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04 अक्टूबर 2010

हेल्थ केयर में रोजगार

कॅरिअर निर्माण की दृष्टि से देश के हेल्थकेयर सेक्टर को कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। जहां वर्ष २००६ में इसका कारोबार ३५ अरब डॉलर के बराबर था वहीं अब यह २०१२ में बढ़कर ७७ अरब डॉलर से ज्यादा होने की उम्मीद विशेषज्ञों द्वारा जताई जा रही है। हालांकि देश की विशाल आबादी और खासतौर से ग्रामीण क्षेत्रों में बसने वाली आबादी को देखते हुए यह स्तर भी ज्यादा नहीं है। असल में इस संभावित बढ़ोतरी के पीछे मूल कारण है मेडिकल टूरिज्म से मिलने वाली आय और प्राइवेट अस्पतालों का बढ़ता बोलबाला। सरकारी स्वास्थ्य सुविधा की बदहाली और दिन प्रतिदिन इन अस्पतालों के डॉक्टरों एवं प्रशासन की बेरुखी की वजह से आम आदमी को प्राइवेट डॉक्टरों की शरण में अंततः जाना पड़ जाता है।

लगभग समस्त सर्वेक्षणों में स्पष्ट कहा गया है कि आने वाले दशक में देश में निजी निवेश और कॉर्पोरेट अस्पताल संस्कृति के कारण उपलब्ध बेड और स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि होगी। इतना ही नहीं, अत्याधुनिक डायग्नोस्टिक उपकरणों पर भी प्रायः समस्त हॉस्पिटलों में ज्यादा धन खर्च किया जाएगा और सुपरस्पेशियलिटी अस्पतालों का प्रचलन बढ़ेगा। इन निजी कॉर्पोरेट अस्पतालों में अपोलो, मैक्स, मेदांता ग्रुप, मेट्रो हास्पीटल आदि का विशेषतौर पर नाम लिया जा सकता है। महानगरों से आगे बढ़ते हुए इन समूहों द्वारा छोटे शहरों में अब अस्पताल खोले जा रहे हैं ।

कहने को सरकारी अस्पतालों का भी आधुनिकीकरण किया जा रहा है पर यह अमूमन बड़े शहरों तक ही सीमित है । इस स्थिति की असल वजह सरकार के पास धन की सीमित मात्रा का होना तथा अन्य वरीयताओं का होना दिया जा सकता है । इसके बावजूद यह भी सच है कि स्वास्थ्यकर्मियों की सबसे बड़ी फौज को रोजगार इन्हीं सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों अथवा सरकारी अस्पतालों में मिला हुआ है। भविष्य में इनके लिए आधुनिक चिकित्सा उपकरणों को ऑपरेट करने वाले ट्रेंड टेक्नीशियन अथवा नई बीमारियों के नियंत्रण हेतु विशिष्ट ट्रेंड चिकित्सकों की नियुक्तियां बड़े पैमाने पर होंगी, इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।

इन ट्रेंड चिकित्साकर्मियों में डॉक्टरों, पेरामेडिकल स्टाफ, नर्सिंग कर्मियों, लैब टेक्नीशियन, रेडियोलॉजिस्ट, फिजियोथिरेपिस्ट आदि का उल्लेख किया जा सकता है। देश में इंजीनियरिंग कॉलेजों की तुलना में फिलहाल मेडिकल कॉलेजों की संख्या बहुत कम है लेकिन आने वाले समय में इनकी संख्या में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि होने की पूरी-पूरी संभावना व्यक्त की जा सकती है। इसी प्रकार सरकारी और निजी क्षेत्र में नर्सिंग एवं पेरामेडिकल की सुविधाओं पर बड़े पैमाने पर निवेश देखा जा सकता है। प्रायः ऐसे कोर्सेज की अवधि दो से चार साल की होती है और अन्य प्रोफेशनल कोर्सेज की तुलना में इनमें अपेक्षाकृत आसानी से दाखिले मिल जाते हैं। इतना ही नहीं इनकी फीस भी कम है। इसी क्रम में यह बताना भी प्रासंगिक होगा कि जहां विश्व में प्रति हजार जनसंख्या पर उपलब्ध बेड्स की संख्या ३.९६ लाख है, वहीं दूसरी ओर भारत में यह मात्र १.२० लाख है जो तुलनात्मक रूप से बहुत कम है। आने वाले समय में इस अनुपात में सकारात्मक वृद्धि होने की पूरी-पूरी संभावना है। इसी प्रकार कुल अस्पतालों के बेड्स की बात करें तो देश में फिलहाल यह १४ लाख हैं जबकि वर्ष २०२५ में अतिरिक्त १७ लाख बेड्स की संभावना व्यक्त की जा रही है।

अगर कुल स्वास्थ्यकर्मियों की तादाद देखें तो वर्तमान के १७ लाख कर्मियों की अपेक्षा दो वर्ष बाद २६ लाख स्वास्थ्यकर्मियों के लिए नौकरियां जरूरी होंगी। आम जनता में स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता और दूर-दराज के इलाकों में पसरती मेडिकल डायग्नोस्टिक सुविधाओं का नतीजा है ऐसे पेशेवरों के लिए सृजित होने वाले रोजगार के अवसरों में बढ़ोतरी की स्थिति। फार्मास्यूटिकल और डायग्नोस्टिक लैब्स द्वारा कॉर्पोरेट अस्पतालों के साथ मिलकर विभिन्न रोगों से बचाव और उनकी जांच के सस्ते एवं आकर्षक पैकेजों का बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार किया जा रहा है।

इस प्रकार के कार्यकलापों में टे्रंड और सेमी टे्रंड युवाओं को नौकरी अथवा कमीशन के आधार पर काम दिया जाता है। यही नहीं रोगियों, वृद्ध व्यक्तियों के लिए जांच सैंपल घरों से एकत्रित करने के काम में ऐसे युवाओं की बड़े पैमाने पर सेवाएं ली जा रही हैं। दवाइयों और अन्य सर्जिकल उपकरणों की सप्लाई का भी काम इसी क्रम में गिनाया जा सकता है जिससे हजारों की संख्या में लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई है। इस क्षेत्र के विशेषज्ञों की उम्मीदों की बात करें तो देखा जा सकता है कि आगामी वर्षों में यह क्षेत्र २० से २५ प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ेगा। भारत में मधुमेह, रक्तचाप और हृदय की बीमारियों से पीड़ित लोगों की बढ़ती आबादी के मद्देनजर भी हेल्थकेयर इंडस्ट्री के लिए कमाई के अच्छे अवसर होने से इनकार नहीं किया जा सकता है। इन्हें आधुनिक जीवन शैली की देन बीमारियों के नाम से भी जाना जाता है। सरकारी अस्पतालों में बुनियादी रोगों के उपचार की सुविधा ही फिलहाल सरकार द्वारा उपलब्ध कराने पर जोर है जबकि कॉर्पोरेट और निजी अस्पताल इन शहरी जीवन की आपाधापी से उपज रहे रोगों को ही अपने बिजनेस का आधार मानकर चल रहे हैं । पेरामेडिकल विधाओं से लेकर नर्सिंग ट्रेनिंग कर ग्रामीण पृष्ठभूमि के युवाओं के लिए यह क्षेत्र निश्चित रूप से आने वाले समय में रोजगार का बड़ा जरिया सिद्ध हो सकता है बशर्ते वे समय रहते इस प्रकार की ट्रेनिंग लेने की ओर कदम बढ़ाएं(अशोक सिंह,मेट्रो रंग,नई दुनिया,दिल्ली,4.10.2010)।

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