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04 अक्टूबर 2010

उप्र के 30 हजार आयुर्वेद डॉक्टरों की डिग्री अमान्य

भारतीय चिकित्सा परिषद ने उत्तर प्रदेश के 30 हजार से ज्यादा आयुर्वेद चिकित्सकों की डिग्रियों को अमान्य कर दिया है। साथ ही सभी को परिषद की चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने से भी वंचित कर दिया गया है। इस कार्रवाई को चुनौती देने के लिए चिकित्सक उच्च न्यायालय की शरण में जाने की तैयारी में हैं। भारतीय चिकित्सा परिषद के एक ही फरमान से सूबे के 30 हजार से ज्यादा आयुर्वेदिक चिकित्सकों के भविष्य पर अनिश्चितता छा गई है। चिकित्सा परिषद की चुनाव प्रक्रिया से ठीक पहले जो आयुर्वेदिक चिकित्सकों की मतदाता सूची जारी की गई है, उसमें राज्य के 30 हजार से ज्यादा चिकित्सकों के नाम काट दिए गए हैं। भारतीय चिकित्सा परिषद ने चुनाव के लिए उत्तर प्रदेश को छह डिवीजनों में बांटा है। परिषद द्वारा हाल ही में जारी मतदाता सूची में हजारों चिकित्सकों का नाम गायब है। सूत्रों के मुताबिक, प्रत्येक डिविजन में पांच हजार से ज्यादा चिकित्सकों को अमान्य करार दिया गया है। यह अलग बात है कि अमान्य किए गए चिकित्सक न केवल 32 वर्षो से चिकित्सीय सेवाएं दे रहे हैं, बल्कि 1995 में केंद्रीय भारतीय चिकित्सा परिषद के चुनाव में मतदान भी कर चुके हैं। जिस भारतीय चिकित्सा परिषद ने अपने पंजीयन प्रमाण पत्रों के द्वारा चिकित्सकों को प्रदेश में चिकित्सा करने का अधिकार किया, वही परिषद अपने ही पंजीयन प्रमाण पत्रों पर अंगुली उठा रही है। पूर्व में आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में आयुर्वेदाचार्य, आयुर्वेद शास्त्री, आयुर्वेद शिरोमणि, आयुर्वेद भास्कर जैसे कोर्स संचालित थे। केंद्र सरकार ने केंद्रीय भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम 1971 के तहत पूरे भारत में आयुर्वेद का एक ही पाठ्यक्रम और एक ही डिग्री प्रदान करने की व्यवस्था कर डाली। अलग राज्यों ने इसे अलग-अलग समय में लागू किया। यूपी में इसे 1978 में मान्य किया गया। इसके अंतर्गत यह व्यवस्था थी कि 1978 में प्रवेश पाने वाले वे आयुर्वेदिक छात्र, जिन्हें भारतीय चिकित्सा परिषद मान्यता देता था, 1978 के बाद मान्य नहीं होंगे। ऐसे में 1978 में एडमिशन लेने वालों पर नई व्यवस्था लागू होनी चाहिए थी। जो 1978 में उक्त कोर्स में अध्ययनरत थे, उन्हें मान्य किया जाना चाहिए था। अर्थात जो प्रथम से लेकर पंचम वर्ष के कोर्स कर रहे थे, उन पर नया नियम लागू नहीं किया जाना चाहिए था। यहां 1978 को आधार बनाकर उसके बाद विभिन्न कोर्स में पासआउट को अब इतने वर्षो बाद अमान्य करार दिया जा रहा है, जबकि भारतीय चिकित्सा परिषद ने ऐसे सभी चिकित्सकों को पूर्व में मान्यता देते हुए पंजीयन प्रमाण पत्र भी जारी कर दिए थे। ऐसे चिकित्सकों में डेढ़ हजार मुजफ्फरनगर, दो हजार मेरठ व 17 सौ सहारनपुर आदि जिलों के शामिल हैं। मुजफ्फरनगर में आयुर्वेद की प्रैक्टिस कर रहे डा.सर्वेश शर्मा ने बताया कि भारतीय चिकित्सा परिषद की इस खामी के विरोध में वे चिकित्सकों के साथ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे(अजय यादव,मुजफ्फरनगर,दैनिक जागरण,4.10.2010)।

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