इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा कि जिनकी कुर्बानियों के दम पर देश निर्भय और महफूज है, वे अब अपनी कुर्बानी की याद सरकार को इसलिए दिला रहे हैं कि उन्हें शहीद का दर्जा दिया जाए। पिछले दिनों अर्द्धसैनिक बल के जवानों की पीड़ा इस अर्थ में उभरकर सामने आई कि सरकार उन्हें शहीद का दर्जा नहीं दे रही है। निस्संदेह रूप से जवानों की यह पीड़ा हर भारतीय की आत्मा को संवेदना से भर देने वाली है। इसमें शक नहीं कि केंद्रीय अर्द्धसैनिक बल के जवान एक साथ कई मोर्चे पर जूझ रहे हैं और देश की सुरक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा रहे हैं, लेकिन बिडंबना यह है कि आंतरिक सुरक्षा में लगे केंद्रीय अर्द्धसैनिक बलों के जवानों को अपनी शहादत तो देनी पड़ रही है, लेकिन सरकार द्वारा उन्हें शहीद का दर्जा नहीं दिया जा रहा है। आज वे कश्मीर से लेकर उत्तर-पूर्व के आतंकियों से लगातार लोहा ले रहे हैं। साथ ही देश के लिए नासूर बनते जा रहे नक्सलियों से तो अक्सर उनका साबका पड़ रहा है। नक्सलियों से मुठभेड़ और उनके कायराना हमले में अब तक सैकड़ों जवानों को अपनी जान गंवानी पड़ी है, लेकिन दुर्भाग्य है कि जवानों की शहादत को सरकार गंभीरता से लेने के बजाए कई बार यहां तक कह गई है कि लापरवाही और प्रशिक्षण के अभाव के कारण ही जवानों की जानें जा रही है। जवानों की शूरवीरता के लिए यह घोर अपमान वाली टिप्पणी तो है ही, साथ ही यह सरकार के निष्ठुर रवैये को भी प्रदर्शित करने वाला है। सवाल सिर्फ केंद्रीय अर्द्धसैनिक बलों के जवानों को शहीद का दर्जा दिए जाने तक ही सीमित नहीं है। सवाल उनके मान-सम्मान और देश के प्रति उनके अतुलनीय जज्बे के प्रति अनुरागात्मक लगाव को लेकर भी है। आज की तारीख में सेना के जवानों के लिए शहीद का दर्जा तो हासिल है, लेकिन केंद्रीय अर्द्धसैनिक बलों के जवानों के लिए नहीं। यह स्थिति जवानों के मनोबल को तोड़ने के साथ ही भेदभाव पैदा करने वाली है। सरकार के उदासीन रवैये के कारण ही आज केंद्रीय बलों के जवानों के मन में लगातार कुंठा बढ़ती जा रही है। यह कुंठा जवानों के मनोबल को इतना डांवाडोल कर रखी है कि वे संभवत: इसलिए भी आत्महत्या पर उतारू हो रहे हैं। याद होगा पिछले दिनों झारखंड राज्य के सरायकेला में एक जवान ने अपने असिस्टेंट कमांडेंट सहित 6 लोगों को गोलियों से उड़ा दिया था। यह हृदय विदारक घटना एक जवान की कुंठा का ही परिणाम है। अब तो आए दिन ऐसी घटनाएं देखने-सुनने को मिल रही हैं। एक आंकड़े के अनुसार पिछले तीन सालों में विभिन्न अर्द्धसैनिक बलों के 317 से अधिक जवान आत्महत्या कर चुके हैं। केंद्रीय सुरक्षा बल ने 2007 में 143 जवान खोए हैं, जिनमें ज्यादतर संख्या आत्महत्या करने वालों की ही है। लोकसभा में सरकार द्वारा स्वीकारा भी जा चुका है कि इस साल अब तक तकरीबन 9000 से अधिक अर्द्धसैनिक बलों के जवान नौकरी को ठोकर लगा चुके हैं। दरअसल, देश के जवान सरकार के रवैये से खासे नाराज हैं। सरकार उनकी मांगों पर सहानुभूति पूर्वक विचार करने के बजाए टालमटोल का रवैया ही अख्तियार कर रही है। सच कहा जाए तो देश की सुरक्षा का उत्तरदायित्व संभाल रहे जवान आज खुद असुरक्षित स्थिति में हैं। आज उनके पास आधुनिक हथियारों का अभाव तो है ही साथ ही बचाव के लिए मजबूत सुरक्षा कवच यानी बुलेट प्रूफ जैकटों की भी भारी कमी है। सरकार द्वारा संसद में कहा जा चुका है कि केंद्रीय सुरक्षा बलों के पास सुरक्षा जैकेटों का भारी अभाव है। एक आंकडे़ के अनुसार, असम राइफल्स में 6,237, सीमा सुरक्षा बल में 15,647, केंद्रीय औद्योगिक पुलिस बल में 11,861, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल में 40,069, भारत तिब्बत सीमा पुलिस बल में 8,216, राष्ट्रीय सुरक्षा गारद में 1,725 और सशस्त्र बल में 2,645 बुलेट प्रूफ जैकेटों की कमी है। समझा जा सकता है कि इसके अभाव में नक्सलियों और आतंकियों से लोहा लेते वक्त जवानों पर क्या बीतती होगी। पिछले दस सालों के भीतर सिर्फ नक्सलियों से मुठभेड़ में 665 से अधिक जवान शहीद हो चुके हैं। आतंकियों से दो-दो हाथ करने में न जाने कितने जवानों को रोज कुर्बानियां देनी पड़ रही है। आज देश के आंतरिक हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि हर छोटे बड़े उपद्रवों को दबाने के लिए जवानों की मदद ली जा रही है, लेकिन लाख टके का सवाल है कि इतने के बाद भी देश की सरकार जवानों को शहीद का दर्जा देने से इनकार कर रही है। इसका मतलब तो यह हुआ कि सरकार नक्सलियों और आंतरिक उपद्रवियों को देश-समाज का शत्रु मान ही नहीं रही है। अन्यथा, उनके द्वारा किए जा रहे राजद्रोहपूर्ण कृत्यों को कुचलने में अपने प्राण गंवाने वाले अर्द्धसैनिक बलों के जवानों को शहीद का दर्जा जरूर देती। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि आज की तारीख में सेना के जवान भी सरकार के रवैये से खुश नजर नहीं आ रहे हैं। वे पिछले कई वर्षो से सत्तारूढ़ संप्रग सरकार से सशस्त्र बलों के लिए अलग वेतन आयोग की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार ने अपने कान बंद कर रखे हैं। मामला आज अदालत तक पहुंच गया है। अभी पिछले दिनों ही उच्चतम न्यायालय ने वेतन विवाद के लिए सैन्यकर्मियों द्वारा अदालतों की शरण लेने पर केंद्र सरकार को जमकर लताड़ा। न्यायालय ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह सेवारत और सेवानिवृत्त सशस्त्र बल कर्मियों के लिए अलग वेतन आयोग गठित करने पर विचार करे। न्यायालय की पीठ ने इतिहास में दर्ज चंद्रगुप्त मौर्य को चाणक्य की सलाह का हवाला देते हुए कहा कि जिस दिन सैनिक को अपने वेतन के लिए संघर्ष करना पड़ेगा, वह दिन देश के लिए दुखद दिन होगा। न्यायालय ने कहा कि सैन्यकर्मी अनुशासित होते हैं। वे दूसरों की तरह आंदोलन नहीं करते हैं। उन्हें अपने वेतन के लिए संघर्ष के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। न्यायालय का यह फैसला सरकार के कान के पास एक जोरदार आवाज है, लेकिन देखना यह है कि सरकार न्यायालय की इस टिप्पणी को सुझाव समझती है या आदेश। इसलिए कि संप्रग सरकार का रवैया विचित्रता से भरा हुआ है। वह अब न्यायालय के आदेशों को सिर्फ सुझाव मानकर अपनी गलतियों पर पर्दा डालने की हैरतअंगेज कोशिश कर रही है। सरकार के उदासीन रवैये के कारण ही पिछले कई सालों से हजारों सैन्यकर्मियों द्वारा अपना पदक लौटाया जा चुका है। एक बार तो ऐसा भी देखने को मिला कि एक सैन्य अधिकारी ने विरोध स्वरूप अपने कृत्रिम अंग को ही जला दिया था। सैनिकों के प्रति सरकार की लापरवाही और उपेक्षा का ही नतीजा है कि अभी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने सेना के एक जवान की विधवा को पेंशन के रूप में महज 80 रुपये दिए जाने पर गहरी आपत्ति जताई। अब समय आ गया है कि सरकार राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में अपनी नीयत और मंशा साफ करते हुए जवानों के जज्बातों को समझे। आज देश के जवान उद्वेलित और दुखी हैं। यह बात और है कि वे जल्दी इसे जाहिर नहीं होने देते, लेकिन इसमें तो कोई दो राय नहीं कि उनके मान-सम्मान को चोट पहुंच रही है। अगर तत्काल उनकी मांगों को मानते हुए उन्हें शहीद का दर्जा और उनके लिए अलग वेतन आयोग का गठन नहीं किया गया तो यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण ही साबित होगा(अरविंद जयतिलक,दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,1.10.2010)।
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