01 अक्टूबर 2010

गैर-सरकारी कर्मचारियों को क्यों नहीं मिलता महंगाई भत्ता

बीते दिनों केंद्र सरकार ने आसमान छूती महंगाई से अपने कर्मचारियों को राहत देने की दिशा में महंगाई भत्ते की किस्त में दस फीसदी की बढ़ोतरी कर एक नया इतिहास रचने का काम किया है। महंगाई भत्ते की यह बढ़ोतरी मौजूदा दर, जो मूल वेतन या पेंशन की 35 फीसदी है, से अलग होगी। इसे मिलाकर केंद्रीय कर्मचारियों या केंद्र सरकार के पेंशन भोगियों का महंगाई भत्ता कुल 45 फीसदी हो गया है। केंद्र सरकार के आदेश के मुताबिक यह बढ़ोतरी एक जुलाई 2010 से लागू होगी, जो छठे वेतन आयोग की अनुशंसा के आधार पर की गई है। केंद्र सरकार का यह निर्णय प्रशंसनीय है कि उसे अपने कर्मचारियों और पेंशन भोगियों की इतनी चिंता तो है, लेकिन खेद इस बात का है कि यही केंद्र सरकार निजी क्षेत्र के कर्मचारियों और पेंशनधारियों के प्रति उदासीन क्यों है? उसे उनके दुख-दर्द और कष्टों की चिंता क्यों नहीं है, जबकि उनकी तादाद केंद्रीय कर्मचारियों से बहुत ज्यादा है। आखिर उनके साथ उसका सौतेलेपन का व्यवहार क्यों? आखिर निजी क्षेत्र के कर्मचारियों-श्रमिकों के लिए अपनी आवाज बुलंद करने वाले मजदूर संगठनों और उनके आका देश की कम्युनिस्ट पार्टियां इस सवाल पर मौन क्यों? अपने वेतन भत्तों की बढ़ोतरी के लिए एकमत हो जाने, संसद-विधान मंडलों में शोर-शराबा कर समय और जनता का पैसा बर्बाद करने वाले राजनीतिक दलों के सांसदों-विधायकों की चुप्पी का मतलब क्या है? इससे साफ जाहिर होता है कि इन्हें केवल अपने स्वार्थ की ही चिंता है, देश के निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की कतई नहीं। आखिरकार महंगाई की मार से क्या वे पीडि़त नहीं हैं और क्या उनके लिए महंगाई कोई मुद्दा नहीं है। सरकार के रवैये से तो यह प्रतीत होता है कि उसके लिए निजी क्षेत्र के कर्मचारी कीड़े-मकोड़े से अधिक कुछ नहीं। इनकी खातिर वह दुबली क्यों हो और क्यों राजनीतिक दल इस बारे में माथा-पच्ची कर अपनी ऊर्जा को बेकार में बर्बाद करें? देश में मौजूदा समय में निजी क्षेत्र में कुल 43 करोड़ से ज्यादा कर्मचारी-श्रमिक हैं। इनमें से केवल 4 करोड़ 44 लाख ही ईपीएफ योजना के तहत आते हैं। कर्मचारी पेंशन योजना 1995 के तहत मौजूदा दौर में विभिन्न श्रेणियों के लगभग 30 लाख से अधिक पेंशनभोगी हैं, जिनकी तादाद दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं। विडंबना यह है कि इन पेंशनभोगियों को पेंशन के नाम पर कुल कुछेक सौ रुपये ही मिलते हैं। उदाहरण के तौर पर देश के एक बहुत बड़े नामी-गिरामी नेता की अगुवाई वाले प्रतिष्ठान में सालों अपनी सेवा दे चुके कर्मचारी को पेंशन के नाम पर मात्र 571 रुपये ही मासिक मिलते हैं। वह भी कभी-कभी महीनों बाद। असल में भले उसने किसी प्रमुख समाचार पत्र समूह में काम किया हो, औद्योगिक प्रतिष्ठान में कार्य किया हो या किसी प्रतिष्ठित कंपनी में वह सालों अपनी सेवाएं दे चुका हो, उसे चार-पांच सौ से लेकर हजार-ग्यारह सौ रुपये महीने से आज भी ज्यादा पेंशन के तौर पर नहीं मिलते हैं। अधिकांश को तो विधवा-असहाय या वृद्धावस्था पेंशन के बराबर भी पेंशन नहीं मिलती। इनमें एक बराबरी जरूर है, वह यह कि इतनी राशि उन्हें शुरुआत में मिलती थी, तब से लेकर आजतक वही राशि उन्हें मिल रही है। उसमें बढ़ोतरी या फिर महंगाई-भत्ते की बढ़ोतरी का कोई प्रश्न ही नहीं है। सबसे बड़ी बात यह कि निजी क्षेत्र के सेवा से मुक्त कर्मियों को जो पेंशन मिलती है, उससे उनके परिवार का गुजारा तो दूर, न तो उस राशि से वह अपना इलाज ही करवा पाते हैं और न ही उससे अपना ही पेट भर पाते हैं। इन हालात में इस पेंशन को क्या कहेंगे, राहत या खिलवाड़ या फिर पेंशन के नाम पर कलंक, इसका निर्णय कौन करेगा, यह समझ से परे है। दरअसल, निजी क्षेत्र के लिए यह कर्मचारी पेंशन योजना-1995 सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की खातिर शुरू की गई थी, लेकिन आज वही सामाजिक सुरक्षा के नाम पर मजाक बनकर रह गई है। असलियत यह है कि कर्मचारी भविष्य निधि और कर्मचारी पेंशन योजना के तहत विभिन्न श्रेणी के पेंशनधारकों को मिलने वाली मासिक पेंशन राशि कई मामलों में मात्र 100 रुपये महीने है। इन योजनाओं की मौजूदा हालत पर टिप्पणी करते हुए केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय से जुड़ी स्थाई श्रम पर संसदीय समिति ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में कड़े शब्दों में कहा है कि सरकार निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के कल्याण के प्रति ढुलमुल रवैये का त्याग करे और (निजी क्षेत्र) कर्मचारी पेंशन योजना-1995 को महंगाई और मूल्य सूचकांक से जोड़े। समिति ने केंद्र सरकार से पेंशन फंड (इस कोष में करीब 1 लाख करोड़ रुपये हैं) में अपने अंशदान (अभी करीब 1.6 प्रतिशत) को बढ़ाने और न्यूनतम व पर्याप्त पेंशन राशि तय करने की मांग की है। जवाब में सरकार ने समिति को बताया है कि इसी मंत्रालय के विशेष सचिव की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति गठित की गई है, जो संबंधित पक्षों के साथ बैठक कर कर्मचारी पेंशन योजना-1995 की समग्र समीक्षा कर रही है। समिति ने सरकार से जानना चाहा है कि कई साल बीतने के बाद भी यह विशेषज्ञ समिति अपनी रिपोर्ट देने में क्यों देरी कर रही है। आखिकार सरकार के इस रवैये से यही जाहिर होता है कि वह येन-केन-प्रकारेण जान-बूझकर इस मामले में देरी कर निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के प्रति सौतेलेपन का बर्ताव और उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है। सरकार के रवैये की आलोचना करते हुए केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय से जुड़ी स्थाई श्रम पर संसदीय समिति ने चिंता व्यक्त की है कि ईपीएफ में कर्मचारियों का अपर्याप्त कवरेज है। यही नहीं, मजदूरी सीमा, वेतन सीमा जैसी शर्ते अब गैर-जरूरी हैं। कारण यह है कि अब मालिकों द्वारा कम कर्मचारियों से अधिकतम उत्पादन का चलन हो गया है। समिति के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन आए दिन तेजी से बढ़ती पेंशनभोगियों की तादाद से निपटने में अपर्याप्त कर्मचारियों की वजह से अक्षम साबित हो रहा है, जिसकी कमी पूरी किए जाने की बेहद जरूरत है। क्या सरकार को केंद्र सरकार के कर्मचारियों की तरह निजी क्षेत्र के कर्मचारियों-पेंशनभोगियों को महंगाई भत्ता नहीं देना चाहिए, जिसके वे हकदार हैं। क्या जिस तरह कर्मचारियों को शासन द्वारा हर साल महंगाई भत्ते की राहत राशि दी जाती है, उसका लाभ इन पेंशनभोगियों को नहीं मिलना चाहिए। इनको मिलने वाली पेंशन तो अनुग्रह राशि से भी कम है। अपने वेतन-भत्ते खुद बढ़ाने के लिए लालायित संासदों-विधायकों को इन पेंशनकर्मियों की बदहाली पर भी सोचना चाहिए कि आखिर इनका अपराध क्या है। यही कि इन्होंने निजी क्षेत्र में अपने जीवन के बेशकीमती साल खपाएं हैं। यही है उसका इनाम। समस्या तो यह है कि पिछली सरकारों में से इस बारे में सभी ने अपने नाकारेपन का ही सबूत दिया है। क्या देश के ईमानदार प्रधानमंत्री की पदवी हासिल कर चुके मनमोहन सिंह की सरकार भी उसी ढर्रे पर चलेगी या इस बारे में संवेदनशीलता का परिचय देगी। यह भविष्य के गर्भ में है। आखिर देश के निजी क्षेत्र के 30 लाख से अधिक पेंशनभोगियों का उद्धारक कौन होगा? यह सवाल आज बहस का मुद्दा बना हुआ है(ज्ञानेंद्र रावत,दैनिक जागरण,राष्ट्रीय संस्करण,30.9.2010)।

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