जाती रही है और इससे जुड़े संस्थानों के कायाकल्प की घोषणाएं भी होती रही हैं लेकिन हकीकत के ठोस धरातल पर हिंदी उपेक्षित ही रही है। सिर्फ हिंदी ही नहीं, अन्य क्षेत्रीय भाषाई संस्थान भी ऐसी ही पीड़ा झेल रहे हैं। बिहार सरकार ने इस साल हिंदी ग्रंथ अकादमी के लिए ८० लाख रुपए का आवंटन किया है जो कर्मचारियों के बकाए वेतन-भत्ते पर ही खर्च होना है। हिंदी से जुड़े शोध और विकास कार्यों के लिए धनराशि का टोटा है।

क्षेत्रीय भाषाओं में भोजपुरी अकादमी के लिए ३३ लाख, मैथिली के लिए २५ लाख, मगही के लिए २२ लाख, बांग्ला के लिए ७ लाख और संस्कृत अकादमी के लिए १८ लाख रुपए जारी हुए हैं। हिंदी समेत सभी क्षेत्रीय भाषाओं की अकादमियां पहले किराए के भवन में ही चल रही थीं लेकिन अब शास्त्री नगर के कर्मचारी फ्लैट में इनका स्थानांतरण हो गया है। सभी भाषा अकादमियों में पूर्णकालिक निदेशक तक नहीं हैं। सामान्य परिषद् और शासी निकाय नहीं हैं। कर्मचारियों को छठे वेतन आयोग का भी लाभ नहीं मिल पाया है। अकादमियों को अध्यक्ष मिल गए हैं और काम जैसे-तैसे चल रहा है।


हिंदी को लेकर उपजे राष्ट्रीय स्वाभिमान की गरमी धीरे-धीरे ठंडी होती चली गई और हिंदी की याद समारोहों तक सिमट कर रह गई। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी और हिंदी साहित्य सम्मेलन भवन उपेक्षा के दंश झेलते रहे हैं। राजद के शासनकाल में छज्जूबाग में फणीश्वरनाथ रेणु हिंदी भवन बनवाया गया था। इसे भोपाल के भारत भवन की तर्ज पर विकसित किए जाने की घोषणाएं हुईं। ७५ कमरों में लेखक गृह, ऑडिटोरियम और आर्ट गैलरी को सजाया जाना था लेकिन अब यह भवन चंद्रगुप्त प्रबंधन संस्थान को सौंप दिया गया है। अब वहां मैनेजमेंट गुरुओं की फसल तैयार हो रही है। 

वैसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हिंदी संस्थानों को सलाना बजट देना शुरू कर दिया है। राजद काल में इन संस्थानों के कर्मचारियों को वेतन के लाले पड़ गए थे। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के कर्मचारियों को अब समय पर वेतन मिलता है। परिषद के परिसर में बाल भवन बना है जहां किलकारी नामक संस्था चलती है लेकिन प्रकाशनों की हालत दयनीय है। परिषद् के पुराने प्रकाशनों को निजी प्रकाशक थोड़ा-बहुत परिवर्तनों के साथ छाप रहे हैं और परिषद् पंगु ही बना रहा है। भाषाई अकादमियों का कामकाज पहले सरकारी अफसर ही देखते थे जो साल में एक बार भी अकादमी के दफ्तर जाना जरूरी नहीं समझते थे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अब भाषाई विद्वानों की बतौर अध्यक्ष नियुक्ति की है। अकादमियों ने पहले निजी भवनों में अनाप-शनाप किराया देकर भवन ले लिया था अब इन्हें एक भवन में लाया गया है लेकिन न तो पर्याप्त कुर्सियां हैं और न ही पांडुलिपियों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था।

बिहार ग्रंथ अकादमी को केंद्र सरकार से अनुदान मिलता है लेकिन कर्मचारियों को वेतन राज्य सरकार देती है। शोध पुस्तकों के प्रकाशन में यह संस्थान अपनी ढेर सारी उपलब्धियां गिनाता है लेकिन हकीकत में हिंदी का विकास नहीं दिखता। ग्रंथ अकादमी का जिम्मा उच्च शिक्षा निदेशक को सौंप दिया गया है। हिंदी साहित्य सम्मेलन भवन का आजादी आंदोलन में भी योगदान रहा। तब यहां हिंदी के दीवाने जुटते थे। हिंदी प्रेमियों का मेला लगता था लेकिन अब यह बदहाली का शिकार है। हिंदी साहित्य सम्मेलन का भवन परिसर अब प्रदर्शनियों के आयोजन के लिए किराए पर दिया जाता है(राघवेन्द्र नारायण मिश्र,नई दुनिया,दिल्ली,हिंदी दिवस,2011)।

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपको हिंदी दिवस की बहुत बहुत हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएं

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  2. नीतीश की इस नौटंकी सेवा से भ्रम में मत आइए। उनका भाषा के लिए रवैया मेरे ब्लाग पर दिखाया गया है।

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