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28 मई 2012

सफलता आपके भीतर है

हर एक चीज हमारे अंदर मौजूद है, बाहर नहीं। मस्तिष्क सभी शक्तियों का उद्गम है। वास्तव में, मस्तिष्क ही मनुष्य है। शरीर मस्तिष्क का वाहक और उसका कार्यकर्ता भी है। अपने वाहक शरीर को स्वस्थ और शक्तिशाली बनाए रखना आपके मस्तिष्क की इच्छा पर निर्भर करता है। जैसा मस्तिष्क वैसा ही शरीर होगा। ईश्वर ने मानव मस्तिष्क को असीम शक्तियां प्रदान कर रखी हैं,किसी भी मनुष्य के लिए अपने मस्तिष्क के अंदर ही अपनी शक्तियों को खोजना सबसे बड़ी चुनौती है। सपने और वास्तविकताएं दोनों सिर्फ मानव मस्तिष्क में ही मौजूद होते हैं। आप अपने जीवन में जो कुछ हासिल करना चाहते हैं, सबसे पहले आपके मस्तिष्क द्वारा ग्रहण किया जाता है और उसे कैसे हासिल किया जाए, इसके लिए तब आपका मस्तिष्क योजना बनाता है और उसके लिए परिस्थितियों का निर्माण करता है। बाद में जब आप उसे हासिल कर लेते हैं तब सिर्फ आपका मस्तिष्क की आप की उपलब्धियों का इस्तेमाल करता है और इंज्वाय करता है। इस प्रकार सफलताओं, उपलब्धियों और प्रसन्नता के सभी खजाने केवल आपके मस्तिष्क में ही मौजूद होते हैं। 

आपका मस्तिष्क आपकी सोच का परिणाम होता है। आप अपनी पांच इंद्रियों से जो कुछ भी ग्रहण करते हैं, वे अच्छा या बुरा के रूप में आपकी सोच द्वारा फिल्टर किए जाते हैं जो बाद में आप के अवचेतन मन मस्तिष्क में आपके अनुभवों के रूप में रिकॉर्ड होता जाता है। ये अनुभव आपकी याद्दाश्त का सृजन करते हैं और यही याद्दाश्त फिर आपकी सोच और परसेप्शन को प्रभावित करते हैं। जो कुछ भी आप हैं वह सब आपकी सोच का परिणाम होता है। 

वास्तव में, सफलता के रहस्य मनुष्य के विचारों में निहित होते हैं। विचार कमजोर व्यक्तियों को मजबूत और मजबूत व्यक्तियों को कमजोर बना देते हैं। प्रत्येक शब्द, जिसे आप सोचते हैं, गाड़ी चलाते हैं, बस पकडऩे के लिए दौड़ते हैं, ये भी आप के विचार की उपज हैं। अपने जीवन में आपके लिए गए प्रत्येक कदम के पीछे,भले ही वह रिलेक्स जैसे कार्य ही क्यों न हों, जो अनिवार्य एवं शक्तिशाली बल होता है वह आप का विचार होता है। जैसे आप चलते हैं, जैसा आप जीवन व्यतीत करते हैं, आप की बातचीत, पोशाक पहनने का अपना तरीका, सभी आपकी सोच को प्रतिबिंबित करते हैं। 

जैसा आप अंदर से होते हैं वैसा ही आप बाहर प्रदर्शित करते हैं। आप अपने विचारों, जैसे आप अपने को मानते हैं कि आप क्या हैं, के उत्पाद होते हैं। सभी संपत्तियों, सभी सफलताओं, समस्त भौतिक प्राप्तियों, सभी खोजों एवं आविष्कारों तथा समस्त उपलब्धियों का मौलिक स्रोत हमारे विचार होते हैं। आपके विचार या तो आप को बना सकते हैं या बिगाड़ सकते हैं। बाइबिल कथन के मुताबिक मनुष्य वही काटेगा जो वह बोयेगा। यह समझना महत्वपूर्ण है कि यह बोना कहीं और नहीं बल्कि सोचने की प्रक्रिया के माध्यम से केवल मस्तिष्क में होता है। आपकी अभिवृत्ति, व्यवहार और कार्य आपकी सोच के परिणाम होते हैं। उनके हाथ मात्र उनके मस्तिष्क के सहायक थे। इसलिए आपको अपने लक्ष्य के प्रति निर्देशित सोच को सृजित करने के कौशल को मांजने के लिए प्रतिदिन अच्छा-खासा समय व्यतीत करना चाहिए। यह आप के मस्तिष्क को सशक्त बनायेगा और आपके सपने को साकार करने के लिए सहायक परिस्थितियों का निर्माण करेगा(ए.के. मिश्रा,शिक्षालोक,दैनिक ट्रिब्यून,15.5.12)।

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27 अगस्त 2011

मैनेजमेंट छात्रों के लिए ब्रांड बने अन्ना

अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को प्रबंधन विशेषज्ञ किसी व्यावसायिक ब्रांड के समानांतर सामाजिक-राजनीतिकब्रांड की संज्ञा दे रहे हैं। इस आंदोलन को प्रबंधन छात्रों की पढ़ाई में शामिल किया गया है। इसी श्रृंखला में दिल्ली विविद्यालय के प्रतिष्ठित संस्थान फैकल्टीज ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज (एफएमएस) में ‘अन्ना एक ब्रांड के रूप में’ पढ़ाया जा रहा है। संस्थान के डॉ. हषर्वर्धन वर्मा ने बताया, ‘मैनेजमेंट और मार्केटिंग विशेषज्ञ के तौर पर हम किसी व्यावसायिक ब्रांड और अन्ना हजारे के आंदोलन, दोनों में कई समानता देखते हैं ।’ विशेषज्ञों को अन्ना और उनके आंदोलन में एक सशक्त ब्रांड के सारे लक्षण दिखाई देते हैं। जानीमानी विज्ञापन एजेंसी जो डब्ल्यूटी , गुड़गांव के सीनियर क्रि एटिव डायरेक्टर प्रणव हरिहर शर्मा के मुताबिक कोई भी ब्रांड तब बनता है जब उसके पीछे कोई बड़ा आइडिया हो। आज के समय में अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ मुख्य विचार बन गए हैं। शर्मा ने कहा कि अन्ना के आंदोलन में किसी धर्म, मत, वर्ग और उम्र की सीमा नहीं है और उनकी खुद की साफ-सुथरी छवि उन्हें इस रूप में ब्रांड बनाती है कि लोग जिसमें भरोसा कर सकें। डॉ. वर्मा ने बताया कि प्रबंधन विशेषज्ञों को अन्ना की मुहिम में एक ब्रांड से जुड़ी तीन प्रमुख चीजें देखने को मिलीं । पहली बात, किसी उत्पाद को कितने लोग खरीदते हैं, और इस मामले में आंदोलन को विशेषज्ञों ने इस रूप में देखा कि आंदोलन के साथ कितने लोग जुड़े हैं। दूसरी चीज कि लोग अपना भरपूर समय दे रहे हैं और दिल्ली के अलावा देश के दूसरे सुदूर कोनों से भी आ रहे हैं, जिसे विशेषज्ञ किसी ब्रांड के लिए अदा कीमत के तौर पर देख सकते हैं। ये बात भी शामिल होती है कि एक ब्रांड को पाने के लिए लोग कितनी परेशानी झेल सकते हैं। डॉ. वर्मा ने बताया कि इस मुहिम के साथ उन्होंने मैनेजमेंट के छात्रों की पढ़ाई में अन्ना को ब्रांड के तौर पर शामिल किया है और मंगलवार को एफएमएस के छात्रों को इस पर व्याख्यान भी दिया। उन्होंने अपने ब्लॉग में इस आंदोलन के कुछ नए प्रतीक गढ़े हैं । मसलन आंदोलन का स्थान एक मैदान यानी जमीन है, जिसका अर्थ ‘नीचे’ से लगाया है और इसके विरोध में सरकार ‘ऊपर’ है। उसी तरह लोग मोमबत्ती और मशाल जलाकर रोशनी कर रहे हैं, जो कि प्रतीकात्मक रूप में अंधेरे के खिलाफ है। इसके पहले फिल्म ‘रंग दे बंसती’, ‘चक दे इंडिया’ के अलावा क्रि केटर महेंद्र सिंह धोनी, अभिनेता आमिर खान और लालू यादव के रेल मंत्री रहने के दौरान भारतीय रेलवे को भी समय समय पर आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में केस स्टडी का हिस्सा बनाया जा चुका है। बहरहाल, एडगुरु प्रहलाद कक्कड़ मानते हैं कि हजारे एक ब्रांड से ज्यादा आज की परिस्थिति में बदलाव की प्रतिमूर्ति हैं। प्रबंधन गुरु मनीष पांडेय ने कहा कि आम जनता के अलावा प्रबंधन क्षेत्र के दिग्गजों और छात्रों के अंदर भी अन्ना हजारे, उनके आंदोलन, आंदोलन के संचालन, वहां मौजूद जनता के अनुशासन की प्रवृत्ति को जानने की जिज्ञासा है(राष्ट्रीय सहारा,दिल्ली,27.8.11)।

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19 अगस्त 2011

अनुसूचित जातियों के प्रति अपने दायित्व से मुंह मोड़ती कम्पनियां

जातिभेद का रोग किस तरह ब्रिटेन में आयात हुआ है इस बारे में हाल की खबरें खुलासा करती हैं। इस सिलसिले में विजय एवं अमरदीप बेगराज नामक भारतीय मूल के एक जोड़े ने अपने ब्रिटिश नियोक्ता की फर्म हीर मानक के खिलाफ अदालत का भी दरवाजा खटखटाया है। उनके मुतातिबक दलित पृष्ठभूमि से आने वाले विजय एवं जाट पृष्ठभूमि की अमरदीप की शादी उनके नियोक्ताओं को पसंद नहीं थी और इसी आधार पर उन्हें भेदभाव झेलना पड़ा। याद रहे कि ब्रिटेन में भारतीय समुदाय में जातिभेद की घटनाओं को लेकर पिछले दिनों एक रिपोर्ट का भी प्रकाशन हुआ था, लेकिन यह पहली बार है जबकि किसी ने इस सिलसिले में मुकदमा दर्ज कराया है। साफ है कि भारतीय मूल का कारपोरेट सेक्टर फिर वह चाहे ब्रिटेन में बसा हो या यहां पर स्थित हो उसके असमावेशी सोच के बारे में यह कोई पहली मिसाल नहीं है। अभी ताजा उदाहरण यह है कि सरकार के तमाम निर्देशों के बावजूद तथा इस काम के लिए सरकार की तरफ से तमाम छूटें हासिल करने के बावजूद निजी क्षेत्र से जुड़े बैंक अनुसूचित तबके के लोगों के कल्याण के प्रति अत्यंत निष्कि्रय दिखते हैं। यह भी मालूम हुआ है कि एचडीएफसी, आइसीआइसीआइ और एक्सिस बैंक जैसे निजी क्षेत्र के अग्रणी बैंकों द्वारा वित्तीय वर्ष 2010-11 में अनुसूचित तबके के छात्रों को अनुक्रम से महज 1.58 करोड रुपये, 57 लाख रुपये और 37 लाख रुपये के कर्ज दिए गए हैं। निजी क्षेत्र के बैंकों के संदर्भ में सार्वजनिक क्षेत्र के छोटे बैंक चाहे इंडियन बैंक हो, आंध्र बैंक अथवा सिंडिकेट बैंक ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति तबके से आने वाले छात्रों को काफी कर्ज उपलब्ध कराया है। पिछले दिनों राज्यसभा में प्रश्नों का जवाब देते हुए वित्त मंत्रालय की तरफ से बताया गया किर् इंडियन बैंक द्वारा इस सिलसिले में 484.56 करोड रुपये, आंध्र बैंक द्वारा 146.08 करोड रुपये और सिंडिकेट बैंक द्वारा 109.47 करोड रुपये दिए जाचुके हैं। देश का सबसे बड़ा कर्जदाता स्टेट बैंक ऑफ इंडिया अनुसूचित तबके को कर्जा देने के मामले में उतना आगे नहीं है। उसकी तरफ से वित्त वर्ष 2010-2011 के अंत में 238 करोड़ रुपये कर्ज दिया गया है। ध्यान रहे कि इंडियन बैंक एसोसिएशन जो सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के बैंकों एवं विदेशी बैंकों का प्रतिनिधि संगठन है उसकी तरफ से बहुत पहले वित्तीय समावेशन को लेकर मॉडल एजूकेशन लोन स्कीम के नाम से एक गजट जारी किया गया है। इसके अंतर्गत भारत के नागरिक जिन्होंने प्रोफेशनल एवं तकनीकी शिक्षा के पाठयक्रमों में प्रवेश परीक्षा या मेरिट आधारित चयन प्रक्रिया के जरिये प्रवेश हासिल किया है, वे शैक्षिक कर्जा पाने के हकदार हैं। निजी बैंकों के ऐसे विशिष्ट रुख को कैसे समझा जा सकता है? क्या यह मान लिया जाए कि निजी बैंक ही नहीं हिंदुस्तान के कारपोरेट क्षेत्र के दरवाजे भी मुख्यत: भद्र जातियों तक ही सीमित हैं? इसी साल के पूर्वा‌र्द्ध में भारतीय उद्योगपतियों के सबसे बड़े संगठन कहे जाने वाले कॉनफेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्रीज यानी सीआइआइ द्वारा इस सिलसिले में किए गए सर्वेक्षण के आंकड़े प्रकाशित हुए थे। सीआइआइ के सदस्य उद्योगों में लगभग 35 लाख लोग कार्यरत हैं। प्रस्तुत सर्वेक्षण के तहत 22 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में फैले उसके सदस्यों का एक सैंपल सर्वे किया, जिसके तहत 8,250 कर्मचारियों अथवा कामगारों से जानकारी हासिल की गई। सर्वेक्षण में कुछ विचलित करने वाले तथ्य सामने आए हैं। मसलन भारत के सबसे औद्योगिक कहे जाने वाले राज्यों में निजी क्षेत्र में अनुसूचित जाति एवं जनजातियों का अनुपात, राज्य की आबादी में उनके अनुपात को कहीं से भी प्रतिबिंबित नहीं करता। उदाहरण के लिए वर्ष 2008-2009 के वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण में औद्योगिकरण एवं रोजगार के मामले में महाराष्ट्र दूसरे नंबर पर है, जबकि वहां इन तबकों का रोजगार में अनुपात महज पांच फीसदी है जो राज्य में उनकी आबादी के 19.1 प्रतिशत से काफी कम है। अगर हम महाराष्ट्र के सीआइआइ से जुड़े उद्योगों में कार्यरत आबादी को देखें तो अकेले महाराष्ट्र में लगभग 20.72 लाख लोग कार्यरत हैं। महाराष्ट्र जैसी स्थिति गुजरात की है जो वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण के मुताबिक चौथे नंबर पर है मगर वहां निजी क्षेत्र में अनुसूचित जाति एवं जनजातियों का प्रतिशत महज नौ फीसदी है जो आबादी में उनके 21.9 प्रतिशत से काफी कम है। अकेले तमिलनाडु में इन वंचित तबकों का निजी क्षेत्र में अनुपात आबादी में उनके हिस्से के लगभग समानुपातिक है। वहां इनकी आबादी का प्रतिशत 20 फीसदी है जबकि उद्योगों में उनकी उपस्थिति का प्रतिशत 17.9 फीसदी है। दक्षिण के अन्य राज्यों में भी इसी किस्म की स्थिति है। यहां सवाल यही उठता है कि जिन आग्रहों के चलते निजी क्षेत्र के कर्णधार अपने यहां उत्पीडि़तों-वंचितों के लिए सकारात्मक कार्रवाई की नीतियां चलाने के प्रति इतना अनिच्छुक दिखते हैं उन्हें कहां तक उचित माना जा सकता है। विडंबना यही कही जाएगी कि कारपोरेट क्षेत्र का असमावेशी रुख सिर्फ सामाजिक तौर पर बहिष्कृत रहे तबकों तक सीमित नहीं है। वह विकलांगों के प्रति भी उतनी ही असहिष्णु है। आंकड़े बताते हैं कि विकलांगता को लेकर समूचा कारपोरेट जगत विफल ही कहा जा सकता है। विकलांगों के रोजगारों को लेकर निजी क्षेत्र की बात करें तो यह बात स्पष्ट होती है कि निजी क्षेत्रों में उनके रोजगार अवसर नाममात्र के होते हैं। जहां बड़ी निजी फर्मो में यह आंकड़ा 0.3 फीसदी दिखता है तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों में महज 0.05 फीसदी तक ही पहुंचता है। विश्व बैंक की रिपोर्ट पीपुल विथ डिसएबिलिटीज इन इंडिया में यह आंकड़े प्रकाशित हुए हैं। दो साल पहले विकलांगों के प्रति उसके इस बेहद असंवेदशील रुख की खबर सुर्खियों में रही थी। वर्ष 2008-09 के अपने वित्त बजट के छमाही आकलन के बाद सरकार ने यह पाया था कि विकलांगों के कल्याण के नाम पर उसने जिस योजना का बहुत प्रचार किया और उसके लिए अठारह सौ करोड़ रुपये की अनुदान राशि निजी कारपोरेट समूहों को दी वह बिल्कुल अछूती ही रह गई। इन दिनों देश में निजी बैंकों को यहां कारोबार करने के लिए लाइसेंस देने के लिए चर्चा चल रही है। एंट्री ऑफ न्यू बैंकर्स इन द प्राइवेट सेक्टर नाम से रिजर्व बैंक की तरफ से इस सिलसिले में चर्चा के लिए परिपत्र भी जारी किया गया है, लेकिन इस बारे में सरकार को सावधानी बरतनी चाहिए कि कहीं यह केवल सक्षम और समर्थ लोगों तक के लिए सीमित न रह जाएं। इसके लिए भारत के प्रबुद्ध समुदाय को जागरूक होने की जरूरत है। उसे इस बात पर जोर देना चाहिए कि बाजार में मुनाफे के लिए पहुंचने के लिए लालायित इन निजी बैंकों से यह गारंटी सुनिश्चित की जाए कि वह अपने सामाजिक कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के प्रति भी सचेत रहें वरना उनके लाइसेंस समाप्त किए जा सकते हैं(सुभाष गताडे,दैनिक जागरण,19.8.11)।

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16 अगस्त 2011

प्रतिभावान बनें


यूथ जेनरेशन को जिंदगी का भरपूर मजा लेना है तो कुछ चैलेंज के साथ आगे बढ़ना होगा। माना जाता है कि युवा अपने पेशे के प्रति काफी सीरियस होते हैं। उनके मन में नौकरी को लेकर कई तरह के सपने भी होते हैं। साथ ही, उनकी चाहत होती है, ऊंचे पदों पर आसीन होना। आज की पीढ़ी के युवा नई शक्ति के रूप में उभर रहे हैं और उनकी सोच का दायरा विस्तृत है। केवल भावनाओं के बलबूते ही वे निर्णय नहीं लेते बल्कि सोच-समझकर अपनी क्षमताओं का प्रयोग करते हैं। उनकी सोच का स्वागत की जानी चाहिए। आखिर यूथ ही देश के भावी कर्णधार हैं। तेज गति बदलते कॉरपोरेट कल्चर में कंपनियां भी सफलता प्राप्त करने के लिए अपने तरीके में बदलाव ला रही है। इन तरीकों के साथ खुद को बदलने के साथ नियम-कानून भी बदल रही है। परंपरागत मैनेजमेंट तकनीक के माध्यम से सफलता प्राप्त कर कंपनियां अब अपने पुराने तौर-तरीकों में बदलाव लाने का काम कर रही है। इन दिनों कॉरपोरेट कल्चर में जो बदलाव आ रहे हैं वह युवा पीढ़ी के टैलेंट के नतीजे हैं। ग्लोब्लाइजेशन के इस दौर में हर क्षेत्र में नए एक्सपेरिमेंट किए जा रहे हैं। वर्तमान दौर में जो बदलाव देखने को मिल रहा है, वह काफी तेजी से हो रहा है, जिसे न रोका जा सकता है और न ही मोड़ा जा सकता है। युवा पीढ़ी का ही परिणाम है कि आज ट्रेडिशनल मैनेजमेंट के तरीके से काम करने वाली कंपनियां पिछड़ने लगी हैं। उन्हें भी आधुनिक कॉरपोरेट कल्चर में ढलना के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। दरअसल, क्रिएटिव कॉपरेशन के माध्यम से युवा कर्मचारी न केवल अपने टैलेंट को सही तरीके से सामने ला रहे हैं बल्कि कंपनी के भीतर भी एडजेस्ट करके चलते हैं। ऐसा ही क्रिएटिव और एडजेस्ट की भावना सभी कर्मचारी में आ जाए तो निश्चित रूप से संस्था का माहौल बदलेगा। कंपनी को आगे ले जाने में युवा कर्मचारियों का सबसे बड़ा हाथ होता है। वे केवल नौकरी नहीं करते बल्कि अपनी जिंदगी को आगे बढ़ते देखना चाहते हैं और दिल से काम करते हैं। जिन युवाओं में जोश होता है वे दूसरों को काम कराने के जोश दिखाने के साथ दूसरों के सामने बेहतर उदाहरण के रूप में सामने होते हैं। जब आप कुछ अलग करते हैं , तभी लोगों की नजर में आते हैं। ऐसे युवा टैलेंट को आगे लाने जरूरत है तथा इन्हीं से माहौल में परिवर्तन भी आएगा। युवा टेलेंट ही सही मायने में कंपनी के लिए उपयोगी है चाहे वह कंपनी सरकारी हो या गैरसरकारी। इसलिए दिल से यूथ के टैलेंट को वेलकम करना चाहिए।

(प्र.अनिता घोष,राष्ट्रीय सहारा,16.8.11)

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11 अगस्त 2011

बदलने पड़ेंगे री-वैल्यूएशन के नियम

सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत छात्रों को परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिकाएं देने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उच्च शिक्षा विभाग को री-वैल्यूएशन संबंधी अपने नियमों को बदलना पड़ सकता है। फिलहाल छात्रों को रिजल्ट घोषित होने के 15 दिनों के अंदर री-वैल्यूएशन के लिए आवेदन देना होता है, जबकि आरटीआई के तहत एक महीने के भीतर जानकारी देने का प्रावधान है। हालांकि स्कूल शिक्षा विभाग में रिजल्ट घोषित होने के तीस दिन बाद तक रीटोटलिंग के लिए आवेदन किए जा सकते हैं।


दो साल पहले उच्च शिक्षा विभाग ने सेमेस्टर सिस्टम लागू करने के साथ ही छात्रों को उनकी उत्तर पुस्तिका दिखाने की व्यवस्था है। इस साल करीब 150 विद्यार्थियों ने इस सुविधा का लाभ लेते हुए अपनी उत्तर पुस्तिकाएं देखीं। दूसरी तरफ माध्यमिक शिक्षा मंडल हाईस्कूल और हायर सेकंडरी परीक्षा की उत्तर पुस्तिका की फोटो कॉपी डाक से छात्रों के घर पहुंचाता है। इसके लिए छात्रों को आवेदन करना पड़ता है। मंडल के आधिकारिक सूत्रों के अनुसार इस साल मंडल ने 15 हजार से ज्यादा विद्यार्थियों को उत्तर पुस्तिकाएं उपलब्ध कराई हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सभी ने स्वागत किया है, हालांकि इसके अमल में दिक्कतें भी कम नहीं हैं।
ये होंगे फायदे

मूल्यांकन में पारदर्शिता बढ़ेगी
बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी (बीयू) की कुलपति प्रोफेसर निशा दुबे मानती हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से निश्चित तौर पर वैल्यूएशन में पारदर्शिता बढ़ेगी, हालांकि स्टाफ पर काम का बोझ और बढ़ जाएगा। इसके लिए बीयू को अलग सेल का गठन करना पड़ेगा, क्योंकि सालभर में हजारों छात्र विभिन्न परीक्षाओं में शामिल होते हैं। इस फैसले के बाद अब हर छात्र चाहेगा कि वो भी अपनी कॉपी देखे।

अभिभावकों को नहीं कर पाएंगे गुमराह 
वरिष्ठ शिक्षाविद रमेश दवे ने इस प्रक्रिया को छात्रों के हित में बताया है। इससे विद्यार्थी अपने अभिभावकों से ये नहीं सकेंगे कि उन्होंने सही जवाब लिखे थे, फिर भी कम नंबर मिले।

अड़चनें भी हैं
री-वैल्यूएशन में दिक्कत
प्रो. निशा दुबे के अनुसार नई प्रक्रिया में जो सबसे बड़ी व्यावहारिक कठिनाई आएगी, वो ये है कि रिजल्ट घोषित होने के 15 दिन के भीतर री-वैल्यूएशन के लिए आवेदन जमा करना होता है। जबकि आरटीआई में कॉपी 30 दिनों के भीतर देने का प्रावधान है।

मेरिट लिस्ट घोषित करने में देरी
माशिमं की सचिव डॉ. मधु खरे के अनुसार इस प्रक्रिया का फायदा विद्यार्थियों को ही है। वे उत्तर पुस्तिका में की गई गलती को सुधरवाकर अपने नंबर बढ़वा सकते हैं, हालांकि माशिमं को इसका सीधे तौर पर नुकसान होने लगा है। जब तक सारे प्रकरण नहीं निपट जाते, माशिमं अपनी स्थाई मेरिट लिस्ट घोषित नहीं कर पाता(दैनिक भास्कर,भोपाल,11.8.11)।

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09 अगस्त 2011

नौकरी और संबंध

जॉब मिलने के बाद अक्सर व्यक्ति अपनी नौकरी पर ही ज्यादा ध्यान देने लगता है। जिसकी वजह से वह तमाम जानने वालों से दूर हटने लगता है। लेकिन तमाम व्यस्तताओं के बावजूद भी अगर आप थोड़ा-सा वक्त अपने जानने वालों साथ बिताएं तो यह आपके रिलेशन को लंबे समय तक मजबूती देता है। फेसबुक, ई-मे ल या फिर एसएमएस के जरिए टच में रहना कोई काम की चीज नहीं। बल्कि लाइफ में आगे बढ़ने के लिए रिलेशन को समझें और सिर्फ टच में रहने की बात को छोड़कर रिलेशनशिप में प्रगाढ़ता बढ़ाएं।

पब्लिक रिलेशन्स- अच्छी जॉब पर बने रहना, हर महीने अच्छी सैलरी पाना यह हर सर्विस क्लास का सपना होता है। जब व्यक्ति यह सब हासिल कर लेता है, तो वह अपने आपको सिक्योर समझने लगता है फिर वह रिसेशन या नौकरी से हटाए जाने की बात मन में नहीं लाता। लेकिन यही मौका होता है, अपने आप को साबित करने का। अपने आपको न केवल वहां बनाए रखें बल्कि अपनी मार्केट वेल्यू बढ़ाने के लिए भी पब्लिक रिलेशन्स बढ़ाएं।

चेंज योर पर्सनालिटी- हो सकता है कि कभी आपको जॉब छोड़ना पड़े, तब आप इन्हीं रिलेशन के सहारे दूसरा जॉब पा सकते हैं। यही कारण है जब तक आप नौकरी में हैं, तब तक अपने नेचर में घमंड ना आने दें। हमेशा सामान्य व्यवहार बनाए रखें।

नो सेल्फिश- रिलेशन को बढ़ाने में कभी सेल्फिश ना बने। सेल्फिश लोगों को दुनिया बहुत जल्दी पहचान लेती है। आपको अपनी ओर से जितना हो सके अपने अच्छे दिनों में लोगों की मदद करें। प्रोफेशनली तौर पर हेल्प जरूर करें। आप देखिए, जब आप जॉब पाना चाहते हैं या फिर जॉब बदलना चाहते है, तब यही संबंध आप से दोस्त की तरह पेश आएंगे और जरूर सहायता करेंगे।


कॉन्टेक्ट- कॉन्टेक्ट में रहने का मतलब आप अपने जानने वाले के साथ बाते करें। उससे इंडस्ट्री में क्या हो रहा है, इस बारे में जरूर खबर रखें, और इस बारे में बातें करे। अपनी बातों के अलावा संपकरे में रहने वाले व्यक्ति के बारे में भी सारी इंफॉम्रेशन लें और उसकी बातें भी सुनें। केवल नेटवर्किंग साइट से अपडेट रहने से कुछ नहीं होता। संबंधों को बढ़ाने के लिए आप रोजाना मिलने वाले लोगों के साथ भी संबंध बनाकर एक नया रिलेशन डेवलप कर सकते हैं।

रिफ्रेश योर रिलेशनशिप- सिर्फ टच में रहने से रिलेशन मजबूत नहीं बनते, इसमें आत्मीयता नहीं रहती। प्रोफेशनल और पर्सनल रिश्तों में काफी फर्क होता है। जब इंसान दोनों रिश्तों को एक ही तराजू में तौलते हैं तो दिक्कत आती है। अकसर प्रोफेशनल रिलेशन की तरह ही हम अपने रिलेटिव्स के साथ भी व्यवहार करने लगते हैं, तब इनमें निहित गर्माहट कहीं खो जाती है। किसी भी रिलेशनशिप में आप जब तक अपने प्रोफेशनल लेवल से थोड़ा ऊपर नहीं उठते तब तक उसमें आत्मीयता नहीं आ पाती और जहां आत्मीयता नहीं है, ऐसे रिलेशन ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाते।
(अनिता घोष,राष्ट्रीय सहारा,दिल्ली,9.8.11)

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05 अगस्त 2011

आईआईटी कानपुर की सलाहः शुरू से न दें अभी लैपटॉप

आईआईटी के छात्र-छात्राओं को मानसिक तनाव से बचाने के लिये संस्थान ने उन्हें देर रात तक इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करने और पहले वर्ष के छात्र-छात्राओं के अभिभावकों को अपने बच्चों को शुरू से ही लैपटॉप न देने की सलाह दी है।
इसके अतिरिक्त छात्र छात्राओं की समय-समय पर काउंसलिंग करने की बात भी की जा रही है। पिछले सालों में आईआईटी कानपुर में कई विद्यार्थियों के आत्महत्या करने की घटनाओं को देखते हुए संस्थान के प्रशासन ने इस बार नया सत्र शुरू होते ही अत्यन्त सावधानी बरतनी शुरू कर दी है।
उनकी पहली प्राथमिकता है कि छात्र-छात्राओं को मानसिक तनाव से कैसे बचाया जाये। इसके लिये प्रशासन ने अनेक उपायों पर विचार करना शुरू कर दिया है, जिसमें से एक उपाय यह भी है कि छात्र छात्रायें देर रात तक इंटरनेट का इस्तेमाल न करें। इसके अतिरिक्त छात्र-छात्रायें पूरी नींद ले ताकि वह बिना किसी तनाव के सुबह कालेज जा सकें।
आईआईटी के रजिस्ट्रार संजीव कशालकर ने कहा कि चूंकि पूरा आईआईटी परिसर वाई फाई इंटरनेट सुविधा से लैस है, इसलिये अक्सर देखने में आया है कि हास्टलों में रात भर छात्र अपने अपने लैपटॉप से चिपके रहते है। सुबह जब वह क्लास में आते हैं या परीक्षा देने जाते हैं तो वह पूरी तरह तरोताजा नही होते हैं। जिससे उनका मन न तो पढ़ाई में लगता है और न ही परीक्षा में। इसके बाद वे धीरे-धीरे मानसिक तनाव का शिकार हो जाते हैं।

रजिस्ट्रार ने कहा कि आईआईटी में चूंकि पांच हजार छात्र-छात्रायें पढ़ते हैं, इसलिये आईआईटी प्रशासन द्वारा यह तो किया नहीं जा सकता है कि वह रात बारह बजे के बाद एक एक छात्र के कमरे में जायें और इस बात की जांच करे कि कौन छात्र सोया है या नहीं। इसलिये आईआईटी प्रशासन ने छात्र-छात्राओं को यह निर्देश दिया है कि वह देर रात तक इंटरनेट का इस्तेमाल न करें और वे कम से कम छह घंटे रात को आराम करें। उसके बाद सुबह तरोताजा होकर कक्षाओं या परीक्षाओं में जायें।
में आते है तो वह अपने मां बाप से लैपटॉप खरीद कर देने को कहते है। इसलिये इस बार प्रशासन ने छात्र-छात्राओं के मां बाप को भी सलाह दी है कि वह प्रथम वर्ष के छात्र-छात्राओं को कम से कम अभी लैपटॉप खरीद कर न दें। क्योंकि अभी उन्हें लैपटॉप की कोई खास जरूरत नहीं है।
जहां तक इन्टरनेट पर काम करने का सवाल है तो संस्थान में कंप्यूटर सेंटर है जहां वे जाकर कंप्यूटर और इन्टरनेट पर काम कर सकते है। इसके अलावा लाइब्रेरी और सभी विभागों में भी इन्टरनेट और वाई फाई सिस्टम उपलब्ध है छात्र छात्रायें वहां जाकर काम कर सकते हैं। आईआईटी के सूत्र बताते है कि बहुत से छात्र सुबह चार बजे तक अपने लैपटाप पर इंटरनेट से चिपके रहते है और उसके बाद मात्र दो से तीन घंटे की नींद लेकर बिना कक्षाओं में या परीक्षा देने पहुंच जाते है।
रजिस्ट्रार कहते है कि छात्र-छात्राओं के लिये काउंसलिंग की व्यवस्था भी संस्थान में की गयी है ताकि अगर उन्हें कोई समस्या हो तो वह आकर उस बारे में बातचीत करें। उनके लिये योग केन्द्र, खेलकूद का मैदान और अन्य मंनोरजन के साधन भी हैं जहां जाकर वे अपना मन बहला सकते हैं और कमरे से निकलकर खेल कूद से दिलोदिमाग ताजा कर सकते हैं(लाईव हिंदुस्तान डॉटकॉम,5.8.11)।

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02 अगस्त 2011

संसदीय स्थायी समिति ने कहाःघटिया विदेशी शिक्षण संस्थानों को रोको

विदेशी शिक्षण संस्थानों के लिए देश के दरवाजे खोलने को लेकर सरकार का उत्साह अपनी जगह पर है, लेकिन उसके लिए पेश विधेयक की कई बातें संसदीय स्थायी समिति के गले नहीं उतर रही हैं। उसकी चिंता खासतौर से घटिया विदेशी शिक्षण संस्थानों को यहां आने और देश में योग्य शिक्षकों की कमी के और बढ़ने को लेकर है। लिहाजा उसने बेहतरीन विदेशी शिक्षण संस्थानों को ही यहां आने की इजाजत देने की पैरवी की है। विदेशी शिक्षण संस्थान (प्रवेश एवं संचालन विनियमन) विधेयक-2010 पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय की संसदीय स्थायी समिति ने सोमवार को संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में सरकार को कई मामलों में आगाह किया है। शिक्षा से जुड़े तमाम पक्षकारों से मशविरे के बाद समिति की राय है कि सिर्फ दुनिया की सर्वश्रेष्ठ संस्थाओं को ही भारत में आने की इजाजत मिलनी चाहिए। उन संस्थाओं को सरकार खुद न्योता देकर बुला सकती है। समिति का तर्क है कि पड़ोसी चीन और मलेशिया जैसे देश भी अपने यहां इसी फार्मूले को अख्तियार करते हैं। समिति ने देश में बेहतरीन शिक्षकों की कमी के सवाल को गंभीरता से लिया है। उसका कहना है कि प्रतिभाशाली छात्रों को शिक्षक बनने के लिए आकर्षितकरने में सरकार नाकाम रही है। जबकि विदेशी शिक्षण संस्थान यहां आने पर योग्य शिक्षकों को अपने साथ ले सकते हैं। समिति का मानना है कि इस स्थिति से बचने के लिए यह प्रावधान किया जाना जरूरी है कि विदेशी शिक्षण संस्थान एक निश्चित प्रतिशत तक शिक्षक अपने यहां से ही लाएं। भारतीय एवं विदेशी शिक्षकों के इस साझा प्रयास के छात्रों व शिक्षकों, दोनों लिहाज से सकारात्मक नतीजे आएंगे। इसके अलावा समिति ने विदेशी शिक्षण संस्थानों में आरक्षण लागू न करने के सरकार के फैसले पर सहमति जताई है, लेकिन यह भी कहा है कि विदेशी संस्थानों में आरक्षण तब लागू हो सकता है, जब भारतीय निजी शिक्षण संस्थानों के लिए भी सरकार ऐसा कोई प्रावधान कर दे(दैनिक जागरण,भोपाल संस्करण,2.8.11 में दिल्ली की रिपोर्ट)।

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01 अगस्त 2011

इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं से आजिज आ गए हैं लोग

इंजीनियरिंग कॉलजों में दाखिले के लिए हर साल अलग-अलग होने वाली तमाम प्रवेश परीक्षाओं के मौजूदा तौर-तरीकों से सभी आजिज आ चुके हैं। लिहाजा 85 प्रतिशत लोगों ने इसमें सुधार की जबरदस्त पैरवी की है। जबकि तमाम लोगों ने छात्रों की काबिलियत आंकने के मद्देनजर दाखिले के लिए राष्ट्रीय स्तर एक ही परीक्षा कराने पर जोर दिया है। इंजीनियरिंग व विज्ञान की उच्च शिक्षा में दाखिले के लिए अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा को लेकर आम लोगों के इस नजरिए का खुलासा केंद्र सरकार के पोर्टल व फेसबुक पर मांगी गई उनकी राय से हुआ है। मालूम हो कि सरकार ने राष्ट्रीय परीक्षा योजना की बाबत केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सचिव टी. रामासामी की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया था। बाद में उसकी सिफारिशों पर आम लोगों की राय मांगी गयी थी, जिस पर 59 प्रतिशत लोगों ने बहु प्रवेश परीक्षा में बड़े सुधार की जरूरत पर बल दिया है। जबकि 26 प्रतिशत लोगों का सीधा मानना है कि इंजीनियरिंग व विज्ञान की उच्च शिक्षा में दाखिले के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक ही प्रवेश परीक्षा होनी चाहिए। अभिभावकों, छात्रों व दूसरे पक्षकारों से आए सुझावों में एक बड़े हिस्से ने प्रवेश परीक्षा के साथ ही स्कूल बोर्ड परीक्षाओं के अंकों भी महत्व दिए जाने पर जोर दिया है। हालांकि कुछ ने इसे सही नहीं मानाहै। सरकारी पोर्टल पर अपने सुझाव देने वाले कुल दो हजार से अधिक लोगों में 59 प्रतिशत छात्र व पांच प्रतिशत अभिभावक हैं। छात्रों में भी 82 प्रतिशत इंजीनियरिंग और नौ प्रतिशत विज्ञान की पढ़ाई करने वाले हैं। सुझाव देने वालों में 98 प्रतिशत भारतीय हैं। उनमें भी सबसे ज्यादा 24 प्रतिशत आंध्र प्रदेश, 23 प्रतिशत कर्नाटक और सिर्फ सात प्रतिशत लोग दिल्ली से हैं। गौरतलब है कि सरकार इंजीनियरिंग व विज्ञान की उच्च शिक्षा में दाखिले के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक ही प्रवेश परीक्षा की हिमायत पिछले साल से ही कर रही है। मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल इस पर ज्यादा जोर देते रहे हैं। पत्रकारों से बातचीत में बीते दिनों उन्होंने कहा,इंजीनियरिंग व विज्ञान में दाखिले के लिए राष्ट्रीय स्तर पर यदि एक ही प्रवेश परीक्षा का प्रावधान कराने में सफल हुआ तो यह एक बड़ी उपलब्धि होगी(दैनिक जागरण,दिल्ली,1.8.11)।

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25 जुलाई 2011

हिन्दी सप्ताह की मोहताज हमारी हिन्दी

कल सुबह चाय की चुस्कियों के साथ अख़बार पढ़ रही थी कि अचानक बड़ी मधुर सी गाने की आवाज़ सुनाई दी- 'चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना' खिड़की से नीचे देखा तो चेहरा जाना पहचाना सा लगा और फिर याद आया कि ये तो हमारी हिन्दी भाषा है जो अपनी ही धुन मे गुनगुनाए जा रही है, मैने आवाज़ देकर उसे ऊपर बुलाया और पूछा कि क्या बात है बड़ी बेजार सी नज़र आ रही हो और ऊपर से ये गाना तो वो एक गहरी साँस खींच कर बोली हन भई अब क्या करें अपने ही देश मे अब हम तो बेगाने हो गये, हमारे साथ तो अब मेहमानो जैसा सुलूक किया जाता है. मैने पूछा कि क्या हुआ, बात कुछ समझ नही आई तब उसने बताया कि देखो ना कहने को तो हम राष्ट्रभाषा हैं, मातृभाषा हैं लेकिन हमें याद रखने के लिए वर्ष मे एक बार हिन्दी साप्ताह मनाया जाता है, हमारे बारे में खूब चर्चाएँ होती हैं कई प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं और हमारा खूब प्रचार-प्रसार किया जाता है और फिर उसके बाद सब भूल जाते हैं, में उसकी बातें सुनकर सोच मे डूब गयी और वो मुझे उसी हाल मे छोड़ कर अपनी राह पर चल दी, उसे जाता देखकर मैने उसकी बातों पर गौर किया तो पाया कि कितना सच कह गयी वो. वाकई मे हमारे हिंदू राष्ट्र मे हमारी राष्ट्रभाषा ही कितनी उपेक्षित सी है, आज हमने पाश्चात्य रहन-सहन को, ख़ान पान को कितने प्यार से अपनाया और साथ ही अँग्रेज़ी भाषा को तो हमने इस कदर आत्मसात कर लिया कि जैसे हमारी अपनी भाषा तो कोई थी ही नही. आज जब बच्चा बोलना सीखता है तो उसे "मॉम" बोलना सिखाया जाता है, अरे जो बच्चा माँ कहना नहीं सीखेगा वो मातृ शब्द ग़ूढ अर्थ कैसे जानेगा. आज माता-पिता अपने बच्चों को अँग्रेज़ी स्कूलों मे पढ़ाने मे, अँग्रेज़ी भाषा सीखने मे गर्व का अनुभव करते हैं- अच्छी बात है, कोई भी भाषा बुरी नही होती क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैचारिक आदान-प्रदान का यही सबसे सरल तरीका है पर यह सब किस कीमत पर- हम कब तक उधार मे ली गयी संस्कृति और भाषा पर गर्व करते रहेंगे, क्या हमारे पास हमारी कोई संस्कृति, भाषा नही है जिस पर हम गर्व कर सकें, गर्व से कह सकें की हम हिंदू हैं और हिन्दी हमारी भाषा है. यह कोई मुश्किल काम नही है बस हर किसिको अपने ही घर से इसकी शुरुआत करनी होगी और इसमे सबसे अहम भूमिका हम महिलाओं की ही है क्योंकि बच्चे का पहला स्कूल घर और पहली शिक्षिका माँ होती है(अर्चना शर्मा,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,25.7.11).

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यूपीःमुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने केंद्र पर साधा निशाना

शिक्षा का अधिकार अधिनियम, सर्वशिक्षा अभियान व वक्फ संशोधन अधिनियम में संशोधन की मांग को लेकर आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने केन्द्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। रविवार को राजधानी के मुमताज कालेज (डालीगंज) में हुए बोर्ड के अवामी जलसे में वक्ताओं ने केन्द्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यूपीए सरकार मदरसों से धार्मिक शिक्षा खत्म करने और वक्फ जायदादों को तबाह-बर्दाद करने का षडयंत्र रच रही है। अवामी जलसे में तय किया गया कि अगर सरकार मानसून सत्र में बिल लाकर तीनों कानूनों में संशोधन नहीं करती तो रमजान शरीफ के बाद बोर्ड रणनीति बनाकर अपनी मुहिम तेज करेगा। इसके लिए अगर मुसलमानों को सड़कों पर भी उतरना पड़ा तो वह पीछे नहीं हटेंगे। बोर्ड के चेयरमैन मौलाना राबे हसनी नदवी ने कहा कि ‘शिक्षा का अधिकार कानून’ अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षिक संस्थान चलाने की आजादी में बाधा है। उक्त कानून के तहत कक्षा एक से आठ तक शिक्षा देने वाले स्कूलों व मदरसों के लिए कुछ मानक तय किये गये हैं, जिन्हें मुलसमानों के स्कूल व मदरसे पूरा नहीं कर सकेंगे। उन्होंने कहा कि अगर सरकार बोर्ड की मांगों को नहीं मानती तो यह समझा जाएगा कि सरकार मुसलमानों की उपेक्षा कर रही है। इसके लिए देश भर के मुसलमान लोकतांत्रिक तरीके से इसका विरोध करने को तैयार रहें। बोर्ड के उपाध्यक्ष मौलाना (डा.) कल्बे सादिक ने कहा कि संविधान अल्पसंख्यकों को अपने स्कूल-कालेज खोलने, उनका पाठय़क्रम तय करने, शिक्षकों की भर्ती करने आदि की आजादी देता है। वहीं दूसरी ओर शिक्षा का अधिकार अधिनियम इस आजादी में बाधा उत्पन्न करता है। बोर्ड की कार्यकारिणी के सदस्य जफरयाब जीलानी ने कहा कि इस अधिनियम के लागू होने पर अल्पसंख्यक शैशिक संस्थाएं अपनी पसन्द की धार्मिक शिक्षा तथा अपनी मातृभाषा (उर्दू) में शिक्षा देने के अधिकार से वंचित हो जाएंगी। उन्होंने कहा कि जो स्कूल या मदरसा नये कानून के नियमों व मानकों को तीन वर्ष में पूरा नहीं करेगा और नियमित मंजूरी हासिल नहीं करेगा तो उनको एक लाख रुपये जुर्माना अदा करना होगा। यही नहीं जुर्माना अदा न करने पर पढ़ाई जारी रखने वाले स्कूल व मदरसों पर दस हजार रुपये प्रतिदिन के हिसाब से अलग जुर्माना लगेगा। इसी प्रकार वक्फ संशोधन एक्ट व डायरेक्ट टैक्सेज कोड बिल तथा सर्व शिक्षा अभियान बिल में भी तमाम कमियां व खामियां हैं। बोर्ड की कार्यकारिणी के सदस्य मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने कहा कि शिक्षा का अधिकार कानून 2009 की धारा 21 के अनुसार स्कूल को स्थापित करने वाली अल्पसंख्यक संस्था को यह भी अधिकार नहीं होगा कि वह प्रबंध समिति में अल्पसंख्यक वर्ग के व्यक्ति को शामिल कर सके। इसी कानून की धारा 23 में अध्यापकों की शैक्षणिक योग्यता के निर्धारण का अधिकार भी केन्द्र सरकार द्वारा निर्धारित अकैडमिक अथॉरिटी को दिया गया है। यही नहीं अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं को यह भी अधिकार नहीं होगा कि वह धार्मिक शिक्षा के लिए योग्यता का निर्धारण कर सके। इससे मुसलमानों को अपने धर्म की शिक्षा देना लगभग बंद हो जाएगा। मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने कहा कि जब चंद लोग दिल्ली के रामलीला मैदान में बैठकर कानून बनवा सकते हैं तो केन्द्र सरकार को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि अगर देश भर के मुसलमान सड़कों पर उतर आये तो क्या नतीजे होंगे(राष्ट्रीय सहारा,लखनऊ,25.7.11)।

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21 जुलाई 2011

मेडिकल की एकल परीक्षा से होगा फायदा

अब तक मेडिकल में जाने के लिए विभिन्न बोर्ड द्वारा लगभग 20 परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं लेकिन अगले वर्ष से सीबीएसई द्वारा देशभर में कॉमन एंट्रेंस टेस्ट (सीईटी) आयोजित की जाएगी। इससे देशभर के स्टूडेंट्स एक ही मापदंड पर परखे जाएंगे। इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज की डीन डॉ. पुष्पा वर्मा कहती हैं चूंकि एक ही बोर्ड परीक्षा कंडक्ट करेगा इसलिए धांधलियां खत्म हो जाएंगी। अभी तक देश में अलग-अलग मापदंड होने के कारण कमजोर स्टूडेंट्स भी डॉक्टर बन जाते हैं। अब मेहनत करने वाला ही डॉक्टर बन पाएगा।

डॉ. अपूर्व पुराणिक कहते हैं निर्णय स्टूडेंट्स के लिए अच्छा है। इससे विभिन्न राज्यों के सिलेबस में अंतर खत्म किया जा सकेगा। उदाहरण के तौर पर एमपीपीएमटी और ऑल इंडिया पीएमटी दोनों के सिलेबस में अंतर है। जो छात्र दोनों परीक्षाएं देना चाहता है उसे अलग-अलग सिलेबस पढ़ना पड़ता है।

समय और पैसे दोनों की बचत

कोचिंग संचालक पुनीत गुप्ता कहते हैं मेडिकल के लिए होने वाली 20 परीक्षाओं में स्टूडेंट्स का समय और पैसा दोनों बर्बाद होता है। अब दोनों की बचत होगी। संदीप गुप्ता कहते हैं इसका नेगेटिव प्वाइंट यह है कि केवल एक परीक्षा होने से यदि कोई स्टूडेंट किसी कारणवश परीक्षा देने से चूक गया तो फिर उसे अगले साल का इंतजार करना पड़ेगा।

प्लस प्वाइंट
- पारदर्शिता बढ़ेगी।
- परीक्षाओं के लिए विभिन्न शहरों में आने-जाने में समय बचेगा।
- एक फॉर्म भरने से देशभर के मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के रास्ते खुल जाएंगे। 
- अभी परीक्षाओं के लिए कोई शेड्यूल तय नहीं होता। फॉर्म मिलने से लेकर परीक्षा होने तक की तारीखें तय नहीं होती। सीबीएसई परीक्षा लेगा तो सारी चीजें तय समय पर होने की उम्मीद है।
- कॉमन प्लेटफॉर्म होने से पूरे देश के टैलेंट का एक ही बेस पर एनालिसिस होगा और क्राइटेरिया भी एक ही होगा। 

मायनस प्वाइंट
- अलग-अलग स्टेट में सिलेबस और सीटों की संख्या में अंतर है। एमपी और महाराष्ट्र की तुलना में महाराष्ट्र बोर्ड का सिलेबस मप्र से आसान है और सीटें भी अधिक हैं। ऐसे में स्टेट के स्टूडेंट्स के लिए कोटा फिक्स किया जाएगा या किस तरह एडमिशन होंगे, स्पष्ट नहीं है। 
- मप्र में ग्रामीण स्टूडेंट्स की संख्या अधिक है। शहर में स्टूडेंट्स को अच्छी एजुकेशन मिलती है जिससे वे तो एक्जाम क्लीयर कर लेंगे लेकिन हिंदी मीडियम के ग्रामीण स्टूडेंट्स की राह आसान नहीं होगी। साउथ और केरल में एजुकेशन लेवल बहुत अच्छा है(दैनिक भास्कर,इन्दौर,21.7.11)।

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20 जुलाई 2011

यूपी में शिक्षकों का दुरुपयोग

नया शिक्षा सत्र शुरू होते ही जिस तरह यह तथ्य सामने आया कि माध्यमिक शिक्षकों को अध्यापन से इतर भी कार्य निपटाने होंगे उससे यही पता चला रहा है कि उत्तर प्रदेश का शासन एवं प्रशासन शिक्षा में सुधार संबंधी अपने प्रयासों को लेकर गंभीर नहीं। यह विचित्र है कि एक ओर तो यह कहा जा रहा है कि शैक्षिक पंचांग को सही तरह से लागू किया जाएगा और छात्रों के सतत विकास के लिए हरसंभव प्रयास किए जाएंगे, लेकिन दूसरी ओर हाईस्कूल एवं इंटरमीडिएट विद्यालयों के शिक्षक एवं शिक्षिकाओं की पठन-पाठन से इतर कार्यो में ड्यूटी लगाने की तैयारी भी शुरू हो गई है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में जिला प्रशासन के निर्देशों के तहत शिक्षकों को मतदाता सूची तैयार करने, उनमें संशोधन-परिव‌र्द्धन करने और घर-घर जाकर फोटो पहचानपत्र बनवाने की जिम्मेदारी संभालनी पड़ेगी। ऐसा तब होगा जब शैक्षिक पंचांग के अनुरूप शिक्षकों को प्रवेश कार्य एवं मासिक परीक्षा संपन्न कराने के साथ ही विभिन्न समितियों का गठन करना है और उनमें शामिल भी होना है। इसके अतिरिक्त उन्हें सामान्य एवं कमजोर वर्ग के छात्रों के लिए उपचारात्मक शिक्षा का प्रबंध भी करना है। आखिर एक साथ इतने दायित्वों का निर्वहन कैसे संभव है? जब शिक्षकों के पास पठन-पाठन संबंधी कार्यो की ही एक लंबी सूची है तब फिर उन्हें अन्य कार्यो में क्यों शामिल किया जा रहा है? यह समझना कठिन है कि शासन में बैठे लोगों को सदैव शिक्षक ही क्यों फुर्सत में दिखाई पड़ते हैं? शिक्षकों को पठन-पाठन के अतिरिक्त अन्य कार्यो में शामिल करने का अर्थ है कि उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड अन्य बोर्डो सरीखी गुणवत्ता हासिल करने के प्रति गंभीर नहीं। यह सुनिश्चित किया जाना तो समझ में आता है कि शिक्षक पठन-पाठन संबंधी अपने दायित्वों की अनदेखी न करने पाएं, लेकिन उन्हें अन्य कार्यो में शामिल करना अनुचित है। इन स्थितियों में गुणवत्तापरक शिक्षा का नारा सार्थक होने वाला नहीं है। बेहतर हो कि उत्तर प्रदेश सरकार शिक्षकों को गैर-शिक्षणेत्तर कार्यो में खपाने के अपने फैसले पर पुनर्विचार करे। इस संदर्भ में उसे प्राइमरी विद्यालयों के शिक्षकों की ओर भी ध्यान देना होगा, क्योंकि वे भी गैर शिक्षणेत्तर कार्य करने के लिए विवश होते हैं(संपादकीय,दैनिक जागरण,लखनऊ,20.7.11)।

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16 जुलाई 2011

सीटीसी नहीं है कर्मचारी के मूल्यांकन का सही तरीका

आजकल कंपनियों द्वारा कर्मचारियों की भर्ती सीटीसी (कंपनी के लिए लागत) के आधार पर करने का चलन बढ़ रहा है। भारतीय प्रबंधन संस्थान-अहमदाबाद के सहायक प्रोफेसर टीवी राव का मानना है कि सीटीसी किसी भी कर्मचारी के मूल्यांकन का सही तरीका नहीं है। एक तरह से यह प्रतिभा के प्रति अन्याय है। अपनी नई पुस्तक ‘हरकोनोमिक्स फॉर टैलंट मैनेजमेंट’ में राव ने लिखा है, ‘सीटीसी एक व्यक्ति का मूल्य बताता है। एक तरह से यह किसी प्रतिभा के मूल्यांकन का उचित तरीका नहीं है। हम किसी संगठन में जितने ऊंचे पद पर होंगे, हमारे समय का मूल्य उतना ही अधिक होगा।’

राव ने लिखा है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सामाजिक सेवा संगठनों में किसी की प्रतिभा का आकलन सीटीसी से करना उसके प्रति घोर अन्याय है। ‘चिकित्सकों, नसरें, शिक्षकों, कृषि और पर्यावरण क्षेत्र में कार्य कर रहे लोगों का मूल्यांकन वित्तीय तरीके से नहीं किया जा सकता। उनका मूल्यांकन बौद्धिक पूंजी योगदान के आधार पर किया जाना चाहिए।’ इस किताब को पियरसन ने प्रकाशित किया है। लेखक का कहना है कि मानव संसाधन को किसी भी दर मापा नहीं जा सकता। राव ने कहा कि मेरा मानना है कि लोगों का मूल्यांकन वित्तीय आधार पर नहीं होना चाहिए। राव ने लिखा है, ‘कुछ साल पहले मैंने ‘ह्यूनिट’ की अवधारणा का विकास किया था। यह किसी व्यक्ति के मानव संसाधन को मापने का तरीका है। ह्यूनिट की गणना एक घंटे के आधार पर की जाती है। इसमें यह देखा जाता है कि वह व्यक्ति एक घंटे में संगठन, परिवार या समाज को क्या दे रहा है। इसकी इकाई व्यक्ति दर व्यक्ति अलग-अलग होती है। ‘हरकोनोमिक’ एक तरह से आर्थिक और वित्तीय आधार पर किसी व्यक्ति, प्रक्रि या या कार्यक्र म की गणना का तरीका है। इस पुस्तक में एचआर के अर्थशास्त्र के बारे में बताया गया है और साथ ही इसमें मानव संसाधन गतिविधियों का विश्लेषण करने का भी प्रयास किया गया है। पुस्तक में बताया गया है कि किसी व्यक्ति के मूल्यांकन के लिए समय की लागत (सीओटी) को आधार बनाया जाना चाहिए। ऐसे समय जब रिश्ते, भरोसा और प्रतिबद्धता को मुनाफे, पेशेवराना अंदाज, लचीलापन, रणनीति और तेजी के आगे भुलाया जा रहा है, हरकोनोक्सि इस नए रुख में कुछ सकारात्मक ढूंढ़ने का प्रयास है(राष्ट्रीय सहारा,दिल्ली,16.7.11)।

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जॉब बदलें तो सैलरी अकाउंट बंद कराएं

यदि आप नौकरी बदल रहे हैं तो अपना सैलरी अकाउंट जरूर बंद करा दें। थोड़ी सी लापरवाही के कारण आपके खाते में जमा रकम डूब सकती है। बाद में आप खाते की जानकारी करने जाएं तो हो सकता है कि बैंक आपको कर्जदार साबित कर दे। जीरो बैलेंस के नए फंडे से बैंक हर साल करोड़ों रुपए के वारेन् यारे कर रहे हैं। गुड़गांव स्थित एक कंपनी में काम करने वाले अजय को कुछ ऐसे ही हालातों का सामना करना पड़ा। अजय का यहां एक निजी बैंक में सेलरी अकाउंट था। करीब दो साल पहले वह नौकरी बदल कर बेंगलुरू चले गए। तब उनके खाते में पांच हजार रुपए जमा थे। कार्य की व्यस्तता में वह इस खाते के बारे में भूल गए। फिर से गुड़गांव आने पर उन्होंने बैंक में आकर संपर्क किया तो उन पर 1800 रुपए बकाया निकाल दिया गया। बैंक अधिकारियों ने साफ शब्दों में कहा कि यह राशि जमा कराने के बाद ही आपका खाता चालू होगा। यह तो महज एक बानगी है। अजय जैसे बहुत सारे लोगों को आए दिन ऐसे ही हालातों से दो-चार होना पड़ता है। दरअसल कारोबार बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा में लगभग सभी बैंक कंपनियों में जाकर अपने यहां सैलरी अकाउंट खुलवाने की पेशकश करते हैं। इस मामले में निजी क्षेत्र के बैंक काफी आगे हैं। यह खाता जीरो बैलेंस पर खोला जाता है। बैंकों के कारिंदे दूसरे बैंकों में चल रहे वेतन खातों को भी अपने यहां जोड़ने में कामयाब हो जाते हैं। ऐसे में बहुत सारे कर्मचारी अपने पहले वाले खाते को बंद नहीं कराते। ऐसे लोगों की रकम डूब जाती है। कॉल सेंटर और कम सेलरी वाले लोग ऐसी घटनाओं के ज्यादा शिकार होते हैं। बैंकिंग नियमों के अनुसार जिस खाते में हर माह वेतन जाता है, वही खाता ‘सेलरी अकाउंट’ माना जाता है। सैलरी ट्रांसफर न होने पर यह बचत खाते की श्रेणी में आ जाता है। महंगाई के दौर जाहिर तौर बड़ी तादाद में कर्मचारियों के खाते में 10 हजार रुपए से कम ही नकदी होती है। बैंक ग्राहक की इसी मजबूरी का फायदा उठाते हैं। निजी क्षेत्र के लगभग सभी बैंकों में बचत खाते में न्यूनतम 10 हजार रुपए जमा होने का नियम है। इससे कम राशि होने पर बैंक प्रति तिमाही 750 रुपए जुर्माना वसूलते हैं। सर्विस टैक्स जोड़कर यह राशि 850 रुपए से ज्यादा हो जाती है। इस एवज में बैंक एक साल में करीब 3500 रुपए की कटौती कर लेते हैं। इस हिसाब से ग्राहक की दो-ढाई साल में 10 हजार रुपए तक की जमा पूंजी पूरी तरह से डूब जाती है। इस तरह की कटौती सरकारी बैंक भी करते हैं लेकिन उनके जुर्माने की राशि प्रति तिमाही 100 से 200 रुपए के बीच होती है। बैंकों को सिर्फ इतन से ही संतुष्टि नहीं मिलती। जमा शून्य होने पर भी ऐसे ग्राहकों पर जुर्माना लगता रहता है। बैंक इस राशि को बकाए के रूप में दर्शाते रहते हैं। इस स्थिति में यदि आपको यह खाता चालू कराना है तो बकाया राशि जमा करानी ही होगी। एक निजी बैंक के शीर्ष अधिकारी ने नाम जाहिर न करने की शर्त पर बताया कि बैंकों की कमाई का यह एक अच्छा जरिया बन गया है जिसमें हर साल अच्छा-खासा इजाफा हो रहा है। गैर जरूरी सेलरी अकाउंट बंद न कराने वाले लोगों को भविष्य में और बड़ी मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल बैंक जीरो बैलेंस होने पर कुछ माह बाद खाता बंद कर देते हैं। भविष्य में यह जुर्माने की राशि लंबे समय तक जोड़ी जा सकती है जो लोग इसे जमा नहीं कराएंगे बैंक उन्हें डिफाल्टर घोषित कर सकते हैं(देवेन्द्र शर्मा,राष्ट्रीय सहारा,16.7.11)।

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14 जुलाई 2011

डीयू के कोटे पर विवाद

उम्मीद की जानी चाहिए कि ओबीसी की सीटें उन्हीं के छात्रों को दिये जाने की दिल्ली विविद्यालय की घोषणा विवाद पर विराम साबित होगी। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम फैसला आना अभी बाकी है। उसके किसी के पक्ष या विपक्ष में होने की स्थिति में बहस एक बार फिर गरम हो सकती है। दरअसल, ताजा विवाद दाखिले के आधार को लेकर है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय 12 वीं की मार्कशीट को अंतर स्नातक कक्षा में नामांकन के लिए देश भर में मानक मानने पर जोर दे रहा है। वहीं डीयू प्रशासन विषयवार अलग-अलग मानक अपनाने को जायज ठहराता है। ओबीसी के पक्षकार, सामान्य वर्ग के छात्रों से 10 अंक के अंतर को और बढ़ाये जाने का तर्क दे रहे हैं। इनका कहना है कि बिना और छूट दिये वह सामान्य वर्ग की बराबरी नहीं कर सकते। इस तरह, वे शिक्षा को समान अवसर के रूप में मुहैया कराने के सरकार के संकल्पों का लाभ उठाने से ही छूट जाएंगे। ओबीसी छात्र डीयू प्रशासन या विभिन्न कॉलेजों के रवैये से आशंकित भी हैं, जो सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए उनके हिस्से के अवसरों को जब-तब लंगड़ी मार देते हैं। वे अदालत में यही दलील दे रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक चार हजार सीटें पिछले सत्र में खाली चली गई, जो ओबीसी कोटे से भरी जानी थीं। डीयू ने यह नहीं बताया कि वे सीटें सामान्य छात्रों को दी या नहीं। निश्चित रूप से होना यही चाहिए कि कोटे की सीटें उसके योग्य उम्मीदवार को ही दी जाएं। उसके साथ ही यह तय करना भी आवश्यक है कि कितने अंकों वाले छात्रों को यह सीटें दी जाएंगी। क्या मानक यहां तक नरम कर दिया जाना चाहिए कि सामान्य वर्ग के साठ प्रतिशत वाले दाखिले से भले छूट जाएं लेकिन ओबीसी के 30 फीसद अंक वाले को वह मौका दे दिया जाये? अदालत अगली सुनवाई में इस पर भी संभवत: विचार करेगी। इस बीच, संघ लोकसेवा आयोग का यह फैसला भी अभ्यर्थियों का मनोबल बढ़ाने वाला साबित होगा, जिसमें मुख्य परीक्षा देने वाली भाषा में भी इंटरव्यू दे सकने की बात कही गई है। पहले यह सुविधा हिन्दी-अंग्रेजी तक ही सीमित थी। जिस भाषा में आप धाराप्रवाह हों, उसमें विचार भी उतनी सशक्तता और प्रखरता से व्यक्त होते हैं। यह तथ्य कई शैक्षणिक प्रयोगों में कब का स्थापित हो चुका है। फिर इसे यूपीएससी द्वारा अपनाने में हुई अब तक देरी का ही कारण समझ से परे है। खुद आयोग को यह अनुभव है कि जैसे ही हिन्दी माध्यम में पहले लिखित और साक्षात्कार की छूट दी गई, सर्वोच्च सेवाओं के फाटक हिन्दी प्रदेशों के अभ्यर्थी के लिए खुल गये। इसके पहले अंग्रेजी को ही तरजीह देते रहने के कारण अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में देश के दक्षिणी राज्यों का अधिकतर बोलबाला था। हिन्दी राष्ट्रभाषा होने के बावजूद यहां भी अंग्रेजी से मात खा जाती थी। हिन्दी भाषी कुछ चुनिंदा उम्मीदवार ही सफल हो पाते थे, जो अंग्रेजी जुबान में सहज थे। अखिल भारतीय सेवाओं में भागीदारी का यह बंटा और आधा अनुपात देश के संघीय ढांचे के लिहाज से भी अधूरा था। अब गैर हिन्दी भारतीय भाषाओं को महत्त्व मिलने से यूपीएससी के तहत आने वाली तमाम सेवाएं भागीदारी की दृष्टि से समग्र और सम्पूर्ण हो जाएंगी। साक्षात्कार में आत्मविश्वास से भरे अभ्यर्थियों के देश के विभिन्न मसलों पर उनके विजन धाराप्रवाह सामने आएंगे। यह सुशासन और विकास के नजरिये से भी फलदायक होगा। इसी दरम्यान, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद की तरफ से आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के पांच फीसद छात्रों की ट्यूशन फीस माफ करने की घोषणा भी स्वागतयोग्य है। बस, चौकसी रहे कि फर्जी प्रमाण पत्र वाले ये सुविधाएं न ले उड़ें(राष्ट्रीय सहारा,दिल्ली,14.7.11)।

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13 जुलाई 2011

कश्मीर की संस्कृति तबाह कर रहे मदरसे

कश्मीर में तबाह हो रही संस्कृति के लिए नई दिल्ली, इस्लामाबाद की राजनीति के साथ गलत शिक्षा दे रहे मदरसों की तादाद में भारी वृद्धि जिम्मेदार है। यह विचार कश्मीर के बुद्धिजीवियों ने जम्मू के गांधीनगर में मंगलवार को संपन्न हुई दो दिवसीय राउंड टेबल कांफ्रेंस में व्यक्त किए। इसके अलावा समग्र संस्कृति के सरंक्षण के साथ राज्य को स्वायत्तता देने का मुद्दा भी जोर शो से उठाया गया। कांफ्रेंस के दूसरे दिन बहुरंगी संस्कृति के संरक्षण की नीति, तंत्र व राज्य की विविधता के संरक्षण में कला की भूमिका पर वक्ताओं ने अपनी राय में माना कि सांस्कृतिक विरासत का सरंक्षण कर संस्कृति को तबाह होने से बचाया जा सकता है। कश्मीर के बुद्धिजीवी गुलाम नबी ख्याल ने वादी में तबाह हो रही संस्कृति के लिए कुकरमुत्तों की तरह फैले मदरसों की गलत शिक्षा व दिल्ली, इस्लामाबाद की छिछोरी राजनीति को जिम्मेदार ठहराया। पत्रकार व लेखिका सादिया देहलवी ने कहा कि इससे कश्मीर समाज गुस्से व नफरत का शिकार हो जाएगा। देहलवी ने कश्मीर में अहले हदीस यूनिवर्सिटी बनाने के मुद्दे पर पूर्व राज्यपाल जनरल एसके सिंह की निंदा कर बहस को दूसरी और मोड़ दिया। इस पर हस्तक्षेप करते हुए वार्ताकार राधा कुमार ने कहा कि अहले हदीस यूनिवर्सिटी बनाना पीडीपी के एक विधायक की सोच थी। विधानसभा में पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस विधायकों ने मिलकर बिल पास करवा दिया था पर विधान परिषद में यह बिल रुक गया था। नेकां के सांसद रहे मिर्जा रशीद ने भी नई दिल्ली, इस्लामाबाद को राज्य की बिगड़ी संस्कृति के लिए जिम्मेदार ठहराया। कश्मीर मसला राज्य को स्वायत्तता देने से ही हल हो सकता है। कांफ्रेंस में यहां ज्योत्सना सिंह ने समाज की दूरियां कम करने के लिए हेरिटेज के संरक्षण पर बल दिया तो वहीं एमके रैना ने कला व कलाकारों को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया। हसरत गड्डा ने कहा कि संस्कृति को प्रोत्साहित करने वाले संस्थानों की कमान मुख्यमंत्री के हाथ नहीं प्रोफेशनल लोगों के हाथ हों। प्रो. गुल वानी ने लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने पर जोर दिया वहीं पिंटू नारबू ने कहा कि लेह के तरह अन्य जिलों में हिल कौंसिलें बनने से मसले हल हो सकते हैं। डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि राज्य की बहुरंगी संस्कृति को बहाल करने के साथ प्रयास किए जाएं कि समाज में विवाद पैदा न हों। उन्होंने पंचायतों को ताकतवर बनाने के लिए संविधान के 73वें, 74वें संशोधन लागू करने पर भी जोर दिया। सांसद मणिशंकर अय्यर ने कहा कि इसे बार-बार मुद्दा बनाने से बेहतर है कि राज्य संविधान में इन धाराओं को शामिल कर हमेशा के लिए मसला हल हो। वहीं राधा कुमार ने कहा कि केंद्र सरकार भी इस दिशा में काम कर रहा है(दैनिक जागरण,जम्मू,13.7.11)।

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05 जुलाई 2011

डीयू में आए चेंज अच्छे या बुरे?

डीयू में इस बार काफी बदलाव किए गए हैं। एडमिशन प्रोसेस से लेकर स्टडी सिस्टम तक, सब बदल चुका है। इन सब बदलावों का सबसे ज्यादा असर स्टूडेंट्स पर ही पड़ने वाला है। नए एडमिशन प्रोसेस तो स्टूडेंट्स फेस कर ही रहे हैं, पर नए सेमेस्टर सिस्टम पर स्टूडेंट्स का क्या रिएक्शन होगा नहीं पता। क्या सोचते हैं सेमेस्टर सिस्टम पर डीयू के स्टूडेंट्स, पता लगाया साक्षी किचलू और मोहित कुमार ने :

छह महीने में रिजल्ट, अच्छा है

सेमेस्टर सिस्टम अच्छा है क्योंकि इसमें स्टूडेंट्स को छह महीने बाद ही उनकी प्रोग्रेस का पता चल जाता है। इससे वह आने वाले पेपर्स में अपनी गलतियां सुधार सकते हैं। पहले मिड टर्म होते थे पर स्टूडेंट्स उन पर इतना ध्यान नहीं देते थे। यह स्टूडेंट्स के अच्छे भविष्य की तरफ अच्छा कदम है। - याने गुप्ता

सेमेस्टर कम करता है टेंशन

सेमेस्टर सिस्टम स्टूडेंट्स के ऊपर से तनाव कम करने का बहुत अच्छा तरीका है। इससे बच्चों पर ज्यादा स्ट्रेस नही पडे़गा और वह हर सब्जेक्ट को बराबर टाइम दे पाएंगे। यह स्टूडेंट्स की भलाई की तरफ एक अच्छा कदम है। स्टूडेंट्स को अपने शेड्यूल से टाइम मिल पाएगा और प्लान करके पढ़ाई कर पाएंगे। स्टूडेंट्स को पता होगा कि छह महीनों में कितने सब्जेक्ट पढ़ने हैं और कैसे पढ़ने हैं। - विनीता

बार-बार एग्जाम, बहुत खराब


मेरे हिसाब से सेमेस्टर सिस्टम अच्छा नहीं है क्योंकि इसमें बच्चों को बार-बार एग्जाम देने पड़ते हैं। हर छह महीने में एग्जाम से स्टूडेंट्स को और चीजों पर ध्यान देने का टाइम नहीं मिल पाएगा। इसके साथ स्टूडेंट्स को कैंपस लाइफ एन्जॉय करने का मौका नहीं मिल पाता। कॉलेज लाइफ सिर्फ पढ़ाई के लिए नहीं होती, स्टूडेंट्स के लिए कॉलेज का मतलब मस्ती भी है। - साजन सिंह 

पढ़ो और भूल जाओ , ठीक नहीं 

डीयू में सेमेस्टर सिस्टम लाना स्टूडेंट्स के लिए अच्छा नहीं है। सेमेस्टर सिस्टम में स्टूडेंट्स एक बार ही एग्जाम देते हैं और छह महीने बाद वही चीज भूल जाते हैं। एक टाइम के बाद स्टूडेंट्स के लिए नॉलेज मेटर करती है। पर जब तक वह ग्रैजुएशन पास करेंगे शायद सब भूल चुके होंगे। सेमेस्टर सिस्टम की वजह से स्टूडेंट्स की नॉलेज पर फर्क पड़ेगा। - अश्वनी(नवभारत टाइम्स,दिल्ली,4.7.11) 


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01 जुलाई 2011

ब्रेन गेन की रंगत

हाल में दुनिया के प्रसिद्ध मानव संसाधन (एचआर) सलाहकार फर्म माफोई रेडस्टेंड के शोध अध्ययन में कहा गया है कि 2009-10 की तुलना में 2010-11 में भारत लौटने वाले प्रवासियों की संख्या में 15 फीसद का इजाफा हुआ है। इसका कारण भारत की आर्थिक और राजनीतिक मजबूती के साथ रोजगार के बढ़ते अवसरों के साथ अपने परिवार के पास लौटने की चाहत भी है। सचमुच इस समय देश के इतिहास में बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय प्रतिभाओं के विदेश से लौटने और वतन को चमकाने के संकल्प की नई इबारत लिखी जा रही है। पिछले दिनों अमेरिका के ड्यूक, कैलिफोर्निया और हार्वर्ड विविद्यालयों के सहयोग से कॉफमैन फाउंडेशन द्वारा किए गए शोध अध्ययन में पाया गया कि अमेरिका से भारतीय प्रतिभाएं तेजी से अपने देश की ओर लौट रही हैं। ऐसे में कल तक जो भारत प्रतिभा पलायन (ब्रेन ड्रेन) से चिंतित रहता था, अब प्रतिभा वापसी लाभ (ब्रेन गेन) से विकास की नई डगर पर तेजी से आगे बढ़ने की संभावनाएं तलाश रहा है। अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले पांच सालों में भारत की ओर प्रवासी भारतीयों के लौटने का रुख धीमी गति वाला था। लेकिन अब इसमें जबर्दस्त तेजी आई है। ऐसे रुख से अमेरिका को बड़ा नुकसान होने जा रहा है। किसी समय प्रतिभा पलायन से लाभ उठाने वाली अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए यह उलटी गंगा बहने जैसा है। निसंदेह ब्रेन ड्रेन को ब्रेन गेन में बदलकर भारत में विज्ञान और तकनीक को नया आयाम देने के लिए पिछले एक दशक से लगातार कदम बढ़ाए जा रहे हैं। ऐसे कई प्रयासों के जरिए भारत ने अपने कारोबारियों, वैज्ञानिकों, तकनीकी विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और उद्योगपतियों को स्वदेश बुलाने के लिए बड़ा अभियान चलाया है जिसके परिणाम दिखाई देने लगे हैं। एक ओर भारत में प्रतिभा पलायन या ब्रेन ड्रेन की जगह ब्रेन गेन की रंगत के कारण जहां आईटी, बीपीओ और मेडिकल जैसे तमाम सेक्टरों में प्रतिभा पलायन का दौर बेहद धीमा हो गया है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका सहित पूरे यूरोप में काम कर रहे बहुत सारे पेशेवर, तकनीकी विशेषज्ञ और शोधकर्ता अब स्वदेश की ओर कूच कर रहे हैं। प्रवासी भारतीय प्रतिभाओं के लिए देश के आर्थिक विकास के साथ रोजगार के चमकीले अवसर निर्मिंत हो रहे हैं। भारत के पास कुशल पेशेवरों की फौज है। भारत में आईटी, सॉफ्टवेयर, बीपीओ, फार्मास्युटिकल्स, केमिकल्स एवं धातु क्षेत्र में दुनिया की जानी-मानी कंपनियां हैं, आर्थिक व वित्तीय क्षेत्र की शानदार संस्थाएं हैं। वह निवेश तथा विकास में भी आगे है। देश की अर्थव्यवस्था एक खरब डॉलर वाली हो गई है और यहां 200 से ज्यादा कंपनियां वि स्तर की हैं। ऊंचाई पर पहुंचती अर्थव्यवस्था के कारण भारत में विदेशी निवेशकों से भारी धन आ रहा है। देश में शेयर बाजारों में विदेशी निवेशकों का संस्थागत निवेश ऊंचाइयां ले रहा है। जून 2011 में विदेशी मुद्राकोष 312 अरब डॉलर से ऊपर हो गया है। ऐसी उजली आर्थिक संभावनाओं के परिवेश में वि में विकास के उजले अध्याय बनाने वाले प्रवासी भारतीयों का योगदान भारत की मिट्टी को सोना बना सकता है। भारतीयों को दुनिया का सबसे योग्य प्रवासी बताया गया है। कहा गया है कि आईटी, कम्प्यूटर, मैनेजमेंट, बैंकिंग, वित्त के क्षेत्र में दुनिया में भारतीय प्रवासी सबसे आगे हैं। पिछले कई दशकों से भारतीय प्रतिभाएं दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत बनाने के लिए याद की जाती रही हैं। ऐसे प्रवासी भारतीयों के लिए भारत के तेजी से बढ़ते बाजारों में अवसरों की कमी नहीं है। उनके स्वदेश आने से पूरे भारतीय समाज के विभिन्न अंगों और देश को लाभ मिलेगा। जहां भारतीय प्रतिभाओं से देश की आंतरिक अर्थव्यवस्था को गति मिलने की संभावनाएं हैं, वहीं इन प्रतिभाओं से भारत में यूरो और डॉलर की नई कमाई की अच्छी संभावनाएं दिख रही हैं। जहां विदेशों से परियोजनाओं और संसाधनों की ताकत के साथ भारत लौटी प्रतिभाओं से देश का विदेश व्यापार बढ़ना संभावित है, वहीं आउटसोर्सिग के नए अध्याय भी खुलते दिखेंगे। सचमुच दुनिया में विकास के पर्याय बन चुके प्रवासी भारतीय और दुनिया का सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्क कही जाने वाली भारतीय प्रतिभाएं अपने देश को तेज विकास की नई रोशनी दिखा रही हैं। जहां देश में प्रतिभाओं की नई पौध प्रबंधकीय एवं तकनीकी जौहर के साथ विकास को गति देने के लिए आगे बढ़ रही हैं वहीं विदेशों से गहरे कार्य अनुभव एवं संसाधनों के साथ लौट रहे प्रवासी देश की नई आर्थिक ताकत के रूप में रेखांकित हो रहे हैं(जयंतीलाल भंडारी,राष्ट्रीय सहारा,30.6.11)।

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08 जून 2011

सवर्णों को आरक्षण की प्रासंगिकता

कुछ लोगों के लिए आरक्षण शब्द बदनामी, घृणा और निकम्मेपन का पर्याय बन गया है। हमारी संस्कृति एवं सभ्यता हजारों साल पुरानी है और आरक्षण कुछ ही वर्षों का इतिहास है। सिकंदर के हमले के बाद से लेकर देश के आजाद होने तक हमारी सभ्यता एवं संस्कृति चंद हमलावरों का भी मुकाबला नहीं कर पाई अर्थात एक भी ऐसा अवसर नहीं आया जब हमने बाहर के लोगों को खदेड़ा और पराजित किया हो। जिस संस्कृति और सभ्यता की यह परंपरा रही है कि एक जाति के लोग देश की रक्षा करेंगे और शेष का उससे कोई मतलब नहीं, उसका बार-बार पराजित होना स्वाभाविक है। इस सभ्यता ने जिन अनेक विसंगतियों को जन्म दिया उनमें से एक यह भी है कि सब जाति के लोग गंदगी करें लेकिन सफाई करने की जिम्मेदारी सिर्फ एक जाति की होगी। देश इस व्यवस्था से कमजोर हुआ, न कि आरक्षण से। अमेरिका आज अगर दुनिया पर राज कर रहा है तो वह दस-बीस सालों के प्रयास से नहीं बल्कि लगभग ३०० वर्षों के अपने पूर्वजों की कमाई की वजह से। बड़ी आसानी से कुछ तथाकथित सवर्ण कहने में हिचकते नहीं कि आरक्षण से समाज में गड़बड़ी फैल रही है, उस समय शायद उन्हें अपनी सभ्यता का बोध नहीं रहता।

दिल्ली विश्वविद्यालय, आईआईटी, जेएनयू, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन में सवर्णों के लिए ५१ प्रतिशत आरक्षण कर दिया गया है। इस देश में जिन लोगों की आबादी लगभग ८५ फीसदी है, अब उन्हें ४९ प्रतिशत के भीतर ही भागीदारी मिलेगी और १५ प्रतिशत वालों को ५१ प्रतिशत का अधिकार होगा। हाल में आईआईटी, जेईई परीक्षा के परिणाम घोषित हुए। २५४५ ओबीसी परीक्षार्थी पास हुए, जिनमें से १५४० सामान्य मेरिट अर्थात बिना छूट मेरिट में आए। इन्हें आरक्षण की श्रेणी में शामिल कर दिया गया। यदि ऐसा न हुआ होता तो १५४० अतिरिक्त ओबीसी के परीक्षार्थी प्रवेश पा जाते। इसी तरह १९५०ᅠ दलित परीक्षार्थी पास हुए, जिनमें १२२ बिना किसी छूट के पास हुए, फिर भी इन्हें आरक्षण की श्रेणी में रखा गया। यदि ऐसा न होता तो १२२ अतिरिक्त दलित छात्र आईआईटी में प्रवेश पाते। ६४५ आदिवासी परीक्षार्थियों में से ३३ बिना छूट के पास हुए। उन्हें भी आरक्षित श्रेणी में रख दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार १९९२, रितेश आर. साह बनाम डॉ. वाई.एल. यमूल (१९९६), आर.के. सब्बरवाल बनाम स्टेट ऑफ पंजाब (१९९५), भारत सरकार बनाम सत्य प्रकाश (२००६) आदि मामलों में स्पष्ट किया गया है कि यदि आरक्षित श्रेणी के परीक्षार्थी बिना छूट के परीक्षा पास करते हैं तो उन्हें सामान्य सीटों या पदों पर नियुक्त करना है। १९ अगस्त, २०१० को दिल्ली हाईकोर्ट में डॉ. जगवीर सिंह बनाम एम्स ने भी ऐसा ही कहा है। संविधान की धारा १५ व १६ में इन वर्गों के लिए सामान्य अवसर के अलावा अतिरिक्त लाभ का प्रावधान है, फिर भी ये संस्थान इन मौलिक अधिकारों को ठेंगा दिखाने का कार्य कर रहे हैं। पिछले वर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय में लगभग ५४०० ओबीसी की सीटें सामान्य श्रेणी के छात्रों को दे दी गई थीं। दिल्ली विश्वविद्यालय में लगभग ७० कॉलेज हैं जिनमें से ३० कॉलेजों के आंकड़े सूचना अधिकार के तहत जुटाए जा सके। उनके अनुसार कुल ओबीसी की सीटें ७०५९ थीं और प्रवेश मिला ३१५८ को ही। मीडिया एवं अन्य स्रोतों से जब अनुमान लगाया गया तो पता लगा कि ५४०० ओबीसी की सीटों की लूट थी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के १० अप्रैल, २००८ को अशोक ठाकुर के मामले में दिए गए फैसले का गलत फायदा उठाया गया। यह फैसला ५ जजों का है। इस केस में सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल था ही नहीं कि प्रवेश के समय कट ऑफ फासला कितना होना चाहिए? पांच जजों की बेंच में दलबीर भंडारी ने अपनी सिफारिश की थी कि ओबीसी का कट ऑफ मार्क्स जनरल कैटेगरी के मुकाबले १० प्रतिशत से ज्यादा नहीं होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि संस्थान कमेटी बनाए और देखे कि प्रवेश में जो अंकों का अंतर है वह कितना होना चाहिए। किसी संस्था ने इस प्रक्रिया को नहीं अपनाया। मजे की बात है कि यह सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं है बल्कि एक जज का व्यक्तिगत मत है। २०१०-११ में जेएनयू ने ३११ ओबीसी की सीटें सामान्य वर्ग के छात्रों को दे दीं और २००९ में २८५ सीटें। जेएनयू के इस कट ऑफ फॉर्मूले को दिल्ली हाईकोर्ट ने ७ सितंबर, २०१० को अपूर्वा के मामले में गलत ठहराया और २ ओबीसी के छात्रों को दाखिला देने का निर्देश भी दिया। इसके बावजूद धांधली चालू है।

इसी तरह से इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन में भी धांधली हो रही है। जितेन्द्र कुमार यादव ने सूचना-अधिकार के तहत इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन से पूछा कि हिंदी पत्रकारिता में तमाम सामान्य वर्ग की तुलना में ओबीसी एवं एससी के छात्र ज्यादा अंक प्राप्त करने के बावजूद किस आधार पर उनका प्रवेश सामान्य श्रेणी में नहीं हुआ है। इस सूचना के जवाब में मास कम्युनिकेशन ने कहा कि प्रत्येक वर्ग के छात्रों की मेरिट लिस्ट उनके द्वारा अप्लाई किए गए कैटेगरी के अनुसार ही बनाई जाती है। अतः आरक्षित वर्ग के जिन अभ्यर्थियों ने छूट नहीं ली, उन्हें सामान्य कोटे में दाखिल नहीं किया गया(उदित राज,नई दुनिया,8.6.11)।

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