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30 सितंबर 2010

राजस्थानःप्रशासनिक सेवा परीक्षा के सवालों पर सवालिया निशान

राजस्थान लोक सेवा आयोग की आरएएस प्री परीक्षा का पैटर्न इस बार बदला हुआ था।

आयोग ने सामान्य ज्ञान का परचा नवीनतम समसामयिक घटनाक्रम के आधार पर तैयार किया। इससे उन अभ्यर्थियों को सीधा लाभ मिलेगा, जो सामान्य ज्ञान की तैयारी के लिए सतत अखबार पढ़ते रहते हैं। आयोग ने सामान्य ज्ञान का परचा 11 सितंबर के बाद तैयार करवाया। यह पता इस तथ्य से चला कि आयोग ने झारखंड में राष्ट्रपति शासन समाप्त होने के बाद अजरुन मुंडा सरकार के अस्तित्व में आने का सवाल भी पूछा।

आयोग ने तारीख देते हुए सवाल किया था कि 11 सितंबर को किसने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। झारखंड में इस दिन अजरुन मुंडा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। एक बड़ा परिवर्तन यह भी देखने को मिला कि सामान्य ज्ञान के परचे में पास होने के लिए सिर्फ राजस्थान संबंधी जानकारी ही पढ़ना पर्याप्त नहीं। राजस्थान के बाहर के भी सवाल पूछे गए।

सवालों को लेकर उठे सवाल!

आरएएस प्री-2010 परीक्षा के प्रश्नपत्रों में कुछ सवालों पर अभ्यर्थियों ने सवाल उठाए हैं। परीक्षा देकर लौटे अभ्यर्थियों ने हिस्ट्री, सामान्य ज्ञान, राजनीतिक विज्ञान के परचे में पूछे गए कुछ सवालों को त्रुटिपूर्ण बताया है। अभ्यर्थियों का कहना था कि हिस्ट्री के परचे में पूछा गया था कि यूनानी यात्री हैरोडॉट्स किस सदी में भारत आया। इसमें पांचवीं, दूसरी, छठी और पहली सदी चार विकल्प दिए गए थे। अभ्यर्थियों का कहना था कि चारों विकल्प गलत थे। हैरोडॉट्स कभी भारत आया ही नहीं।

सामान्य ज्ञान के परचे में एक सवाल पूछा गया कि राजस्थान के एक राज्य का वह शासक जिसने बनारस हिंदू विवि की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसमें महाराजा फतेहसिंह (उदयपुर), महाराजा उम्मेदसिंह (जोधपुर), महाराजा गंगा सिंह (बीकानेर) और मानसिंह द्वितीय (जयपुर) चार विकल्प दिए गए थे। अभ्यर्थियों का कहना था कि चारों ही विकल्प गलत थे। किताबों में माधोसिंह का नाम छपा हुआ है जिन्होंने पंडित मदन मोहन मालवीय को बनारस हिंदू विवि के लिए 5 लाख रुपए दिए थे।

राजनीतिक विज्ञान के परचे में भी बी सीरीज में 20वां सवाल था-निम्न लिखित में कौन सही है। इसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू के नाम के आगे मॉस गांधी एंड सोशलिज्म लिखा हुआ था। अभ्यर्थियों का कहना था कि यह किताब डॉ. राममनोहर लोहिया की लिखी हुई है, पंडित नेहरू की नहीं। इसी प्रकार डॉ. लोहिया के नाम के आगे विल टू पावर लिखा हुआ था, यह किताब भी लोहिया ने नहीं लिखी है। अभ्यर्थियों ने बोनस अंक देने की मांग की है(दैनिक भास्कर,अजमेर,30.9.2010)।

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