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25 जुलाई 2011

हिन्दी सप्ताह की मोहताज हमारी हिन्दी

कल सुबह चाय की चुस्कियों के साथ अख़बार पढ़ रही थी कि अचानक बड़ी मधुर सी गाने की आवाज़ सुनाई दी- 'चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना' खिड़की से नीचे देखा तो चेहरा जाना पहचाना सा लगा और फिर याद आया कि ये तो हमारी हिन्दी भाषा है जो अपनी ही धुन मे गुनगुनाए जा रही है, मैने आवाज़ देकर उसे ऊपर बुलाया और पूछा कि क्या बात है बड़ी बेजार सी नज़र आ रही हो और ऊपर से ये गाना तो वो एक गहरी साँस खींच कर बोली हन भई अब क्या करें अपने ही देश मे अब हम तो बेगाने हो गये, हमारे साथ तो अब मेहमानो जैसा सुलूक किया जाता है. मैने पूछा कि क्या हुआ, बात कुछ समझ नही आई तब उसने बताया कि देखो ना कहने को तो हम राष्ट्रभाषा हैं, मातृभाषा हैं लेकिन हमें याद रखने के लिए वर्ष मे एक बार हिन्दी साप्ताह मनाया जाता है, हमारे बारे में खूब चर्चाएँ होती हैं कई प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं और हमारा खूब प्रचार-प्रसार किया जाता है और फिर उसके बाद सब भूल जाते हैं, में उसकी बातें सुनकर सोच मे डूब गयी और वो मुझे उसी हाल मे छोड़ कर अपनी राह पर चल दी, उसे जाता देखकर मैने उसकी बातों पर गौर किया तो पाया कि कितना सच कह गयी वो. वाकई मे हमारे हिंदू राष्ट्र मे हमारी राष्ट्रभाषा ही कितनी उपेक्षित सी है, आज हमने पाश्चात्य रहन-सहन को, ख़ान पान को कितने प्यार से अपनाया और साथ ही अँग्रेज़ी भाषा को तो हमने इस कदर आत्मसात कर लिया कि जैसे हमारी अपनी भाषा तो कोई थी ही नही. आज जब बच्चा बोलना सीखता है तो उसे "मॉम" बोलना सिखाया जाता है, अरे जो बच्चा माँ कहना नहीं सीखेगा वो मातृ शब्द ग़ूढ अर्थ कैसे जानेगा. आज माता-पिता अपने बच्चों को अँग्रेज़ी स्कूलों मे पढ़ाने मे, अँग्रेज़ी भाषा सीखने मे गर्व का अनुभव करते हैं- अच्छी बात है, कोई भी भाषा बुरी नही होती क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैचारिक आदान-प्रदान का यही सबसे सरल तरीका है पर यह सब किस कीमत पर- हम कब तक उधार मे ली गयी संस्कृति और भाषा पर गर्व करते रहेंगे, क्या हमारे पास हमारी कोई संस्कृति, भाषा नही है जिस पर हम गर्व कर सकें, गर्व से कह सकें की हम हिंदू हैं और हिन्दी हमारी भाषा है. यह कोई मुश्किल काम नही है बस हर किसिको अपने ही घर से इसकी शुरुआत करनी होगी और इसमे सबसे अहम भूमिका हम महिलाओं की ही है क्योंकि बच्चे का पहला स्कूल घर और पहली शिक्षिका माँ होती है(अर्चना शर्मा,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,25.7.11).

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