विधि सलाहकार ने पिछले तीन माह में कई बार लिखित सलाह दी। पूर्व अतिथि प्रवक्ताओं ने भी अपनी दावेदारी लगातार बनाए रखी। यह अलग बात है कि अब तक पूर्व अतिथि प्रवक्ताओं को किस तरीके से रखा जाए, इस मामले पर एक भी स्पष्ट निर्देश जारी नहीं हो सका। मामला दर्शनशास्त्र विभाग में शिक्षकों की नियुक्ति का है। इस मसले पर निर्णय लेने की जगह विधिक सलाह को फाइल व पत्र के साथ एक दूसरे के पास भेजने का खेल लगातार चल रहा है। इन सबके बीच कला संकाय के डीन ने रजिस्ट्रार को पत्र लिख कर उनसे मामले पर स्पष्ट निर्देश देने का अनुरोध किया है। दर्शनशास्त्र विभाग में शिक्षकों की नियुक्ति के मसले पर विश्वविद्यालय के विधिसलाहकार पीएस बघेल ने जुलाई, अगस्त व सितंबर में कई बार विधिक सलाह दी। इसमें डा. उमाकांत व अन्य के मामले में उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश के आज भी प्रभावी होने तथा इस लिहाज से अतिथि प्रवक्ताओं की तैनाती जारी रखने को कहा गया है। विधि सलाहकार की इस सलाह के बाद विभाग में हाल ही में तैनात शिक्षकों की नियुक्ति अवैध घोषित होने का संकट खड़ा हो गया है। यह अलग बात है कि अभी तक इस मसले पर किसी की भी ओर से कोई स्पष्ट आदेश जारी नहीं हो सका है। पहले कार्यवाहक कुलपति प्रो. केजी श्रीवास्तव व बाद में कुलपति प्रो. राजेन हर्षे ने इस सलाह के अनुपालन के लिखित निर्देश जारी किए। इनके निर्देशों के क्रम में रजिस्ट्रार ने विभागाध्यक्ष व कला संकाय के डीन को पत्र जारी किए। इन सभी ने विधिक सलाह को पत्रावली व पत्र के साथ संलग्न कर न्यायालय के आदेश का अनुपालन करने का निर्देश दिया। कला संकाय के डीन प्रो. एमपी दुबे द्वारा रजिस्ट्रार को भेजे गए पत्र के अनुसार यहां शिक्षकों के कुल नौ पद रिक्त थे। इसमें प्रो. एचएस उपाध्याय के परीक्षा नियंत्रक बनने के बाद रिक्त हुआ पद भी शामिल है। इन पदों पर पांच स्थाई व चार अतिथि प्रवक्ताओं की नियुक्ति विश्वविद्यालय कर चुका है। डा. उमाकांत व अन्य के मामले में शामिल दो पूर्व अतिथि प्रवक्ता भी इसमें चयनित हो चुके हैं। अब एक भी पद रिक्त नहीं हैं। ऐसे में पूर्व के तीन अतिथि प्रवक्ताओं को कैसे रखा जाए। इसके लिए या तो हाल ही में नियुक्त शिक्षकों की नियुक्तियां निरस्त की जाएं या नए पद सृजित कर तैनाती की जाए। फिलहाल, रजिस्ट्रार के निर्देशों का इंतजार हो रहा है(दैनिक जागरण,इलाहाबाद,3.10.2010)।
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