03 अक्टूबर 2010

यह आइडिया आपको क्यों नहीं आया

कहा जाता है कि एक विचार पूरी जिंदगी को बदल देता है। पर यह भी सच है कि अपने विचार को एक सफल आकार देना कम मुश्किल काम नहीं है। कुछ लोग इसकी हिम्मत ही नहीं कर पाते, तो कुछ बीच राह में नुकसान और हार की आशंका में अपने विचार को छोड़ देते हैं। पर जो अपने विचार को सफल बिजनेस प्लान बनाने में कामयाब होते हैं, वे जानते हैं कि सफलता के लिए विचार की स्पष्टता, कड़ी मेहनत और फोकस्ड एप्रोच होना बेहद जरूरी है। जानते हैं युवाओं के कुछ ऐसे ही सफल विचारों को, जिनके बारे में आप कहेंगे कि यह आइडिया पहले आपको क्यों नहीं आया।

टाइप फाउंडरी
भारतीय भाषाओं के डिजाइनर टाइपफेस
इंडियन टाइप फाउंडरी के सह-संस्थापक सत्य राजपुरोहित वर्ष 2006 में अहमदाबाद स्थित नेशनल इंस्टीटय़ूट ऑफ डिजाइन में पढ़ाई कर रहे थे। उस समय उनके कॉलेज ने हॉलैंड के टाइपोग्राफर पीटर बिलक को अपने संस्थान में गेस्ट लेक्चर के लिए आमंत्रित किया था। वहां बिलक ने भारतीय भाषाओं में काम करने में रुचि दर्शायी।

28 वर्षीय सत्य भी इस दिशा में कुछ काम कर रहे थे। उन्होंने ई-मेल के जरिए बिलक को अपनी सेवाएं उपलब्ध कराने की बात की। वर्ष 2007 में बिलक ने उन्हें हेग स्थित अपने स्टूडियो में बुलाया, उस समय वे फ्रैंकफर्ट में एक इंटरनेशनल टाइप फाउंडरी में इंटर कर रहे थे। दोनों ने काम शुरू किया और मिलकर फेडरा हिंदी नामक नया टाइपफेस बनाया जो कि बिलक के फेडरा इंगलिश का देवनागरी विकल्प के तौर पर काम करता।

सत्य के अनुसार, इंगलिश टाइपफेस बनाना तुलनात्मक रूप से आसान है, वहीं देवनागरी में 800 से अधिक कैरेक्टर्स टाइपफेस की प्रक्रिया को कुछ जटिल बना देते हैं। फेडरा हिंदी को बनने में लगभग दो साल का समय लगा। इस बीच सत्य अपनी पढ़ाई पूरी कर चुके थे। इस दिशा में बिजनेस संभावनाओं की खोज के लिए सत्य और बिलक ने मिलकर इंडियन टाइप फाउंडरी की स्थापना की। वह कहते हैं, इस विचार की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसके लिए आपको अधिक पूंजी की आवश्यकता नहीं थी। कुछ कंप्यूटर और एक अच्छा प्रिंटर होना काफी था।

पहले ही महीने में उन्हें अपनी वेबसाइट के जरिए ऑनलाइन पहला क्लाइंट मिल गया। उसके कुछ समय बाद स्टार प्लस, नोकिया ग्लोबल और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने उनके पास संपर्क किया। सत्य के अनुसार भारतीय बाजार में काम करना बहुत आसान नहीं है। बड़े स्तर पर लोग यहां गुणवत्तापूर्ण टाइपफेसेज़ के महत्व को नहीं समझते। अधिकतर फॉन्ट जो उपलब्ध हैं वो इंजीनियरिंग कंपनियों द्वारा बनाए हुए हैं।

ऐसे में डिजाइनर्स द्वारा नहीं बने होने के कारण इनकी गुणवत्ता अच्छी नहीं होती और इनमें से अधिकतर अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप भी नहीं होते। इस बिजनेस की सबसे बड़ी चुनौती पाइरेसी है। बड़े-बड़े कॉरपोरेट और ब्रॉडकास्टिंग हाउस पाइरेटिड फॉन्ट का इस्तेमाल करते हैं। हम फॉन्ट पर बहुत समय देते हैं और उसके साथ रिसर्च वर्क भी इससे जुड़ा है।

आरंभिक पूंजी- कुछ नहीं, अधिकतर काम डिजिटल है, जिसके लिए ऑफिस की जरूरत नहीं है।
पूंजी की व्यवस्था- पैसे की जरूरत नहीं है, कुछ कंप्यूटर, ई-मेल, प्रिंटर और स्काइपे
पहला ग्राहक- पहला लाइसेंस वेबसाइट के जरिए ऑनलाइन बेचा गया।
बड़ी चुनौती- पाइरेसी और डिजाइन सेंस की कमी


फोकटकॉपी
स्टूडेंट, एडवरटाइजर और कंपनी सबका फायदा
फोटोकॉपी का यह विचार आईआईटी दिल्ली से मैथ्स एंड कंप्यूटिंग में एमटैक डिग्री की पढ़ाई कर रहे 23 वर्षीय हर्ष नारंग के दिमाग की उपज है। तीसरे वर्ष के अंत में हर्ष और उनकी टीम ने ओरिजनल बिजनेस आइडिया प्रतियोगिता में भाग लिया। बकौल हर्ष हमने सबसे पहले स्टूडेंट्स की रोजमर्रा की जरूरत पर सोचना शुरू किया। इस दौरान उनका ध्यान फोटोकॉपी पर गया, जिसके लिए हर माह कॉलेज स्टूडेंट्स काफी पैसा खर्च करते थे।
उन्होंने विचार बनाया कि छात्रों को फोटोकॉपी निशुल्क उपलब्ध कराएंगे और कागज के पिछले भाग पर कंपनियों से विज्ञापन लिए जाएंगे। इस विचार में विज्ञापन राशि से फोटोकॉपी की लागत और मुनाफा निकल हो रहा था और स्टूडेंट्स को फायदा ही फायदा।

हर्ष और उसकी टीम ने अपने इस आइडिया के लिए 5 बी-प्लान प्राइज जीते। जून 2009 में हर्ष ने अपने विचार को मूर्त रूप देना शुरू किया और फोकटकॉपी स्टूडेंट एडवरटाइजिंग प्राइवेट लि. की स्थापना कर दी, जिसके लिए प्रारंभिक पूंजी की व्यवस्था अभिभावकों और बी-प्लान बिजनेस प्रतियोगिता की ईनामी राशि से जुटाई गई।

हर्ष कहते हैं, ‘हमने करियर लॉन्चर, कैफे कॉपी डे, निरूलाज और फास्ट ट्रैक जैसी ऐसी कंपनियों से संपर्क करना प्रारंभ किया, जिनका टारगेट कॉलेज छात्र-छात्राएं थीं। हमने प्रारंभिक प्लान में एक बदलाव भी किया, जिसके तहत हमने सीधे ही सुविधा स्टूडेंट्स को निशुल्क नहीं दी। इससे फोटोकॉपी के दुरुपयोग की संभावना थी। अत: मैंने फोटोकॉपी की कीमत स्टूडेंट्स से ली जाती फिर उन्हें उतनी राशि के लाभ दे दिए जाते।

मसलन, यदि किसी स्टूंडेंट ने 40 रुपये की फोटोकॉपी करवाई तो छात्र द्वारा भुगतान की गई यह राशि प्रिपेड कार्ड के जरिए उसके बैलेंस में जोड़ दी जाती थी।’ हर्ष के अनुसार प्रारंभ में बड़ी कंपनियों के मार्केटिंग विभाग को अपने विचार के लिए तैयार करना बड़ी चुनौती थी। मेरे पास सिर्फ एक विचार था जिसको मुझे सफल बनाना था। कुल मिलाकर नारंग की फोटोकॉपी आज लगभग 50 कॉलेजों में 75 हजार छात्र-छात्राओं तक पहुंच चुकी है। जल्द ही यह सुविधा मुंबई के 20 कॉलेजों में भी उपलब्ध कराई जाएगी।

प्रारंभिक पूंजी-5 लाख रुपये
पूंजी की व्यवस्था- परिवार और प्रतियोगिता के ईनाम की राशि
पहले ग्राहक- करियर लॉन्चर, कैफे कॉफी डे, निरूलाज और फास्ट ट्रैक
चुनौती- कंपनियों को विज्ञापन देने के लिए अपने विचार के प्रति तैयार करना।

इन्क्लूसिव प्लेनेट
दृष्टिहीनों तक पहुंचाया सूचना का संसार
इन्क्लूसिव प्लेनेट की कोर टीम में जो लोग शामिल हैं, उनमें तीन नाम प्रमुख हैं, राहुल चेरियन (36 वर्ष), सचिन मल्हान (31 वर्ष) और रुबेन जेकब (35 वर्ष)। इनमें से नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (एनएलएसआईयू) के स्टूडेंट राहुल और सचिन अपनी-अपनी फर्म चला रहे थे। रुबेन कंपनी के सदस्य बनने से पहले एक्रोडेलेन टेक्नोलॉजिस के सीईओ थे।

राहुल कॉपीराइट कानून के विशेषज्ञ होने के साथ-साथ विकलांगता नीति के सक्रिय कार्यकर्ता भी हैं। राहुल को नए प्रोजेक्ट का विचार तब आया जब वे वाशिंगटन में वर्ल्ड ब्लाइंड यूनियन की कॉन्फ्रेंस में भाग लेने गए। जहां एक एजेंडा विभिन्न सरकारों को इस दिशा में अग्रसर करना था कि सरकारें अपने देशों में दृष्टिहीन और अन्य अक्षम लोगों तक अधिक से अधिक पाठ्यसामग्री की पहुंच को सुनिश्चित करें। इसी कॉन्फ्रेंस ने राहुल के मन में दृष्टिहीन लोगों तक तकनीक की आसान पहुंच बनाने का विचार उत्पन्न किया।

वर्ष 2009 में राहुल और उनकी टीम ने इन्क्लूसिव प्लैनेट की शुरुआत की, जिसमें सूचना को इंटरनेट के माध्यम से दृष्टिहीन लोगों तक पहुंचाने का कार्य शामिल था। उन्होंने सूचनाओं को नेट पर ऑडियोफाइल्स के रूप में उपलब्ध कराया। इस वेबसाइट के माध्यम से दृष्टिहीन अपनी जरूरत की सामग्री ढूंढ़ सकते थे, एक-दूसरे को भेज सकते थे और विभिन्न किताबों और दस्तावेजों को उनके अनुकूल फॉरमेट में उपलब्ध कराया गया।

यहां आप दृष्टिहीन लोगों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर लेख व सामग्री भी देख सकते हैं। इस साइट के तुर्की, अमेरिका, कनाडा और लैटिन अमेरिका जैसे देशों से लगभग 4200 सक्रिय सदस्य हैं। खास यह है कि साइट को इस्तेमाल करने पर शुल्क नहीं है। यह प्लेटफॉर्म तकनीकी उद्यमशीलता में प्रतिष्ठित नामों से पूंजी की व्यवस्था करता है।

राहुल कहते हैं कि यह काम आसान नहीं था। दृष्टिदोष झेल रहे लोगों तक डिजिटल संसार को लेकर जाने की राह में कई अड़चनें हैं, जैसे वेबसाइटों पर सूचना ऐसे लोग किस तरह पढ़ेंगे? मौजूदा सूचना तंत्र और ऐसे लोगों के बीच अभी फासला है। आय के लिए उन्होंने एक अन्य सेवा शाखा भी बनाई जो छपे शब्दों को समझने में अक्षम लोगों तक सामग्री की पहुंच बनाने के लिए सॉफ्टवेयर विकसित करने का काम करती है। राहुल का अगला उद्देश्य साइट को ऑटोपायलट मोड में उपलब्ध कराना है।

प्रारंभिक पूंजी-4 लाख रुपये
पूंजी का प्रबंध- तकनीकी उद्यमियों से सहयोग मिलने से पहले अपने संसाधनों से पैसा जुटाया
पहला ग्राहक- नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ विजुअली हैंडीकैप्ड, देहरादून

डायल-ए-बुक सर्विस
स्पीड रीडिंग

डायल-ए-बुक सर्विस दिल्लीवासी बंधुओं मयंक और तरंग ढींगरा की कंपनी है। 25 वर्षीय तरंग दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतिम वर्ष के छात्र और 27 वर्षीय मयंक एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं जिन्होंने 2005 में फिडिलिटी इंटरनेशनल छोड़कर कई नए तकनीकी कार्य किए। वर्ष 2008 में ट्विटर की लहर चलने से पूर्व उन्होंने क्विपी नामक सेवा शुरू की थी। 2009 के मध्य में यह समाप्त हो गई और काफी विचार मंथन के बाद नया काम छेड़ा।

मयंक के अनुसार, ‘हम चाहते थे कि किताबें भी बर्गर और पिज्जा की तरह ऑर्डर पर मिलें। अधिकांश लोग ऑनलाइन क्रेडिट कार्ड इन्फॉर्मेशन देने से हिचकते हैं।’मयंक ने मात्र 48 घंटे में किताबों की सप्लाई के अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए ट्विटर पर अपने 1381 फॉलोअर्स के बीच यह सर्वे किया कि इस कार्य की कोई मार्किट है या नहीं। मयंक कहते हैं, ‘मैंने पाया कि जो लोग किताबें खरीदते हैं उन्हें यह सुविधा सेवा चाहिए और इसके लिए फोन या एसएमएस से आसान भला क्या है।’

मयंक ने 25 सितंबर 2009 को डायल-ए-बुक का ट्रायल रन किया। उन्होंने नया फोन नंबर लिया, एक वेबसाइट गठित की और सोशल नेटवर्किग साइट के जरिए नजदीकी मित्रों को ईमेल, एक्टिव ट्विटर फीड और फेसबुक के जरिए प्रचार किया। इसके बाद दोनों ने दरियागंज, नई सड़क के 50-60 दुकानदारों और एजेंटों से संपर्क साधा।
शुरुआती ऑर्डर दोस्तों और जानकारों से आए तो मयंक ने एक विधिवत कार्यशैली बनाई। सप्लायरों से पुस्तक प्राप्ति और डिलिवरी की समयसीमा तय की गई। पांच कर्मचारियों की यह कंपनी (दोनों संस्थापकों सहित) चल निकली। मयंक आज भी स्वयं 30 प्रतिशत डिलिवरी करते हैं। ‘मैं वेंचर कैपिटल फंड से फाइनेंस नहीं चाहता था। हम जल्दी मुनाफा कमाना चाहते थे और पहले ही माह में हम इसमें सफल रहे।’

पहले माह में डायल-ए-बुक सप्ताह में पांच पुस्तकें डिलिवर करती थी। सप्लायर छोटे ऑर्डरों के प्रति उदासीन रहते हैं। मयंक के अनुसार, ‘हम ज्यादा पुस्तकें स्टॉक नहीं करते।’ लिहाजा, आज डायल-ए-बुक एक माह में सौ पुस्तकें डिलिवर करती है। अब उन्होंने दिल्ली से बाहर के ऑर्डर भी लेने शुरू किए हैं जिसके लिए कूरियर सेवाओं की मदद ली जा रही है। जरूरी बात ये है कि कंपनी के 20 प्रतिशत ऑर्डर ट्विटर और फेसबुक जैसी सेवाओं के जरिए आ रहे हैं। कुछ दुर्लभ पुस्तकें उन्हें विदेशों से भी मंगवानी पड़ी थी। मयंक के अनुसार, ‘कस्टमर सर्विस हमारा मंत्र है। हम उपहार और छूट भी देते हैं, तो ग्राहक आएंगे ही।’

शुरुआती पूंजी-50,000 रुपए (निजी बचत से)
पहला ग्राहक- गूगल चैट पर ढींगरा के स्कूल मित्र ने ट्रायल रन के दौरान रुचि दिखाई। पुस्तक थी ‘दि रोड लैस ट्रैवल्ड’।
चुनौती- दिल्ली के खुदरा सप्लायरों से सांठगांठ करना और 48 घंटे की समयसीमा में पुस्तक पहुंचाना।

(हिंदुस्तान,दिल्ली,27.9.2010)

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