04 अक्टूबर 2010

डीयू में कोबॉल्ट 60 : गामा सेल बेचने में घपला!

डूटा व शिक्षक संगठनों ने आरोप लगाया है कि चार टन वाले गामा सेल को कबाड़ में बेचे जाने में भी घपला किया गया था। संगठनों के मुताबिक तीन हजार किलो से अधिक वजन वाले गामा सेल को महज एक रुपये में बेच दिया गया था। शिक्षक संगठनों ने डीयू द्वारा बनाई गई जांच कमिटी की रिपोर्ट को मानने से इनकार कर दिया है और नए सिरे से जांच कमिटी बनाने की मांग की है।

डूटा प्रेजिडेंट आदित्य नारायण मिश्रा का कहना है कि रेडियोएक्टिव मटीरियल से युक्त गामा सेल को बेचने के लिए वाइस चांसलर समेत यूनिवर्सिटी के सीनियर ऑफिसर जिम्मेदार हैं लेकिन जांच कमिटी ने उनकी कोई जवाबदेही तय नहीं की। शिक्षक संगठन एएडी के जनरल सेक्रेटरी जे. खूंटिया का कहना है कि इस जांच कमिटी रिपोर्ट का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि इसे वीसी ने बनाया था, जो खुद इस मामले में सवालों के घेरे में हैं।

शिक्षक संगठन एनडीटीएफ के सीनियर लीडर इंद्र कपाही ने कोबॉल्ट 60 मामले में न्यायिक जांच की मांग की है और डीयू कमिटी की रिपोर्ट को नकारा है। सोमवार को इग्जेक्यूटिव काउंसिल की मीटिंग होनी है, जिसमें रिपोर्ट पर चर्चा होगी लेकिन शिक्षक संगठनों के रुख को देखकर लगता है कि मीटिंग में हंगामा होगा। जांच कमिटी की रिपोर्ट में कोबॉल्ट 60 से लैस गामा सेल को कबाड़ में बेचे जाने की घटना के लिए डीयू के केमिस्ट्री डिपार्टमेंट को जिम्मेदार करार दिया गया है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि पूरे डिपार्टमेंट को दोषी ठहराकर मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है जबकि रिपोर्ट में जिम्मेदार अधिकारियों व टीचर्स का नाम आना चाहिए था(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,4.10.2010)।


इसी विषय पर दैनिक भास्कर के दिल्ली संस्करण में शैलेन्द्र सिंह की खोजी रिपोर्ट भी देखिएः

एक पुराने गैस सिलेंडर, रेफ्रीजरेटर की कीमत क्या हो सकती है, क्या यह चार टन वजन के रेडियोक्टिव कोबाल्ट-60 के बराबर कीमत के हो सकते हैं। अगर आपका जवाब नहीं है तो दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से फरवरी-2010 में मंजूर कबाड़ की सूची पर जरूर नजर डाल लें।

दिल्ली विश्वविद्यालय ने यह सभी उत्पाद महज एक रुपए की दर से बेच दिए, और हैरान करने वाली बात तो यह है कि केमिस्ट्री विभाग की इस लापरवाही पर दिल्ली विश्वविद्यालय कुलपति व तत्कालीन समकुलपति ने भी बिना सोचे-समझे मंजूरी की मोहर लगाई।

रेडियोक्टिव गामा सेल वाले कोबाल्ट-60 की अनुचित नीलामी और उससे मायापुरी के कबाड़ बाजार में मचे हंगामे की जांच के लिए विवि की ओर से फिजिक्स के सेवानिवृत प्रो.एससी पंचौली की अध्यक्षता में गठित तीन सदस्यीय कमेटी की रिपोर्ट मे इस सारी गड़बड़ी की पोल तो खोली गई, इसके लिए जिम्मेदारी सुनिश्चित करने में कमेटी महज सुझाव देती नजर आई है।

कमेटी रिपोर्ट के बारे में जानकारी देते हुए विश्वविद्यालय में फिजिक्स के वरिष्ठ शिक्षक डॉ. इन्द्र कपाही ने बताया कि चार टन का कोबाल्ट-60 उपकरण किस तरह से महज एक रुपए में बेच दिया गया। उन्होंने बताया कि यह वहीं रेडियोक्टिव कोबाल्ट-60 है जिसके अधिकारिक तौर पर 20 हजार 385 रुपए स्थापित करने भर में लग गए थे।

डॉ. कपाही ने बताया कि 1969 में उपहार के तौर पर कनाडा से डीयू पहुंचे इस उपकरण को लेकर ऑटोमिक एनर्जी रेगुलेटरी बॉडी से सुरक्षा संबंधी गाइडलाइन मांगी गई थी, जिसमें इसके निपटान की प्रक्रिया को भी स्पष्ट कर दिया गया था, बावजूद न सिर्फ शिक्षकों बल्कि कुलपति तक ने इसे कबाड़ में बेचने जैसी बड़ी गलती की और जब जांच हुई तो इसके लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार कुलपति व समकुलपति से पूछताछ तक नहीं की गई।

डॉ. कपाही ने हैरानी जाहिर करते हुए कहा कि विवि प्रशासन की ओर से बार-बार कहा जाता है कि कोबाल्ट कबाड़ के साथ बेचा गया तो उस पर ध्यान ही नहीं गया, लेकिन यह भी उतना ही हैरान करने वाली बात है जितनी की इसकी नीलामी की कीमत।

क्योंकि आप ही बताएं कि 400 विभिन्न उत्पादों में चार टन की आइटम पर कैसे नजर नहीं गई। डॉ. कपाही का कहना है कि जांच रिपोर्ट में भले ही नीलामी से जुड़े पक्षों को साफ किया गया हो लेकिन इसके लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई को लेकर समिति खामोश है जो अनुचित है और ऐसी जांच रिपोर्ट का क्या औचित्य जिसमें दोषियों की पहचान के बजाए समूचे विभाग को जिम्मेदार ठहरा दिया जाए।


आज होगी रिपोर्ट पर चर्चा
कोबाल्ट-60 की अनुचित नीलामी को लेकर हुई प्रो. एससी पंचौली की तीन सदस्यीय जांच कमेटी की रिपोर्ट पर सोमवार चार अक्तूबर को एग्जीक्यूटिव काउंसिल की बैठक में चर्चा होगी। बीती 1अक्टूबर को यह रिपोर्ट काउंसिल के समक्ष पेश की गई थी जिसके बाद जहां सदस्यों ने रिपोर्ट पर सवाल खड़े किए वहीं दूसरी ओर उन्होंने कुलपति प्रो. दीपक पेंटल को भी जमकर कोसा।

सदस्यों का कहना था कि 124 पन्नों की जांच रिपोर्ट पर बिना अध्ययन के चर्चा संभव नहीं सो समय दिया जाएं और फिर चर्चा हो, जिसके तहत सोमवार को पुन: बैठक बुलाई गई। एग्जीक्यूटिव काउंसिल सदस्य डॉ. राजीब रे व डॉ. शिबा सी पांडा से जब इस बाबत पूछा गया तो उनका कहना था कि आप ही बताएं कि जो कुलपति खुद ही इस समूचे प्रकरण में आरोपी हो वह कहां तक असली गुनाहगारों को सजा दिलाने का प्रयास करेगा।

उन्होंने कहा कि हमारी कोशिश सोमवार को भी यहीं रहेगी कि कुलपति की बजाए बैठक की अध्यक्षता समकुलपति करें ताकि रिपोर्ट पर सहीं मायने में चर्चा हो सके।

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