04 अक्टूबर 2010

डिग्री कानून की, अधिकारी दगवाते रहे गोले

कानून की उचित डिग्री होने के बावजूद आर्मी अपने तोपखाने के एक मेजर से स्थायी तौर पर न्यायिक काम लेने के बजाए उनसे गोले दगवाते रहे । इतना ही नहीं, कानून की डिग्री हासिल करने वाले मेजर ने न्यायिक काम करने के लिए सभी जरूरी शर्तें भी पूरी कीं। बावजूद इसके, आर्मी उन्हें ‘जज एडवोकेट जनरल विभाग’ (जैग) में स्थायी तौर पर तबादला करने के बजाए उनके कानून की डिग्री पर ही सवाल खड़ा करते रहे । आर्मी के इस रवैये पर दिल्ली हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए मेजर आलोक शुक्ला को तोपखाने से जैग विभाग में तबादला करने का आदेश दिया है । न्यायमूर्ति गीता मित्तल व जे.आर मिधा की दो सदस्यीय खंड पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि आर्मी ने मेजर शुक्ला को जज एडवोकेट जनरल विभाग में तबादला नहीं करके न सिर्फ उनके साथ भेदभाव किया है, बल्कि अन्याय किया है। खंडपीठ ने चार सप्ताह के भीतर उन्हें जज एडवोकेट जनरल विभाग ( सेना कोर्ट ) स्थायी तौर पर न्यायिक काम देखने के लिए तबादला करने को कहा है । इसके साथ ही हाईकोर्ट ने बेवजह अधिकारी की मांग को दरकिनार कर उन्हें कोर्ट आने के लिए मजबूर करने को गंभीरता से लेते हुए केन्द्र सरकार पर 25 हजार रुपये जुर्माना किया है । जुर्माने की रकम मेजर शुक्ला को बतौर मुकदमा खर्च अदा करने को कहा गया है ।

दरअसल वर्ष 1992 में स्नातक की पढ़ार्ई पूरी करने के बाद आलोक शुक्ला ने छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर में काननू की पढ़ाई शुरू कर दी , लेकिन इसी बीच उन्हें आर्मी के तोपखाने में नौकरी मिल गई। इसके बाद नौकरी में आने के बाद छुट्टी के अभाव में शुक्ला कानून की पढ़ाई पूरी नहीं कर पा रहे थे। लेकिन 2003 में प्रथम श्रेणी में कानून की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने जैग विभाग में तबादला करने की गुहार लागई। इसके बाद उन्होंने इसके लिए सभी जरूरी शर्तें पूरी की। जुलाई 2004 में मेजर शुक्ला को जैग विभाग में अस्थायी तौर पर तबादला कर दिया था लेकिन वर्ष 2006 में उन्हें स्थायी तौर पर जैग में तबादला करने से इंकार करते हुए दोबारा से तोपखाने में तैनात कर दिया था(हिंदुस्तान,दिल्ली,4.10.2010)।

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