मुख्य समाचारः

सम्पर्कःeduployment@gmail.com
भाषा और लिपि लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
भाषा और लिपि लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

25 सितंबर 2014

हिंदी और वैज्ञानिक शब्दावली

मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक शब्दावली का कोश तैयार करने का बीड़ा उठाया हुआ है। वर्ष 1961 में संसद में पारित प्रस्ताव के मुताबिक सभी विषयों के लिए सभी भाषाओं में शब्दावली तैयार की जाएगी। हर भाषाई क्षेत्र में कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं, जहां भाषा और विषय के विद्वान एक साथ बैठ कर शब्दों पर बहस करते हैं और शब्दावली बनाते हैं। ऐसे शब्दकोश को तैयार करने का मकसद क्या होना चाहिए? आज तक चला आ रहा पुराना सोच यह है कि तकनीकी शब्दावली भाषा को समृद्ध बनाती है। पर इसमें समस्या यह है कि हमारी भाषाओं में समृद्धि को अक्सर क्लिष्टता और संस्कृतनिष्ठता का पर्याय मान लिया गया है। इसलिए तकनीकी शब्दावली पूरी तरह संस्कृतनिष्ठ होती है। 

इसके पक्ष में कई तर्क दिए जा सकते हैं। वैज्ञानिक शब्दों में भिन्न अर्थों की गुंजाइश कम होती है। संस्कृत में व्याकरण और शब्द-निर्माण के नियमों में विरोधाभास नहीं के बराबर हैं। भाषा जानने वालों को संस्कृत शब्दों में ध्वन्यात्मक सौंदर्य भी दिखता है। पर विद्वानों की जैसी भी मुठभेड़ संस्कृत भाषा में होती रही हो, लोक में इसकी कोई विशेष जगह न कभी थी, और न ही आज है। इस वजह से कोशिश हमेशा यह रहती है कि शब्दों के तत्सम रूप से अलग सरल तद्भव शब्द बनाए जाएं। कइयों में यह गलत समझ भी है कि संस्कृत का हर शब्द हिंदी में स्वाभाविक रूप से इस्तेमाल हो सकता है। इसलिए विद्वानों में यह संशय पैदा नहीं होता कि शब्दावली क्लिष्ट हो रही है। सामान्य छात्रों और अध्यापकों को परेशानी झेलनी पड़ती है। 

इसके विपरीत, मकसद पर एक समझ यह भी है कि शब्दावली ऐसी हो जो विज्ञान सीखने में मदद करे और विषय को रुचिकर बनाए। बीसवीं सदी के प्रख्यात भौतिकीविद रिचर्ड फाइनमैन ने अध्यापकों को दिए एक व्याख्यान में समझाया था कि शब्द महत्त्वपूर्ण हैं, उनको सीखना है, पर पहली जरूरत यह है कि विज्ञान क्या है, यह समझ में आए। ये दो बातें बिल्कुल अलग हैं और खासतौर पर हमारे समाज में जहां व्यापक निरक्षरता और अल्प-शिक्षा की वजह से आधुनिक विज्ञान एक हौवे की तरह है। इस तरह लोकतंत्र के निर्माण में इन दो प्रवृत्तियों की अलग राजनीतिक भूमिका दिखती है। 

तकरीबन हर भारतीय भाषा में इन दो तरह की समझ में विरोध है। हिंदी में यह द्वंद्व सबसे अधिक तीखा बन कर आता है। बांग्ला, तेलुगू जैसी दीगर भाषाओं में उन्नीसवीं सदी तक काफी हद तक संस्कृत शब्दों की आमद हो चुकी थी। हिंदी में इसके विपरीत, जब से कविता से ब्रजभाषा विलुप्त हुई और खड़ी बोली हर तरह से मान्य भाषा बन गई, तद्भव शब्द काफी हद तक बचे रहे, पर तत्सम शब्दों का इस्तेमाल अटपटा लगने लगा। आजादी के बाद कुछ सांप्रदायिक और कुछ सामान्य पुनरुत्थानवादी सोच के तहत हर क्षेत्र में पाठों में तत्सम शब्द डाले गए। उस संस्कृतनिष्ठ भाषा को पढ़-लिख कर तीन-चार पीढ़ियां बड़ी हो चुकी हैं। हिंदी को जबरन संस्कृतनिष्ठ बनाने की यह कोशिश कितनी विफल रही है, यह हम सब जानते हैं। यह समस्या और गंभीर हो जाती है, जब नए कृत्रिम तत्सम या तद्भव शब्द बना कर भाषा में डाले जाते हैं। एक समय था जब लोगों को लगता था कि धीरे-धीरे ये नए कृत्रिम शब्द बोलचाल में आ जाएंगे, पर ऐसा हुआ नहीं है। अब ग्लोबलाइजेशन के दबाव में सरकारों की जन-विरोधी अंगरेजीपरस्त नीतियों और अन्य कारणों से स्थिति यह है कि भाषाएं कब तक बचेंगी, यह सवाल हमारे सामने है। ऐसे में गंभीरता से सोचने की जरूरत है कि इन कोशिशों का मतलब और मकसद क्या हो। अगर हम अपने मकसद में कामयाब नहीं हैं, तो वैकल्पिक तरीके क्या हों। क्या तत्सम शब्दों के अलावा तकनीकी शब्दों को ढूंढ़ने का कोई और तरीका भी है। 

कुछेक उदाहरणों से बात ज्यादा साफ होगी। रसायन के कोश का पहला शब्द अंगरेजी के ऐबरेशन शब्द का अनुवाद ‘विपथन’ है। यह शब्द कठिन नहीं है, ‘पथ’ से बना है, जिसे बोलचाल में इस्तेमाल न भी किया जाए, हर कोई समझता है। ‘विपथ’ कम लोगों के समझ आएगा, जैसे मैथिल भाषियों के लिए यह आम शब्द है। ‘विपथन’ हिंदी के अधिकतर अध्यापकों को भी समझ नहीं आएगा, जबकि अंगरेजी में ऐबरेशन हाई स्कूल पास किसी भी छात्र को समझ में आता है। इसकी जगह अगर ‘भटकना’ से शब्द बनाया गया होता, मसलन ‘भटकन’, तो अधिक लोगों को पल्ले पड़ता। यहां तर्क यह होता है कि संस्कृत के नियमों के अनुसार ‘विपथन’ से कई शब्द बन सकते हैं, पर ‘भटकन’ से ऐसा संभव नहीं है। पर क्यों नहीं? ऐसे पूर्वग्रहों से मुक्त होने की जरूरत है। अज्ञेय और रघुवीर सहाय जैसे कवियों ने हिंदी में कई शब्दों को सरल बनाया और कई नए शब्द जोड़े। 

यह विडंबना है कि एक ओर अखबारों के प्रबंधक संपादकों को अंगरेजी शब्दों का इस्तेमाल करने को मजबूर कर रहे हैं, तो दूसरी ओर बोलचाल के शब्दों के साथ सामान्य खिलवाड़ कर नए शब्द बनाना गलत माना जा रहा है। मसलन कल्पना करें कि कोई ‘भटकित’ शब्द कहे तो प्रतिक्रिया में हिंसा नहीं तो हंसी जरूर मिलेगी। अगर ‘भटक गया’ या ‘भटक चुका’ लिखें तो लोग कहेंगे कि देखो तत्सम होता तो दो शब्द न लिखने पड़ते। 

हिंदी के अध्यापकों के साथ बात करने से मेरा अनुभव यह रहा है कि वैज्ञानिक शब्दावली के अधिकतर शब्द उनकी पहुंच से बाहर हैं। मिसाल के तौर पर अंगरेजी का सामान्य शब्द ‘रीवर्सिबल’ लीजिए। हिंदी में यह ‘उत्क्रमणीय’ है। हिंदी के अध्यापक नहीं जानते कि यह कहां से आया। क्या यह उनका दोष है? इसकी जगह ‘विपरीत संभव’ या और भी बेहतर ‘उल्टन संभव’ क्यों न हो! एक शब्द है ‘अनुदैर्घ्य’- अंगरेजी के ‘लांगिच्युडिनल’ शब्द का अनुवाद है। सही अनुवाद है- दीर्घ से दैर्घ्य और फिर अनुदैर्घ्य। हिंदी क्षेत्र में अधिकतर छात्र इसे अनुदैर्ध्य पढ़ते हैं। ‘घ’ और ‘ध’ से पूरी दुनिया बदल जाती है। ऐसे शब्द का क्या मतलब, जिसे छात्र सही पढ़ तक न पाएं! 

ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं, जहां शब्द महज काले अक्षर हैं और वैज्ञानिक अर्थ में उनका कोई औचित्य नहीं रह गया है। जो शब्द लोगों में प्रचलित हैं, उनमें से कई को सिर्फ इस वजह से खारिज कर दिया गया है कि वे उर्दू में भी इस्तेमाल होते हैं, जैसे कीमिया और कीमियागर जैसे शब्दों को उनके मूल अर्थ में यानी रसायन और रसायनज्ञ के अर्थ में शामिल नहीं किया गया है। यह मानसिकता हम पर इतनी हावी है कि करीब तीस साल पहले मैंने प्रख्यात कथाकार और ‘पहल’ पत्रिका के संपादक ज्ञानरंजन को अपनी चिंता साझा करते हुए लिखा था कि हिंदी में वैज्ञानिक शब्दावली हिंदी-भाषियों के खिलाफ षड़्यंत्र लगता है। इससे जूझने के लिए हमें जनांदोलन खड़ा करने की जरूरत है। शब्दावली बनाने की प्रक्रियाओं के समाजशास्त्रीय विश्लेषण की जरूरत है। ऐसा क्यों है कि हिंदी क्षेत्र के नामी वैज्ञानिक इसमें गंभीरता से नहीं जुड़ते। जो जुड़ते हैं, उनकी भाषा में कैसी रुचि है? यह भी एक तकलीफ है कि पेशे से वैज्ञानिक होना और वैज्ञानिक सोच रखना या विज्ञान-शिक्षा में रुचि रखना एक बात नहीं है। 

अधिकतर वैज्ञानिकों के लिए विज्ञान महज एक नौकरी है। चूंकि पेशे में तरक्की के लिए हर काम अंगरेजी में करना है, इसलिए सफल वैज्ञानिक अक्सर अपनी भाषा में कमजोर होता है। इस बात को ध्यान में रख सत्येंद्रनाथ बोस जैसे महान वैज्ञानिकों ने भारतीय भाषाओं में विज्ञान लेखन पर बहुत जोर दिया था। चूंकि हिंदी क्षेत्र में गरीबी, भुखमरी और बुनियादी इंसानी हुकूक जैसे मुद्दे अब भी ज्वलंत हैं, विज्ञान और भाषा के इन सवालों पर जमीनी कार्यकर्ताओं का ध्यान जाता भी है तो वे सवाल महत्त्वपूर्ण नहीं बन पाए हैं। हिंदी में विज्ञान-कथाओं या विज्ञान-लेखन के अभाव (कुछेक अपवादों को छोड़ कर) के समाजशास्त्रीय कारणों को ढूंढ़ा जाए तो भाषा के सवालों से हम बच नहीं पाएंगे। 

आखिर समस्या का समाधान क्या है। शब्द महज ध्वनियां नहीं होते। हर शब्द का अपना एक संसार होता है। जब वे अपने संसार के साथ हम तक नहीं पहुंचते, वे न केवल अपना अर्थ खो देते हैं, वे हमारे लिए तनाव का कारण बन जाते हैं। खासतौर पर बच्चों के लिए यह गंभीर समस्या बन जाती है। अंगरेजी में हर तकनीकी शब्द का अपना इतिहास है। हमारे यहां उच्च-स्तरीय ज्ञान आम लोगों तक नहीं पहुंच पाया, इसके ऐतिहासिक कारण हैं, जिनमें जाति-प्रथा की अपनी भूमिका रही है। यह सही है कि अंगरेजी में शब्द की उत्पत्ति कहां से हुई, इसे समझ कर उसका पर्याय हिंदी में ढूंढ़ा जाना चाहिए। पर लातिन या ग्रीक तक पहुंच कर उसे संस्कृत से जोड़ कर नया शब्द बनाना किस हद तक सार्थक है- यह सोचने की बात है। 

भाषाविदों के लिए यह रोचक अभ्यास हो सकता है, पर विज्ञान सिर्फ भाषा का खेल नहीं है। आज अगर तत्सम शब्द लोग नहीं पचा पाते तो उनको थोपते रहने से स्थिति बदल नहीं जाएगी। किसी भी शब्द को स्वीकार या खारिज करने का सरल तरीका यह है कि वह हमें कितना स्वाभाविक लगता है, इस पर कुछ हद तक व्यापक सहमति होनी चाहिए। अगर सहमति नहीं बनती तो ऐसा शब्द हटा देना चाहिए, भले ही भाषाविद और पेशेवर वैज्ञानिक उसकी पैरवी करते रहेंं। 

यह संभव है कि जैसे-जैसे वैज्ञानिक चेतना समाज में फैलती जाए, भविष्य में कभी सटीक शब्दों की खोज करते हुए आज हटाए गए किसी शब्द को वापस लाया जाए। पर फिलहाल भाषा को बचाए रखने की जरूरत है। और समय के साथ यह लड़ाई और विकट होती जा रही है। गौरतलब है कि कई तत्सम लगते शब्द सही अर्थ में तत्सम नहीं हैं, क्योंकि वे हाल में बनाए गए शब्द हैं। कृत्रिम शब्दों का जबरन इस्तेमाल संस्कृत भाषा के प्रति भी अरुचि पैदा कर रहा है। यह बात संस्कृत के विद्वानों को समझ में आनी चाहिए। लोक से हट कर संस्कृत का भविष्य सरकारी अनुदानों पर ही निर्भर रहा तो यह पूरे उपमहाद्वीप के लिए बदकिस्मती होगी। 

पर वैज्ञानिक शब्दावली का सरलीकरण आसानी से नहीं होगा। कट्टर पंडितों और उनकी संस्कृत का वर्चस्व ऐसा हावी है, कि सामान्य समझ लाने के लिए भी जनांदोलन खड़ा करना होगा। जब तक ऐसा जनांदोलन खड़ा नहीं होता, हिंदीभाषियों के खिलाफ यह षड़्यंत्र चलता रहेगा। यह भाषा की समृद्धि नहीं, भाषा के विनाश का तरीका है। संभवत: इस दिशा में जनपक्षधर साहित्यकारों को ही पहल करनी पड़ेगी। आखिरी बात यह कि मुद्दा महज तत्सम शब्दों को हटाने का नहीं, बल्कि सरल शब्दों को लाने का है। विज्ञान-चर्चा जब सामान्य विमर्श का हिस्सा बन जाएगी, तो जटिल सटीक शब्दों को वापस लाया जा सकेगा(लाल्टू,जनसत्ता,25 सितम्बर,2014)।

आगे बढ़ें...

03 सितंबर 2014

भाषाई उपेक्षा का दंश

भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं की उपेक्षा और दोयम दर्जे के व्यवहार का मुद्दा कुछ समय से बराबर उठता रहा है। संघ लोक सेवा आयोग की प्रशासनिक सेवाओं के अतिरिक्त भी अधिकतर प्रतियोगी परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं की स्थिति ऐसी ही है। प्रश्नपत्रों पर यह स्पष्ट लिखा रहता है कि प्रश्नों के पाठ में भिन्नता होने पर अंगरेजी वाला पाठ मान्य होगा और कई प्रश्नपत्रों में तो यह भी लिखा नहीं होता है, जबकि अक्सर हिंदी पाठ अबूझ और कई बार गलत तक होता है। यह बात विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा से लेकर सामान्य प्रतियोगी परीक्षाओं तक में देखी जा सकती है। इन आंदोलनकारियों को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने भारतीय भाषाओं की इस उपेक्षा को फिर से बहस में ला दिया। 

यह कोई प्रशासनिक सेवाओं का अलग-थलग मसला नहीं है, बल्कि हमारे देश की उस अकादमिक व्यवस्था का एक विस्तार है, जहां भारतीय भाषाओं की इसी तरह की उपेक्षा होती है और जो इन भाषाओं के पठन-पाठन की गतिविधियों और इनके विद्यार्थियों के लिए अकादमिक और पेशेगत अवसरों को सीमित करती है। अगर हम उच्च शिक्षा की स्थिति पर एक नजर डालें तो स्पष्ट हो जाएगा कि सरकारी नीतियां इस असमान व्यवस्था को प्रोत्साहित करती हैं।

आजादी के बाद हमारे राजनीतिक नेतृत्व ने महसूस किया कि अन्य विकासमूलक मानकों पर विकसित देशों की बराबरी करने में हमें वक्त लगेगा, तकनीक और विज्ञान का क्षेत्र ऐसा है जिसमें और जिसके जरिए हम तत्काल विकसित देशों की पंक्ति में जा खड़े होंगे। फलत: हमारी सरकारें (चाहे किसी भी पार्टी की हों) तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षा पर विशेष ध्यान देती हैं, उसके बाद ही सामाजिक विज्ञान के अनुशासनों का स्थान आता है। और अंत में, भाषा और साहित्य जैसे मानविकी के विषय रह जाते हैं। 

अभी हमारे देश में सोलह भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) हैं, जिनमें छह-सात काफी प्रतिष्ठित हैं और अन्य अभी आकार ले रहे हैं। इसके अतिरिक्त तीस राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआइटी) हैं। विज्ञान-शिक्षा के क्षेत्र में पांच भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (आइआइएसइआर) हैं। साथ ही, भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलुरु, भारतीय प्रतिरक्षा संस्थान, नई दिल्ली के अलावा भी विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के लिए कई संस्थान और परिषदें हैं। 

समाज विज्ञान की शिक्षा के क्षेत्र में भी ऐसी कई संस्थाएं हैं- टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (मुंबई और हैदराबाद), गोखले अर्थशास्त्र और राजनीतिक विज्ञान संस्थान (पुणे), कलिंग सामाजिक विज्ञान संस्थान (भुवनेश्वर), मद्रास विकास अध्ययन संस्थान, विकास अध्ययन संस्थान कोलकाता जैसी कई संस्थाएं हैं। लेकिन भाषा और साहित्य के क्षेत्र में भारतीय भाषा संस्थान मैसूर, केंद्रीय हिंदी संस्थान, सेंट्रल इंस्टीट्यूट आॅन क्लासिकल तमिल जैसी गिनी-चुनी संस्थाओं के अलावा महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय ही हैं। 

इसी तरह उच्च शिक्षा में शोध के लिए वैज्ञानिक एवं औद्योगिक शोध परिषद (सीएसआइआर), वैज्ञानिक एवं अभियांत्रिकी शोध परिषद (एसइआरसी) जैसी संस्थाएं वैज्ञानिक शोध को प्रोत्साहित करती हैं। समाजविज्ञान के क्षेत्र में इंडियन काउंसिल फॉर सोशल साइंस रिसर्च अकादमिक शोध को बढ़ावा देती है। इसके अलावा समाजविज्ञान के विभिन्न अनुशासनों में भी कई संस्थान हैं। इतिहास के क्षेत्र में ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद और दर्शनशास्त्र के लिए इंडियन काउंसिल फॉर फिलोसोफिकल रिसर्च ऐसी ही परिषदें हैं। इसी तरह नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय आधुनिक भारत के इतिहास से जुड़े विभिन्न प्रसंगों पर शोध को बढ़ावा देता है। 

ये परिषदें और संस्थाएं न केवल शोध के लिए विभिन्न शोधवृत्तियां देती हैं, बल्कि फील्ड वर्क को भी प्रोत्साहित करती हैं। यही नहीं, ये संस्थाएं संबंधित क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्राय: देश के अलग-अलग हिस्सों में शोध पद्धति की कार्यशालाओं का आयोजन करती हैं, जिनमें युवा संकाय सदस्य और शोधार्थी भाग लेते हैं। उक्त सरकारी संस्थाओं के अतिरिक्त कई गैर-सरकारी संस्थाएं भी सामाजिक विज्ञान और विज्ञान के क्षेत्रों में कार्यरत हैं। ये सभी अपने-अपने क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देने का काम करती हैं। साथ ही साथ, ये अपनी परियोजनाओं और कार्यक्रमों के जरिए रोजगार के अवसर भी मुहैया कराती हैं। 

वहीं अगर हम भाषा और साहित्य की तरफ नजर डालें तो भारतीय भाषाओं की साहित्य अकादमियों के अलावा कुछ खास है नहीं। उक्त साहित्य अकादमियां और अन्य निजी न्यास या संस्थान भी साहित्यिक पुरस्कारों पर ज्यादा ध्यान देते हैं, नए शोध के लिए शोधवृत्तियां प्राय: नहीं देते और न ही शोध से संबंधित गतिविधियां आयोजित करते हैं। हालांकि इन अकादमियों और निजी न्यासों का दायरा उच्च शिक्षा नहीं है, फिर भी ये पुरस्कारों की स्थापना के साथ कुछ शोधवृत्तियां स्थापित करेंगे तो उस भाषा और साहित्य का शैक्षणिक विस्तार ही होगा। इसलिए ऐसा किया जाना चाहिए। 

हम इस तरह देखते हैं कि सरकारें भारतीय भाषाओं को कोई विशेष महत्त्व नहीं देती हैं। हां, इन भाषाओं के तकनीकी विकास पर अवश्य ध्यान दिया जा रहा है, जिसके तहत प्रगत संगणन विकास केंद्रों (सीडैक), केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान मैसूर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली में बहुत-सी अकादमिक गतिविधियां चल रही हैं। इस पूरी परिघटना की सबसे बड़ी विडंबना है कि भाषा और साहित्य जैसे मानविकी विषयों को रोजगारमूलक शिक्षा के नाम पर नजरअंदाज किया जा रहा है, जबकि बेरोजगारी तो बढ़ ही रही है। सही है कि रोजगार एक आवश्यक तत्त्व है, लेकिन शिक्षा महज रोजगार के लिए नहीं हो सकती। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को अपने समाज, राजनीति और संस्कृति के यथार्थ से रूबरू कराना भी होता है।

अपने समाज और परिवेश से विद्यार्थियों को जोड़ने और संपूर्ण शिक्षा देने के इसी उद्देश्य से आइआइटी, एनआइटी जैसी तकनीकी संस्थाओं में सामाजिक विज्ञान और मानविकी विभाग भी स्थापित किए गए। उच्च शिक्षा के लिए बनाई गई यशपाल समिति की रिपोर्ट में भी यह एक महत्त्वपूर्ण सिफारिश थी। लेकिन यह फलीभूत नहीं हुई, क्योंकि शायद ही किसी संस्थान में हिंदी या किसी अन्य भारतीय भाषा को स्थान मिला हो। इन सभी संस्थानों के मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभागों में सामाजिक विज्ञान के कुछ विषय पढ़ाए जाते हैं, जबकि साहित्य और भाषा के नाम पर अंगरेजी पढ़ाई जाती है, हिंदी या अन्य कोई भारतीय भाषा नहीं। यही स्थिति राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों की है। एक-दो अपवाद और हिंदी दिवस जैसी औपचारिकताओं को छोड़ दें तो भारतीय भाषा संबंधी गतिविधियां प्राय: इन संस्थानों में नहीं होतीं। भारतीय प्रबंधन संस्थान तो इस मामले में और भी पीछे हैं।

यही हाल उन निजी विश्वविद्यालयों का है, जो पिछले कुछ वर्षों में धूमधाम से खुले हैं। अधिकतर निजी विश्वविद्यालय विज्ञान, तकनीक, प्रबंधन आदि अध्ययन के लिए ही हैं, जिनमें भाषा-साहित्य के नाम पर बस अंगरेजी है। लेकिन जो निजी विश्वविद्यालय सामाजिक विज्ञान और मानविकी को बराबर स्थान देने का दावा करते हैं, वहां भी प्राय: भारतीय भाषाओं को कोई स्थान नहीं मिलता है। उदाहरण के लिए, एमिटी विश्वविद्यालय में जर्मन, स्पेनिश, फ्रांसीसी और अंगरेजी में स्नातक की पढ़ाई होती है, लेकिन भारतीय भाषाओं में सिर्फ संस्कृत को यह स्थान देता है। जोधपुर नेशनल यूनिवर्सिटी जैसे कुछ ही विश्वविद्यालय भारतीय भाषाओं के पाठ्यक्रम प्रस्तावित करते हैं। 

इन अपवादों को छोड़ दें, तो ऐसे निजी विश्वविद्यालयों की फेहरिस्त लंबी है, जहां भारतीय भाषाओं का अस्तित्व ही नहीं है और उनमें साहित्य के नाम पर अंगरेजी साहित्य या कहीं-कहीं तुलनात्मक साहित्य पढ़ाया जाता है। कई सरकारी विश्वविद्यालय भी तुलनात्मक साहित्य के अध्यापकों के लिए योग्यता तुलनात्मक साहित्य या अंगरेजी (अन्य किसी भाषा में नहीं) में एमए निर्धारित करते हैं। अंगरेजी साहित्य पढ़ाए जाने से कोई समस्या नहीं है, लेकिन भारतीय भाषाओं का साहित्य भी इन्हें अवश्य पढ़ाना चाहिए। अगर अंगरेजी साहित्य पढ़ाया जा सकता है, तो हिंदी, उर्दू, पंजाबी, बांग्ला, मराठी, असमी, मलयालम, तमिल, तेलुगू, ओड़िया, गुजराती आदि भाषाओं का साहित्य क्यों नहीं पढ़ाया जा सकता! 

निजी विश्वविद्यालय संबंधित राज्य की विधानसभा द्वारा पारित अधिनियम के तहत स्थापित किए जाते हैं और इन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भी मान्यता देता है, तो क्यों नहीं इन२के लिए यह आवश्यक किया जाए कि ये कम से कम उस राज्य की भाषा और उसके साहित्य के कुछ पाठ्यक्रम प्रस्तावित करें। यही बात आइआइटी और आइआइएम पर भी लागू होनी चाहिए। कितना अच्छा हो, अगर देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थित इन संस्थानों में अलग-अलग भारतीय भाषाएं भी पढ़ाई जाएं। इसके विपरीत वर्तमान व्यवस्था के कारण अधिकतर छात्र-छात्राओं की पढ़ाई की भाषा व्यवहार की भाषा से अलग हो जाती है। जब उनकी ज्ञान की प्रक्रिया से ही इन भाषाओं को काट दिया गया है, तो फिर यह शिकायत कहां से जायज है कि अमुक अनुशासन भारतीय भाषाओं में नहीं पढ़ाए जा सकते! यह एक सर्वविदित तथ्य है कि हमारे देश में प्राय: उच्च शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएं नहीं हैं। कुछ राज्यों के विश्वविद्यायलों में अवश्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से पठन-पाठन होता है, लेकिन इसके लिए उन्हें दोयम दर्जे की पाठ्यपुस्तकों पर निर्भर रहना पड़ता है। फलस्वरूप, अक्सर वे उस विषय में पारंगत होने और आगे की पढ़ाई से वंचित हो जाते हैं। इसके अलावा भारतीय भाषाओं के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की विशेष वित्तीय सहायता से संचालित कार्यक्रम या पुस्तकालय भी प्राय: नहीं दिखाई देते। 

अब जरा उस शिकायत पर भी नजर डालते हैं, जो भारतीय भाषाओं, खासकर हिंदी के लेखक-प्रकाशक करते हैं कि साहित्य को पाठक नहीं मिल रहे हैं। मिलेंगे कहां से, जब संभावित पाठकों की पूरी पीढ़ी को ही व्यवस्थित तरीके से उसके साहित्य, भाषा और समाज से दूर कर दिया जाता है। यह स्थिति अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में हिंदी में ज्यादा विकट है। यह मुद्दा चाहे सीधे रूप से प्रतियोगी परीक्षाओं से न जुड़ता हो, इससे अलहदा नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक परिदृश्य से संबद्ध है, जहां भारतीय भाषाएं उपेक्षित हैं और जहां यह माना जाता है कि वे अंगरेजी से पिछड़ी हुई हैं, ज्ञान का माध्यम नहीं बन सकती हैं और संवाद-कौशल या व्यक्तित्व-विकास का पर्याय तो अंगरेजी ही है। एक बार यह मान लेने के बाद अकादमिक संसाधनों का असमान वितरण आम स्वीकृति पा जाता है, जो भारतीय भाषाओं को और हाशिये पर धकेल देता है। इसलिए इन भाषाओं के इस मसले को समग्रता में देखा जाना चाहिए(गणपत तेली,जनसत्ता,01 सितम्बर,2014)।

आगे बढ़ें...

22 अगस्त 2014

भारतीय भाषाओं के पुनर्वास का प्रश्न

नई सरकार के आते ही हिंदी वर्ग विशेष के लेखकों और वक्ताओं की सक्रियता का कारण तो समझ आता है,लेकिन ऐसे अधिकतर लेख पढ़ कर निराशा ही होती है कि अब भी ये निष्कर्ष हिंदी समर्थक या हिंदी-विरोधी पक्षों से आगे जाते दिखाई नहीं देते। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय भाषाओं की क्या भूमिका होनी चाहिए? क्यों यह प्रश्न वैचारिक विश्लेषण का हिस्सा नहीं बनता? यह अफसोस की बात है कि भाषा के प्रश्न को सामाजिक न्याय और बराबरी के पहलुओं से जोड़ कर देखने के प्रयास नहीं किए जाते। 
कोई भी भाषा गंभीर विचार-विमर्श का आधार बन सकती है बशर्ते कि उस भाषा में वे सभी साधन विकसित किए जाएं। आखिर कब तक यह दोहरापन जारी रहेगा कि दादा-दादी और नाना-नानी से बात करने के लिए तो अपनी भाषाएं याद आती हैं लेकिन ज्ञान की बात करने के लिए सिर्फ अंगरेजी का आलाप आरंभ हो जाता है। मानो अगर यह आलाप आप नहीं लगा सकते तो आपके विचारों में कोई ताकत ही नहीं होगी।
क्यों प्रत्येक वर्ष टीवी पर बजट की समीक्षा करने के लिए अच्छे हिंदी वक्ताओं का टोटा पड़ जाता है? क्यों फिर ऐसे विश्लेषण सुनने पड़ते हैं जिनमें अटपटी हिंदी और हिंग्लिश की शब्दावली की भरमार होती है? अंतत: बजट समीक्षा इस कदर बोझिल हो जाती है कि बजट जैसी आर्थिक प्रक्रिया की बारीकियां तो छोड़िए उसके प्रमुख बिंदुओं को समझने में भी असमंजस पैदा होने लगता है। लगभग यही स्थिति उन सभी विषयों पर लागू होती है जिनमें भाषा संबंधी विशिष्ट जानकारी की जरूरत होती है। इसलिए यह समझना बहुत जरूरी है कि भारतीय भाषाओं में और विशेषकर हिंदी में ज्ञान के विविध पक्षों के लिए विशिष्ट शब्दावली का जो अभाव नजर आ रहा है वह बहुत हद तक बदलते परिवेश का परिणाम है जिसमें हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में विविध विषयों की जानकारी का लेन-देन घटता जा रहा है। यह प्रमुख चिंता का विषय बनना चाहिए।
अपनी भाषाओं के द्वारा ज्ञान का प्रसार ही पश्चिमी देशों को भूमंडलीय स्तर पर आर्थिक और व्यापारिक मामलों में चौधराहट का अवसर प्रदान करता है। इस भूमिका को अख्तियार करने में इन देशों की शैक्षिक संस्थाओं की प्रमुख भूमिका रहती है। इन शैक्षिक संस्थाओं के द्वारा ही शोध और उसके द्वारा भाषा गढ़ने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में भाषा की अहम भूमिका बनती है जो उसके वैज्ञानिक स्वरूप को ही सुनिश्चित नहीं करती, बल्कि पूरी दुनिया में उसकी भाषा के प्रसार को भी सुनिश्चित करती है। टेलिफोन का आविष्कार या फिर मोबाइल का प्रचलन महज पश्चिमी ज्ञान का प्रसार नहीं है, बल्कि उस भाषा का भी प्रसार है जिसके  माध्यम से ‘टेलि’ जैसे शब्द (जो ग्रीक भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है ‘दूर’) का प्रयोग टेलीफोन और टेलीविजन जैसे शब्दों को गढ़ने के लिए किया गया।
पश्चिमी देशों ने भाषाओं को ज्ञान का आधार बनाने के साथ ही अन्य देशों में भी इस ज्ञान के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया, लेकिन यह भी सुनिश्चित किया कि यह ज्ञान उनकी अपनी भाषा में प्रसारित हो। इसी का परिणाम है कि आज हजारों भारतीय जो विदेशों में उच्च शिक्षा के लिए जाते हैं, इस तथ्य की तसदीक के लिए कि वे अंगरेजी भाषा जानते हैं, उन्हें इन देशों की कई परीक्षाएं पास करनी पड़ती हैं। टॉफल और आइइएलटीएस जैसी परीक्षाओं का संचालन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है, जिसके बिना कोई भी भारतीय इंग्लैंड या अमेरिका में उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकता। 
इसके विपरीत क्या हम अपने देश में भाषा की ऐसी किसी मानक परीक्षा का समावेश कर पाए हैं? हम इस तरह का मानक नहीं खड़ा कर पाए हैं, क्योंकि हमने किसी भारतीय भाषा को उच्च शिक्षा के लिए निर्मित करने का प्रयास ही नहीं किया। उच्च शिक्षा की भाषा के लिए हमने अंगरेजी को ही जारी रखा, जिसके  कई दूरगामी परिणाम निकले हैं और भविष्य में भी इसके विपरीत परिणाम सामने आएंगे।
यह आश्चर्य की बात नहीं है कि विदेशी छात्र, जो भारतीय विषयों पर शोध करते हैं, वे जब भारत आते हैं तो उन पर कोई शर्त लागू नहीं होती कि वे भारत में आने से पहले कोई भारतीय भाषा सीखें। अधिकतर विदेशी छात्र भारत में बिना शोध-वीजा के दाखिल होते हैं और तमाम नियमों को ताक पर रख कर अपना काम करते हैं। क्या किसी भारतीय छात्र के लिए ऐसा करना संभव होगा कि वह ब्रिटेन जाकर बिना शोध-वीजा के शोध कर सके? क्या आप कल्पना करेंगे कि अंगरेजी ज्ञान के बिना बिटेन या अमेरिका के पुस्तकालयों में जाकर काम कर सकें?
भारत के बड़े शहरों में रहने वाले ऐसे अनेक विदेशी छात्र मिल जाएंगे जो बिना भाषा जाने इन शहरों में रह रहे हैं, बल्कि अब तो वे भारतीय अर्थव्यवस्था का लाभ उठाने से भी नहीं चूकते। ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जो बताते हैं कि भारतीय भाषाओं के महत्त्व को गंभीरता से न लेने के कितने विपरीत परिणाम निकल रहे हैं। इस संदर्भ में नई सरकार द्वारा भारतीय भाषाओं और विशेषकर हिंदी के महत्त्व को उभारना अहम कदम साबित हो सकता है।

यह कदम सही दिशा में उठेगा, तभी उन प्रदेशों के नौनिहालों के साथ न्याय किया जा सकेगा जिनके पूर्वजों को पहले राष्ट्रीयता के नाम पर और फिर उत्तर भारत के शिक्षित वर्गों ने हिंदी के नाम पर राष्ट्रीय आंदोलन की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया। उत्तर भारत के उन तमाम वर्गों ने अपनी बोलियों को दरकिनार करके हिंदी का दामन थामा   था, इस विश्वास के साथ कि आजादी के बाद वे अंगरेजी के चंगुल से मुक्त हो पाएंगे। लेकिन हिंदी समेत भारतीय भाषाओं को उच्च शिक्षा के माध्यम के तौर पर स्वीकार न किया जाना यह दर्शाता है कि इन भाषाओं को राजनीतिक उत्साह जगाने के लिए तो प्रयोग किया गया, लेकिन कभी भी इन्हें गंभीर विषयों के लिए तैयार नहीं किया गया।
नई सरकार का भाषाई सपना तब तक साकार नहीं हो सकता, जब तक वह भारतीय भाषाओं को ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में प्रोत्साहित नहीं करेगी। भारतीय भाषाओं को ज्ञान-विज्ञान की भाषाएं बनाए बिना हम कमजोर तबकों के लिए विकास को अर्थपूर्ण दिशा नहीं दे पाएंगे। तब तक विकास की किसी भी परियोजना को बेमानी ही माना जाएगा जब तक उसमें इन वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित नहीं की जाएगी। अंगरेजी भाषा की पृष्ठभूमि से आने वाले लोग विशिष्ट सामाजिक और आर्थिक वर्ग से आते हैं। अंगरेजी को ही गुणवत्ता का आधार मानना केवल इस वर्ग के लोगों को लाभ पहुंचाना है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विजय महज एक राजनीतिक दल और उसकी विचारधारा की जीत नहीं है, बल्कि यह उस व्यक्तित्व की भी जीत है जिसने अखिल भारतीय स्तर पर संवाद के लिए अंगरेजी को नहीं, बल्कि हिंदी और गुजराती को आधार बनाया। उनके लंबे चुनावी अभियान में उनके वक्तव्यों और तर्कों की भाषा के पीछे हिंदी और गुजराती के संस्कार भी थे जिसके  द्वारा उन्होंने विरोधी दलों पर हमले बोले। इस पहलू को दूसरे नजरिए से भी देखा जा सकता है कि विरोधी दलों के नेता जिन पर वंशवाद के आरोप लगे, उनकी हार के पीछे उनके दस वर्षीय शासन की विफलताएं रहीं, लेकिन किसी भी एक भाषा में प्रभावी संवाद कायम न कर पाने की उनकी अकुशलता को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। अभी इन पक्षों को विश्लेषण का आधार बनाने के लिए सामाजिक मंच भी तैयार नजर नहीं आते। 
कांग्रेसी नेतृत्व द्वारा जनता के साथ किए गए संवाद इस कदर प्रभावहीन थे कि अवाम को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाए। जनता की इस अस्वीकृति के पीछे भाषा के पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगर कहें कि कांग्रेसी नेता अंगरेजी और हिंदी दोनों ही भाषाओं के प्रभावी इस्तेमाल में अक्षम रहे तो यह गलत नहीं होगा। 
दरअसल, उत्तर भारत में भूमंडलीकरण के बाद नौजवान मतदाता की भूमिका ने वर्तमान चुनाव परिणामों को तय करने में अहम भूमिका निभाई। युवाओं की इस भूमिका को भाषा और संवाद के तरीकों से जोड़ कर भी देखा जा सकता है। तकनीकी विकास और सूचना तंत्र का प्रसार कई अर्थों में अंगरेजी शिक्षा की तरह महज प्राइवेट स्कूलों तक केंद्रित नहीं रहा, बल्कि यह गैर-अंगरेजी नौजवानों का हथियार भी बना है।
सत्तर के दशक में भारतीय भाषाओं में पढ़ने वाले छात्रों में अंगरेजी न जानने की हीन भावना इन भाषाओं के लिए समर्थन जुटाने में आड़े आती रही। लेकिन इक्कीसवीं सदी के गैर-अंगरेजी भाषी नवयुवकों के बीच तकनीकी विकास की विशेष भूमिका रही है। अंगरेजी के अभाव में यह वर्ग अब भी मौजूद है, लेकिन अब वह हीन भावना से ग्रस्त नहीं है जिस तरह वह सत्तर या अस्सी के दशक में दिखाई देता था। उसके पास तकनीक और सूचना का औजार है जिसके माध्यम से वह अंगरेजी-प्रभाव का मुकाबला करने की क्षमता दिखा रहा है। वह अंगरेजी अधूरी ही बोलता है, लेकिन तकनीकी शब्दावली की ढाल के सहारे अंगरेजी के वार को बेकार करने की क्षमता रखता है। भारतीय बोलियों को बरतने वाले ये नौजवान सूचना तंत्र के प्रभावी वाहक बन कर उभरे हैं। अब भी ये वर्ग संवाद के लिए भारतीय भाषाओं पर ही निर्भर हैं। 
यह केंद्र और प्रदेशों की सरकारों को तय करना है कि भारतीय भाषाओं को भविष्य में कैसे ज्ञान-विज्ञान की भाषाएं बनाया जा सकता है। लेकिन इस तथ्य से भी हम मुंह नहीं मोड़ सकते कि भाषा कोई भी हो, उसको बरतने में आलोचनात्मक और विश्लेषणात्मक दृष्टि अपनाए बिना उसे सक्षम नहीं बनाया जा सकता। भारतीय भाषाओं को ज्ञान-विज्ञान की भाषाएं बनाने के लिए विविध संस्थाओं को उनके प्रति ईमानदारी से पेश आना होगा। अगर अपनी भाषाओं के प्रति अनुशासन और गंभीरता नहीं है तो महज पौराणिक कथाओं के आधार पर भारतीय अतीत की श्रेष्ठता का गुणगान काफी नहीं है। अपनी भाषाओं को ज्ञान-विज्ञान के विविध अनुशासनों से जूझना होगा। फिर यह लक्ष्य हिंग्लिश से तो कभी भी प्राप्त नहीं किया जा सकता(ऐश्वर्ज कुमार,जनसत्ता,दिल्ली,21 अगस्त,2014)।

आगे बढ़ें...

05 जून 2012

गोजरी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग

जम्मू-कश्मीर के वन मंत्री मियां अल्ताफ अहमद ने गोजरी भाषा को संविधान के आठवें शेड्यूल में शामिल करने की मांग की है। 

उन्होंने यह बात सोमवार को अकादमी आफ आर्ट, कल्चर एवं लैंग्वेजिस की ओर से लाल मंडी में आयोजित म्यूजिकल कार्यक्रम में कही। उन्होंने कहा कि गोजरी भाषा विश्व के विभिन्न हिस्सों में बोली जाती है, लेकिन इसका केंद्र बिंदु जेएंडके में ही है। 

उन्होंने कहा कि गोजरी भाषा के साथ अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को संविधान में शामिल करना उमर अब्दुल्ला की अगुवाई वाली गठबंधन सरकार की पहली प्राथमिकता है। उन्होंने गुज्जर बक्करवाल समुदाय की सांस्कृतिक धरोहर को सहेजकर रखने के अलावा अकादमी की समुदाय के लेखकों, कलाकारों, कविओं को बढ़ावा देने को कहा। 

वहीं कार्यक्रम में अकादमी के सचिव खालिद बशीर ने कहा कि समुदाय के गणमान्य व्यक्तियों द्वारा गोजरी भाषा के फोक सांग को सहेजकर रखने के लिए कई सुझाव दिए हैं, जिसके लिए अकादमी की और से गोजरी की एलबम बनाई जाएगी। उन्होंने कहा कि आगामी राज्य स्तरीय म्यूजिक फेस्टिवल को गोजरी भाषा में करवाया जाएगा। 

इससे पहले चीफ एडिटर डा. जावेद राही ने बताया कि अकादमी द्वारा गोजरी भाषा को जन जन तक पहुंचाने को कई किताबें प्रकाशित की जा रही हैं(दैनिक भास्कर,जम्मू,5.6.12)।

आगे बढ़ें...

12 दिसंबर 2011

उत्तराखंड में लोकभाषाओं की दिशा व दशा पर मंथन आज से

उत्तराखंड भाषा संस्थान व हिन्दी अकादमी के दो दिवसीय शोध सम्मेलन में देशभर के भाषा विज्ञानी और साहित्यकार लोक भाषाओं की मौजूदा दशा व दिशा पर मंथन करेंगे। दून विवि में 12 और 13 जून को आयोजित इस कार्यक्रम में ‘लोकभाषाओं का साहित्य व उसके सांस्कृतिक आयाम’ विषय पर मंथन किया जाएगा। संस्थान की सविता मोहन व डा. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल उत्तराखंड हिन्दी अकादमी के डा. मुनीराम सकलानी ने संयुक्त रूप से बताया कि कार्यक्रम में डा. ताराचन्द्र त्रिपाठी, नंदकिशोर नौटियाल, गंगाप्रसाद विमल, केशवदत्त, डा. प्रयाग जोशी, बीआर पुरोहित व उमा भट्ट समेत अनेक आंचलिक साहित्यकार, समालोचक व भाषाविद् भाग लेंगे। इनके द्वारा शोधपत्र भी प्रस्तुत किए जाएंगे। कार्यक्रम में भाषा संस्थान की पुस्तक प्रकाशन अनुदान योजना के लिए आंचलिक शोध पुस्तकों के प्रकाशन हेतु पुस्तकों का चयन भी समिति द्वारा किया जाएगा। कार्यक्रम के दूसरे दिन चयनित आंचलिक व भाषायी लेखकों को मुख्यमंत्री द्वारा सम्मानित किया जाएगा(राष्ट्रीय सहारा,देहरादून,12.12.11)।

आगे बढ़ें...

06 दिसंबर 2011

कठिन हिंदी शब्दों के स्थान 'हिंग्लिश’ को तरजीह देने का निर्देश

कठिन हिंदी शब्दों से आने वाली समस्याओं से पार पाने के लिए सरकार ने सेक्शन ऑफिसरों को निर्देश दिया है कि वे आसानी से समझ में आने और भाषा को प्रोत्साहन देने के लिए वैसे शब्दों की जगह ‘हिंग्लिश’ शब्दों का प्रयोग करें। यह आदेश गृह मंत्रालय की राजभाषा इकाई ने जारी किया। इसेे हाल में विभिन्न दफ्तरों में फिर से भेजा गया है। इसमें आधिकारिक तौर पर उल्लेख किया गया है कि विशुद्ध हिंदी के इस्तेमाल से आम जनता में अरुचि पैदा होती है।
परिपत्र में अनुशंसा की गई है कि आधिकारिक कामों के लिए कठिन हिंदी शब्दों की जगह देवनागरी लिपि में अंग्रेजी के वैकल्पिक शब्दों का इस्तेमाल किया जा सकता है। गृह मंत्रालय में आधिकारिक भाषा विभाग ने उदाहरण देते हुए कहा कि ‘मिसिल’ की जगह फाइल का इस्तेमाल किया जा सकता है। ‘प्रत्याभूति’ की जगह ‘गारंटी’, ‘कुंजीपटल’ की जगह कीबोर्ड और ‘संगणक’ की जगह ‘कंप्यूटर’ का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें लोकप्रिय हिंदी शब्दों और वैकल्पिक अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल करने की भी वकालत की गई है ताकि भाषा को और आकर्षक तथा दफ्तरों और आम जनता के बीच इसे लोकप्रिय बनाया जा सके। परिपत्र में कहा गया है, ‘जब भी आधिकारिक काम के दौरान अनुवाद की भाषा के तौर पर हिंदी का इस्तेमाल किया जाता है तो यह कठिन और जटिल बन जाती है। अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद की प्रक्रिया में बदलाव करने की तत्काल आवश्यकता है। शब्दश: हिंदी करने की बजाय अनुवाद में मूल पाठ का भावानुवाद होना चाहिए।’ आधिकारिक पत्राचार में उर्दू, अंग्रेजी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के लोकप्रिय शब्दों के इस्तेमाल को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। हिंदी के शुद्ध शब्द साहित्यिक उद्देश्यों के लिए होने चाहिएं जबकि काम के लिए व्यावहारिक ‘मिश्रित’ शब्दों का इस्तेमाल होना चाहिए। इसमें कहा गया है कि शुद्ध हिंदी में अनुवाद करने की बजाय देवनागरी लिपि में अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल करना ज्यादा बेहतर है(दैनिक ट्रिब्यून,दिल्ली,6.12.11)।

आगे बढ़ें...

05 दिसंबर 2011

संस्कृत की स्वरलहरियों पर तहजीब की हिलोरें

देश में भाषा के नाम पर घृणा व उन्माद फैलाने वालों को,बिहार के अरवल जिले का श्री राम संस्कृत कालेज सरौती आइना दिखा रहा है। इस संस्था में संस्कृत की स्वलहरियों पर गंगा-जमुनी तहजीब हिलोरें ले रही है। यहां हिन्दू छात्रों के बीच दर्जनों मुस्लिम छात्र भी संस्कृत की संस्कारिता शिक्षा पाकर धन्य हो रहे हैं। यहां जब हिन्दु-मुस्लिम छात्र एक साथ संस्कृत के स्लोकों का पाठ पढ़ते हैं तो लोगों को सुखद अनुभूति होती है। कालेज प्रबंधन भी इन मुस्लिम छात्रों को उनके शिक्षण कार्य में सहयोग करता है। यहां पूर्व में भी दर्जनों मुसलमान छात्र उप शास्त्री व शास्त्री की डिग्री ले चुके हैं। आकिब जावेद, शमीम अख्तर, एनामुल हक व तैयब हुसैन सरीखे छात्र बताते हैं कि कि संस्कृत सीखकर उन्हें काफी संतोष मिल रहा है। अगर संभव हुआ तो वे इसमें अपना कैरियर भी बनाएंगे। छात्रों का कहना है कि किसी भाषा को किसी समुदाय की परिधि तक सीमित नहीं रखा जा सकता। भाषा तो एक सेतु है, जो विभिन्न संप्रदाय से लेकर विश्र्व के विभिन्न स्थलों की दूरी को खत्म कर देता है। यहां परवेज आलम, फरहाना खातून सहित दर्जन भर छात्र-छात्राएं सरौती संस्कृत कालेज में संस्कृत शिक्षा परंपरा के मजबूत संवाहक बने हैं। उल्लेखनीय है कि कालेज में संस्थापक व तत्कालीन महान संत व संस्कृत के महान विद्वान स्वामी परंकुशाचार्य जी महाराज ने संस्था के स्थापना उद्देश्य में ही कालेज को सभी प्रकार की संकुचित बंधनो से परे रखा था। आज संस्था के वर्तमान प्रमुख स्वामी रंगरामानुजाचार्यजी महाराज अपने गुरु द्वारा स्थापित परंपरा को व्यापकता प्रदान करने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। आज हुलासगंज तथा सरौती में ब्रांाणों के साथ दलित वर्ग के विद्यार्थी भी समान गरिमा व सम्मान के साथ संस्कृत की शिक्षा लेकर अपने को धन्य पा रहे हैं। राजनीति तथा सामाजिक क्षेत्रों के स्थापित लोग इसे राष्ट्रीय तथा सामाजिक एकता के लिहाज से बेहतरीन संस्थागत प्रयास मान रहे हैं। कालेज के प्राचार्य डा. सर्वानंद शर्मा भारद्वाज ने बताया कि कामेश्र्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्र्व विद्यालय से संबद्धता प्राप्त उनके कालेज में संस्कृत शिक्षा के लिए प्रतिवर्ष मुसलमान छात्रों का रुझान क्रमश: बढ़ रहा है, यह संस्कृत शिक्षा के हालिया स्थिति के लिहाज से काफी प्रेरक है। फिलहाल कालेज में शास्त्री व उपशास्त्री के लगभग चार सौ छात्र अध्ययनरत हैं(मृत्युंजय/मनिन्द्र,दैनिक जागरण,जहानाबाद,5.12.11)।

आगे बढ़ें...

16 नवंबर 2011

अपनी भाषा में इंटरनेट

भारत के आम लोगों और इंटरनेट के बीच की गहरी खाई अब पट सकती है। छह महीने बाद यानी मई 2012 से वेबसाइट के लिए डोमेन नाम हिंदी में भी लिए जा सकेंगे। कुछ समय बाद अन्य भारतीय भाषाओं में भी यह शुरुआत हो जाएगी। इसके लिए डॉट-भारत और अन्य कई दूसरे डोमेन नाम रजिस्टर करने की अनुमति भारत सरकार संबंधित एजेंसी इंटरनेट कॉपरेरेशन फॉर असाइंड नेम्स एंड नंबर्स से हासिल कर चुकी है।

इंटरनेट जब दुनिया में संवाद एवं संचार का सबसे ताकतवर माध्यम बनता जा रहा है, भारत में भाषा की बाधा सबको इस माध्यम से जोड़ने की राह में एक बड़ी रुकावट बनी हुई है। देश में आज भी अंग्रेजी समझने वाले लोगों की संख्या 11 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है, जबकि बाकी लोग अपना सारा कामकाज देशी भाषाओं में ही करते हैं।

इसलिए इसमें कोई अचरज नहीं कि अभी एक अरब 20 करोड़ आबादी वाले इस देश में इंटरनेट का उपयोग करने वाले लोगों की संख्या दस करोड़ से ज्यादा नहीं है। इसलिए संचार जगत से जुड़े लोगों का यह अनुमान सही है कि भारतीय भाषाओं में डोमेन नाम की शुरुआत होने के साथ इंटरनेट यूजर्स की संख्या तेजी से बढ़ेगी। हालांकि इस रास्ते में कुछ रुकावटें अभी भी बाकी रहेंगी।

जैसाकि कई जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि इंटरनेट सचमुच आमजन का माध्यम बन सके, इसके लिए यह जरूरी होगा कि सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर और कंटेंट को सम्मिलित करते हुए इस तकनीक का पूरा इकोसिस्टम देशी भाषाओं में उपलब्ध कराया जाए।


जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों के अनुभव को देखते हुए यह तो पूरे भरोसे के साथ कहा जा सकता है कि यह काम नामुमकिन नहीं है। हिंदी समेत भारतीय भाषाओं में काम करने वाले जनसमूहों की बढ़ती आर्थिक हैसियत से पैदा हो रही बाजार की नई जरूरतें इंटरनेट के इस विकासक्रम को सशक्त आधार दे रही हैं। संभवत: इसीलिए देश डिजिटल खाई पाटने की दिशा में यह प्रभावी कदम उठा सका है(संपादकीय,दैनिक भास्कर,05.11.11)।

आगे बढ़ें...

भाषा पर मंडरा रहा है खतरा

हमारे भारतीय साहित्य, खासतौर से हिंदी साहित्य पर अस्तित्व का खतरा मंडराना शुरू हो गया है। भाषाओं से ही साहित्य निर्मित होता है और आज हमारी भाषा (हिंदी) ही खतरे में है। अब हिंदी का रचनाकार दूसरी भाषा (इंग्लिश) में जा रहा है। हमारी चीजें हमें स्थानीय भाषा में नहीं मिल रही हैं।

आज हिंदुस्तान में विश्वस्तरीय साहित्य पैदा नहीं हो पा रहा है। ऐसा होने की वजह स्पष्ट है। हमारी बड़ी-बड़ी प्रतिभाएं भारतीय साहित्य में यथेष्ट योगदान नहीं दे रही हैं। हमारी नई पीढ़ी के लोग अगर हिंदी में लिखेंगे ही नहीं, तो आगे चल के वह नष्ट होगी ही। एक समय था जब भाषा का उपयोग करने वाले, भाषा विज्ञानी ही उसका निर्माण करते थे, लेकिन अब बाजार, सरकार निर्णायक बन बैठी है।

जो सत्ता कभी विद्वानों में, जनता में निहित थी, वह अब बाजार में चली गई है। जाहिर है ऐसे में भाषा का स्वरूप बिगड़ेगा, वह नष्ट ही होगा। मैं हिंदी में अन्य भाषाओं के शब्द लेने का भी विरोधी नहीं हूं। यह तो होता ही है।


चिंता इस बात की होनी चाहिए कि भाषा का निर्माण भाषा बनाने वाले करें न कि और दूसरे पूंजीवादी सत्ता केंद्र। वर्तमान में बाजारवाद हर क्षेत्र को प्रभावित कर रहा है, शायद इसीलिए भारतीय साहित्य आज अपने समय की आवाज नहीं बन पा रहा है। आज के साहित्य में मनुष्य की मूलभूत चिंताओं को नजरअंदाज कर वैश्विक चमक-दमक ज्यादा व्यक्त की जा रही है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि आज हमारा देश गरीबी की उस सीमा पर है जिस पर वह कभी भी नहीं रहा। कृषि प्रधान देश में में किसान का आत्महत्या करना इसका ज्वलंत उदाहरण है। बावजूद इसके इस तरह के मसलों पर साहित्य की प्रतिक्रिया बहुत कम है। 

आज के साहित्यकारों की संवेदना कुंठित हो गई है। वह उस परिमाण में व्यक्त नहीं हो रही, जिस परिमाण में मनुष्य पीड़ित है। साहित्य की भूमिका तो शुरू से प्रतिपक्ष की रही है। वह हमेशा से धन, राजनीति या शस्त्र जैसी विभिन्न सत्ताओं के प्रतिपक्ष में खड़ा होता रहा है। 

वह जनता के साथ, उसके प्रश्नों को,उसकी चिंताओं को व्यक्त करता रहा है। वह युग को मोड़ने की कोशिश करता है, समाज को एक दिशा देने का प्रयत्न करता है। लेकिन दुर्भाग्य से आज वह उस ओहदे पर ही नहीं रहा, कि दुनिया को, समाज को प्रभावित कर सके। (प्रभाकर श्रोत्रिय से अमित स्वप्निल से बातचीत पर आधारित यह आलेख दैनिक भास्कर में 13.11.11 को प्रकाशित है)।

आगे बढ़ें...

28 अक्टूबर 2011

खो रहा है भाषा का चरित्र

रूसी न्यूज चैनल के संस्कृति विषयक एक प्रसारण में चीन में यह चिंता व्याप रही है कि वहां के छोटी अवस्था के बच्चे अपनी चीनी लिपि लिखनी सीखने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। उस मुश्किल चित्रलिपि लिखनी सीखने की माथापच्ची कोई क्यों करे, बच्चे कंप्यूटर पर उंगलियां थिरका कर बड़ी तेजी से अपनी लिपि में मनचाहा लिख सकने में समर्थ हैं। एक बहुत ही छोटा बच्चा जो चारेक बरस का होगा, जिस फुर्ती और सहजता से कंप्यूटर पर उंगलियां चला रहा है, मानो बच्चों के किसी खिलौने पियानो पर उंगलियों से तरन्नुम से में गा रहा है। कैमरे के फोकस में इससे कुछ और बड़ी आयु के बच्चे आ रहे हैं, वे भी पूर्ण दत्तचित्त होकर कंप्यूटर पर अपनी भाषा में लिख रहे हैं। फिर उद्घोषक कहता है कि चीन में यह माना जाता है कि जो लोग अपनी मातृभूमि को प्यार करते हैं, उसके लिए चीनी लिपि लिखना जानना बहुत जरूरी है। इसीलिए वहां सुलेख शिक्षा यानी केलीग्राफी के स्कूल और उनमें निष्णात शिक्षक हैं जो बड़े मनोयोग से विभिन्न प्रकार के मोटे-पतले ब्रशों द्वारा इस चित्रात्मक लिपि को लिखने का ज्ञान व अभ्यास बच्चों को देते हैं-उनको भी कैमरा दिखा रहा है। यह एक उदाहरण है कि किस प्रकार भूमंडलीकरण हमारी पुरानी से पुरानी भाषाओं को लील रहा है। विज्ञापन का मायावी संसार अपनी तरह से भाषाओं के चरित्र को फूहड़ बना रहा है, गो एक वर्ग ऐसा भी है जो यह मानता है कि इस सबसे भाषा का बंधा हुआ रूप भाषा को एक नया लचीलापन, एक नई छवि तथा लोच प्रदान कर रहा है, बाजार को भाषा के लिए तैयार होना ही है। यह उसके विकास का स्वाभाविक अगला चरण है।


इसका दूसरा पक्ष यह है कि हमारी भाषाओं का चरित्र पूरी तरह विरूपित हो रहा है, वे एक नए प्रकार की विपन्नता प्राप्त कर रही हैं-उनके चारित्रिक विकास में आए कितने ही शब्द विलुप्त हुए जा रहे हैं और हम जबरन उन्हें अपनी स्मृति से इस प्रकार गायब कर रहे हैं कि दस-पांच वर्षों में रोजमर्रा के अनेक हिंदी शब्द केवल कोश की ही शोभा बढ़ा रहे होंगे, प्रयोग उनका बिलकुल नहीं रह जाएगा। होटलों में जाती नई पीढ़ी उड़द की दाल और अरहर की दाल भूलती जा रही है - होटल में बैठकर काली दाल, मक्खनी दाल या पीली दाल का आदेश देती है। ऑर्डर नोट करने वाले बैरे की शब्दावली भी काली दाल या पीली दाल की ही रह गई है, दो-चार साल पहले सुना जाता रहा शब्द मांह की दाल अब सुनने में नहीं आता। नाश्ता सुबह का या कलेवा शब्द धीरे-धीरे गुमनामी में जा रहा है, ब्रेकफास्ट ने उसे धक्का देकर अपनी जगह बना ली है। हमारे कुत्तों तक के पारंपरिक नाम मोटी, झबरा, डब्लू, कालू आदि बिला गए हैं, सिर्फ अंग्रेजी नाम ही रह गए हैं। हमारे अपने बच्चे प्यारे-प्यारे नहीं रहे क्यूट बन गए हैं। 

अपनी जड़ों से काट कर वैश्विक नागरिक बनाना वैश्वीकरण की प्रक्रिया का स्वाभाविक अंग है। क्या इस आंधी को रोकने का कुछ प्रयत्न अब भी किया जा सकता है? वैसे लगता तो नहीं कि यह संभव होगा(पुष्पपाल सिंह,नई दुनिया,दिल्ली,25.10.11)।

आगे बढ़ें...

03 अक्टूबर 2011

राजस्थानी भाषा को मान्यता के लिए पीएम से गुहार

अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति के अंतरराष्ट्रीय संयोजक तथा राजस्थान एसोसिएशन ऑफ नॉर्थ अमेरिका कनाडा व कैलिफोर्निया के मीडिया चेयरमैन प्रेम भंडारी ने गांधी जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को पत्र लिख कर राजस्थानी भाषा को शीतकालीन सत्र में ही संवैधानिक मान्यता दिए जाने की मांग की है।
भंडारी ने गांधीजी का वक्तव्य याद दिलाते हुए लिखा है कि केंद्र और राजस्थान में गांधीवादी सरकार है और उनको गांधीजी के उन विचारों का सम्मान करना चाहिए जिसमें उन्होंने बच्चों को शिक्षा मातृभाषा के माध्यम से ही दिए जाने पर जोर दिया था।
उन्होंने लिखा है कि अनिवार्य शिक्षा कानून में भी शिक्षा का माध्यम मातृभाषा ही रखने का प्रावधान है, मगर राजस्थान के लोगों की मातृभाषा राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता नहीं मिलने से प्रदेश में यह शिक्षा कानून पूर्णतया लागू नहीं हो पाया है।

क्या है गांधी का वक्तव्य :
शिक्षा के भाषायी माध्यम संबंधी कई लेख गांधीजी ने लिखे थे, जिन्हें भारतन् कुमारप्पा ने संकलित तथा गुजराती से अनुवादित कर हिंदी में ‘शिक्षा का माध्यम’ शीर्षक से पुस्तिका के रूप में प्रकाशित करवाया था।

गांधीजी ने स्पष्ट लिखा है- ‘मैं बच्चों के मानसिक विकास के लिए उन पर मां की भाषा को छोड़कर दूसरी भाषा लादना मातृभूमि के प्रति पाप समझता हूं। मेरा विश्वास है कि राष्ट्र के जो बालक अपनी मातृभाषा के बजाय दूसरी भाषा में शिक्षा प्राप्त करते हैं, वे आत्महत्या ही करते हैं। इसलिए मैं इस चीज को पहले दर्जे का राष्ट्रीय संकट मानता हूं।’

प्रधानमंत्री से मांगा मुलाकात के लिए समय :
पत्र में राजस्थानी को मान्यता के सिलसिले में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से मुलाकात के लिए समय भी मांगा गया है। उल्लेखनीय है कि संघर्ष समिति का प्रतिनिधिमंडल गत 23 अगस्त को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री भंवर जितेन्द्र सिंह से मुलाकात कर चुका है। भंडारी के अनुसार राजस्थानी के प्रति इन नेताओं के सकारात्मक रवैये से वे अभिभूत हैं।

भंडारी से भारत लौटने का आग्रह :
संघर्ष समिति के प्रदेश महामंत्री डॉ. राजेन्द्र बारहठ ने प्रेम भंडारी से संसद के शीतकालीन सत्र से पहले भारत लौटने का आग्रह किया है। बारहठ ने बताया कि गत अगस्त माह में राजस्थानी मान्यता के लिए भंडारी के भारत दौरे से अच्छा वातावरण निर्माण हुआ तथा उससे आंदोलन को गति मिली।

नवंबर में भारत आएंगे भंडारी :
उधर न्यूयॉर्क से प्रेम भंडारी ने दूरभाष पर जानकारी दी कि वे राजस्थानी की मान्यता के लिए नेताओं से मुलाकात करने तथा राजस्थान भर में जनजागरण के लिए नवंबर के दूसरे सप्ताह में भारत लौट रहे हैं। इस दौरान वे केंद्रीय नेताओं से मिलकर संसद के शीतकालीन सत्र में राजस्थानी की मान्यता संबंधी विधेयक लाने का आग्रह करेंगे(दैनिक भास्कर,जोधपुर,3.10.11)।

आगे बढ़ें...

22 सितंबर 2011

गुजरात हाईकोर्ट ने सभी भाषाओं में प्रवेश परीक्षा न लिए जाने पर केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा

गुजरात हाईकोर्ट ने केंद्र व राज्य सरकारों से क्षेत्रीय भाषाओं में प्रवेश परीक्षाएं लिए जाने के संबंध में जवाब मांगा है। एक जनहित याचिका में संविधान द्वारा मान्य सभी भाषाओं में प्रवेश परीक्षाएं कराने की मांग की गई है।

कार्यवाहक चीफ जस्टिस एएल दवे की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने इस मामले में सभी पक्षों से 20 अक्टूबर तक अपना जवाब दाखिल करने को कहा है। जनहित याचिका में गुजराती साहित्य परिषद के कस्तूरभाई, रघुवीर चौधरी ने कहा है कि कई व्यावसायिक परीक्षाएं केवल अंग्रेजी और हिंदी में ली जातीं हैं, ऐसे में गुजराती भाषा में पढ़ाई करने वाले छात्र अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते। अत: यह व्यवस्था समानता के अधिकार पर कुठाराघात है, जबकि संघ लोक सेवा आयोग पहले से ही परीक्षार्थियों को क्षेत्रीय भाषाओं में परीक्षा देने का विकल्प देता है। अदालत ने इस मामले में आईआईटी जेईई, अखिल भारतीय इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा (एआईईईई), ऑल इंडिया प्री मेडिकल टेस्ट (एआईपीएमटी), कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट (सीएलटी), नेशनल एघ्टीट्यूट टेस्ट इन आर्किटेक्ट (एनएटीए) एवं चार्टर्ड एकाउटेंट कॉमन प्रोफिशिएंसी टेस्ट (सीएसीपीटी) को भी नोटिस जारी किया है(दैनिक भास्कर,अहमदाबाद,22.9.11)।

आगे बढ़ें...

14 सितंबर 2011

बिहारःखस्ताहाल हैं हिंदी संस्थान

राष्ट्रभाषा हिंदी से जुड़े संस्थान खस्ताहाल हैं। समारोही मौकों पर हिंदी की दुहाई दी जाती रही है और इससे जुड़े संस्थानों के कायाकल्प की घोषणाएं भी होती रही हैं लेकिन हकीकत के ठोस धरातल पर हिंदी उपेक्षित ही रही है। सिर्फ हिंदी ही नहीं, अन्य क्षेत्रीय भाषाई संस्थान भी ऐसी ही पीड़ा झेल रहे हैं। बिहार सरकार ने इस साल हिंदी ग्रंथ अकादमी के लिए ८० लाख रुपए का आवंटन किया है जो कर्मचारियों के बकाए वेतन-भत्ते पर ही खर्च होना है। हिंदी से जुड़े शोध और विकास कार्यों के लिए धनराशि का टोटा है।

क्षेत्रीय भाषाओं में भोजपुरी अकादमी के लिए ३३ लाख, मैथिली के लिए २५ लाख, मगही के लिए २२ लाख, बांग्ला के लिए ७ लाख और संस्कृत अकादमी के लिए १८ लाख रुपए जारी हुए हैं। हिंदी समेत सभी क्षेत्रीय भाषाओं की अकादमियां पहले किराए के भवन में ही चल रही थीं लेकिन अब शास्त्री नगर के कर्मचारी फ्लैट में इनका स्थानांतरण हो गया है। सभी भाषा अकादमियों में पूर्णकालिक निदेशक तक नहीं हैं। सामान्य परिषद् और शासी निकाय नहीं हैं। कर्मचारियों को छठे वेतन आयोग का भी लाभ नहीं मिल पाया है। अकादमियों को अध्यक्ष मिल गए हैं और काम जैसे-तैसे चल रहा है।


हिंदी को लेकर उपजे राष्ट्रीय स्वाभिमान की गरमी धीरे-धीरे ठंडी होती चली गई और हिंदी की याद समारोहों तक सिमट कर रह गई। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी और हिंदी साहित्य सम्मेलन भवन उपेक्षा के दंश झेलते रहे हैं। राजद के शासनकाल में छज्जूबाग में फणीश्वरनाथ रेणु हिंदी भवन बनवाया गया था। इसे भोपाल के भारत भवन की तर्ज पर विकसित किए जाने की घोषणाएं हुईं। ७५ कमरों में लेखक गृह, ऑडिटोरियम और आर्ट गैलरी को सजाया जाना था लेकिन अब यह भवन चंद्रगुप्त प्रबंधन संस्थान को सौंप दिया गया है। अब वहां मैनेजमेंट गुरुओं की फसल तैयार हो रही है। 

वैसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हिंदी संस्थानों को सलाना बजट देना शुरू कर दिया है। राजद काल में इन संस्थानों के कर्मचारियों को वेतन के लाले पड़ गए थे। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के कर्मचारियों को अब समय पर वेतन मिलता है। परिषद के परिसर में बाल भवन बना है जहां किलकारी नामक संस्था चलती है लेकिन प्रकाशनों की हालत दयनीय है। परिषद् के पुराने प्रकाशनों को निजी प्रकाशक थोड़ा-बहुत परिवर्तनों के साथ छाप रहे हैं और परिषद् पंगु ही बना रहा है। भाषाई अकादमियों का कामकाज पहले सरकारी अफसर ही देखते थे जो साल में एक बार भी अकादमी के दफ्तर जाना जरूरी नहीं समझते थे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अब भाषाई विद्वानों की बतौर अध्यक्ष नियुक्ति की है। अकादमियों ने पहले निजी भवनों में अनाप-शनाप किराया देकर भवन ले लिया था अब इन्हें एक भवन में लाया गया है लेकिन न तो पर्याप्त कुर्सियां हैं और न ही पांडुलिपियों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था।

बिहार ग्रंथ अकादमी को केंद्र सरकार से अनुदान मिलता है लेकिन कर्मचारियों को वेतन राज्य सरकार देती है। शोध पुस्तकों के प्रकाशन में यह संस्थान अपनी ढेर सारी उपलब्धियां गिनाता है लेकिन हकीकत में हिंदी का विकास नहीं दिखता। ग्रंथ अकादमी का जिम्मा उच्च शिक्षा निदेशक को सौंप दिया गया है। हिंदी साहित्य सम्मेलन भवन का आजादी आंदोलन में भी योगदान रहा। तब यहां हिंदी के दीवाने जुटते थे। हिंदी प्रेमियों का मेला लगता था लेकिन अब यह बदहाली का शिकार है। हिंदी साहित्य सम्मेलन का भवन परिसर अब प्रदर्शनियों के आयोजन के लिए किराए पर दिया जाता है(राघवेन्द्र नारायण मिश्र,नई दुनिया,दिल्ली,हिंदी दिवस,2011)।

आगे बढ़ें...

राजस्थानःबाबुओं के भरोसे साहित्यिक पुरस्कार

राजस्थान में हिंदी के प्रचार-प्रसार की न तो सरकारों को चिंता रही है ओर न ही लेखकों को। आमजन में गहरी पक़ड़ रखने वाले जनप्रतिनिधियों का भी हिंदी भाषा के प्रति अधिक लगाव नहीं है। राजस्थान विधानसभा में एक भी ऐसा जन प्रतिनिधि नहीं है जिसका साहित्यक रुझान हो।

राजस्थान में पिछले तीन साल से राजस्थान साहित्य अकादमी सहित प्रमुख अकादमियों के प्रमुखों के पद खाली प़ड़े हैं। अध्यक्ष नहीं होने के कारण इन अकादमियों में पुस्तकों का प्रकाशन और पुरस्कारों की घोषणा भी बाबुओं के भरोसे है। इसी का नतीजा है कि राजस्थान साहित्य अकादमी की ओर से पिछले दिनों एक नए लेखक को अकादमी का सर्वोच्च मीरा पुरस्कार दिए जाने के कारण साहित्यिक जगत में हंगामा मच गया था। साहित्यकारों ने लेखक को पुरस्कार के लिए अयोग्य माना था।

राजस्थान में हिंदी के प्रचार-प्रसार और प्रोत्साहन की जिम्मेदारी हिंदी ग्रंथ अकादमी, राजस्थान साहित्य अकादमी और राजभाषा विभाग के जिम्मे है लेकिन विडंबना यह है कि इन संस्थाओं में साहित्यिक गतिविधियों का आयोजन और राजभाषा प्रचार-प्रसार संबंधी गतिविधियां ठप प़ड़ी हैं। हिंदी ग्रंथ अकादमी की ओर से उच्च शिक्षा से जु़ड़े विभिन्न विषयों पर पुस्तकों का प्रकाशन किया जा रहा है लेकिन इनमें से ज्यादातर पुस्तकें निम्न स्तर की हैं। हिंदी ग्रंथ अकादमी की ओर से ज्यादातर किताबें ऐसे लेखकों की प्रकाशित हो रही हैं जो या तो कॉलेज अथवा विश्वविद्यालयों में प़ढ़ाते हैं अथवा राजकीय सेवा से सेवानिवृत्त हैं। पिछले कुछ वर्षों से हिंदी ग्रंथ अकादमी की ओर से पुस्तक पर्व जैसे आयोजन कर साहित्यिक गतिविधियों को ब़ढ़ावा दिया जा रहा है लेकिन इनका आयोजन सिर्फ संभाग मुख्यालयों तक ही सीमित है और जिले इससे अछूते हैं।


हिंदी ग्रंथ अकादमी की ओर से मार्च २०११ तक विभिन्न विषयों पर ५४७ मौलिक और ८८ अनुदित पुस्तकों का प्रकाशन किया जा चुका है। इस साल अब तक अकादमी की ओर से २० मौलिक पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है। पिछले दस साल में राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी की ओर से लेखकों को उनकी किताबों की रॉयल्टी के रूप में करीब ७० लाख रुपए दिए गए हैं। इस समयावधि में हिंदी ग्रंथ अकादमी ने अपनी पुस्तकें बेचकर छह करो़ड़ २१ लाख रुपए की कमाई की है। वर्ष २०००-०१ में हिंदी ग्रंथ अकादमी को पुस्तकों की बिक्री से ४४ लाख रुपए की आमदनी थी जो अब ब़ढ़कर एक करो़ड़ रुपए के करीब पहुंच गई है। वर्ष २०१०-११ में अकादमी को पुस्तकों की बिक्री से ७३.४४ लाख रुपए की आमदनी हुई है। राज्य सरकार की ओर से अकादमी को हर साल एक करो़ड़ रुपए से अधिक अनुदान दिया जाता है। 

साहित्यकार राजाराम भादू का कहना है कि राजस्थान में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए कार्यरत संस्थाओं के पास बजट की कोई कमी नहीं है लेकिन इन संस्थाओं के मुखिया राजभाषा के प्रति समर्पित नहीं हैं। राज्य के राजभाषा विभाग के पास इस समय सबसे ज्यादा बजट है लेकिन हिंदी दिवस के अलावा यह विभाग और कोई गतिविधि नहीं चला रहा है। अंग्रेजी मानसिकता के कारण सरकारी विभागों में हिंदी में लिखने वाले कर्मचारियों को उपेक्षा का शिकार होना प़ड़ता है। राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी के निदेशक आर.डी. सैनी का मानना है कि अकादमियों में अध्यक्षों की नियुक्ति के लिए लेखक समुदाय को लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाकर सरकार पर अपना दबाव बनाना चाहिए(आनंद चौधरी,नई दुनिया,दिल्ली,हिंदी दिवस,2011)।

आगे बढ़ें...

छत्तीसगढ़ःबदहाल है हिंदी अकादमी

हिंदी के विकास और प्रचार-प्रसार के लिए गठित छत्तीसगढ़ राज्य हिंदी ग्रंथ अकादमी सुविधाओं के लिए तरस रही है। गठन के लगभग पांच साल बाद भी किराए के भवन में संचालित अकादमी का स्थापना व्यय भी इस साल २५ लाख से घटाकर ५ लाख कर दिया गया है। केंद्र सरकार द्वारा एक बार ५० लाख रुपए अनुदान देने के बाद इसे दोबारा कोई सहायता नहीं दी गई। इसकी स्थिति भी देश में हिंदी की स्थिति की तरह ही है।


जानकारी के मुताबिक प्रदेश में जून २००६ में इसका गठन किया गया था। अकादमी में संचालक के साथ चार पदों की स्वीकृति दी गई है। राज्य सरकार के उच्च शिक्षा विभाग के अधीनस्थ संचालित अकादमी को प्रतिवर्ष लगभग २५ लाख रुपए स्थापना व्यय के रूप में दिया जाता था। पिछले वर्ष राज्य शासन द्वारा अकादमी को कोई राशि नहीं दी गई। छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी के संचालक रमेश नैयर के अनुसार इस वर्ष के लिए स्थापना व्यय की राशि मात्र पांच लाख रुपए देने संबंधी पत्र अकादमी को मिला है। हिंदी के कर्ताधर्ताओं के लिए यह हतोत्साहित करने वाली खबर है। अकादमी का स्थापना व्यय प्रतिवर्ष करीब १४ लाख रुपए है। शासन द्वारा इसमें की गई कटौती से अकादमी के कर्मचारियों को वेतन-भत्ते के लाले पड़ जाएंगे। 

शासन की मानें तो अकादमी के पास कार्य संचालन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण ऐसा किया गया है। हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा महाविद्यालय से संबंधित पाठ्य एवं पाठ्यक्रम आधारित संदर्भ किताबें हिंदी में प्रकाशित करने का कार्य किया जाता है। इसके अलावा देशभर की सभी हिंदी अकादमी द्वारा प्रकाशित की जाने वाली किताबों की बिक्री भी की जाती है। इसके तहत आधार पाठ्यक्रम की किताबों पर १० प्रतिशत और अन्य विषयों की किताबों पर २५ प्रतिशत छूट दी जाती है। अकादमी के कार्य जैसे पुस्तक प्रकाशन जिसके अंतर्गत पांडुलिपी कंपोजिंग, छपाई, लेखकों की रॉयल्टी आदि का खर्च केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय वहन करता है। 

छत्तीसगढ़ हिंदी अकादमी चार सदस्यीय है। इनमें संचालक के अलावा एक सहायक संचालक, एक विक्रय सहायक और एक वाहन चालक है। बताते हैं कि चारों सदस्य अस्थायी हैं। स्थायी नौकरी नहीं होने के कारण गठन के बाद से लगभग आठ लोगों ने अकादमी की नौकरी छोड़ी है। जानकारी के मुताबिक अकादमी के नए भवन के लिए राजधानी रायपुर के पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय परिसर में करीब ६१ हजार वर्गफुट जमीन आवंटित की गई है। अकादमी द्वारा इसके लिए पहल की गई थी। अभी जिस भवन में अकादमी संचालित है, वह काफी जर्जर हो चुका है(कौशल स्वर्णबेर,नई दुनिया,दिल्ली,हिंदी दिवस,2011)

आगे बढ़ें...

पश्चिम बंगालःघोटालों और राजनीति में खंडहर बनी हिंदी अकादमी

जहां से हिंदी का पहला अखबार निकला और जहां निराला जैसे साहित्य मनीषियों ने अपनी रचना को धार दी, वहां हिंदी के नाम पर राजनीतिक हितसाधन और घपलों-घोटालों का खेल अबाध चलता रहा है। दो दशक पहले हिंदी अकादमी का गठन जरूर किया गया लेकिन आम हिंदीभाषी और हिंदी के बुद्धिजीवियों की अकादमी तक कभी पहुंच नहीं बनी। वाममोर्चा के राज में माकपा के सदस्य हिंदी अकादमी में मनमानी करते रहे। अब बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार बनी है तो अकादमी के पुनर्गठन की पूरी कवायद पर ही सवाल उठ रहे हैं। वजह, मुख्यमंत्री द्वारा गठित १२ सदस्यों की कमेटी में अध्यक्ष हिंदी के एक स्थानीय अखबार के मालिक हैं और सात सदस्य कारोबारी। महज तीन नाम, प्रो.रूपा गुप्ता, प्रो. मंजुरानी सिंह और कुसुम खेमानी हिंदी शिक्षा और साहित्य से जु़ड़े हैं।


कमेटी की अब तक हुई दो बैठकों में हिंदी अकादमी में कुछ कमेटियों के गठन के प्रस्ताव आए हैं। प्रो. रूपा गुप्ता के अनुसार, "हिंदी अकादमी को रोजगार मूलक कार्यक्रमों से जो़ड़ने की कोशिश की जा रही है।" हालांकि सरकार की उपेक्षा का आलम यह है कि राज्य सरकार ने अभी तक हिंदी अकादमी के लिए बजट जारी नहीं किया है, जबकि बांग्ला-उर्दू और अन्य अकादमियों के लिए बजट जारी किया जा चुका है। बंगाल में हिंदी अकादमी का गठन १९९० में किया गया। अकादमी का अतीत खंगालने से साफ हो जाता है कि यहां हिंदी को मजदूरों की भाषा समझने की मानसिकता हावी रही। हिंदी अकादमी के लिए कोलकाता के संस्कृत कॉलेज के एक कमरे में जगह दी गई। बंगाल की हिंदी अकादमी का औसत बजट साल में चार से १० लाख रुपए के बीच का रहा, जबकि बांग्ला, उर्दू से लेकर अन्य भाषाई और सांस्कृतिक अकादमियों का बजट एक से २० करो़ड़ रुपए के बीच है। शुरुआती दौर में यहां की हिंदी अकादमी ने दो पुरस्कार- राहुल पुरस्कार और प्रेमचंद पुरस्कार शुरू किए लेकिन कमेटी के सदस्यों के बीच ही पुरस्कारों के बंटवारे और पुस्तकों के प्रकाशन को लेकर हुए विवाद से अकादमी की विश्वसनीयता खत्म हो गई। ९० से ९७ के बीच यहां के दो प्रकाशनों का लोकार्पण सिर्फ पुस्तकों के जिल्द दिखाकर किया गया। यहां के दो मासिक प्रकाशन थे जिनके दो-तीन अंक छपे। वे पत्रिकाएं अकादमी के कमरे से बाहर नहीं आईं। 
सरकारी स्तर पर सिर्फ एक दफा हिंदी के बुद्धिजीवियों की बैठक बुलाई गई है। १९९७ की उस बैठक में बुद्धदेव भट्टाचार्य (तब सूचना और संस्कृति मंत्री) ने यह टिप्पणी की कि हिंदी वालों को भाषा और साहित्य से कोई मतलब नहीं। तब से कमेटी का पुनर्गठन हुआ ही नहीं। अकादमी के लिए रखे गए छह अस्थाई कर्मचारी अपने हिसाब से अकादमी चलाते रहे हैं। अब ममता बनर्जी ने जो कमेटी बनाई है, उसके स्वरूप पर सवाल उठ रहे हैं। पश्चिमबंग हिंदीभाषी समाज के सचिव अशोक सिंह के अनुसार, "माकपा ने हिंदी अकादमी की बेहद क्षति की। हमेशा पार्टी का नियंत्रण बनाए रखा लेकिन ममता बनर्जी ने तो किसी साहित्यकार या बुद्धिजीवी को इसका अध्यक्ष न बनाकर हिंदीभाषियों का अपमान किया है। ऐसा भी नहीं है कि काबिल लोगों की कमी है। हिंदी की साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता अलका सरावगी कोलकाता की साहित्यकार हैं। ऊषा गांगुली हिंदी और बांग्ला नाटकों के मंचन के लिए चर्चित हैं। कोलकाता के कई हिंदी साहित्यकार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हैं।"

साहित्यकार गीतेश शर्मा के अनुसार, "उपेक्षा का आलम यह है कि उर्दू अकादमी तक का अपना भवन है लेकिन हिंदी के लिए सोचा ही नहीं गया।"शर्मा कहते हैं कि ६७ में बंगाल में १७ विधायक हिंदीभाषी थे। आज दो भी नहीं। साफ है कि राजनीतिक स्तर पर ब़ड़े सधे रूप में हिंदी-विरोधी काम हो रहा है(दीपक रस्तोगी,नई दुनिया,दिल्ली,हिंदी दिवस,2011)।

आगे बढ़ें...

उत्तरप्रदेशःसियासत दां के एजेंडे का हिस्सा नहीं है हिंदी

हिंदी के प्रचार और प्रसार के लिए गठित संस्थाएं न केवल अपने उद्देश्य से भटक गई हैं बल्कि सरकार ने कुछ इस कदर उनकी उपेक्षा की है कि हिंदी सेवी ही नहीं हिंदी के साहित्यकारों को भी इन संस्थाओं के होने का इलहाम खत्म हो गया है। उत्तर प्रदेश में हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए हिंदी संस्थान का गठन किया गया था लेकिन इस संस्थान की दुर्गति इसी से समझी जा सकती है कि दो वर्षों से रिक्त चल रहे कार्यकारी अध्यक्ष के पद पर साहित्यकार डॉ. प्रेमशंकर की नियुक्ति उच्च न्यायालय के आदेश के बाद ही हो पाई। यही नहीं, अदालती चाबुक के बाद ही एक साल से खाली प़ड़ा निदेशक का पद डॉ. एस.एस. सिंह की तैनाती से भरा गया। हिंदी संस्थान के रिक्त पदों और दुर्गति के बाबत आरटीआई कार्यकर्ता नूतन ठाकुर ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की थी। हैरतअंगेज यह है कि अभी तक कार्यकारिणी समिति के गठन और सामान्य सभा में गैर सरकारी सदस्यों के मनोनयन का प्रकरण जस का तस लटका हुआ है।

बजट के लिहाज से देखा जाए तो योजना मद यानी प्लान हेड में मुलायम सिंह यादव सरकार के दौरान मिलने वाली धनराशि को १५ लाख कर दिया गया था लेकिन मायावती सरकार में यह घटकर ६ लाख रुपए रह गई। इसी धनराशि से चार योजनाएं-नाट्य लेखन कार्यशाला, साहित्य संवाद, पुस्तकालय सुदृ़ढ़ीकरण और कंप्यूटरों के संरक्षण का काम भी करना होता है। शासन ने नॉन प्लान हेड में ९० लाख रुपए की धनराशि आंवटित की थी जिसमें ५६ लाख पुरस्कार योजना के लिए थी लेकिन मायावती राज में १११ पुरस्कारों में से सिर्फ तीन पुरस्कार ही देने के ऐलान के चलते यह धनराशि घटाकर छह लाख रुपए कर दी गई है। अब हिंदी संस्थान- भारत भारती, हिंदी गौरव और महात्मा गांधी पुरस्कार ही प्रदान करेगा। बाकी के पुरस्कार बंद कर दिए गए हैं। कमाल यह है कि इन पुरस्कारों के बंद करने के बाबत अभी तक कोई शासनादेश या कार्यालय ज्ञापन तक जारी नहीं किया गया है। इनमें कई पुरस्कार गैर हिंदी भाषी लोगों को हिंदी सेवा के लिए दिए जाते थे। प्रवासी भारतीयों के लिए भी पुरस्कारों की व्यवस्था थी।


हैरत की बात यह है कि संस्थान ने राज्य सरकार की कटौती की ओट में उन पुरस्कारों तक को बंद कर दिया जिनके लिए धनराशि पहले से जमा है। मसलन, अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने पिता कृष्ण बिहारी के नाम हाईस्कूल और इंटर की परीक्षाओं में हिंदी भाषा में सर्वाधिक अंक पाने वाले छात्रों के लिए जो पुरस्कार शुरू किया था वह बंद हो गया। अभिषेक बच्चन ने अपने दादा हरिवंश राय बच्चन के नाम युवा गीतकारों को दिया जाने वाला ३५ हजार रुपए की धनराशि का जो सम्मान शुुरू किया था, वह भी बंद हो गया। कांग्रेस नेत्री और उत्तर प्रदेश में मंत्री रही स्वरूप कुमारी बख्शी ने अपने पिता शिंगलू के नाम महिला कथाकारों की कृति पर पुरस्कार की योजना चलाई थी, वह भी बंद हो गई है। यह तब हुआ है जब इन तीनों पुरस्कारों के लिए दी जाने वाली धनराशि के लिए इन लोगों द्वारा इतनी अधिक धनराशि बैंक में डिपाजिट की जा चुकी है कि उसके ब्याज से ही ये तीनों पुरस्कार चलते हैं।

वित्तीय वर्ष २००९-१० में तो पुरस्कारों के लिए ४८ लाख रुपए शासन ने हिंदी संस्थान को उपलब्ध भी करा दिए थे। २०१०-११ में ५६ लाख रुपए भी संस्थान को मिल गए थे पर सरकार ने तीन पुरस्कारों को छो़ड़ बाकी की धनराशि वापस करा ली। वर्ष २०१०-११ में नॉन प्लान हेड में महज आठ लाख रुपए दिए गए हैं। आश्चर्य यह है कि पुरस्कार काट तो दिए गए पर संशोधित पुरस्कार नियमावली लंबे समय से भाषा विभाग के प्रमुख सचिव अशोक घोष के पास प़ड़ी है। यही वजह है कि वर्ष २००९-१० और २०१०-११ के तीन विशिष्ट पुरस्कारों की प्रक्रिया लटकी हुई है।

पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने गैर हिंदी भाषी साहित्य के संवर्धन और प्रचार-प्रसार के लिए भाषा संस्थान का गठन किया था ताकि हिंदी, गैर हिंदी भाषाओं के लिए सेतु के रूप में काम कर सके। इस संस्थान के संचालन के लिए आज भी मात्र २३ लाख रुपए का बजट है जबकि इसी धनराशि में से लखनऊ, इलाहाबाद, बरेली और आगरा समेत पांच जगहों पर प्रशिक्षण केंद्र भी चलाए जाते हैं। महज एक-एक लाख रुपए से संचालित इन केंद्रों का इस राशि से कोई भला नहीं हो पाता। भाषा संस्थान को मिलने वाली धनराशि इन केंद्रों के चलते महज १८-१९ लाख रुपए बैठती है और इसका बहुत ब़ड़ा हिस्सा वेतन में खर्च हो जाता है(योगेश मिश्र,नई दुनिया,दिल्ली,हिंदी दिवस,2011)।

आगे बढ़ें...

07 सितंबर 2011

छत्तीसगढ़ में खुलेंगे 100 संस्कृत विद्यालय

छत्तीसगढ़ संस्कृत विद्यामंडलम के अध्यक्ष डॉ. गणेश कौशिक ने कहा है कि राज्य में संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन को बेहतर बनाने के साथ ही इसे रोजगारपरक बनाने की पहल शुरू कर दी गई है।
विभिन्न जिलों में नए संस्कृत विद्यालय शुरू किए जाने की संभावना का अध्ययन बोर्ड कर रही है। आगामी शिक्षा सत्र से राज्य में कम से कम 100 नए संस्कृत विद्यालय प्रारंभ करने की योजना पर बोर्ड काम कर रहा है।

डॉ. कौशिक यहां सर्किट हाउस में शिक्षा विभाग के अधिकारियों एवं नागरिकों से चर्चा कर रहे थे। उन्होंने जिले में संस्कृत को बढ़ावा देने के संबंध में विस्तार से चर्चा की और उनसे सुझाव भी लिए। संस्कृत मूल भाषा है। उन्होंने कहा कक्षा 6वीं से लेकर 8वीं तक प्रथमा, नवमीं एवं दसवीं में पूर्व मध्यमा तथा ग्यारहवीं एवं बारहवीं में उत्तर मध्यमा की पढ़ाई होगी।

इन विद्यालयों में व्यवसायिक पाठ्यक्रमों की भी शिक्षा दी जाएगी। संस्कृत विद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थी पीईटी, पीएमटी, बीसीए, बीबीए जैसे पाठ्यक्रमों में भी प्रवेश ले सकेंगे। संस्कृत के अलावा अन्य विषयों का अध्ययन-अध्यापन हिन्दी में होगा(दैनिक भास्कर,राजनंदगांव-रायपुर,7.9.11)।

आगे बढ़ें...

31 अगस्त 2011

झारखंडः9 जनजातीय भाषाओं को राजभाषा का दर्जा़

राज्य मंत्रिपरिषद ने मंगलवार को झारखंड की सभी नौ जनजातीय भाषाओं को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिए जाने के प्रस्ताव पर मंजूरी दे दी। सबसे पहले राज्य सरकार ने उर्दू को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया था।

बाद में कैबिनेट ने संताली और बांग्ला को द्वितीय राजभाषा का दर्जा देने पर सहमति जताई थी। मंगलवार को कैबिनेट ने उर्दू को छोड़ अन्य सभी 11 भाषाओं को विधेयक के रूप में विधानसभा में दो अगस्त को पेश करने संबंधी प्रारूप पर भी मंजूरी दे दी।

जिन भाषाओं को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिए जाने का प्रस्ताव कैबिनेट ने मंजूर किया है, उनमें संताली, मुंडारी, हो, खरिया, कुड़ुख (उरांव), नागपुरी, कुरमाली, खोरठा, पंचपरगनिया, उड़िया और बांग्ला शामिल हैं। कैबिनेट ने विधानसभा के इसी मानसून सत्र में इस विधेयक को पेश करने का भी फैसला किया है(दैनिक भास्कर,रांची,31.8.11)।

आगे बढ़ें...

30 अगस्त 2011

यूपीःअब परिषदीय स्कूलों के गुरुजी बोलेंगे अंग्रेजी !

कान्वेंट स्कूलों की तरह अब परिषदीय विद्यालयों के गुरुजी भी फर्राटेदार अंग्रेजी में बोलकर बच्चों को शिक्षा देंगे। इसके लिए जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) में अंग्रेजी भाषा लैब (इंग्लिश लैंग्वेज लैब) की स्थापना की गयी है। सोमवार को इसका उद्घाटन बेसिक शिक्षा निदेशक दिनेश चन्द्र कनौजिया ने किया। इस दौरान र्वड्स बर्थ इंग्लिश लैंग्वेज लैब के सीईओ जसविन्दर सिंह ने बताया कि कुछ समय पहले भारत में एक रिसर्च कराया गया था, जिसके माध्यम से यह जानकारी कि भारतीयों को अंग्रेजी सीखने में कहां दिक्कतें आती हैं। उन्होंने बताया कि उन्हीं दिक्कतों को दूर करने के लिए एक साफ्टवेयर तैयार किया गया है। इसका प्रयोग गुजरात, राजस्थान और कर्नाटक में किया जा चुका है। न्होंने बताया कि अभी तक 1500 से अधिक स्कूल-कालेजों को इसका फायदा मिल चुका है। अब लखनऊ में इसकी शुरुआत की गयी है। इसमें शिक्षकों को तीन माह का प्रशिक्षण दिया जाएगा, जिसमें अंग्रेजी का भाषाई ज्ञान, शब्दकोष के अलावा उसे समझना और बोलना आदि सिखाया जाएगा। उपहले चरण में मास्टर ट्रेनरों को प्रशिक्षित किया जाएगा जो बाद में शिक्षकों को इसकी ट्रेनिंग देंगे(राष्ट्रीय सहारा,लखनऊ,30.8.11)।

आगे बढ़ें...