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30 सितंबर 2010

छात्र और हिंसा

सिर्फ एक दिन के अंतराल पर दिल्ली के दो विश्वविद्यालयों में छात्रों के बीच हुई मारपीट में एक छात्र की मौत हो गई तो दूसरे में भी एक छात्र बेहद गंभीर अवस्था में है। दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कालेज (सांध्य) में कथित तौर पर छात्र संघ के पदाधिकारी ने अपने साथियों के साथ मिलकर ललित नाम के छात्र की पिटाई की। उसे बचाने अक्षय आया तो उसे भी पीटा। दोनों छात्रों को बेहोशी की हालत में और बुरी तरह जख्मी अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां अक्षय की हालत अब भी गंभीर बनी है।

उधर, जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में क्लास में पढ़ रहे छात्र शाहरुख को फोन कर बाहर बुलाया गया, जहां से उसे विश्वविद्यालय परिसर के बाहर थोड़ी दूर पर ही पीट-पीटकर मार डाला। पुलिस छात्र को नजदीक के होली फैमिली अस्पताल ले गई, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। दोनों ही हिंसक वारदातों का कारण अभी स्पष्ट नहीं हुआ है। कारण चाहे जो भी हो, लेकिन जिस तरह की यह हिंसक वारदात है और वह भी छात्रों के बीच यानी ये सब आम घरों के छात्र हैं, कोई बड़े अपराधी गैंग के सदस्य नहीं हैं, यह मसला चिंतनीय है।

विश्वविद्यालय और कॉलेज के छात्रों के अलावा स्कूली छात्रों के बीच भी जानलेवा हमलों और झगड़ों की खबरें आती रहती हैं। पिछले साल दिल्ली के विकासपुरी इलाके में सरकारी स्कूल में पढ़ रहे छात्रों के बीच पिस्तौल से चलाई गई गोलियों का मामला भी आया था। इस समस्या के बारे में जानकारी एकत्र करने के उद्देश्य से गत वर्ष सफदरजंग अस्पताल के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग ने दक्षिणी दिल्ली के तीन स्कूलों और दो कॉलेजों में एक अध्ययन कराया था। इस अध्ययन में 14 से 19 वर्ष उम्र के बीच के 550 विद्यार्थियों को शामिल किया गया था। इस अध्ययन के नतीजे चौंकाने वाले और अभिभावकों तथा समाज के लोगों को सोचने के लिए मजबूर करने वाले थे। रिपोर्ट के मुताबिक 12 प्रतिशत छात्र हथियार लेकर पढ़ने जाते हैं। अध्ययन में 15.7 लड़के तथा 3.7 फीसदी लड़कियां हथियार रखती पाई गई। एक साल के भीतर इन हथियारों से 13.5 छात्रों ने किसी न किसी को डराया-धमकाया या घायल किया। पाए गए हथियारों में चाकू, बंदूक, तलवार और हंटर आदि शामिल थे। कहने के लिए अधिकतर विद्यार्थियों ने कहा कि उन्होंने इसे आत्मरक्षा के लिए रखा है, लेकिन अपने सहपाठियों के बीच दबदबा तथा आतंक कायम करने के लिए यह काफी होता है। हालांकि वे रोज इन हथियारों से किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं, लेकिन दूसरों को कमजोर स्थिति में डालने के लिए यह काफी होता है कि उनके पास वार करने के लिए हथियार है।

यही विचारणीय मुद्दा है कि दूसरों को डराने, पीड़ा पहुंचाने में आनंद की अनुभूति क्यों होती है? प्रश्न उठता है कि इस तरह की गुटबाजी और मारपीट से शिक्षा संस्थानों के अंदर हिंसा की जिस संस्कृति का विस्तार हो रहा है, उसकी जड़ें कहां पर हैं। जहां तक विश्वविद्यालय प्रशासन के रवैये का सवाल है तो यही दिखता है कि वह उक्त मसले पर गंभीर नहीं है। उसने सिर्फ यही जाना है कि कोई घटना होने पर दोषी छात्रों को संस्थान से निकाल दिया जाएगा और शेष कार्रवाई करना पुलिस का काम है तथा पीडि़त पक्ष अपने लिए न्यायालय से न्याय मांगेगा। शिक्षा संस्थानों की तरफ से समय-समय पर अनुशासन का डंडा अवश्य दिखाया जाता है, मगर छात्रों की पढ़ाई में रुचि कैसे बनेगी, पाठयेतर गतिविधियां क्या हों, जो कि छात्रों में आपसी सद्भाव, सरोकार और टीमवर्क की भावना बढ़ाएं, दूसरे सामाजिक मुद्दों पर उनकी जागरूकता के लिए क्या किया जाना चाहिए, इसके लिए अधिक मशक्कत नजर नहीं आती है।

कुछ कॉलेजों और अन्य शिक्षा संस्थानों में छात्रों के चतुर्दिक बहुमुखी विकास के लिए कोशिश तो दिखती है, लेकिन अधिकतर शिक्षा संस्थान ऐसे ही हैं, जहां गतिविधियों के नाम पर कुछ खानापूर्ती की जाती है। अलग-अलग विभागों को छात्रों के साथ अंत‌िर्क्रया चलाने के लिए जिन सोसाइटियों का निर्माण करना पड़ता है, वहां पर भी आमतौर पर औपचारिकता ही निभाई जाती है। दिल्ली के शिक्षा संस्थान में काउंसिलर होने के नाते अपने एक दशक से अधिक के अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि जो सोसाइटी अधिक सक्रिय रहती है, अपनी विशिष्ट गतिविधि के बहाने छात्रों को आपसी गहन अंत‌िर्क्रया का मौका देती है। आपस में टीमवर्क कैसे विकसित हो, इस पर जोर देती है। वहां स्वस्थ मित्रता और मुद्दों से जुड़ाव बनता है। ऐसे छात्र विध्वंसक गतिविधियों में नहीं के बराबर होते हैं। दिल्ली के कुछ कॉलेजों में ड्रामा सोसायटी काफी सक्रिय हैं। कहीं जेंडर संवेदनशीलता बनाने के लिए बने केंद्र सक्रिय हैं, इनमें शामिल छात्र निश्चित ही कॉलेजों में अपनी अलग छाप छोड़ते दिखते हैं।

शिक्षा संस्थानों में अपने भविष्य को संवारने के लिए पहुंचे छात्र-छात्राओं से अगर संस्थान के अंदर बेहतर माहौल का साबका पड़ेगा तो वे वैसे बन सकते हैं, लेकिन अगर संस्थान के अंदर खराब किस्म का माहौल है तो वे कैसे प्रेरित हो सकते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत के शिक्षा संस्थानों में छात्र एवं शिक्षक के बीच का अनुपात अब भी काफी विषम है यानी एक शिक्षक और शिक्षिका को अपनी क्षमता से अधिक छात्र-छात्रों की देखरेख करनी पड़ती है। निश्चित ही अधिक शिक्षा संस्थान खोलने, अधिक संख्या में शिक्षक भर्ती करने के बारे में कदम उठाने ही होंगे। एक स्थूल अनुमान के मुताबिक आज जितनी छात्र संख्या है, उसे पूरा करने के लिए पांच लाख अतिरिक्त शिक्षकों की भी आवश्यकता है। मगर यह हुआ स्थिति का एक पहलू। कॉलेजों या विश्वविद्यालयों में आमतौर पर यह अनुपात इतना विषम नहीं है। वहां पर अध्यापनरत लोग (जिनकी तनख्वाहें भी अच्छी हैं, अगर आप किसी सरकारी अनुदान प्राप्त कालेज में अध्यापन कर रहे हों) अधिकतर संस्थान के अंदर की आपसी गुटबाजी या पढ़ाने के नाम पर खानापूर्ति करने में ही व्यस्त दिखते हैं। कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में हाजिरी लगाने की अनिवार्यता भी नहीं होती, इसका फायदा उठाते हुए तमाम लोग क्लास लेने की जहमत तक नहीं उठाते हैं। उन्हें यह सोचना ही होगा कि उनको मिल रही अच्छी तनख्वाह जनता के करों से आती है और उसके प्रति उनकी न्यूनतम जिम्मेदारियां भी हैं।

ध्यान दें कि रैगिंग करने वाले छात्र किसी भी संस्थान में पुराने छात्र होते हैं, जो साल दो साल अपने शिक्षण संस्थान में पढ़ चुके होते हैं। यदि उनका गहरा नाता अपने गुरुओं से बन पाया होता, जिसमें वे कहीं से भी यह सीख पाए होते कि दूसरों का हक छीनना जुर्म है या अपने व्यवहार से दूसरे को तकलीफ पहुंचाना भी सभ्य इंसान की पहचान नहीं है तो वे जरूर एक बार विचार करते, किसी के साथ आक्रामक हिंसा को अंजाम देने से पहले। इसमें कोई दो राय नहीं कि विद्यार्थियों में आपराधिक व्यवहार के लिए शिक्षण संस्थान या शिक्षकों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन जब शिक्षा संस्थान के हिंसा के अखाड़े में तब्दील होने की आशंका सामने दिख रही हो, वहां समाधान तलाशने के लिए इनकी भूमिकाओं की भी पड़ताल जरूरी होगी(अंजलि सिन्हा,दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,30.9.2010)।

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