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23 अक्टूबर 2010

गुरुकुल की ओर

नक्सली हिंसा से देश के कई इलाकों में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई बंद हो गई है। नक्सल प्रभावित कई राज्यों में स्कूल अरसे से बंद पड़े हैं। छत्तीसगढ़ के कुछ इलाकों का भी यही हाल है। लेकिन वहीं के महासमुंद जिले के 29 वर्षीय चंद्रमणि शास्त्री जो कुछ कर रहे हैं, वह सचमुच मिसाल है। पहले तो वह खुद राज्य से बाहर शिक्षा प्राप्त करने के लिए गए। बाद में अपने यहां के छोटे बच्चों को उसी गुरुकुल में पढ़ाने के लिए लाने लगे। इसमें उस गुरुकुल की भी महती भूमिका है। चंद्रमणि शास्त्री दरअसल अपने गुरु ब्रह्मचारी श्रीकृष्णदत्त जी की प्रेरणा से 15 साल पहले उत्तर प्रदेश के उस बागपत जिले में खुद ही शिक्षा ग्रहण करने आए थे, जो अपराधियों के गढ़ के रूप में पूरे देश में कुख्यात रहा है।

वह बागपत जिले के लाक्षागृह स्थित महानंद संस्कृत महाविद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। चूंकि छत्तीसगढ़ के बच्चों की पीड़ा वह जानते हैं, इसलिए वहां के नक्सल प्रभावित क्षेत्र के बच्चों में शिक्षा का आलोक जगाने के लिए वह सक्रिय हैं। इसके लिए वह बच्चों के अभिभावकों को प्रेरित करते हैं और साल में दो बार करीब 15-20 छोटे-छोटे बच्चों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए अपने साथ ले आते हैं। दिलचस्प है कि इस गुरुकुल से शिक्षा ग्रहण करने वाले बच्चे उन्हीं इलाकों में जाकर शिक्षण कार्य करते हैं, जहां के बच्चे नक्सलियों के खौफ से स्कूल नहीं जा पाते। चंद्रमणि बताते हैं कि इस गुरुकुल में भारतीय संस्कृति, वेद और अध्यात्म की शिक्षा दी जाती है। वह ऐसे ही परिवार और बच्चों को शिक्षा पाने के लिए प्रेरित करते हैं, जिनकी महत्वाकांक्षा बड़ी न होकर एक सच्चा नागरिक बनने की होती है। गुरुकुल में शिक्षा निःशुल्क दी जाती है, लेकिन बच्चों को इतनी दूर से लाने का खर्च वह स्थानीय लोगों और गुरुकुल की समिति के सहयोग से प्राप्त करते हैं। चंद्रमणि कहते हैं कि नेक काम के लिए हर कोई सहयोग करने को तत्पर रहता है।

यहां शिक्षा पाने वाले बच्चे गरीब जरूर हैं, लेकिन उनमें पढ़ने की ललक है और वे दिल्ली, हरिद्वार तथा बनारस तक गुरुकुल परिवेश को समृद्ध कर रहे हैं। इस गुरुकुल की सादगी ही दूर-दराज के बच्चों को भी अपनी ओर आकर्षित करती है। यहां शिक्षा पाने वाले हर बच्चे की यही ख्वाहिश रहती है कि जितना संभव हो सके, भारतीय संस्कृति को जीवित रखा जाए। चंद्रमणि बताते हैं कि निरक्षरता के अंधकार में अगर एक दीपक भी जलाया जाता है, तो उससे कई और दीपक जलते हैं और यही हमारा मुख्य मकसद है। यही मूल मंत्र यहां के छात्र लेकर अपने-अपने इलाकों में शिक्षा का अलख जगा रहे हैं(राजेश रंजन,अमरउजाला,23.10.2010)।

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