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04 अक्टूबर 2010

अंग्रेजी का नागरीकरण और हिंदी की होशियारीःसुधीश पचौरी

सन् 1967 के आसपास की बात होगी। कॉलेज के दिनों में यह बात अचानक फैल गई कि हिंदी के लिए कुछ करना है । हिंदी राष्ट्रभाषा है और अंग्रेजी उसे खाए जा रही है । अंग्रेजी से उसे खतरा है । बचाना है तो अंग्रेजी हटाओ। हिंदी लाओ। इस पुण्य प्रेरणा से प्रेरित हम कई छात्र हाथरस जैसे सोते-ऊंघते, मस्त मिजाज, निरे ब्रजभाषी शहर से अंग्रेजी हटाने लगे। ‘गुरु ! तुम का कर्रए हौ। वाकी भैं... आऔ आज अंगे्रजी हटांगे!’ ‘कछू नाए गुरु आज हत क्या एै सो भांग छनबे बारी एै। एक अंटा चढ़ांगे। बाके बाद कछू करिंगे।’ पर उधमी, फिल्मी प्राण की सी शक्ल और आवाज वाले, अंटेबाजी में अग्रणी, एक्शन में परमहिम्मती, बीए में अंग्रेजी में बस किसी तरह से पास नंबर लेकर अपनी थर्ड डिवीजन को फर्स्ट की तरह बताने वाले अंटा गुरु ने हमारे आंदोलनकारी फौरी प्रतिवेदन को एक अदद अंटे की एवज एक घंटे के लिए स्थगित क र दिया। कुछ मौज मस्ती की खातिर, कुछ हिंदी के नाम पर यूं-ही संग साथ हो गए हम बीसेक छात्र अंग्रेजी को हटाने के लिए अंग्रेजी ढूंढ़ने लगे। ब्रजभाषी शहर में अंग्रेजी बड़ी मुश्किल से नजर आई। कहीं ‘डाबर’ के बोर्ड में, कहीं ‘बालूजा’ के बोर्ड में, ‘सैमसन’ के ‘रेडीमेड ’ कपड़ों के विज्ञापन बोर्ड में, क हीं ‘बाटा शूज’ की दुकान में लिखी नजर आई। कहीं अपने सुंदर से बच्चे के साथ ‘मर्फी रेडियो’ बेचती नजर आई तो कहीं ‘बिनाका’ में नजर आई। कहीं बाल काले करने वाले ‘वेस्मोल’ के बोर्ड में नजर आई।

ये सब अब तक अखरी नहीं थी। इस आंदोलन के वातावरण में दुकानों के बोर्डों में ऐसी ‘अंग्रेजी’ साफ साफ लिखी नजर आई। ‘दुश्मन इतना साफ और इतना सामने कभी नहीं हो सकता’ कुछ ऐसा भानकर हम एक्शन में आ गए। संयोग से पास में बन रही सड़क के लिए रात को उबाले गए कोलतार के खुले छोड़ दिए गए ड्रम में पास खड़े नीम की एक टहनी डुबोकर तुरत अंग्रेजी शब्दों पर पोतने लगे। आनन-फानन में ‘अंग्रेजी हटाओ’ उधम हाथरस में इस तरह शुरू हुआ और पूरा हुआ। बाद में हिंदी पढ़ते-पढ़ते मालूम पड़ा कि वह ‘उधम’ नहीं ‘आंदोलन’ था और ‘ऐतिहासिक ’ भी था। कई दुकानों के बोर्डों के अंग्रेजी शब्दों पर कालिख पोत दी गई। कुछ देर बाद अंग्रेजी हटाने के रास्ते में कुछ बाधाएं उपस्थित हो गईं। सामने ‘गुप्ता एंड संस’ वाला बड़ा बोर्ड था। जगह-जगह गुप्ता, अग्रवाल, शर्मा इत्यादि अपने-अपने ‘एंड संस’, ‘एंड ब्रदर्स, ‘एंड कंपनी’ लिए नागरी अक्षरों में सुशोभित थे। अचरज कि वे हमें अंग्रेजी के नहीं लगे। हिंदी के लगे। हिंदी में अंग्रेजी घुसी पड़ी है । यह नजर नहीं आया। लेकिन अंटा गुरु ने ‘जै हिंदी’ वाले जोश में अपने चमक गए दिमाग से हिंदी में अंग्रेजी की इस घुसपैठ को पकड़ा और चीख पड़े -‘जे भैं... ‘एंड संस’ यहां क्या अपनी... रहा है । जाकू काहे को छोड़ रए हो... लप्तू गुरु कर दो इसका भी सोलह सिंगार...।’ इस एक्शन के बीच, भाषादीक्षित होते दूसरे पक्ष से यह बात काटी गई। कहा गया कि ‘है तो हिंदी ई गुरू ... जि अंगे्रजी नाएं।’ यह प्राइमरी स्कूल के मास्टरजी का बेटा था। अक्सर कायदे की बातें करता था। इस तरह ‘एंड संस’ नागरी में होने से बच गए।

हमारे ‘अंग्रेजी हटाओ’ का अंत इस तरह हुआ। आंदोलनकारियों के झुंड में किसी की नजर अचानक मास्टर जी के बेटे की कलाई में बंधी एचएमटी की नई घड़ी पर पड़ी जो उसे सगाई में मिली थी। उस में अंग्रेजी थी। सुरक्षित। उसे देख एक ने सीधा आवाहन किया‘जि तेरी घड़ी मेंई अंग्रेजी एै भातई जाए भूल रौ ऐ। ओ रे छोरा लइयो नेंक कोलतार..।’ मास्टर जी के बेटे ने अंग्रेजी हटाओ की बहस के अचानक ‘प्रैक्टीकल’ हुए जा रहे मिजाज को भांपा और गिरोह से बाहर निकल दौड़ लगा दी। तब से अब तक हिंदी की ऐसी ‘होशियारी’ बढ़ी है । ‘एंड संस’ की जगह बहुत सारे अंग्रेजी शब्दों का नागरीकरण होने लगा है । ‘अंग्रेजी हटाओ’ का ऐतिहासिक था। आज का नागरीकरण भी ऐतिहासिक ही है (हिंदु्स्तान,दिल्ली,3.10.2010)।

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