बहुत कम छात्र गणित को मुख्य विषय के रूप में चुनते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इसमें कॅरिअर के विकल्प बहुत कम हैं लेकिन इसे लोकप्रिय बनाने के लिए व्यावहारिक गणित में अधिक अन्वेषण की आवश्यकता है। आज दैनिक नई दुनिया में इसी विषय पर मुकुल व्यास जी का एक आलेख छपा है। आप भी पढिएः
"गणित एक ऐसा विज्ञान है जो बहुत कम लोगों को आकर्षक लगता है। स्कूल के दिनों में हमें गणित के सवाल हल करने में खासी मशक्कत करनी पड़ती थी। घंटों दिमाग लड़ाने के बाद भी नतीजा अकसर सिफर ही निकलता था। यह सिलसिला आज भी जारी है। बच्चे गणित के सवालों में उलझे रहते हैं और हम उनकी कोई मदद नहीं कर पाते। देश के स्कूलों में एक तरफ तो छात्र-शिक्षक अनुपात बहुत ज्यादा है और दूसरी तरफ ऐसे शिक्षक बहुत कम हैं, जो छात्रों में गणित की बुनियाद मजबूत कर सकें।
भारत में गणित अध्ययन की परंपरा बहुत पुरानी है। आर्य भट्ट और ब्रह्मगुप्त के नाम कौन नहीं जानता। दुनिया को शून्य का बोध सबसे पहले हमने ही कराया था। २० वीं सदी के प्रारंभ में श्रीनिवास रामानुजन ने प्रवेश किया और अल्प समय में ही उन्होंने अपने गणितीय अनुसंधानों से गणित की दुनिया को रोमांचित कर दिया। आज भारत के स्कूल भले ही गणित की पढ़ाई में पिछड़ रहे हों लेकिन देश में गणितज्ञों का एक छोटा सा समुदाय भारत को गणित की दुनिया में प्रतिष्ठित स्थान दिलाने के लिए पिछले कई वर्षों से सक्रिय है। टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के प्रोफेसर और प्रमुख गणितज्ञ एम.एस. रघुनाथन का मानना है कि भारत विश्व की एक प्रमुख गणित शक्ति बन चुका है और इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि दुनिया के गणितज्ञों ने इस वर्ष अपनी अंतरर्राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए भारत का चुनाव किया है। इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ मैथमेटिशियंस-२०१० (आईसीएम २०१०) का आयोजन हैदराबाद में १९ से २७ अगस्त तक होगा। १८९७ में ज्यूरिख में आईसीएम की स्थापना के बाद यह पहला मौका है जब भारत में दुनिया के गणितज्ञों का इतना बड़ा सम्मेलन होने जा रहा है।
भारत गणित कांग्रेस आयोजित करने वाला तीसरा एशियाई देश है। इससे पहले क्योटो (जापान) में १९९० और पेइचिंग (चीन) में २००२ में आईसीएम आयोजित हो चुकी है।
अब सवाल यह है कि गणित के प्रति ज्यादा से ज्यादा छात्रों को कैसे आकृष्ट किया जाए और कैसे गणित शिक्षकों की संख्या बढ़ाई जाए? केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री पृथ्वीराज चौहान मानते हैं कि बहुत कम छात्र गणित को मुख्य विषय के रूप में चुनते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इसमें कॅरिअर बनाने के विकल्प बहुत कम हैं। यह एक गूढ़ विज्ञान है लेकिन इसको लोकप्रिय बनाने के लिए इसके व्यावहारिक पक्ष यानी एप्लाइड मैथमेटिक्स में और अधिक रिसर्च की आवश्यकता है। कंप्यूटर विज्ञान के अलावा रक्षा विज्ञान के कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां गणित की जरूरत पड़ती है। गणित को विज्ञान के साथ ही जोड़ा जाना चाहिए और यह सरकार का दायित्व है कि वह इस तरह का संदेश देश के कोने-कोने में पहुंचाए। उम्मीद है कि हैदराबाद में होने वाली अंतरराष्ट्रीय गणितज्ञ कांग्रेस भारतीय युवाओं को गणित को आत्मसात करने के लिए प्रेरित करेगी।"
"गणित एक ऐसा विज्ञान है जो बहुत कम लोगों को आकर्षक लगता है। स्कूल के दिनों में हमें गणित के सवाल हल करने में खासी मशक्कत करनी पड़ती थी। घंटों दिमाग लड़ाने के बाद भी नतीजा अकसर सिफर ही निकलता था। यह सिलसिला आज भी जारी है। बच्चे गणित के सवालों में उलझे रहते हैं और हम उनकी कोई मदद नहीं कर पाते। देश के स्कूलों में एक तरफ तो छात्र-शिक्षक अनुपात बहुत ज्यादा है और दूसरी तरफ ऐसे शिक्षक बहुत कम हैं, जो छात्रों में गणित की बुनियाद मजबूत कर सकें।
भारत में गणित अध्ययन की परंपरा बहुत पुरानी है। आर्य भट्ट और ब्रह्मगुप्त के नाम कौन नहीं जानता। दुनिया को शून्य का बोध सबसे पहले हमने ही कराया था। २० वीं सदी के प्रारंभ में श्रीनिवास रामानुजन ने प्रवेश किया और अल्प समय में ही उन्होंने अपने गणितीय अनुसंधानों से गणित की दुनिया को रोमांचित कर दिया। आज भारत के स्कूल भले ही गणित की पढ़ाई में पिछड़ रहे हों लेकिन देश में गणितज्ञों का एक छोटा सा समुदाय भारत को गणित की दुनिया में प्रतिष्ठित स्थान दिलाने के लिए पिछले कई वर्षों से सक्रिय है। टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के प्रोफेसर और प्रमुख गणितज्ञ एम.एस. रघुनाथन का मानना है कि भारत विश्व की एक प्रमुख गणित शक्ति बन चुका है और इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि दुनिया के गणितज्ञों ने इस वर्ष अपनी अंतरर्राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए भारत का चुनाव किया है। इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ मैथमेटिशियंस-२०१० (आईसीएम २०१०) का आयोजन हैदराबाद में १९ से २७ अगस्त तक होगा। १८९७ में ज्यूरिख में आईसीएम की स्थापना के बाद यह पहला मौका है जब भारत में दुनिया के गणितज्ञों का इतना बड़ा सम्मेलन होने जा रहा है।
भारत गणित कांग्रेस आयोजित करने वाला तीसरा एशियाई देश है। इससे पहले क्योटो (जापान) में १९९० और पेइचिंग (चीन) में २००२ में आईसीएम आयोजित हो चुकी है।
अब सवाल यह है कि गणित के प्रति ज्यादा से ज्यादा छात्रों को कैसे आकृष्ट किया जाए और कैसे गणित शिक्षकों की संख्या बढ़ाई जाए? केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री पृथ्वीराज चौहान मानते हैं कि बहुत कम छात्र गणित को मुख्य विषय के रूप में चुनते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इसमें कॅरिअर बनाने के विकल्प बहुत कम हैं। यह एक गूढ़ विज्ञान है लेकिन इसको लोकप्रिय बनाने के लिए इसके व्यावहारिक पक्ष यानी एप्लाइड मैथमेटिक्स में और अधिक रिसर्च की आवश्यकता है। कंप्यूटर विज्ञान के अलावा रक्षा विज्ञान के कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां गणित की जरूरत पड़ती है। गणित को विज्ञान के साथ ही जोड़ा जाना चाहिए और यह सरकार का दायित्व है कि वह इस तरह का संदेश देश के कोने-कोने में पहुंचाए। उम्मीद है कि हैदराबाद में होने वाली अंतरराष्ट्रीय गणितज्ञ कांग्रेस भारतीय युवाओं को गणित को आत्मसात करने के लिए प्रेरित करेगी।"
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