05 अक्टूबर 2010

यूपी में जाति और निवास प्रमाण-पत्र का खेलःबीस रूपए का फॉर्म,सुविधा शुल्क 300 रूपए

पॉलीटेक्निक के छात्र फजल खान निवास प्रमाण पत्र के लिए सदर तहसील में भटकते रहे। इनका आरोप था कि 250 रुपये दिए तब भी काम नहीं बना। सोमवार को सदर तहसील पहुंचे काकोरी निवासी विकलांग राम नारायन ने आरोप लगाया कि उन्होंने 300 रुपये देकर जाति प्रमाण पत्र बनवाया। कानपुर रोड एल्डिको कॉलोनी निवासी शुभांकर ने नियमानुसार फार्म भरा, कर्मचारियों ने उनके पिता का नाम ही गलत कर दिया। शुभांकर के मुताबिक नाम ठीक कराने के लिए कर्मचारी रकम चाहिए। सदर तहसील में खतौनी लेने, दाखिल खारिज कराने और जाति व निवास प्रमाण पत्र बनवाने के लिए लोग को भटक रहे हैं। कर्मचारियों की मिलीभगत से कदम-कदम पर खेल हो रहा है। 20 रुपये के फार्म से बनने वाले प्रमाण पत्र के लिए लोगों को 300 से 500 रुपये तक सुविधा शुल्क देनी पड़ रही है। इस संवाददाता ने सोमवार को सदर तहसील में एक दिन बिताकर हालात का जायजा लिया और भुक्तभोगियों से बात की। लोगों की भीड़, कर्मचारी नदारद तहसील परिसर के मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही वकीलों व जरुरतमंदों की भागदौड़ नजर आने लगती है। परिसर के बरामदे में खतौनी के काउंटर पर भारी भीड़ है। दो कतारों में लोग खड़े हैं। काम न होने से परेशान कुछ लोग थक हार कर फर्श पर ही बैठ जाते हैं। जरूरतमंद कतारों में खड़े थे लेकिन खतौनी देने वाले कर्मचारी नदारद। चंद कदम आगे बढ़ने पर काउंटर नम्बर-दो पर कुछ लोग नाराज नजर आए। बात शुरू हुई तो पता चला कि जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए वह परेशान हैं। नाराज लोगों ने आरोप लगाया कि जाति व निवास प्रमाण पत्र बनवाने के लिए फार्म मिलता है 20 रुपये का लेकिन काम कराने के लिए देने पड़ते हैं 300 से लेकर 500 रुपये। पैसे न दो तो फार्म में ही गड़बड़ कर दिया जाता है। उसके बाद लगाते रहो तहसील के चक्कर। हर जगह दलालों का मकड़जाल काउंटर नम्बर-दो का हाल जानने के बाद यह संवाददाता परिसर में बनी चाय की एक दुकान पर गया तो वहां पंचायत चुनाव के लिए जाति प्रमाण पत्र बनवाने आए कई लोग भटकते मिले। एक दलाल ने उन्हें भी वहीं घेर लिया और हर किसी से 300 से 400 रुपये रिश्र्वत लेकर फार्म भरवा दिया। काकोरी के सकरा गांव निवासी बंशीलाल, सरोजनीनगर के नंदलाल, रुदल प्रसाद व उमाशंकर को चुनाव में पर्चा दाखिल करने के लिए जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए सुविधा शुल्क देना पड़ा। वहीं तहसील परिसर के बरामदे के एक कोने में बैठकर बीड़ी के कश ले रहे मोहनलालगंज निवासी नौमीलाल व नरेश ने बताया जमीन के कागजात का नकल लेने सुबह नौ बजे ही आ गए थे। मजबूरन एक मददगार (दलाल) से मदद लेनी पड़ी। फिर भी अभी तक काम नहीं हुआ। तहसील में काम कराने वाले कुछ लोगों ने मुस्कराकर बताया कि यह रोज की बात है। ये भी हैं दिक्कतें प्रमाण पत्र बनवाने के लिए फार्म भरने के बाद उस पर तहसीलदार, कानूनगो व लेखपाल के दस्तखत होते हैं। तहसीलदार व कानूनगो मिल भी जाएं तो लेखपाल को ढूंढना काफी मुश्किल होता है। उनके भी दस्तखत हो गए तो फार्म को कम्प्यूटर पर लोड करते समय उसमें हेरफेर कर दिया जाता है(ज्ञानेश्वर चतुर्वेदी,दैनिक जागरण,लखनऊ,5.10.2010)।

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