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28 मई 2012

छोटे कन्धों पर बड़ी पढ़ाई का बोझ

यूं तो शिक्षा पाने के लिए विद्यार्थी को स्कूल भेजने की एक उम्र होती है ताकि विद्यार्थी इस योग्य बन जाए कि वह शिक्षा पाने में सक्षम हो सके। कच्ची उम्र और विशेषकर जब बच्चे की उम्र इतनी नहीं होती है कि वह शिक्षा पा सके और उन हालातों में अगर बच्चे को स्कूल भेजा जाता है तो वह महज एक मजाक बनकर रह जाता है। 

आज के युग में अभिभावकों में एक होड़ देखने को मिलती है और वे अपने बच्चों को जितना जल्दी हो सके शिक्षा दिलाने के लिए स्कूल भेजना चाहते हैं। बच्चा चाहे कपड़े पहनना तो दूर कपड़ों के विषय में जानता तक नहीं है किंतु अभिभावक चाहते हैं कि उनका बच्चा जल्दी से शिक्षा पाकर जल्दी नौकरी लग जाए और जल्दी ही कमाई शुरू कर दे। उनका मुख्य उद्देश्य बच्चे को नौकरी पर देखना होता है। इसी होड़ के चलते विभिन्न स्कूलों में जहां कभी पहली कक्षा से स्कूली शिक्षा की शुरुआत होती थी वहां अब पहली से भी पहले नर्सरी और प्रि-नर्सरी कक्षाएं शुरू हो गई हैं। जहां पहले विद्यार्थी करीब छह वर्ष की उम्र होने पर ही स्कूल जाता था वहीं अब तीन या चार वर्ष की उम्र में ही स्कूल जाने लगा है। आने वाले समय में और भी पहले शिक्षा दिलाने का प्रबंध करना पड़ सकता है। अभिभावकों का कहना है कि जब अभिमन्यु अपनी माता के गर्भ में ही शिक्षा पा गया था तो क्यों न छोटी से छोटी कक्षा में ही विद्यार्थी को स्कूल भेजा जाए। 

एक जमाना था जब अभिभावक पहले अपने बच्चे को करीब छह से आठ वर्ष की उम्र में अपने घर पर रखते थे और जब बच्चा कुछ करने योग्य हो जाता और यहां तक कि वह कपड़े पहनने व खाना खाने आदि का ज्ञान प्राप्त कर लेता था तब अपने बच्चे को शिक्षालय भेजते थे ताकि वह शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर अग्रस हो सकता था। उस जमाने में बड़ी आयु के विद्यार्थी ही शिक्षा पाते थे। वैसे भी अगर विद्यार्थी अपना काम कम से कम स्वयं नहीं कर पाता तो वह सच्चा विद्यार्थी नहीं कहलाएगा। अगर विद्यार्थी अपना काम स्वयं कर लेता था तो उसे स्कूल भेजा जाता था। यद्यपि उस जमाने में विद्यार्थी के बस्ते का बोझ कम ही होता था किंतु आज बिल्कुल उलट है। आज के दिन बस्ता बड़ा एवं भारी होता है और विद्यार्थी छोटा होता है। विद्यार्थी का बस्ता भी उसके अभिभावक स्कूल तक पहुंचाकर आते हैं और स्कूल से भी बच्चे को घर लाते हैं। यहां तक कि बच्चे का स्कूली काम भी अभिभावक ही पूरा करते हैं। 

शिक्षा के प्रति जागरूकता जरूर बढ़ी है। पहले वक्त था जब बच्चे बड़ी उम्र तक स्कूल नहीं भेजा जाता था और जब वह अधिक उम्र का हो जाता तो स्कूल से वंचित ही रख दिया जाता था। लड़कियों की शिक्षा पर तो कोई ध्यान तक नहीं दिया जाता था। आज उलटा हो गया है। लड़कियों की शिक्षा की ओर उतना ही ध्यान दिया जाने लगा है जितना लड़कों की शिक्षा की ओर। आज के जमाने में आम अभिभावक यह माने लग गया है कि अगर उसका लड़का ही नहीं अपितु लड़की भी शिक्षा पाएगी तो कम से कम क्षेत्र में नाम होगा। वैसे भी माना जाता है कि एक बच्ची का लिखा पढ़ा होने से एक नहीं अपितु दो परिवारों का भला हो सकता है। 

छोटी उम्र में शिक्षा दिलवाने की होड़ जहां तक कई मायनों में लाभकारी भी है तो कई मायनों में हानिकारक भी है। जहां लाभ का प्रश्न है तो विद्यार्थी अपनी बुद्धि के पूरे यौवन पर होने पर किसी भी परीक्षा में बैठकर अपना भाग्य आजमा सकेगा। ऐसा देखने में आता है कि छोटी उम्र में ही बच्चा बड़ी-बड़ी परीक्षाओं की तैयारी में लग जाता है। छोटी उम्र में शिक्षा पा लेने से उसे कई परीक्षाओं में मौका मिल पाएगा। बड़ी उम्र में अगर शिक्षा पाने लगेगा तो वह कई परीक्षाओं में भाग्य नहीं आजमा पाएगा। ऐसे में छोटी उम्र में कई लाभ हो सकते हैं। वैसे भी ग्रामीण क्षेत्रों में नर्सरी व प्रि-नर्सरी से पूर्व ही आंगनबाड़ी केंद्र खुल गए हैं। इन केंद्रों में बच्चों को स्कूल से पहले भेजा जाता है ताकि बच्चा स्कूल जाने के काबिल हो जाए। वैसे भी आंगनबाड़ी जैसे संस्थाओं ने बच्चे को शिक्षा पाने में मदद की है। छोटी उम्र में बच्चे को स्कूल भेजने की होड़ अधिक कारगर इसलिए नहीं है क्योंकि बच्चे का शारीरिक विकास नहीं पाता है और बच्चा पढ़ाई के बोझ तले दबता ही चला जात है। बच्चे का मानसिक विकास ही नहीं अपितु शारीरिक विकास भी नहीं हो पाता है। बच्चा मानसिक तनाव ग्रस्त होता चला जाता है। ऐसे में यह होड़ कई मायनों में हानिकारक साबित होती है। अगर बच्चे को सही एवं पूर्णरूप से विकसित होने का मौका दिया जाए तो वह किसी बड़ी से बड़ी मुश्किल से नहीं डर पाएगा और सदा आगे ही बढ़ता जाएगा।

छोटी उम्र में ही स्कूल भेजने का सपना साकार करने में निजी स्कूल का बड़ा हाथ है। वैसे तो सरकारी स्कूलों में नर्सरी कक्षाएं लगाई जाने लाने लगी हैं किंतु निजी स्कूलों में तो नर्सरी से भी छोटी कक्षाएं भी लगाई जाने लगी हैं। बच्चा घर का रास्ता तक नहीं जानता किंतु उसे स्कूल भेजने का रास्ता बताया जाता है। शहरी क्षेत्रों में जहां महिलाएं एवं पुरुष काम पर जाते हैं तो उनके पास अपने बच्चे की देखरेख का कोई समय नहीं होता है और वे इस प्रकार की विधि अपनाते हैं। अब तो ग्रामीण क्षेत्र भी कम नहीं हैं। शहरी विधियां ग्रामीण क्षेत्रों पर अपनाई जा रही हैं। छोटी उम्र में स्कूल भेज पाना निम्न मायनों में उचित नहीं लगता है :- 

1. शरीर का पूर्ण विकास नहीं हो पाता है। 

2. मानसिक रूप से परेशान रहता है।

3. उसके दिलों दिमाग पर एक बोझ बनता चला जाता है। 

4. बच्चे को अपने माता-पिता का पूरा प्यार एवं सामाजिक विकास नहीं पनप पाता है। 

5. परिवार से दूर रहने लग जाता है(होशियार सिंह,शिक्षालोक,दैनिक ट्रिब्यून,22.5.12)।

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27 मई 2012

गुरु भी पिस रहा है उपभोक्तावाद की चक्की में

एक जमाना था, जब गुरुकुल था, जब गुरुकुल प्रथा प्रचलित थी और वहां का सारा वातावरण गुरु नियंत्रित व उच्च आदर्शों का मानक होता था, आचार्य या शिक्षक पूर्णत: स्वतंत्र होता था वह अपनी स्वयं निर्मित नियमावली व आदर्शों को अपनी ही ईजाद की गई शिक्षण पद्धति द्वारा छात्रों अथवा शिष्यों को शिक्षित करता था, न उसे परिवार के पालन-पोषण की चिन्ता थी और न ही शिक्षण से इतर कार्यों में उसे खपना-खटना पड़ता था। उसका केवल और केवल एक ही लक्ष्य होता था अपने द्वारा अर्जित ज्ञान अगली पीढ़ी को संक्रमित व हस्तांतरित करना, उनमें उच्च मूल्यों, मानकों, आदर्शों को ‘इन्स्टीगेट’ यानी प्रस्थापित करना। यह वह समय था, जब शिष्य भी गुरु के प्रति पूर्णतया आज्ञाकारी होते थे लेकिन काल संक्रमण के साथ बदलता है, सो शिष्य ही नहीं गुरु भी बदले और साथ ही साथ बदला सामाजिक परिवेश, वातावरण, मूल्य व मानक तथा आदर्श। 

मूल्य समाज का स्थान समय के साथ अर्थ प्रधान समाज ने लिया तो अल्प वेतनभोगी शिक्षक तुलनात्मक रूप से अन्य वेतन भोगियों से हेय व कमतर होता चला गया। वहीं शिक्षकों का बड़ा वर्ग भी अर्थ प्रधानता की प्रवृत्ति के साथ बहता, बदलता गया और शिक्षण के स्थान पर ‘ट्यूशन’ व कोचिंग को प्राथमिकता व वरीयता देने वाला हो गया। इसी क्रम में ‘भुगतान करो और ज्ञान पाओ’ की प्रवृत्ति अभिभावकों व छात्रों में स्पष्टï परिलक्षित होने लगी यानी ‘गुरु जी’ अब बिकने व खरीदी जाने वाली वस्तु में तबदील हो गए तथा उपभोक्तावाद के जमाने में उनकी भी सीमांत उपयोगिता आंकी जाने लगी। तब भला श्रद्धा कहां बचती? 

‘इस हाथ दे, उस हाथ ले’ के चलते सिर्फ इतना ही नहीं हुआ, ‘ गुरु जी’ के ‘क्लास बंकिंग’ पर भी सतर्क निगाह रखी जा रही है और सच यह भी है कि प्राथमिक स्तर के भोले बच्चे गुरु जी की ‘बंकिंग’ से भले ही खुश होते हों पर डिग्री कॉलेज के तर्कशील विद्यार्थी बेखौफ प्रश्न खड़ा करते हैं कि यदि शिक्षक ‘कक्षा मिस’ करके ट्यूशन या कोचिंग में ‘अटैंडेंस’ दे सकते हैं तो फिर वे कक्षाओं में क्यों जाएं? या उन पर ‘शॉर्ट अटैंडेंस’ का नियम क्यों लागू हो ? बात वैसे गैरवाजिब भी नहीं है। भई, जब अभिभावक व छात्र अपनी फीस के माध्यम से आपको वेतन दे रहे हों, तब प्रश्न पूछने का हक तो उन्हें है ही। 

हालांकि ऐसा भी नहीं कि ‘टीचर’ ही माध्यमिक अथवा स्नातक,परास्नातक स्तर की शिक्षा के अधोपतन के दोषी हैं, चयन से लेकर सेवा शर्तों तक सरकारीऔर निजी दोनों क्षेत्रों में शिक्षक का बेतहाशा शोषण किया जा रहा है। जहां निजी क्षेत्रों की दुकानें विद्यार्थियों से भारी फीस वसूल करती हैं, वहां शिक्षक को वेतन के ही नाम पर नहीं ठगा जा रहा वरन् उनके नैतिक, दैहिक एवं अन्य प्रकार के शोषण के दिल दहलाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। कई संस्थानों के अनपढ़, धनाढ्य व राजनीतिक पहुंच वाले मैनेजर व मालिक शिक्षक को अपने घरेलू नौकर से भी बदतर हालात में रहने को मजबूर कर रहे हैं, उन्हें न उचित वेतन मिलता है और न ही सम्मान। ऐसे में भला कैसे वो अपने ज्ञान का खजाना कहीं भी उड़ेल सकते हैं। 

सरकारी क्षेत्र अपने सफेद हाथीपने के लिए कुख्यात है ही, वहां सरकारें शिक्षक को वेतन तो पूरा देती हैं पर न तो शैक्षणिक माहौल वहां है, न समयानुकूल प्रशिक्षण, न विद्यालयों में पर्याप्त संसाधन हैं और न पाठ्य पुस्तकें। नियुक्ति के लेकर प्रस्थापन (पोस्टिंग) तक वहां वही सब ढर्रा है, जो अन्य विभागों में है। अत: शिक्षक कक्षाओं के बजाय अधिकारियों के समक्ष शरणागत होने, उनकी चापलूसी करने में, स्ययं को अधिक सुरक्षित महसूस करता है। इतने पर ही बस नहीं, सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में शिक्षण से अधिक ‘मिड डे मील’ योजना पर शिक्षा के कर्ता-धर्ता कहीं अधिक ध्यान दे रहे लगते हैं। 

स्थिति इतनी बदतर है कि अधिकांश राज्यों में बोर्ड के परीक्षा परिणाम 50 प्रतिशत से भी कम रहते हैं मगर शिक्षक को चुनाव कराने, पोलियो ड्रॉप्स पिलाने, जनगणना, पशुगणना तथा और भी न जाने कैसे-कैसे कार्यों में झोंक दिया जाता है। ऐसा लगता है कि ये सरकारें यह मान बैठी हैं कि शिक्षक पढ़ाते तो हैं ही नहीं, सो हर फालतू कार्य उन्हीं से लेकर उन्हें दिए जाने वाले वेतन की पूर्ति की जाए।

एक बात और, अब वह पुरानी व्याख्यान पद्धति या ब्लैक बोर्ड चॉक-डस्टर वाली पढ़ाई से काम चलने वाला नहीं है, अब शिक्षण नहीं वरन् अधिगम (Learning) पर जोर देने का जमाना है। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि आपने क्या और कैसा या कैसे पढ़ाया, महत्वपूर्ण यह है कि बच्चों ने क्या सीखा और यह उद्देश्य प्राप्त करने के लिए शिक्षक को भी पुराने खोल से बाहर आना ही होगा। अब कुर्सी पर बैठकर सुस्ताने या फिर पसीने-पसीने होने से भी बात नहीं बनेगी। वरन् बच्चों के साथ बच्चा बनकर उनके व्यक्तिगत मनोविज्ञान, व्यक्तिगत जरूरत व कमजोरी को समझकर ‘मैन टू मैन’ की शैली में ‘चाइल्ड टू चाइल्ड’ पद्धति अपनानी होगी। ठीक है संसाधन कम हैं और चुनौती बड़ी है पर शिक्षक तो वह अमोघ अस्त्र है जो समाज व देश की दशा, दिशा व भविष्य बदल सकता है। अत: अब पढ़ाने की ही नहीं वरन् बच्चों को पढऩे की जरूरत है। यदि आधे शिक्षक भी यह कर पाएं तो शिक्षा व शिक्षण का परिदृश्य जल्दी ही बदला दिखने लगेगा(घनश्याम बादल,शिक्षालोक,दैनिक ट्रिब्यून,8.5.12)।

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ज्ञान की नींव हैं पाठ्य पुस्तकें

प्रारम्भ से ही शिक्षक बच्चों को यह सिखाये कि पाठ्य-पुस्तकें शिक्षा का माध्यम हैं, ज्ञानकोष नहीं। इनमें केवल इतना ज्ञान ही दिया जाता है जितना हर बालक को जानना चाहिए। इसमें दी गई पाठ्यवस्तु ज्ञान की नींव मात्र है। इसी नींव पर जानकारियों को बढ़ाना है। 

शिक्षक के लिये पाठ्य-पुस्तक शिक्षण का महत्वपूर्ण साधन है। इसकी विषय-वस्तु से शिक्षक केवल जानकारी ही नहीं देते हैं बल्कि दिये गये चित्रों, सम्भव क्रियाओं और अभ्यासों के माध्यम से छात्रों में उचित भावनाओं और कुशलताओं का विकास भी करते हैं। 

पाठ्य-पुस्तक में तथ्य, जानकारियां और सिद्धांत सामान्य रूप से ही दिए होते हैं। उपयुक्त उदाहरण, स्थानीय ज्ञान और नये रोचक तथ्य देकर शिक्षक ही उन सामान्य बातों को सजीव बना सकते हैं। शिक्षक के प्रोत्साहन से ही छात्र पाठ्य-पुस्तक से प्राप्त ज्ञान को विस्तृत करके नये तथ्य और ज्ञान ढूंढ़ निकालने की कोशिश करने लगेंगे। अच्छी से अच्छी पाठ्य-पुस्तक भी शिक्षक का स्थान नहीं ले सकती। 

पाठ्य-पुस्तकों में प्रचुर मात्रा में चित्र दिये होते हैं। ये सजावट मात्र नहीं हैं बल्कि पाठ्य-पुस्तक के अभिन्न अंग हैं। इनके माध्यम से रुचि और उत्सुकता, दोनों बढ़ती हैं। शिक्षक बच्चों को चित्र ध्यान से देखना सिखाए। इनकी आपस में तुलना से नया ज्ञान प्राप्त करने में सहायता करिये और अस्पष्ट धारणाओं को स्पष्ट करने का प्रयास करिये। पाठ्य-पुस्तक में दी गई क्रियाएं और अभ्यास भी शिक्षण के आवश्यक अंग हैं। इनके द्वारा शिक्षक मूल्यांकन तो करेंगे ही, साथ ही पढ़ाते समय तथा पढ़ाने के बाद उनके प्रयोग से बच्चों के ज्ञान का व्यवस्थित रूप भी दे सकेंगे। क्रियाओं के माध्यम से पढ़ाकर आप ज्ञान को स्थायी और प्रभावपूर्ण बना सकते हैं। फिर, इन्हीं की मदद से आप नयी क्रियाओं और नये अभ्यासों को सोच सकते हैं। हर तरह से ये आपकी सहायता करेंगे(विक्रम कुंडू ‘प्रबोध’,शिक्षालोक,दैनिक ट्रिब्यून,8.5.12)।

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26 मई 2012

गांवों में बालिका-उच्चशिक्षा सिर्फ आधी हकीकत है

हमारे देश में जहां आबादी का बड़ा प्रतिशत गांवों में रहता है वहां लड़कियों की दशा अभी भी सोचनीय है। शहरी लड़कियों की तुलना में गांव में रहने वाली लड़कियों को पढ़ाई के लिए अधिक जद्दोजहद करनी पड़ती है। ज्यादातर ग्रामीण परिवारों में पढ़ाई को दूसरे विकल्प के तौर पर लिया जाता है। लड़कियों के लिए घर के काम सीखने व करने ज्यादा जरूरी माने जाते हैं। सफाई-बुहारी, चूल्हा-चौका, पालतू पशु की देखरेख जैसे- दूध दोहना, उपले बनाना, चारे का इंतजाम इत्यादि के बाद पढ़ाई का नंबर आता है। उनकी शिक्षा को उतनी तवज्जो नहीं मिल पाती जितनी लड़कों को मिलती है। ज्यादातर गांवों में लड़कियों को दसवीं या बारहवीं तक शिक्षा के पश्चात् घर बैठा दिया जाता है। बहुत हुआ तो स्नातक की पढ़ाई कर ली। प्रोफेशनल कोर्सेज तथा बी.एड. इत्यादि करने वाली गांव की लड़कियों की संख्या आज भी बेहद कम है। प्रारंभिक शिक्षा के पश्चात् गांवों में लड़कियों की जल्दी शादी कर दी जाती है। ऐसे ग्रामीण परिवार आज भी विरले हैं जिनमें लड़कियां शिक्षा प्राप्त कर अपना समुचित विकास कर पाती हैं। हालांकि भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के प्रसार के नतीजे अब धीरे-धीरे सामने आने लगे हैं। किसान, मजदूर अन्य कामगार अपने बच्चों को शिक्षित बनाने में रुचि लेने लगे हैं। लड़कों के साथ-साथ, बालिकाओं की स्कूल जाने की दर में भी इजाफा होने लगा है। हालांकि प्राथमिकता अभी भी दो जून की रोटी के जुगाड़ को ही दी जाती है। यह एक मजबूरी भी है परन्तु मिड-डे मील जैसी योजनाओं के लागू होने से ग्रामीण अपनी संतानों को स्कूल भेजने लगे हैं। जहां तक बात महिलाओं की उच्च शिक्षा की है उसके लिए हर स्तर पर प्रयास बेहद जरूरी हैं। ग्रामीण महिलाओं की संपूर्ण उन्नति के लिए आवश्यक है कि हमारी सोच में परिवर्तन आये। शहरी लड़कियों की तुलना में देखा जाए तो ग्रामीण लड़कियां अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करने के कारण अधिक मजबूत हो जाती हैं। 

लड़कियां व महिलाएं आज हर क्षेत्र में पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती दे रही हैं परन्तु इसमें अधिकतर शहरों व नगरों का योगदान है। शिक्षा, तकनीकी,विज्ञान, प्रशासन, सेना, पुलिस, खेल इत्यादि सभी क्षेत्रों में स्त्रियों के लिए द्वार खुले हैं। ग्रामीण स्तर पर इस सामाजिक चेतना की बहुत ज्यादा जरूरत है, जब बालिकाएं स्कूल, कालेज से आगे निकलकर अपने व देश के भविष्य को उज्ज्वल बना सकेंगी।

सरकारें अपनी तरफ से प्रयास करती रही हैं। हाल ही में हमें मौलिक शिक्षा का अधिकार प्राप्त हुआ है। परन्तु महिलाओं, लड़कियों की शिक्षा के स्तर पर क्रांति की दरकार है। आम जनता की भागीदारी से ही यह कार्य मुमकिन है(शायनी,शिक्षालोक,दैनिक ट्रिब्यून,1.5.12)।

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13 दिसंबर 2011

रोचक विषय है गणित

किसी भी कार्य में सफलता पाने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि उसे करने वाले की उस कार्य में पर्याप्त रुचि हो। जितने अधिक समय तक कार्य करने में रुचि बनी रहेगी, उतने ही समय तक पर्याप्त उत्साह एवं उमंग के साथ कार्य ठीक तरह होता रहेगा। ज्यों ही रुचि में कमी हुई तथा कार्य नीरस लगने लगा, गति बहुत धीमी हो जाएगी। यहां तक कि रुचि के अरुचि में परिवर्तन होने पर काम बिगडऩे की भी आशंका हो सकती है। ठीक इसी तरह से गणित की शिक्षा देते समय गणित के अध्ययन के प्रति बच्चे की रुचि का होना सबसे महत्वपूर्ण बात है। वह विषय सरल और रोचक प्रतीत होना चाहिए।

गणित को कैसे रोचक बनाया जाए, यह गणित शिक्षकों के लिए बहुत ही महत्व का विषय है। इस प्रश्न के दो महत्वपूर्ण पहलू हैं। पहला यह कि बच्चों को गणित के अध्ययन के प्रति कैसे आकर्षित किया जाए और दूसरा यह है कि एक बार गणित के अध्ययन के प्रति रुचि तथा उत्साह जाग्रत होने पर उसे किस प्रकार यथानुकूल बनाए जाए? कुछ बिन्दु इस संबंध में लाभकारी हो सकते हैं।

बच्चे स्वभाव से ही जिज्ञासु होते हैं तथा वे समस्याओं की गहराई में उतरना चाहते हैं। अत: उनको समस्याओं के अध्ययन के लिए अवसर देना रुचि जागृति करने का साधन बन सकता है। शिक्षक को यह गलत धारणा अपने मस्तिष्क में से बिल्कुल निकाल देनी चाहिए कि साधारणतया छात्र अपने मस्तिष्क का उपयोग करने में आराम-पसंद होते हैं। अगर कोई कार्य उनकी मानसिक शक्तियों के लिए चुनौती बनकर सामने आए तो छात्रों में उसे पूरा करने की भावना को लेकर उसके प्रति रुचि अवश्य ही जाग्रत हो जाएगी। अत: गणित के प्रति रुचि जाग्रत करने और उसे बनाए रखने में यह ध्यान रखें कि कार्य छात्रों की मानसिक शक्तियों का उपयोग करने का पूर्ण अवसर प्रदान करें। शिक्षकों को समस्यात्मक और अन्वेषणात्मक दृष्टिकोण को लेकर गणित का अध्ययन कराना चाहिए। अपने आप सभी कुछ बतलाकर उसे रटवाने के द्वारा नहीं। रुचि तभी बनी रह सकती है, जब तक उनके मस्तिष्क को कुछ कार्य मिलता रहे, वे समस्या की तह तक जाकर सत्य की खोज करते हैं।


काम करने वाला जिस कार्य को जितना अधिक उपयोगी समझेगा, उतनी ही रुचि, परिश्रम और ïउत्साह से वह काम करेगा। अगर गणित की पढाई प्रयोगात्मक अथवा व्यवहारात्मक ज्ञान की प्राप्ति को ध्यान में रखकर कराई जाए तो कोई कारण नहीं कि छात्रों को गणित की पढ़ाई सरस और रोचक प्रतीत न हो। जब भी किसी प्रकरण अथवा समस्या का अध्ययन आरंभ किया जाए तो उसके अध्ययन आरंभ किया जाए तो अनुभव छात्रों को अवश्य करा देना चाहिए। इससे उसके प्रति छात्रों में सहज आकर्षण उत्पन्न हो जाता है। अब इसके पश्चात जो भी ज्ञान दिया जाए, अगर उसे व्यावहारिक जीवन में उसके उपयोग से संबंधित करके दिया जाए तो यह रुचि बनी रह सकती है।

गणित के कलात्मक और सौंदर्यात्मक पक्ष से परिचित कराकर गणित के अध्ययन को रुचिपूर्ण बनाया जा सकता है। मन को प्रसन्न करने वाली सभी कलाओं तथा सौंदर्यात्मक दृश्यों में गणित के सिद्धांत किस तरह कार्य करते हैं, यह जानकार छात्रों में गणित के प्रति सहज आकर्षण पैदा हो सकता है। गणित एक नीरस विषय नहीं है, इसमें मनोरंजन और खेलकूद का भी स्थान हैै, विषय के प्रति इस प्रकार की भावना उत्पन्न करने का प्रयत्न किया जाना चाहिए। छात्रों को गणित संबंधी विभिन्न खेलों को खेलने के लिए प्रेरित करना चाहिए तथा गणित संबंधी विभिन्न सहायक साधनों का प्रयोग करके गणित को रोचक बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। 

शिक्षक का गणित संबंधी विभिन्न बुझारतों, पहेलियों तथा संख्या संबंधी खेलों का ज्ञान गणित के अध्ययन के प्रति छात्रों की रुचि बनाने में बहुत सहायता कर सकता है। स्कूल में ‘गणित परिषद' की स्थापना भी इस दिशा में बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकती है। परिषद द्वारा गणित संबंधी अनेक योजनाओं पर कार्य करने तथा गणित से संबंधित अनेक भाषण, विचार-गोष्ठियों तथा कार्यशालाओं का आयोजन किया जा सकता है। इनके माध्यम से छात्रों को अपने विचार स्वतंत्र रूप से प्रकट करने तथा कार्य करने का अवसर मिलता है तथा गणित के अध्ययन के प्रति उनकी रुचि बढ़ती है।

योजना विधि तथा प्रयोगशाला विधि को गणित की पढ़ाई में महत्वपूर्ण स्थान दिया जाना चाहिए। जो कुछ भी पढ़ाया जाए उसके बारे में बच्चों का दृष्टिïकोण पूर्ण व्यावहारिक बन सके, इसके लिए उचित सहायक साधनों का प्रयोग करके क्रियात्मक कार्य के लिए सभी अवसर बच्चों को दिए जाने चाहिए। सैद्धांतिक रूप से कोई बात बच्चों को तभी बताई जानी चाहिए जब वे उसके क्रियात्मक पक्ष से अवगत हो लें। इस तरह से छात्रों का वास्तिवक क्रियात्मक सहयोग लेकर गणित की शुष्क पढ़ाई आसानी से सरसता में परिणित हो सकती है(विक्रम कुंडू प्रबोध,दैनिक ट्रिब्यून,7.12.11)।

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12 दिसंबर 2011

दिल्ली में सरकारी स्कूलों की कमी

दिल्ली में नर्सरी दाखिले की प्रक्रिया शुरू होने वाली है लेकिन सरकारी स्कूलों में सीटों की कमी होना निश्चित ही चिंताजनक है। इन स्कूलों में सीटों की कमी के कारण जहां कई बच्चे दाखिला हासिल नहीं कर पाएंगे, वहीं कई अन्य के अभिभावकों को मजबूरीवश महंगे निजी स्कूलों का रुख करना पड़ेगा। विगत दस वर्षो में राजधानी में नर्सरी दाखिला बड़ी चुनौती बन गई है। हर साल बच्चों की संख्या में 30 से 40 हजार की बढ़ोतरी हो जाती है लेकिन सरकारी स्कूलों में नर्सरी के लिए मात्र 17 हजार सीटें ही हैं। सरकारी स्कूलों में सीटें कम होने का परिणाम यह है कि वर्ष 2009 में निजी स्कूलों की करीब दो लाख सीटों के लिए साढ़े चार लाख बच्चों ने आवेदन किया था, जबकि 2010 में इतनी सीटों के लिए पांच लाख आवेदन आए। पिछले एक दशक में निजी स्कूलों की संख्या में सौ फीसदी इजाफा हुआ है लेकिन सरकारी स्कूलों की संख्या दस फीसदी भी नहीं बढ़ी। मौजूदा समय में दिल्ली में सरकारी स्कूलों की संख्या 637 है, जिनमें सुबह और शाम की पालियों को मिलाकर कुल 925 स्कूल चलते हैं। पाली बढ़ाकर कक्षाओं की संख्या तो बढ़ा दी गई, लेकिन इमारतें सिर्फ 637 ही हैं। विगत दस वर्षो में दिल्ली में सिर्फ 50 सरकारी स्कूल बने हैं, जबकि वर्ष 2000 और 2001 में राजधानी में छोटे-बड़े मान्यता प्राप्त निजी स्कूलों की संख्या हजार से ग्यारह सौ थी जो अब बढ़कर 1950 हो गई है। राजधानी में गैर मान्यता प्राप्त स्कूलों की संख्या करीब 1591 है। सरकारी स्कूलों में दो पालियां शुरू करने से कुछ राहत अवश्य मिली है, लेकिन इससे समस्या पूरी तरह हल नहीं हो सकी है। दिल्ली में हर साल नर्सरी दाखिला लेने वाले बच्चों की संख्या को देखते हुए सरकार व दिल्ली नगर निगम को विशेष योजना बनाकर प्राथमिकता के आधार पर नए स्कूल बनाने की दिशा में कार्य करना चाहिए ताकि अभिभावकों को अपने बच्चों के दाखिले के लिए निजी स्कूलों की ओर न देखना पड़े। स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान देने के साथ ही बच्चों को शिक्षा के लिए उचित माहौल मुहैया कराना भी आवश्यक है। इसके मद्देनजर सरकारी स्कूलों में बिजली, पानी, शौचालय इत्यादि की भी उचित व्यवस्था की जानी चाहिए। स्थिति यह होनी चाहिए कि दिल्लीवासी निजी स्कूलों को विकल्प के तौर पर लें, उनमें बच्चों का दाखिला कराना उनकी मजबूरी न बने(संपादकीय,दैनिक जागरण,दिल्ली,12.12.11)।

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07 दिसंबर 2011

व्यवस्था के कारण छात्र बनते हैं तोतारटंत

आज हमारे देश में दोहरी शिक्षा प्रणाली है। एक ग्रामीण तथा गरीब बच्चों को सरकारी विद्यालयों में मिलने वाली काम चलाऊ शिक्षा और दूसरी जो बड़े शहरों में महँगे विद्यालयों में मिलने वाली ताम-झाम से परिपूर्ण दिखावटी शिक्षा। इतना ही नहीं, आज शिक्षा अधिकार नहीं बल्कि कुछ लोगों का विशेषाधिकार बन गई है। ऐसे में सिर्फ कोचिंग क्लासेज की आलोचना करने से क्या होगा?

अमेरिकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जनरल वेसले क्लार्क ने कहा था कि अगर किसी इच्छुक व्यक्ति के पास आईआईटी की डिग्री हो तो उसे तुरंत अमेरिकी नागरिकता मिल जाएगी। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) के छात्रों का अंतरराष्ट्रीय बाजार में महत्व का अंदाजा इस अमेरिकी नेता के इस बयान से लगाया जा सकता है। भारत के युवा वर्ग में अमेरिकी वीसा की चाहत एक सपने की तरह जेहन में मचलता रही है। आईआईटी की डिग्री उन्हें यह अवसर आसानी से उपलब्ध कराती है।

माइक्रोसॉफ्ट के मुखिया बिल गेट्स ने एक साक्षात्कार में पूछे गए प्रश्नों के जवाब देते हुए कहा था कि आईआईटियन बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर उनकी पहली पसंद है लेकिन कुछ दिन पहले जब न्यूयार्क में आईआईटी के भूतपूर्व छात्रों द्वारा आयोजित पीएएन आईआईटी कार्यक्रम में इंफोसिस के संस्थापक एनआर नारायणमूर्ति ने यह कहकर कि आजकल आईआईटी के ८० फीसद छात्र स्तरहीन होते हैं, देश के सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा किया है।

नारायणमूर्ति के अनुसार स्तरहीनता का कारण कोचिंग है और छात्र कोचिंग द्वारा रटंत विद्या के दम पर ही आईआईटी का सफर तय कर रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि नारायणमूर्ति की बात में कुछ हद तक सच्चाई है लेकिन उन्होंने जो वजह बताई है वह वजह इतनी आसान नहीं है कि कोचिंग क्लासेज पर रटंत विद्या के बढ़ावा देने का आरोप लगाकर पल्ला झाड़ लिया जाए। अगर सच में इस प्रश्न का जवाब पाने का प्रयास किया जाए तो देश की शिक्षा व्यवस्था की कई खामियाँ सामने उभर कर आएँगी।

नारायणमूर्ति सिर्फ २० फीसद छात्रों को स्तरीय बताते हैं तो उन्हें भी जरूर मालूम होना चाहिए कि वे २० फीसद छात्र भी किसी न किसी कोचिंग का सहारा लेते ही हैं। आईआईटी की संयुक्त प्रवेश परीक्षा को पूरी दुनिया के कठिनतम परीक्षाओं में से एक समझा जाता है। लगभग पाँच लाख परीक्षार्थी आईआईटी प्रवेश परीक्षा में अपनी किस्मत आजमाते हैं और सफलता का दर मात्र दो फीसद से भी कम है। अमेरिका जैसे संपन्ना देशों में भी आईआईटी में दाखिले को हॉर्वर्ड, एमआईटी और येल जैसे विश्वविद्यालय के दाखिले से कठिन समझा जाता है और अब स्थिति यह हो गई है कि इतनी प्रतिष्ठित परीक्षा में सफल होने के लिए रट्टा मारने की जरूरत पड़ रही है और कोचिंग संस्थान चाँदी कूट रहे हैं।

आखिर आईआईटी क्यों ऐसे प्रश्नों को पूछने में अक्षम हो रहा है जो रटंत विद्या पर आधारित नहीं हों? क्या प्रश्न बनाने वाली टीम सच में इतनी कमजोर हो चुकी है कि छात्रों को बजाय सृजनात्मक क्षमता की जाँच किए रटंत विद्या पर आधारित प्रश्नों को पूछ कर छात्रों को कोचिंग पर लाखों रुपए खर्च करने पर मजबूर कर रही है। इस तरह के सवालों को पूछकर आईआईटी क्या उन गरीब बच्चों के साथ एक भद्दा मजाक नहीं कर रही है जिनके पास कोचिंग पर खर्च करने के लिए पैसे नहीं हैं? जाहिर है कि प्रश्न बनाने वाले प्रश्न बनाते समय इस बात की कोई परवाह नहीं करते कि उनके प्रश्नों को हल करने के लिए तोता रटंत होना जरूरी हो जाता है।

आईआईटी के प्रश्नकर्ताओं की टीम आज इतनी लापरवाह हो चुकी है कि पिछले साल हिन्दी में पूछे गए प्रश्न ही अटपटे हो गए थे। यहीं नहीं, इस वर्ष तो १८ अंकों के प्रश्न ही गलत पूछ दिए गए। आनन-फानन में आईआईटी को औसत मार्किंग करनी पड़ी यानी जिसने प्रश्नों का हल नहीं किया वह भी १८ अंक का मालिक बन बैठा। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि आईआईटी में रिजल्ट के समय जो रैंक दिए जाते हैं उसमें एक अंक के अंतराल पर सैकड़ों छात्र खड़े होते हैं। ऐसे में सभी अभ्यर्थियों को एकमुश्त १८ नंबर दे देने का आखिर क्या औचित्य हो सकता है?

आज हमारे देश में दोहरी शिक्षा प्रणाली है। एक ग्रामीण तथा गरीब बच्चों को सरकारी विद्यालयों में मिलने वाली कामचलाऊ शिक्षा और दूसरी जो बड़े शहरों में महँगे विद्यालयों में मिलने वाली तामझाम से परिपूर्ण दिखावटी शिक्षा। इतना ही नहीं, आज शिक्षा अधिकार नहीं बल्कि कुछ लोगों का विशेषाधिकार बन गई है। सिर्फ कहने के लिए ही शिक्षा सबके लिए है लेकिन वास्तव में शिक्षा पर धनी वर्ग का वर्चस्व हो गया है। गरीब के लिए तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाना महज एक कल्पना ही है।


अब तो शिक्षा खरीदने की चीज भर बनकर रह गई है। अगर आपके पास पैसे हैं तो अपने बच्चों के लिए शिक्षा को खरीद सकते हैं, वरना मन मसोसने के सिवा आपके पास कोई विकल्प नहीं है। आज बच्चों को स्कूल के स्तर से ही रटवाया जा रहा है। उदाहरण के तौर पर बच्चे जानते हैं कि त्रिभुज का क्षेत्रफल क्या होगा, लेकिन क्यों होगा, यह नहीं जानते हैं। यहाँ तक कि जोड़-घटाव, गुणा तथा भाग की प्रकिया को तो जानते हैं, लेकिन यह प्रक्रिया क्यों अपनाई जाती है और इसका प्रमाण क्या है, यह नहीं जानते हैं। इस तरह रट्टा लगवाने की प्रक्रिया बच्चों के दिमाग में शुरुआत में ही डाल दी जाती है। अब भला उन गरीब छात्रों की छटपटाहट को कौन समझेगा जो बेचारे अपने दम पर कड़ी मेहनत करके प्लस टू तक की पढ़ाई करते हैं लेकिन उन्हें झटका उस वक्त लगता है और कोचिंग नहीं कर पाने के कारण गरीबी का अहसास होता है, जब आईआईटी प्रवेश परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों और प्लस के सिलेबस की गहरी खाई को बगैर कोचिंग के पाट पाने में अक्षम हो जाते हैं। सच कहा जाए तो आईआईटी का सिलेबस ही इस तरह का बनाया गया है कि छात्रों के लिए कोचिंग करना अपरिहार्य बन गया है(आनंद कुमार,नई दुनिया,7.12.11)।

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31 अक्टूबर 2011

कब बहुरेंगे दिन विविद्यालयों के

उच्च शिक्षा को प्राथमिकता देने में हम कितने पीछे हैं यह क्यूएस टाइम्स हायर एजुकेशन रैंकिंग के परिणामों से साफ है। इस रैंकिंग में वि के शीर्ष 200 विविद्यालयों में एक भी भारतीय विविद्यालय या शिक्षण संस्थान नहीं है। रैंकिंग के परिणामों के मुताबिक टॉप 500 की सूची में 218वें नंबर पर आईआईटी-दिल्ली, 225वें स्थान पर आईआईटी-मुंबई और 281वें स्थान पर आईआईटी-मद्रास का नंबर आता है। गौरतलब है कि इन तीनों संस्थानों की रैकिंग पिछले साल क्रमश: 202, 187 और 262 थी। जाहिर है कि हम डाउनफॉल की हालत का सामना कर रहे हैं। यह सूची यह बताने के लिए काफी है कि क्यों नस्ली हमले सहकर भी लोग ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में पढ़ते हैं और क्यों हमारे शिक्षा संस्थानों से कोई वेंकटरमण रामकृष्णन नहीं निकलता। बात यहीं खत्म नहीं होती। एशिया के शीषर्स्थ 200 विविद्यालयों में भारत का स्थान पांचवां है। सूची के करीब आधे विविद्यालय केवल दो देश चीन और दक्षिण कोरिया के हैं। ये दोनों देश इस मोच्रे पर दो दशक पहले भारत जैसे ही थे। साफ है कि उदारीकरण के बाद इन दोनों देशों ने अपनी शिक्षानीति में आमूलचूल बदलाए किए और हम केवल बातें ही बनाते रह गए। पिछले कुछ सालों का परिदृश्य देखें तो हमारे यहां केवल दोयम दज्रे के निजी विविद्यालय खुले हैं। विविद्यालयों की गुणवत्ता को लेकर अकसर यह तर्क सामने आता है कि गुणवत्ता का आधार दूसरे देश का कोई संस्थान नहीं हो सकता। ऐसा तर्क देने वालों का कहना है कि जब हमारे शिक्षण संस्थान देशी छात्रों और यहां की इंडस्ट्री की जरूरतों को पूरा कर रहे हैं तो रैंकिंग देने वाले हमें जहां भी रखें, क्या फर्क पड़ता है। जाहिर है ये तर्क वैीकरण के इस माहौल में बेजा ही कहे जा सकते हैं। आज हमारी अर्थव्यवस्था तमाम संकटों के बावजूद करीब 8 प्रतिशत की विकास दर से आगे बढ़ रही है। इस दर को स्थायी बनाना एक शक्ति केंद्र के रूप में देश को विकसित करना है तो यह ग्लोबल तौर-तरीकों की शिक्षा केंद्रों की स्थापना के बगैर पूरा नहीं हो सकता। बगैर आधुनिक शिक्षण संस्थानों के हम प्रतिभाशाली जनशक्ति हासिल नहीं कर सकते। ऐसा नहीं कि हमारे पास यह जनशक्ति नहीं है लेकिन उसे हमेशा कुछ बेहतर करने के लिए ऑक्सफोर्ड, येल और कैब्रिज आदि विविद्यालयों का रास्ता नापना होता है। आज हमारे शीर्ष केंद्रीय विविद्यालयों में भी डिग्री केंद्रित शिक्षा अर्जन का काम चल रहा है। आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थान भी मेधावी छात्रों के लिए बस अच्छी नौकरी पाने का जरिया बन गए हैं। हमारे यहां जो मुट्ठी भर छात्र रिसर्च कायरे में लगे हैं, वे भी मौका मिलते ही विदेश चले जाते हैं। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय हमारे शिक्षण संस्थानों की बेहतरी के लिए जो कुछ कर रहा है उसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। 11वीं पंचवर्षीय योजना में केंद्र सरकार ने 30 नए केंद्रीय विविद्यालय, आठ नए आईआईटी, सात नए आईआईएम, 37 अन्य तकनीकी संस्थान और जिला स्तर पर 373 नए कॉलेज स्थापित करने के लिए करीब 80,000 करोड़ रुपये का आबंटन किया था। औपचारिक रूप से शुरू की गई इनमें से ज्यादातर संस्थान विस्तरीय नहीं कहे जा सकते और न ही यहां हमारी जमीनी जरूरतों का लेकर कोई शोध ही किया जा रहा है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय कितना ध्यान शोध पर दे रहा वह कुछ ही महीने पहले जारी इस फरमान से स्पष्ट हो जाता है कि जिसमें उसने शैक्षणिक संस्थानों को रिसर्च से जुड़े उपकरणों और रसायन आदि की खरीद की जिम्मेदारी लेने और विदेशों में रिसर्च पेपर पढ़ने के लिए स्पांसरशिप भी खुद ढूंढ़ने को कहा है। मंत्रालय संस्थानों को स्वाबलंबी बनाने के तर्क दे यह भूल रहा है कि टॉप 200 शिक्षण संस्थानों में अधिकांश सरकारी पैसे से चलते हैं। हां, यह जरूर है कि कई देशों में ऐसा ढ़ांचा विकसित किया गया है कि निजी कंपनियां भी बगैर किसी तरह के हस्तक्षेप के शिक्षण संस्थानों को पैसे डोनेट करती हैं। मंत्रालय इस तरह का ढ़ांचा विकसित करने में नहीं बल्कि सरकारी संस्थानों को कमजोर और निजी संस्थानों को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। विदेशी संस्थानों के भारत आने का भी रास्ता खोला जा रहा है लेकिन सवाल है कि ये विदेशी संस्थान या निजी संस्थान रिसर्च जैसे क्षेत्र में क्यों पैसा लगाना चाहेंगी? वे तो सीधे-सीधे लाभ के लिए काम करेंगी और सभी को मालूम है कि रिसर्च जैसे कार्य में पैसा लगाना उनके लिए लाभप्रद सौदा किसी कीमत पर नहीं हो सकता। सरकार की तरफ से शोधपरक कायरें के लिए पैसे की कमी नहीं होनी चाहिए। प्राइवेट सेक्टर से ठीक वैसी ही मदद ली जानी चाहिए जैसे विदेशों में ली जाती है। उन्हें शिक्षण संस्थाओं को गोद लेने को कहा जा सकता है या फिर जो प्राइवेट कंपनी शिक्षण संस्थाओं को आर्थिक मदद प्रदान करे उन्हें टैक्स में राहत दी जा सकती है। दरअसल सरकार के पास उच्च शिक्षा के लिये पैसा लाने के लिए विकल्पों की कमी नहीं है लेकिन सवाल है कि आप चाहते क्या हैं? हमें अगले 20 सालों में कम से कम 50 विस्तरीय संस्थान खड़ा करने के लक्ष्य पर काम करना चाहिए(नीरज कुमार तिवारी,राष्ट्रीय सहारा,दिल्ली,31.10.11)।


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28 अक्टूबर 2011

शिक्षा क्षेत्र में गिरावट, जिम्मेदार कौन?

"शिक्षा मानव को बंधनों से मुक्त करती है और आज के युग में तो यह लोकतांत्रिक चेतना का आधार भी है। जन्म तथा अन्य कारणों से उत्पन्ना जाति एवं वर्गगत विषमताओं को दूर करते हुए मनुष्य को इनसे ऊपर उठाती है।" पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की ये पंक्तियाँ वर्तमान में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। परंतु सवाल तो यह है कि वह शिक्षा कैसी हो? विद्वानों द्वारा वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था पर प्रश्न उठाए जाते रहे हैं। हाल में इंफोसिस से सेवानिवृत्त हुए नारायण मूर्ति ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों की शिक्षा-व्यवस्था पर प्रश्न उठाया जिसने इस मुद्दे को बहस की तरफ गति दी है। आज उच्च शिक्षण संस्थाओं में भी कई तरह की समस्याएँ पैदा हो रही हैं।


भारतीय शिक्षा-व्यवस्था में कई तरह की खामियाँ हैं। कई राज्यों में तो पुराने पड़ चुके पाठ्यक्रमों को चलाया जाता है। इससे हमें आधुनिक समस्याओं से लड़ने की सीख दी जाती है। कोई भी आसानी से समझ सकता है कि आधुनिक समस्या का सामना इन पुराने पाठ्यक्रमों से नहीं होने वाला है। देश के नीति-नियंता इस बात से भलीभाँति अवगत हैं कि शिक्षा का स्तर ऊँचा बनाकर ही हम एक स्वस्थ लोकतांत्रिक देश के रूप में प्रतिष्ठित हो सकते हैं। परंतु ठोस इच्छाशक्ति का अभाव व कुछ राजनीतिक स्वार्थ के वशीभूत इसमें सुधार के प्रति इच्छाओं का अभाव दिखता है। 
शिक्षा-व्यवस्था बेहतर बनाने के लिए कई सरकारी और गैर-सरकारी समितियों का गठन हुआ लेकिन कोई बेहतर परिणाम नहीं निकला। इसके लिए सरकार को ही दोष नहीं दिया जा सकता, बहुत हद तक आम नागरिक भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। हम अपने बच्चों को जैसी प्रारंभिक शिक्षा देते हैं, उसके भविष्य का निर्धारण भी उसी से होता है। जिस प्रकार की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की हम आशा करते हैं, क्या उसी प्रकार की गुणवत्तापूर्ण प्रारंभिक शिक्षा हम अपने बच्चों को देते हैं? हमें सोचना चाहिए। साथ ही सरकार को अपने राजनीतिक स्वार्थों से कि ऐसी चूक हमसे क्यों होती है। इसके लिए हमें अपने निहित स्वार्थों से ऊपर उठकर देश हित के मुद्दे को प्राथमिकता देनी होगी, तभी हम वैश्विक स्तर पर प्रतियोगिता का सामना कर पाएँगे। बिहार का उदाहरण यहाँ लिया जा सकता है जिसकी कई योजनाओं ने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। अभी बिहार सरकार की एक योजना "समझें-सीखें" अस्तित्व में आई है, जिसमें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को प्राथमिकता दी गई है। 

यह एक अनुकरणीय पहल है जिसका स्वागत किया जाना चहिए। शिक्षा पर हम जितना खर्च कर रहे हैं यदि उसकी गुणवत्ता पर भी उतना ही ध्यान दिया जाए तो हम अपने उद्देश्य में सफल हो सकते हैं और भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। अतः शिक्षा को सामाजिक उद्देश्य से जोड़ना जरूरी है(गौरव कुमार,नई दुनिया,दिल्ली,26.10.11)।

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22 अक्टूबर 2011

आईआईटी को लेकर रोना-गाना

तकनीकी शिक्षा की गुणवत्ता और आईआईटी को लेकर एक बार फिर बहस शुरू हो चुकी है। पिछले दिनों इनफोसिस के मानद चेयरमैन एन आर नारायण मूर्ति ने न्यू यॉर्क में आईआईटी सम्मेलन में सैकड़ों पूर्व आईआईटी छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि हाल के वर्षों में आईआईटी में प्रवेश पाने वाले छात्रों की गुणवत्ता में काफी गिरावट आई है। इसके लिए उन्होंने कोचिंग संस्थानों को जिम्मेदार ठहराया। इससे पहले उद्योग एवं व्यापार जगत की प्रमुख संस्था फिक्की ने भी उच्च शिक्षा एवं तकनीकी शिक्षा के गिरते स्तर पर चिंता जताते हुए मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल को पत्र लिखा था। इसमें कहा गया था कि उद्योग जगत के 65 फीसद हिस्से को कुशल स्नातक नहीं मिल रहे हैं। इसके भी पहले वरिष्ठ शिक्षाविद यशपाल और जयराम रमेश ने आईआईटी पर तल्ख टिप्पणियां की थीं।

कॉर्पोरेट टेक्नॉलजी
गौर से देखें तो ये सारी चिंताएं पूरी तरह कॉर्पोरेट जगत से ही जुड़ी हुई हैं। तकनीकी शिक्षा के बुनियादी और व्यावहारिक पक्ष से किसी का कोई लेना-देना नहीं है। तभी वे कह रहे है कि हमें आईआईटी स्नातकों को फिर से काम की ट्रेनिंग देनी पड़ रही है । उनका सीधा सा मतलब है कि आईआईटी ऐसे स्नातक पैदा करे जिनका कॉर्पोरेट के लोग पहले दिन से ही भरपूर दोहन कर सकें। बुनियादी तकनीकी और विज्ञान से आज देश में कोई नहीं जुड़ना चाहता। आईआईटी के अधिकांश छात्र बी.टेक. करने के बाद अमेरिका में बसना चाहते हैं। उनकी एक बड़ी तादाद प्रशासनिक सेवा में कार्य करना पसंद करती है। कभी दुनिया भर में होने वाले शोध कार्य में भारत का योगदान नौ फीसद था। आज यह घटकर महज 2.3 फीसद रह गया है।

वर्ल्ड क्लास मिथ
देश में इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक को लें तो यह तकरीबन पूरी की पूरी आयातित है। इनमें 50 फीसद तो बिना किसी बदलाव के ज्यों की त्यों और 45 फीसद थोड़ा-बहुत हेर-फेर के साथ के साथ इस्तेमाल होती है। इस तरह विकसित तकनीक के लिए हम पूरी तरह आयात पर निर्भर हैं। कहा जा रहा है कि देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है लेकिन ये प्रतिभाएं क्या केवल विदेशों में नौकरी या मजदूरी करने वाली हैं? शिक्षा व शोध के अभाव को भूलकर कई बार कहा जाता है कि आईआईएम और आईआईटी में काफी तनख्वाह दिलवाने वाली पढ़ाई होती है। दूसरे लोग भी यह देखते हैं कि किस संस्थान के छात्रों को कितने पैसे की नौकरी ऑफर हुई। यह पूरी सोच ही गलत है और इससे बाहर निकलने की जरूरत है। आईआईटीज में अच्छे छात्र आते हैं, क्योंकि वे कड़ी प्रतिस्पर्द्धा से निकलकर आते हैं। उन्हें खुली जगह मिलनी चाहिए, लेकिन उन्हें एक संकीर्ण दायरे में डालने की कोशिश होती है।


विज्ञान में उच्च स्तरीय शोध के लिए जो भारतीय संस्थान जाने जाते हैं, उनमें प्रमुख रूप से इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज (आईआईएससी), टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (टीआईएफआर) तथा भाभा अटॉमिक रिसर्च सेंटर (बीएआरसी) जैसे केंद्रों का उल्लेख किया जा सकता है। आईआईटी का नाम इसमें नहीं आता। आईआईएससी, टीआईएफआर और बीएआरसी में शोध करनेवाले विद्यार्थी आईआईटी डिग्रीधारक नहीं बल्कि उन तमाम विश्वविद्यालयों से निकले होते हैं जो अभावों से जूझते हुए भी शोध को आगे ले जानेवाले हमारे सबसे बड़े स्त्रोत हैं। दुखद है कि इनकी गुणवत्ता के विकास के लिए हमने कोई राष्ट्रीय नीति नहीं बनाई है। 

आर्थिक उदारीकरण के बाद जब से उच्च शिक्षा का व्यावसायीकरण होने लगा है, कॉर्पोरेट जगत के लोग ही तय करते हैं कि अमुक विश्वविद्यालय या शोध संस्थान वर्ल्ड क्लास है या नहीं। उन्होंने ही तय किया है कि आईआईटी का विद्यार्थी वर्ल्ड क्लास है। उनके अनुसार आईआईटी का महत्व इसलिए है कि वह अमेरिका और दूसरे बड़े औद्योगिक राष्ट्रों के लिए आवश्यक वर्कफोर्स मुहैया कराता है। बुनियादी विज्ञान विषयों की उपेक्षा कर सॉफ्टवेयर प्रशिक्षण को महत्व भी इसीलिए दिया जा रहा है। जबकि अमेरिका बुनियादी विज्ञान विषयों की प्रगति का पूरा ध्यान रखता है। उसकी नीति है कि तकनीकी मजदूर तो वह भारत से ले जाए पर विज्ञान और टेक्नॉलजी के ज्ञान पर नियंत्रण स्वयं रखे। चीन में भी शिक्षा का व्यवसायीकरण हुआ है, पर बुनियादी विज्ञान और टेक्नॉलजी की प्रगति का उसने पूरा ध्यान रखा है। भारत को चीन से सीखना चाहिए, क्योंकि वर्ल्ड क्लास बनने के लिए बुनियादी विज्ञान का विकास जरूरी है। 

कॉर्पोरेट व्यवस्था के समर्थक विशेषज्ञ उसी मॉडल को बनाने में जुटे हैं जिससे कॉर्पोरेट को लाभ होता हो। यह निराशाजनक ही है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हमारी सारी अपेक्षाएं मात्र आईआईटी और कुछ गिने-चुने विश्वविद्यालयों से ही होती है। दूसरे देशों में ऐसा नहीं है। इसी प्रकार देश भर के छात्रों का दबाव दिल्ली के कुछ गिने-चुने महाविद्यालयों पर होता है। देश में इस समय 25 हजार से भी अधिक महाविद्यालयों के विकास के लिए कोई राष्ट्रीय योजना नहीं है।उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाकर हमें संपूर्ण विकास की ओर ध्यान देना होगा। 

अपने हों मापदंड 
कॉर्पोरेट निर्धारित वर्ल्ड क्लास मापदंडों के पीछे न भागकर हमें राष्ट्र की समस्याओं के अनुकूल मापदंड बनाने होंगे। नई तकनीक के विकास में जो मौलिक काम हो रहे हैं, उन्हें बढ़ावा देना होगा। देश में बड़ी संख्या में छोटे-छोटे लेकिन उपयोगी आविष्कार हुए हैं। ऐसे आविष्कारों के बारे में अकसर छपता रहता है लेकिन उस ओर सरकार कम ध्यान देती है। इससे नई तकनीक के विकास को प्रोत्साहन नहीं मिल पाता है। तकनीकी शिक्षा के समग्र विकास और पूरे उच्च शिक्षा तंत्र को मजबूत बनाने के लिए सरकार को पहल करनी पड़ेगी। साथ में इसके लिए एक राष्ट्रीय नीति भी होनी चाहिए, जिसे पूरे देश में कड़ाई से लागू करके ही हम वास्तविक अर्थों में तकनीकी शिक्षा को एक नई दिशा दे पाएंगे(शशांक द्विवेदी,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,21.10.11)।

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19 अक्टूबर 2011

पढऩे के लिए दबाव नहीं, प्रेरित करें

बच्चों को न पढऩे की आदत माता-पिता के लिए तनाव का कारण होती है। उनमें पढऩे का शौक पैदा हो इसके लिए जरूरी है कि बच्चों के मनोविज्ञान को समझा जाए। आमतौर पर बच्चों को यदि पढऩे की ओर प्रेरित किया जाये तो उनमें धीरे-धीरे पढऩे की आदत विकसित होती है। इसलिए पढऩे की आदत बनाने के लिए माता-पिता को इसके लिए युद्धस्तर पर प्रयास करना होता है। एक बार बच्चा यदि पढ़ाई में रुचि लेने लगता है तो फिर उसे पढ़ाई आसान लगने लगती है, उसमें निरंतर अच्छा परफॉर्म करने की भावना शीघ्र से तीव्रतम हो जाती है।

बच्चों को स्कूल भेजने के साथ ही माता-पिता समझ लेते हैं कि अब बच्चे को शिक्षित करने की जिम्मेदारी स्कूल की है। हकीकत में ऐसा नहीं है। माता-पिता दोनों को ही बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि पैदा करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने पड़ते हैं। इसके लिए घर का वातावरण ऐसा बनाया जाना चाहिए जिसमें बच्चा पढऩे की ओर प्रेरित हो। बच्चों को छोटेपन से ही इतर कहानियों की किताबें पत्र-पत्रिकाओं आदि को पढऩे के लिए प्रेरित करना चाहिए। जिस दौरान बच्चा इन किताबों को देख उस दौरान उनके इर्द-गिर्द रहना चाहिए और उनकी रुचि को समझना चाहिए। उन्हें पढऩे के लिए प्रोत्साहित करें। याद रखें बच्चा पढ़ाई से जुड़ी चीजें पढ़े या पढ़ाई से इतर चीजें पढ़े। बच्चे को पढऩे के लिए किसी तरह का कोई लालच न दें। बच्चे की शिक्षा से जुड़ी तमाम समस्याओं पर पूरा ध्यान दें। स्कूल में होने वाली पीटीएम में जरूर जाएं और उसकी क्लास टीचर व सब्जेक्ट टीचर से उसकी परफॉर्मेंस के विषय में बात करें। पीटीएम में बच्चे को जरूर साथ ले जाएं और बच्चे से उसकी समस्याओं को लेकर टीचर से बात करें। बच्चे की होमवर्क डायरी प्रतिदिन देखें। उसको दिये जाने वाले होमवर्क पर पूरा ध्यान दें। क्या बच्चा स्कूल से होमवर्क नोट करके लाता है? यदि लाता है तो क्या वह अपना होमवर्क समय पर पूरा करता है? उसकी कॉपियों की समय-समय पर जांच करें। कहीं वह अपने कामों को अधूरा तो नहीं छोड़ता? स्कूल में बच्चे के रूटीन के बारे में जानकारी हासिल करें। बच्चा जब स्कूल से लौटकर आये तो उसकी पढ़ाई के विषय में उससे बातचीत करें उससे उसके अनुभव बांटे।

बच्चे को उसकी उम्र और रुचि के अनुरूप उसे पढ़ाई से इतर सामग्री पढऩे दें। यदि उसे किसी खास खेल में रुचि है तो अखबार में उसे खेल संबंधित समाचार उसे पढ़कर सुनाएं। बच्चों की उनकी पसंद की कॉमिक्स, पंचतंत्र की कहानियां और ज्ञानवर्धक पुस्तकें लाकर दें। इन पुस्तकों को सिर्फ ला कर देने भर से ही माता-पिता की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। उनके साथ बैठकर उन पुस्तकों की रीडिंग करें। बच्चे कहानी पढ़ें के लिए प्रेरित करने के लिए स्वयं भी कहानी पढ़ें और उसके साथ किसी कहानी के विषय में बातचीत करें। इससे उसमें जिज्ञासा पैदा होगी और वह स्वयं भी नयी-नयी पुस्तकों को पढऩे के लिए प्रयासरत होगा।

मनोविदों का मानना है कि माता-पिता जब बच्चों पर बार-बार पढऩे के दबाव डालते हैं तो बच्चों पर इस दबाव का कोई असर नहीं होता। वह धीरे-धीरे अनसुना कर देते हैं। बच्चों को पढऩे की ओर प्रेरित करने के लिए जरूरी है कि उसे बार-बार पढऩे के लिए लेक्चर न दें, उसे रिलैक्स रखें। बच्चा जिस समय अपने दोस्तों के साथ खेल रहा होता है, उसके खलने को लेकर उसको खरी-खोटी न सुनायें। ऐसा करने से बच्चे में हीनभावना आने लगती है और वह धीरे-धीरे कुंठा का शिकार हो जाता है। बच्चों के प्रति अपना रवैया हमेशा सकारात्मक रखें। बच्चों के दोस्तों के साथ उसे अपनी किताबें शेयर करने के लिए प्रेरित करें(नीलम अरोड़ा,दैनिक ट्रिब्यून,12.10.11)।

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अंकों का ग्रेड बुद्धिमत्ता का पैमाना नहीं

माउंट एवरेस्ट फतह करने की दूसरी नाकाम कोशिश के दौरान एडमंड हिलेरी ने कहा था, ‘मैं दोबारा आऊंगा और जीतूंगा। मैं इसलिए जीतूंगा क्योंकि तुम एक पर्वत हो। तुम बढ़ नहीं सकते लेकिन मैं एक व्यक्ति हूं, मैं निरंतर बढ़ सकता हूं।’
यह जरूरी नहीं है कि हर व्यक्ति किसी काम को बेहतर ढंग से शुरू करे और उसे उतने ही अच्छे ढंग से समाप्त करे। एक माता-पिता होने के नाते आप इस वक्तव्य को गंभीरता से लें, हो सकता है कि इससे आपका बच्चा पूरी तरह से बदल जाये। आप जिस तरह से अपने बच्चों की परवरिश कर रहे हैं हो सकता है कि वह तरीका सही न हो। हो सकता है इससे आपको एक नयी दिशा का ज्ञान हो। क्या ऐसा है कि आप अपने बच्चों के हर माह होने वाले टेस्ट में उसकी परफोर्मेंस को बहुज ज्यादा महत्व देते हैं? वह परीक्षा में कितने अंक हासिल करता है? उसे कौन-सा ग्रेड मिलता है? आप इसे लेकर अति सशंकित रहते हैं? इसकी बजाय आप अपने बच्चों को भविष्य के लिए तैयार करें। इस संदेश को याद रखें कि बच्चे जैसे बड़े होते हैं उनकी कक्षा बढ़ती है, उनका स्तर बढ़ता है। इस सबके साथ उनका पाठ्यक्रम भी कठिन से कठिनतर होता रहता है। दूसरे अभिभावकों की तरह आप भी बच्चों के ग्रेड और उनके अंकों के आधार पर बच्चों का भविष्य निर्धारित करने का प्रयास करते हैं। हकीकत यह है कि बच्चों का भविष्य उसकी मन:स्थिति के ऊपर निर्भर करता है। बच्चों की मन:स्थिति को विकसित करने, उसे सही दिशा देने के लिए आप एक सशक्त भूमिका का निर्वाह कर सकते हैं।
स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के कैरोल वेक का कहना है कि जरूरी नहीं है जो बच्चा परीक्षाओं में बेहतर अंक हासिल करे उसका मानसिक विकास भी उसी के अनुरूप हो या कम अंक हासिल करने वाला बच्चा जीवन में असफल रहेगा। क्योंकि मानसिक विकास कोई स्थिर चीज नहीं है। यह लगातार विकसित होती है। इसलिए दुनिया के तमाम महान लोग बचपन से कम बुद्धि का प्रदर्शन करने के बावजूद बाद के जीवन में इतिहास रचने में सफल रहे। अल्बर्ट आइंस्टाइन, चाल्र्स डार्विन, लियो टॉलस्टॉय, महात्मा गांधी ये तमाम ऐसी हस्तियां हैं जिन्हें पूरी दुनिया में प्रसिद्धि मिली। ये सभी बचपन में प्रखर छात्रों में से नहीं थे। लेकिन बाद में इन्होंने न सिर्फ अपनी बुद्धिमत्ता बल्कि कल्पनाशीलता का भी लोहा मनवाया और दुनिया की सर्वकालीन महान व्यक्तित्वों की सूची का हिस्सा बनें।
सवाल है निरंतर विकसित होने वाली मन:स्थिति को कैसे हासिल करें। मान लीजिए हममें कोई गुण, योग्यता, क्षमता, बुद्धि, कौशल नहीं है तो हम ये सभी गुण व कौशल निरंतर अभ्यास के जरिये हासिल कर सकते हैं। अंग्रेजी की एक प्रसिद्ध कहावत है, ‘मैन कैन डू व्हॉट मैन कैन डू’ यानी आदमी वह सब कर सकता है जो कोई भी आदमी कर सकता है। कठिन परिश्रम और लगन ही हमें इन तमाम योग्यताओं को हासिल करने का रास्ता दिखाती है। संबंधित अध्ययन इस बात की ओर इशारा करता है कि जो बच्चे अपनी योग्यता और प्रखरता के चलते दूसरों की तारीफ का विषय बनते हैं, उनकी योग्यता उन बच्चों से ज्यादा होती है जो बच्चे उनकी तुलना में कम स्मार्ट होते हैं।
जीवन की राहों में आने वाली समस्याएं बच्चों द्वारा की जाने वाली गलतियां, कम अंक हासिल करना ये सब बातें बच्चों के जीवन का एक हिस्सा होती हैं। इन्हें बच्चों की असफलता से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। इसका यह भी मतलब नहीं है कि आप उन्हें लगातार आगे बढऩे की ओर प्रेरित न करें। उनकी जीवन दृष्टि को एक नयी दिशा देने का प्रयास करें। उन्हें अपनी चीजों को बेहतर ढंग से करने और जीवन के अन्य क्षेत्रों में बेहतर करने के लिए प्रेरित करें।
बच्चों को अपने मस्तिष्क को निरंतर विकसित करने की ओर प्रेरित करें उनके द्वारा की जाने वाली अच्छी बातों की तारीफ करें। उनके भीतर की जिज्ञासा का समाधान करें। उनके मस्तिष्क में उठने वाले हर सवाल का जवाब दें। उन्हें समझाएं कि जीवन में की जाने वाली हर गतिविधि प्रयोगात्मक होगी। उन्हें जीवन की चुनौतियों से जूझने के लिए स्वयं प्रयोग करने दें। वह अपने अनुभवों से ज्यादा जल्दी सीखते हैं। माता-पिता होने के नाते बच्चों की असफलताओं को सफलताओं में बदलने का प्रयास करें।
इस बात को हमेशा याद रखें कि परीक्षा में सिर्फ अच्छे अंक लाना ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि इससे सीखने का महत्व ज्यादा है। याद रखें हर बच्चा अलग-अलग ढंग से प्रेरित होता है। उसके भीतर ऊर्जा का संचरण भी अलग प्रकार से होता है। कुछ बच्चे स्कूल में बेहतर ढंग से परफॉर्म करते हैं। कुछ बच्चे स्कूली शिक्षा के बाद अच्छे ढंग से अपने को बना पाते हैं। कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं जो करिअर बनाने के बाद बेहतर तरीके से परफॉर्म करते हैं। याद रखें विकसित मन:स्थिति इस तथ्य पर आधारित होती है कि आपको योग्यता, शक्ति और क्षमता केवल प्रयासों और प्रेरणा से ही अच्छी बन सकती है। इस धुन में लगातार लगे रहना और अपने को इसी का दास बना लेना विकसित मन:स्थिति का हॉलमार्क बन जाता है। अल्बर्ट आइंस्टाइन ने कहा था, ‘केवल मैं स्मार्ट हूं ऐसा नहीं है। मेरी स्मार्टनेस सिर्फ और सिर्फ यही है कि मैं किसी भी समस्या को लगातार सुलझाने में लगा रहता हूं।’(नीलम अरोड़ा,दैनिक ट्रिब्यून,12.10.11)

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05 सितंबर 2011

शिक्षक और शिक्षा

ऊर्जा शिक्षक और शिक्षा युग-निर्माता होने के कारण योग्य अध्यापक राष्ट्र ऋषि हैं। शिक्षा सबसे बड़ी पूंजी है। शिक्षक संस्कार के अध्याय से संस्कृति बनाते हैं। शिक्षा चरित्र निर्माण का मूल आधार है। यह जीवन को सफल और सुंदर बनाती है। इसका उद्देश्य मात्र साक्षरता नहीं, बल्कि सद्गुणों को सीखना है। लोक मंगल की भावना करने वाला संस्कार जब दक्षता की सीमा तक उद्बुद्ध होता है तो वह विद्या की कोटि में आता है। शिक्षा साधन है, विद्या साध्य और साक्षरता उपकरण। शिक्षा संस्कृति बनाती है तो विद्या विनयाधान करती है। अपने जीवन में सर्वप्रथम सदाचरण उतारकर शिक्षा देने वाले ही सच्चे शिक्षक हैं। नैतिकता शिक्षा का अंग है। शिक्षा जीवन की दृष्टि है। यह जीवन जीने की कला सिखाती है। योग्यता, प्रतिभा को चमकाने के लिए शिक्षा के अलावा दूसरा कोई माध्यम नहीं है। भेदभाव दूर करके यह दूसरों के लिए उदाहरण बनाती है। अर्थ और अधिकार के लिए बढ़ती भूख शिक्षा को खोखला करती है। योग्य शिक्षकों के अभाव में शिक्षा अपूर्ण रहती है। पंचतंत्र में कहा गया है जहां अपूज्यों की पूजा होती है और पूज्यों का अपमान होता है वहां दुर्भिक्ष, भय और मरण ये तीनों होते हैं। अध्यापक शिक्षा के आधारभूत सिद्धांतों के संरक्षण और विकास में माली का काम करते हैं। विवेकानंद ने कहा है-शिक्षा की अवहेलना करना महान राष्ट्रीय पाप है और यही हमारे अध:पतन का कारण भी है। महामना मदनमोहन मालवीय ने उद्बोधन दिया था-किसी को इस बात का दु:ख नहीं होना चाहिए कि मैं अध्यापकों के लिए बहुत मांग रहा हूं। प्राय: सभी सभ्य देशों में देश के राष्ट्रीय उत्थान में अध्यापक का स्थान श्रेष्ठ माना जाता है। इसीलिए विश्वविख्यात वैज्ञानिक पद्मश्री डॉ. लाल सिंह जैसे शिक्षाविद् काशी विवि के कुलपति बनाए गए। अधिकतर महापुरुष पहले शिक्षक ही रहे। विनोबाजी, आचार्य नरेंद्र देव, नानाजी, राधाकृष्णन, डॉ. कलाम, शंकरदयाल शर्मा ने शिक्षा और शिक्षकों के लिए जो आदर्श मूल्य स्थापित किए वे सभी के लिए प्रेरणाश्चोत हैं( डॉ. हरिप्रसाद दुबे,दैनिक जागरण,5.9.11)

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शिक्षक दिवस विशेषःशिक्षकों को दोष देना बेमानी

तारीफों की तरह आलोचनाओं का भी सरलीकरण होता है। अब इसे ही लें। आप किसी से भी बात करिए, चाहे वह संदर्भ तक से वाकिफ न हो, लेकिन अगर शिक्षा, शिक्षकों और नई पीढ़ी पर बात होने लगे तो वह छूटते ही कहेगा कि अब अध्यापकों में भला वह जज्बा कहां है, जो पहले हुआ करता था? पहले तो अध्यापक पीढ़ी गढ़ा करते थे। अब तो तनख्वाह के लिए ड्यूटी की खानापूर्ति भर करते हैं। मगर यह सही नहीं है। दरअसल, हम जरूरतें तो वर्तमान की देखते हैं, लेकिन जब बात आदर्शो की होती है तो हम अतीत की तरफ देखना पसंद करते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि शिक्षकों के त्याग, बलिदान और अपने विद्यार्थियों के लिए कुछ भी कर जाने, किसी भी हद तक गुजर जाने का समृद्ध इतिहास है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हर शिक्षक अपने दौर की जरूरतों को भी ध्यान में रखता है। आज एक तरफ तो हम अपने शिक्षकों पर यह तोहमत मढ़ते हैं कि अब वह सर्वपल्ली राधाकृष्णन और रवींद्र नाथ टैगोर जैसे शिक्षक नहीं हैं, जो अपने छात्रों को जीवनमूल्य दें। दूसरी तरफ हम यह भी उम्मीद करते हैं कि हमारे बच्चे ऐसे स्कूलों में पढ़ें, जहां आधुनिक और प्रोफेशनल पढ़ाई होती हो ताकि पढ़ाई पूरी करते ही हमारे बच्चों को आकर्षक पे स्केल मिले। मगर क्या आप जानते हैं कि देश में किन स्कूलों की सबसे ज्यादा मांग है? कौन-से ऐसे व्यावसायिक शैक्षिक संस्थान हैं, जहां हर कोई पढ़ना चाहता है? जी, हां! ये वही देश के गिने-चुने व्यावसायिक शैक्षिक संस्थान हैं, जहां का कैम्पस प्लेसमेंट अखबारों की सुर्खियां बनता है। लोग नामी-गिरामी मैनेजमेंट संस्थानों में कई लाख रुपये सालाना देकर बच्चों की पढ़ाई के लिए तैयार रहते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि अभी इनकी पढ़ाई खत्म भी नहीं होगी कि उनके बच्चों को ऐसा प्लेसमेंट मिलेगा, जिसके बारे में उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी। दरअसल, यही विरोधभास है। अब हम अगर मान लें कि अध्यापकों का पहला काम मूल्यों का गढ़ना है तो कोई अच्छा अध्यापक मैनेजमेंट संस्थानों में हो ही नहीं सकता। क्योंकि मैनेजमेंट संस्थानों में जीवनमूल्यों के खिलाफ ही पढ़ाया जाता है, खिलाफ ही सिखाया जाता है। हालांकि खिलाफ का मतलब नकारात्मक नहीं है, लेकिन अतिरिक्त सजगता से अधिकतम मुनाफा कैसे हासिल किया जाए, प्रबंधन संस्थानों की शिक्षा का सार और प्रबंधन की सर्वोच्च कला यही है। अब आप जब मुनाफा की बात करते हैं तो कोई भी मुनाफा किसी न किसी की जेब से ही होता है। जब दुकानदार को सौदा बेचकर खूब मुनाफा मिलता है तो ग्राहक का नुकसान होता है। ग्राहक की परेशानी बढ़ती है। इसी तरह जब प्रबंधन की कला के रूप में इस तरह कमाने की तरकीबें सिखाई जाएं कि जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों की जेबें ढीली कराई जा सकें तो भले ही जेबों को ढीली कराना आपराधिक कृत्य न हो, लेकिन परिणाम में तो यह पूरी सजगता से हासिल किया गया वह लाभ है, जिसमें किसी न किसी को तो परेशानी होनी ही है। अब आप ही बताइए कि प्रबंधन संस्थानों के अध्यापक अपने विद्यार्थियों को मुनाफे की कला सिखाएं या जीवन के मूल्य सिखाएं। जीवन के मूल्य तो कहते हैं कि किसी को ठगो मत, लेकिन प्रबंधन की कला का सारा फोकस यही है कि सामने वाले को पता ही न चले और आप उसे अधिक से अधिक खाली करवा लें। दरअसल, हर दौर के जीवनमूल्यों की अपनी एक खास सीमा होती है। हम जिस दौर के अध्यापकों को आज तक आदर्श के सिंघासन से उतार नहीं पाए, वे आजादी के संघर्ष के दौर के अध्यापक हैं, जिनका एक खास तरह का जीवनमूल्य था। जो बच्चों में कूट-कूटकर देशभक्ति की भावनाएं भरते थे। देश को हर हाल में आजाद कराने की भावनाएं भरते थे। दरअसल, यह उस दौर की जरूरत थी और उस दौर के माहौल का हिस्सा था। आज हम आजाद हैं। किसी देश को कभी भी देशभक्त की भावना ओवरडोज नहीं होती। उसकी हमेशा जरूरत रहती है, लेकिन हम जिस दौर के अध्यापक की मूरत अपने दिलो-दिमाग से आज तक नहीं निकाल पाए, उस दौर में देशभक्ति सिर्फ जीवनमूल्य नहीं, बल्कि जीवन ध्येय भी था, क्योंकि हमारे तमाम बेहतरी के रास्ते का आखिरी सिरा आजादी था। अगर आजादी नहीं हासिल होती तो सारे मूल्य बेकार थे। आज ऐसा नहीं है। आज सारा दबाव आगे बढ़ने का है। ग्लोबल विश्व की चुनौतियों के बीच न सिर्फ अपने वजूद को बरकरार रखना है, बल्कि अपने वजूद को दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण बनाने की चुनौती का यह दौर है। ऐसे में भला अध्यापक वैसे कैसे रह सकते हैं?(लोकमित्र,दैनिक जागरण,5.9.11)

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शिक्षक दिवस विशेषःआदर्श पीढ़ी गढ़ें या प्रोफेशनल

जब हर रिश्ते को बाजार की नजर लग गई है, तब गुरु-शिष्य के रिश्तों पर इसका असर न हो ऐसा कैसे हो सकता है? नए जमाने के नए मूल्यों ने हर रिश्ते पर बनावट, नकलीपन और स्वार्थो की एक ऐसी चादर डाल दी है, जिसमें असली सूरत नजर ही नहीं आती। अब शिक्षा बाजार का हिस्सा है, जबकि भारतीय परंपरा में वह गुरु के अधीन थी, समाज के अधीन थी। बाजार में उतरे शातिर खिलाड़ी पूंजी के शातिर खिलाडि़यों ने जब से शिक्षा के बाजार में अपनी बोलियां लगानी शुरू की हैं, तबसे हालात बदलने शुरू हो गए थे। शिक्षा के हर स्तर के बाजार भारत में सजने लगे थे। इसमें कम से कम चार तरह का भारत तैयार हो रहा था। आम छात्र के लिए बेहद साधारण सरकारी स्कूल थे, जिनमें पढ़कर वह चौथे दर्जे के काम की योग्यताएं गढ़ सकता था। फिर उससे ऊपर के कुछ निजी स्कूल थे, जिनमें वह बाबू बनने की क्षमताएं पा सकता था। फिर अंग्रेजी माध्यमों के मिशनों, शिशु मंदिरों और मझोले व्यापारियों की शिक्षा थी, जो आपको उच्च मध्य वर्ग के करीब ले जा सकती थी। और सबसे ऊपर एक ऐसी शिक्षा थी, जिनमें पढ़ने वालों को शासक वर्ग में होने का गुमान पढ़ते समय ही हो जाता है। इस कुलीन तंत्र की तूती ही आज समाज के सभी क्षेत्रों में बोल रही है। इस पूरे चक्र में कुछ गुदड़ी के लाल भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं, इसमें दो राय नहीं। किंतु हमारी व्यवस्था ने वर्ण व्यवस्था के हिसाब से ही शिक्षा को भी चार खानों में बांट दिया है और चार तरह के भारत बनाने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। जाहिर तौर पर यह हमारी एकता- अखंडता और सामाजिक समरसता के लिए बहुत घातक है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बदहाली हालात यह हैं कि कुल 54 करोड़ का हमारा युवा वर्ग उच्च शिक्षा के लिए तड़प रहा है। उसकी जरूरतों को हम पूरा नहीं कर पा रहे हैं। सरकारी क्षेत्रों की उदासीनता के चलते आज हमारे सरकारी विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय लगभग स्लम में बदल रहे हैं। एक लोक कल्याणकारी सरकार जब सारा कुछ बाजार को सौंपने को आतुर हो तो किया भी क्या जा सकता है। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा का बाजार अब उन व्यापारियों के हवाले है, जिन्हें इससे मोटी कमाई की आस है। जाहिर तौर पर शिक्षा अब सबके लिए सुलभ नहीं रह जाएगी। कम वेतन और सुविधाओं में काम करने वाले शिक्षक आज भी गांवों और सूदूर क्षेत्रों में शिक्षा की अलख जगाए हुए हैं, किंतु यह संख्या निरंतर कम हो रही है। सरकारी प्रोत्साहन के अभाव और भ्रष्टाचार ने हालात बदतर कर दिए हैं। इससे लगता है कि शिक्षा अब हमारी सरकारों की प्राथमिकता का हिस्सा नहीं रही। बढ़ गई है जिम्मेदारी ऐसे कठिन समय में शिक्षक समुदाय की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है, क्योंकि वह ही अपने विद्यार्थियों में मूल्य और संस्कृति प्रवाहित करता है। आज नई पीढ़ी में जो भ्रमित जानकारी या कच्चापन दिखता है, उसका कारण शिक्षक ही हैं। क्योंकि अपने सीमित ज्ञान, कमजोर समझ और पक्षपातपूर्ण विचारों के कारण वे बच्चों में सही समझ विकसित नहीं कर पाते। इसके कारण गुरु के प्रति सम्मान भी घट रहा है। रिश्तों में भी बाजार की छाया इतनी गहरी है कि वह अब डराने लगी है। आज आम आदमी जिस तरह शिक्षा के प्रति जागरूक हो रहा है और अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने के लिए आगे आ रहा है, वे आकांक्षाएं विराट हैं। उनको नजरंदाज करके हम देश का भविष्य नहीं गढ़ सकते। सबसे बड़ा संकट आज यह है कि गुरु-शिष्य के संबंध आज बाजार के मानकों पर तौले जा रहे हैं। युवाओं का भविष्य जिन हाथों में है, उनका बाजार तंत्र किस तरह शोषण कर रहा है, इसे समझना जरूरी है। सरकारें उन्हें प्राथमिक शिक्षा में नए-नए नामों से किस तरह कम वेतन पर रखकर उनका शोषण कर रही हैं, यह एक गंभीर चिंता का विषय है। इसके चलते योग्य लोग शिक्षा क्षेत्र से पलायन कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि जीवन को ठीक से जीने के लिए यह व्यवसाय उचित नहीं है। नई पीढ़ी की व्यापक आकांक्षाएं शहरों में पढ़ रही नई पीढ़ी की समझ और सूचना का संसार बहुत व्यापक है। उसके पास ज्ञान और सूचना के अनेक साधन हैं, जिसने परंपरागत शिक्षकों और उनके शिक्षण के सामने चुनौती खड़ी कर दी है। नई पीढ़ी बहुत जल्दी और ज्यादा पाने की होड़ में है। उसके सामने एक अध्यापक की भूमिका बहुत सीमित हो गई है। नए जमाने ने श्रद्धाभाव भी कम किया है। उसके अनेक नकारात्मक प्रसंग हमें दिखाई और सुनाई देते हैं। गुरु-शिष्य रिश्तों में मर्यादाएं टूट रही हैं, वर्जनाएं टूट रही हैं, अनुशासन भी भंग होता दिखता है। नए जमाने के शिक्षक भी विद्यार्थियों में अपनी लोकप्रियता के लिए कुछ ऐसे काम कर बैठते हैं, जो उन्हें लांछित ही करते हैं। सीखने की प्रक्रिया का मर्यादित होना भी जरूरी है। परिसरों में संवाद, बहसें और विषयों पर विमर्श की धारा लगभग सूख रही है। परीक्षा को पास करना और एक नौकरी पाना इस दौर की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गई है। ऐसे में शिक्षकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस पीढ़ी की आकांक्षाओं की पूर्ति करने की है। साथ ही उनमें विषयों की गंभीर समझ पैदा करना भी जरूरी है। शिक्षा के साथ कौशल और मूल्यबोध का समावेश न हो तो वह व्यर्थ हो जाती है। इसलिए स्किल के साथ मूल्यों की शिक्षा बहुत जरूरी है। कॉरपोरेट के लिए पुर्जे और रोबोट तैयार करने के बजाए अगर हम उन्हें मनुष्यता, ईमानदारी और प्रामणिकता की शिक्षा दे पाएं और स्वयं भी खुद को एक रोल मॉडल के तौर पर प्रस्तुत कर पाएं तो यह बड़ी बात होगी। शिक्षक अपने विद्यार्थियों के लिए एक दोस्त, दार्शनिक और मार्गदर्शक के रूप में सामने आते हैं। वे उनका रोल मॉडल भी हो सकते हैं। सही तस्वीर गढ़ने की जरूरत गुरु-शिष्य परंपरा को समारोहों में याद की जाने वाली वस्तु के बजाए अगर हम उसकी सही तस्वीरें गढ़ सकें तो यह बड़ी बात होगी, लेकिन देखा यह जा रहा है कि गुरु तो गुरु घंटाल बन रहे हैं और छात्र तोल-मोल करने वाले माहिर चालबाज। काम निकालने के लिए रिश्तों का इस्तेमाल करने से लेकर रिश्तों को कलंकित करने की कथाएं भी हमारे सामने हैं, जो शर्मसार भी करती हैं और चेतावनी भी देती हैं। नए समय में गुरु का मान-स्थान बचाए और बनाए रखा जा सकता है। बशर्ते हम विद्यार्थियों के प्रति एक ईमानदार सोच रखें, मानवीय और संवेदनशील व्यवहार रखें, उन्हें पढ़ने के बजाए समझने की दिशा में प्रेरित करें, उनके मानवीय गुणों को ज्यादा प्रोत्साहित करें। भारत निश्चय ही एक नई करवट ले रहा है, जहां हमारे नौजवान बहुत आशावादी होकर अपने शिक्षकों की तरफ निहार रहे हैं, उन्हें सही दिशा मिले तो आसमान में रंग भर सकते हैं। हमारे युवा भारत में इस समय दरअसल शिक्षकों का विवेक, रचनाशीलता और कल्पनाशीलता भी कसौटी पर हैं, क्योंकि देश को बनाने की इस परीक्षा में हमारे छात्र अगर फेल हो रहे हैं तो शिक्षक पास कैसे हो सकते हैं?(संजय द्विवेदी,दैनिक जागरण,5.9.11)

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शिक्षक दिवस विशेषः शिक्षा की दशा-दिशा

आज शिक्षक दिवस है, मतलब शिक्षा और शिक्षकों के योगदान और महत्व को समझने का दिन। पर आज जब शिक्षा का पूरा तंत्र एक बड़े व्यवसाय में तब्दील हो रहा है, क्या हम शिक्षा और शिक्षक की गरिमा को बरकरार रख पाए हैं? वास्तव में पूंजीवादी विश्व के बदलते स्वरूप और परिवेश में हम शिक्षा के सही उद्देश्य को ही नहीं समझ पा रहे है। सही बात तो यह है कि शिक्षा का सवाल जितना मानव की मुक्ति से जुड़ा है उतना किसी अन्य विषय या विचार से नहीं। एक बार देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ब्रिटेन के एडिनबरा विश्र्वविद्यालय मे भाषण देते हुए कहा था कि शिक्षा और मानव इतिहास का संपूर्ण लक्ष्य मानव जाति की मुक्ति है। पर जब मुक्ति का अर्थ ही बेमानी हो जाए, उसका लक्ष्य सर्वजन हिताय की परिधि से हटकर घोर वैयक्तिक दायरे में सिमट जाए तो मानव-मन स्व के निहितार्थ ही क्रियाशील हो उठता है और समाज में करुणा की जगह क्रूरता, सहयोग की जगह दुराव, प्रेम की जगह राग-द्वेष व प्रतियोगिता की भावना ले लेती है। इन दिनों जब शिक्षा की गुणात्मकता का तेजी से Oास होता जा रहा है, समाज में सहिष्णुता की भावना लगातार कमजोर पड़ती जा रही है और गुरु-शिष्य संबंधों की पवित्रता को ग्रहण लगता जा रहा है। डॉ. राधाकृष्णन का पुण्य स्मरण फिर एक नई चेतना पैदा कर सकता है। वह शिक्षा में मानव के मुक्ति के पक्षधर थे। वह कहा करते थे कि मात्र जानकारियां देना शिक्षा नहीं है। करुणा, प्रेम और श्रेष्ठ परंपराओं का विकास भी शिक्षा के उद्देश्य हैं। शिक्षा की दिशा में हमारी सोच अब इतना व्यावसायिक और संकीर्ण हो गई है कि हम सिर्फ उसी शिक्षा की मूल्यवत्ता पर भरोसा करते हैं और महत्व देते हैं जो हमारे सुख-सुविधा का साधन जुटाने में हमारी मदद कर सके, बाकी चिंतन को हम ताक पर रखकर चलने लगे हैं। देश में बी.एड. महाविद्यालयों को खोलने को लेकर जिस तरह से राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद धड़ल्ले से स्वीकृति प्रदान कर रहा है, वह एक दुखद गाथा है। प्राय: सभी महाविद्यालय मापदंडों की अवहेलना करते हैं। महाविद्यालय धन कमाने की दुकान बन गए हैं और शिक्षा का अर्थ रह गया है है परीक्षा, अंक प्राप्ति, प्रतिस्पर्धा तथा व्यवसाय। देश में यही हालत तकनीकी शिक्षा की है जहां बिना किसी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी के लगातार कॉलेज खुल रहे है। लोगों को यह एक अच्छा व्यवसाय नजर आने लगा है। पिछले दिनों इस पर योजना आयोग ने अपना ताजा दृष्टिकोण-पत्र जारी कर दिया है। आयोग चाहता है कि ऐसे उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना की अनुमति दे दी जानी चाहिए, जिनका उद्देश्य मुनाफा कमाना हो। दृष्टिकोण-पत्र के मुताबिक 1 अप्रैल, 2012 से शुरू हो रही 12वीं पंचवर्षीय योजना में उच्च शिक्षा, खासकर तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को बड़ी भूमिका देने के लिए अनुकूल स्थितियां बनाने की जरूरत है। अभी इस दृष्टिकोण-पत्र पर सरकार की मुहर नहीं लगी है, इसके बावजूद यह सुझाव पिछले वर्षो के दौरान उच्च शिक्षा क्षेत्र के बारे में चली चर्चा के अनुरूप ही है। विदेशी विश्र्वविद्यालयों को भारत में अपनी शाखा खोलने की इजाजत के साथ भी यह बात जुड़ी हुई है कि वे सिर्फ मुनाफे की संभावना दिखने पर ही यहां आएंगे। आज आवश्यकता है देश में प्राचीन समृद्ध ज्ञान के साथ युक्तिसंगत आधुनिक ज्ञान आधारित शिक्षा व्यवस्था की। देशभक्ति, स्वास्थ्य-संरक्षण, सामाजिक संवदेनशीलता तथा अध्यात्म-यह शिक्षा के भव्य भवन के चार स्तंभ हैं। इन्हें राष्ट्रीय शिक्षा की नीति में स्थान देकर स्वायत्त शिक्षा को संवैधानिक स्वरूप प्रदान करना चाहिए। इन सब उपायों से शिक्षा की चुनौतियों का मुकाबला किया जा सकता है। शिक्षा बाजार नहीं अपितु मानव मन को तैयार करने का उदात्त सांचा है। जितनी जल्दी हम इस तथ्य को समझेंगे उतना ही शिक्षा का भला होगा। तभी हम शिक्षक दिवस को सच्चे अर्थो में सार्थक कर सकेंगे और डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के अधूरे सपनों को पूरा कर पाएंगे (एस के द्विवेदी,दैनिक जागरण,5.9.11)।

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04 सितंबर 2011

समान शिक्षा प्रणाली ही है विकल्प

शिक्षा के बारे में कहा जाता है कि वह मनुष्य बनाती है। पर वह कैसा मनुष्य बनाती है इसका एक उत्तर इस तथ्य से मिल सकता है कि किसी भी समाज में शिक्षा के क्षेत्र में कितनी समता या विषमता है। बच्चे सब एक जैसे होते हैं। सबमें लगभग एक जैसी प्रतिभा या क्षमता होती है। इनका कितना और किस दिशा में विकास होता है यह इस पर निर्भर करता है कि बच्चों को शिक्षा का वातावरण किस तरह का प्रदान किया जाता है। अगर स्कूलों के ढांचे में विषमता है यानी अलग-अलग स्कूलों में अल-अलग पढ़ाया जाता है तो नागरिक भी अलग-अलग तरह के बनेंगे और उनकी क्षमता भी अलग-अलग होगी। आश्चर्य है कि हमारे देश में माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा देने के अलग-अलग पैमाने बने हुए हैं। परीक्षा के कई-कई बोर्ड हैं। हर बोर्ड का अपना पाठ्यक्रम है। शिक्षा का माध्यम भी बंटा हुआ है। कुछ स्कूलों में हिंदी या स्थानीय भाषा में पढ़ाई होती है तो कुछ में अंग्रेजी में। इस तरह शिक्षा के क्षेत्र में चिंताजनक विषमता और अराजकता है। अगल-बगल रहने वाले विद्यार्थियों में एक कुछ पढ़ता है, दूसरा कुछ और। परंतु सामाजिक न्याय और सामाजिक समानता का दम भरने वाली सरकारों का ध्यान इस पर जाता ही नहीं। आरक्षण की मांग होती है, गरीब व अल्पसंख्यक परिवारों से आए हुए छात्र-छात्राओं को विशेष सहायता देने की मांग की जाती है, लेकिन सबको एक जैसी शिक्षा मिले इस आदर्श की उपेक्षा कर देते हैं। जाहिर है वर्ग जाति पर भारी पड़ता है। इस मामले में तमिलनाडु की पिछली द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम सरकार की तारीफ करनी पड़ेगी कि उसने राज्य में शिक्षा की समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। द्रमुक का जन्म सामाजिक समता के आंदोलन के बीच हुआ था। इस आंदोलन के कुछ तत्व अभी तक वहां की राजनीति में दिखाई देते हैं। इसी राजनीति का नतीजा था कि उसकी सरकार ने राज्य के चार माध्यमिक शिक्षा बोर्डो के पाठ्यक्रमों को हटाकर पूरे राज्य में एक ही पाठ्यक्रम लागू करने के लिए वर्ष 2010 में एक कानून बनाया। कानून का नाम है-तमिलनाडु समान स्कूल शिक्षा प्रणाली। इस अधिनियम के तहत प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में एकसमान पाठ्यक्रम लागू करने का प्रावधान है। द्रमुक सरकार ने इस कानून को लागू भी कर दिया। सरकारी आदेश के अनुसार 2011-12 के अकादमिक वर्ष से नई पुस्तकें पढ़ाई जानी थीं। पिछले विधानसभा चुनाव में द्रमुक हार गई और अन्ना द्रमुक को बहुमत मिला और जयललिता की सरकार द्रमुक सरकार द्वारा बनाए गए कानून में संशोधन कर समान स्कूल शिक्षा प्रणाली को निरस्त कर दिया। इसका उद्देश्य था उस पुरानी शिक्षा प्रणाली को फिर से जीवित करना जिसमें पाठ्यक्रम की विषमता थी। इस संशोधन को मद्रास उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई और उसने इस संशोधन को निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि शिक्षा में समानता का तत्व जितना बढ़ेगा देश के भविष्य के लिए उतना ही अच्छा होगा। जयललिता सरकार को मद्रास न्यायालय के सुचिंतित फैसले से कुछ सीखना चाहिए था, लेकिन उसने इस फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील की। उच्चतम न्यायालय के तीन जजों के पीठ ने अपने 16 अगस्त के फैसले में तमिलनाडु की सरकार को फटकारते हुए मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले में 25 तर्क दिए और सरकार को आदेश दिया कि वह दस दिनों में सभी स्कूलों के लिए समान पाठ्यक्रम लागू करे। उच्चतम न्यायालय का यह फैसला हर दृष्टि से समर्थन योग्य है, लेकिन मीडिया और शिक्षा जगत में इसकी पर्याप्त चर्चा नहीं हुई। इसका प्रमुख कारण है कि समाज का वर्चस्वशाली वर्ग नहीं चाहता कि शिक्षा के क्षेत्र में समानता आए। समान पाठ्यक्त्रम की व्यवस्था अंतत:समान शिक्षा प्रणाली की ओर ले जाती है जिसे राष्ट्रीय नीति के रूप में मंजूर कर लिया जाए तो शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति हो जाएगी। शिक्षा संस्थानों में आरक्षण से भी विषमतावादी चरित्र नहीं बदलता। दिल्ली के प्राइवेट स्कूलों में गरीब बच्चों को भी प्रवेश मिले इसके लिए दिल्ल्ी उच्च न्यायालय वर्षो से प्रयास कर रहा है। रियायती दर पर जमीन प्राप्त करते समय प्राइवेट स्कूलों ने सरकार को वचन दिया था कि वे अपनी कुल सीटों का एक निश्चित प्रतिशत साधनहीन परिवारों के लिए आरक्षित करेंगे, लेकिन इसका पालन नहीं किया गया। अंतत: सरकार और न्यायालय द्वारा दबाव डालने पर स्कूल अपने वाचन का पालन करने के लिए मजबूर हुए, लेकिन यह काम बहुत ही अनमने ढंग से हो रहा है। सोवियत संघ में आर्थिक वर्ग खत्म कर दिए गए थे इसलिए सबके लिए एक जैसी शिक्षा और एक जैसी चिकित्सा की व्यवस्था थी। अब वहां प्राइवेट स्कूल खुल रहे हैं जहां शिक्षा काफी महंगी है, लेकिन चीन में अभी भी शिक्षा में समानता कायम है। सभी पूंजीवादी देशों में हाईस्कूल स्तर तक एक जैसी व्यवस्था है। बेशक वहां भी फैंसी स्कूल हैं, लेकिन वे इतने महंगे हैं कि एक छोटा-सा वर्ग ही अपने बच्चों को वहां भेज सकता है। 90 से 95 प्रतिशत तक बच्चों की शिक्षा सरकारी या मिशनरी स्कूलों में होती है। भारत समाजवाद और पूंजीवाद दोनों से प्रभावित है और दोनों की ही मांग है कि हम समान शिक्षा प्रणाली की ओर बढ़ें। भले ही यह मांग अभी फिलहाल कमजोर हो पर भविष्य में बढ़ती ही जाएगी(राजकिशोर,दैनिक जागरण,4.9.11)।
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16 अगस्त 2011

आरक्षण पर राजनीति

यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि हमारे देश में शुरू से ही आरक्षण की व्यवस्था पर राजनीति होती रही है। अब तो आरक्षण के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी हमले शुरू हो गए हैं। हाल ही में रिलीज फिल्म आरक्षण के कुछ संवादों और दृश्यों पर दलित नेताओं को ऐतराज है। हालांकि दलित नेताओं की आपत्ति के बाद फिल्म से ये संवाद और दृश्य हटा लिए गए हैं लेकिन इसके बावजूद उन्होंने फिल्म का विरोध जारी रखा। क्या यह दलित नेताओं का खोखला आदर्शवाद नहीं है? जिन संवादों और अनुभवों से दलितों को अपने वास्तविक जीवन में रोज दो-चार होना पड़ता है अगर वे संवाद और दृश्य दलितों की पीड़ा व्यक्त करने के उद्देश्य से फिल्म में आते हैं तो उन पर इतनी आपत्ति क्यों? विडंबना यह है कि आरक्षण के तवे पर सब अपनी-अपनी रोटियां सेंक रहे हैं। अब समय आ गया है कि हम दलितोद्धार के अन्य विकल्पों पर भी विचार करें। अगर आरक्षण ही करना है तो सरकार को अपने बजट का एक बड़ा भाग दलितों के लिए आरक्षित करना चाहिए ताकि इस बजट से दलितों के लिए अच्छे हॉस्टल, पुस्तकालय और कोचिंग जैसी सुविधाओं की व्यवस्था की जा सके और दलित व पिछड़े वर्गो के छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से आत्मविश्वास के साथ अगड़ी जातियों के छात्रों से आगे निकल सकें। दलितों को आगे बढ़ाने के लिए अगड़ी जातियों को भी आगे आना होगा। इस उद्देश्य के लिए सरकारी व्यवस्था के तहत निजी संस्थानों में दलितों को प्रोत्साहित किया जा सकता है। इससे समाज में भी यह संदेश जाएगा कि अगड़ी जातियां दलितों की दुश्मन नहीं हैं। दुख की बात यह है कि अभी तक निजी क्षेत्र ने दलितों को प्रोत्साहित करने के लिए कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया है। हाल ही में एक बार फिर कुछ जाट नेताओं ने आरक्षण के नाम पर सरकार को घेरने की चेतावनी दी है। गुर्जर नेता भी आरक्षण को लेकर मुखर हैं। आरक्षण एक ऐसी आग बन गया है जिसे बुझाने की जितनी कोशिश की जाती है, यह उतनी ही भड़कती है। इस समय प्रत्येक जाति एवं वर्ग को आरक्षण एक ऐसा हथियार दिखाई दे रहा है, जिसके माध्यम से वे जिंदगी की बड़ी से बड़ी जंग जीत सकते हैं। यह सत्य है कि आरक्षण ने समाज की मुख्यधारा से कटे लोगों का जीवनस्तर सुधारा है, इसलिए आरक्षण के महत्व एवं उद्देश्यों पर शक नहीं किया जा सकता। लेकिन सवाल यह है कि क्या आज भी आरक्षण का उद्देश्य वही रह गया है जो इस व्यवस्था की स्थापना के समय था? क्या कारण है कि आज समाज की मुख्यधारा से कटे लोगों के उत्थान के लिए आरक्षण को ही एकमात्र विकल्प के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है? अगर हमारे नीति-निर्माताओं को दबे-कुचले लोगों के उत्थान या पतन की वास्तविक चिंता होती तो कुछ ऐसी नीतियां बनाई जातीं जिनसे ऐसे लोग आत्मविश्वास से सराबोर होकर स्वयं ही आरक्षण जैसी व्यवस्था को नकार देते। आरक्षण को ही जिंदगी की सफलता का सूचक मान लेना तर्कसंगत नहीं है। हमें यह समझने की जरूरत है कि इस दौर में हमारे राजनेता हमें आरक्षण का स्वप्न दिखाकर अपना हित साध रहे हैं। इन सब बातों का अर्थ आरक्षण का विरोध करना नहीं है। अगर आरक्षण को राजनीति से न जोड़ा जाता तो यह दबे-कुचले लोगों के उत्थान का सशक्त माध्यम होता। हमारे राजनेताओं द्वारा आरक्षण को राजनीति से जोड़ने के कारण आज यह व्यवस्था नेताओं के उत्थान का एक सशक्त माध्यम बन गई है। आरक्षण की राजनीति के कारण अगर किसी का पतन हो रहा है तो वह आम जनता ही है। सवाल यह है कि आरक्षण के नाम पर सरकार एवं एकदूसरी जातियों को घेरने की राजनीति कब तक होती रहेगी? इस समय कुछ पिछड़ी जातियां अन्य जातियों को पिछडे़ वर्ग में शामिल करने पर एतराज जता रही हैं। इसलिए विभिन्न जातियों के बीच आपसी संघर्ष बढ़ता जा रहा है। अगर आरक्षण के नाम पर समाज से आपसी भाईचारा खत्म हो रहा है तो इसकी प्रासंगिकता पर पुनर्विचार किया जाना आवश्यक है(रोहित कौशिक,दैनिक जागरण,16.8.11)।

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13 अगस्त 2011

आंध्रप्रदेश में उपेक्षित है शिक्षा

केंद्र सरकार के बार-बार मना करने के बावजूद पंजाब में किसानों और गरीब मजदूरों को बिजली मुफ्त दी जा रही है। इस पर कोई बहस इसलिए भी नहीं की जा सकती है क्योंकि यह पंजाब की अपनी नीति है और सरकार यह मानती है कि कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देने तथा किसानों के घाटे को कम करने के लिए ऐसा करना आवश्यक है। दूसरी ओर प्रदेश में पांच सौ से अधिक ऐसे स्कूल हैं जिनके बिजली के कनेक्शन बिल का भुगतान न होने के कारण काटे जा चुके हैं। कुछ स्थानों पर तो गर्मी से बचने के लिए शिक्षकों ने अपने पास से बिजली के बिल का भुगतान किया है और बहुत से स्थानों पर पावरकाम की लाइन से अवैध रूप से बिजली लेकर स्कूलों का काम चलाया जा रहा है। जाहिर है कि शिक्षा क्षेत्र सरकार की प्राथमिकता में शामिल नहीं है। वर्तमान में जब स्कूलों में कंप्यूटर की शिक्षा की बात हो रही है तो सरकारी स्कूलों में बिजली न होना निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे पठन-पाठन में तो व्यवधान उत्पन्न होता ही है साथ ही सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों में भी हीन भावना पैदा होती है जिसका कुप्रभाव उनके व्यक्तित्व के विकास पर पड़ता है। सर्वाधिक घातक स्थिति उन स्कूलों की है जहां चोरी की बिजली उपयोग में लाई जा रही है। ऐसे स्कूलों में बच्चे क्या नैतिक शिक्षा ग्रहण कर सकेंगे जहां अध्यापक और प्राध्यापक चोरी की बिजली का इस्तेमाल कर रहे हों? सर्वाधिक दुखद बात तो यह है कि जिन स्कूलों के बिजली कनेक्शन बिल के भुगतान के अभाव में काट दिए गए हैं उनमें शिक्षा मंत्री के गृह जिले के भी सौ से अधिक स्कूल शामिल हैं। स्पष्ट है कि शिक्षा मंत्री को भी इस बात का भान है कि सरकार की दृष्टि में कृषि क्षेत्र अधिक महत्वपूर्ण है और शिक्षा क्षेत्र कम। हैरानीजनक बात तो यह है कि सरकार के नीति नियंता यह मामूली बात भी नहीं समझ पाते हैं कि शिक्षा के अभाव में कृषि का विकास भी संभव नहीं है(संपादकीय,दैनिक जागरण,दिल्ली,13.8.11)।

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12 अगस्त 2011

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से परीक्षाएं होंगी पारदर्शी

सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से देश के करोड़ों विद्यार्थियों को सुकून मिला है, जिसमें सूचना के अधिकार के तहत जांची गयी उत्तर पुस्तिकाओं का पुनर्मूल्यांकन कराने का हक मिला है। अकसर ऐसे मामले प्रकाश में आते हैं जब विद्यार्थियों को लगता है कि उनकी योग्यता का सही मूल्यांकन नहीं हुआ। यद्यपि उत्तर पुस्तिकाओं की जांच करने वाले सभी परीक्षकों की विश्वसनीयता पर सवाल नहीं खड़े किये जा सकते, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है। देखा गया है कि उत्तर पुस्तिकाओं की अधिक संख्या या फिर अच्छा सुलेख न हो पाने के कारण उत्तर पुस्तिकाओं के साथ न्याय नहीं हो पाता। कई बार भाषा की समस्या भी आड़े आती है। यह भी सही है कि कई राज्यों में उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन करने वालों को उचित पारिश्रमिक नहीं मिलता है, अत: वे चलताऊ किस्म का मूल्यांकन कर बैठते हैं। हालांकि हालिया फैसले की कई व्यावहारिक दिक्कतें भी हैं, लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि इसके बावजूद परीक्षार्थियों को उनका हक मिल सकेगा। जैसे उत्तर प्रदेश में प्रतिवर्ष करीब 38 लाख परीक्षार्थी दसवीं व बारहवीं की परीक्षा में बैठते हैं तो ऐसे में लाखों परीक्षार्थियों को इस अधिकार की सुविधा प्रदान करना काफी कठिन होगा। जहां एक ओर शिक्षकों की सजगता से मूल्यांकन का स्तर सुधरेगा, वहीं दूसरी ओर कालेजों व विश्वविद्यालयों पर काम का अधिक बोझ भी पड़ेगा। सामान्य तौर पर ऐसे परीक्षार्थियों की संख्या काफी अधिक होती है जो अपने अंकों से संतुष्टï नहीं होते। हर किसी को लगता है कि उसे अधिक अंक मिलने चाहिए थे। लेकिन किसी सीमा तक यह पहल उपयोगी जरूर हो सकती है। इसका एक विकल्प यह भी है कि आईआईटी की तर्ज पर उत्तर पुस्तिका के उत्तरों को ऑनलाइन कर दिया जाये ताकि छात्र अपना मूल्यांकन खुद कर सकें।

बहरहाल, अब सुप्रीम कोर्ट के ताजातरीन फैसले से हर छात्र का उत्तर पुस्तिका को देख पाना एक हक जैसा हो जायेगा। वास्तव में यह किसी भी परीक्षार्थी के लिए मौलिक अधिकार सरीखा है। सबसे महïत्वपूर्ण बात यह है कि यह सूचना के अधिकार की अगली कड़ी है और इसकी व्यवस्था करना अधिकारियों का दायित्व है। इसका अभिप्राय: यह है कि देश में किसी परीक्षा की उत्तर पुस्तिका की जांच की जानकारी संबंधित एजेंसी को उपलब्ध करवायी जायेगी। कई मामलों में देखने में आया है कि किसी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा में या शोध हेतु होने वाली प्रवेश परीक्षा के परीक्षार्थी की कापी हिंदी में होने के कारण जांची तक नहीं जाती। ऐसे परीक्षार्थी भी सूचना के अधिकार के तहत अपनी पुस्तिकाओं के मूल्यांकन की स्थिति जान पायेंगे। अकसर परीक्षा का परिणाम आने पर विद्यार्थी अपने अभिभावकों से कहते नजर आते थे कि उसने पेपर तो अच्छा किया था, लेकिन नंबर नहीं आये। अब तमाम ऐसी शंकाओं के निराकरण का मार्ग प्रशस्त हो पायेगा। इस अधिकार से उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन करने वाले वे लोग भी सजग होंगे जो अब तक मूल्यांकन के कार्य को हल्के में लेते रहे हैं। अकसर देखा जाता है कि परीक्षा परिणामों के दिनों में कई छात्र-छात्राएं मनोनुकूल परीक्षा परिणाम न आने पर आत्महत्याएं तक कर लेते हैं, कई छात्र घर छोड़कर भाग जाते हैं। अब ऐसे विद्यार्थियों के जीवन में एक उम्मीद की किरण जगेगी कि पुनर्मूल्यांकन से वास्तविकता सामने आ सकती है। वास्तव में देश में उत्तर पुस्तिकाओं की जांच प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने व मूल्यांकन करने वालों को जवाबदेह बनाने की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी। सुप्रीम कोर्ट की यह पहल इस दिशा में मील का पत्थर साबित होगी(संपादकीय,दैनिक ट्रिब्यून,12.8.11)।

नई दुनिया का संपादकीय भी देखिएः
सूचना के अधिकार कानून ने हमारे व्यवस्था तंत्र में वर्षों से कायम रहस्य और गोपनीयता की कई दीवारें गिराने का काम किया है। इसी सिलसिले में स्कूलों, कॉलेजों और प्रतियोगी परीक्षाओं की मूल्यांकन प्रणाली भी अब रहस्य या गोपनीयता के दायरे से मुक्त हो गई है। यानी अब इन परीक्षाओं के नतीजे आने के बाद छात्र अपनी उत्तर पुस्तिकाएं देख सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि परीक्षाओं की जांची गई उत्तर पुस्तिकाएं सूचना के दायरे में आती हैं और सूचना के अधिकार कानून के तहत परीक्षार्थियों को इन्हें देखने का अधिकार है तथा इसी कानून के तहत परीक्षाएं आयोजित करने वाली निकाय के अधिकारियों का यह कर्तव्य है कि वे इन उत्तर पुस्तिकाओं को छात्रों को उपलब्ध कराएं। शीर्षस्थ अदालत ने यह व्यवस्था ५ फरवरी, २००९ को कलकत्ता हाई कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ दायर अपील को खारिज करते हुए दी है। इस व्यवस्था को शिक्षा मंडलों, विश्वविद्यालयों तथा कुछ सार्वजनिक निकायों की प्रतियोगी परीक्षाओं की मूल्यांकन प्रणाली को साफ-सुथरा, जिम्मेदार और पारदर्शी बनाने की दिशा में एक सटीक व्यावहारिक पहल कहा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपील करने वाली परीक्षक संस्थाओं की इस दलील को खारिज कर दिया कि जांची गई उत्तर पुस्तिकाएं छात्रों को दिखाने से समूची परीक्षा प्रणाली ध्वस्त हो जाएगी। अदालत की इस पहल से छात्रों को अपनी शंकाओं के वे जवाब मिल सकेंगे जिन्हें अब तक गोपनीयता कानून की आड़ में देने से इनकार कर दिया जाता था। हालांकि ऐसा नहीं है कि परीक्षाएं आयोजित करने वाले ज्यादातर संस्थानों के परीक्षा परिणामों में घपले ही घपले होते हों या ज्यादातर छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं का गलत या पक्षपातपूर्ण मूल्यांकन कर उनके भविष्य से खिलवाड़ किया जाता हो। लेकिन यह भी तथ्य है कि कई परीक्षाओं के परिणामों में प्रतिभा और मूल्यांकन के बीच कोई साम्य नहीं होता है। इसके पीछे कई वजहें हैं। मसलन मूल्यांकन करने वाले की संबंधित विषय में अपर्याप्त योग्यता, मूल्यांकन की पूर्वाग्रही मानसिकता, रसूखदारों की संतानों को ज्यादा नंबर देने की द्रोणाचार्य वाली परंपरा और पैसे के लिए नंबर घटाने-बढ़ाने का खेल लंबे अरसे से स्कूल-कॉलेजों में चला आ रहा है। इसी के चलते आमतौर पर जब भी स्कूल, कॉलेजों और प्रतियोगी परीक्षाओं के नतीजों में अच्छी पढ़ाई करने वाले छात्र यह पाते हैं कि नतीजे उनकी उम्मीद के मुताबिक नहीं हैं तो उनके लिए इसकी वजह समझ पाना काफी मुश्किल होता है और कई छात्र तो निराश होकर गलत राह पर चल पड़ते हैं या आत्महत्या जैसा कदम भी उठा लेते हैं। उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट की इस ताजा पहल से ये सारे अप्रिय सिलसिले अब बहुत हद तक थम जाएंगे।

नवभारत टाइम्स के विचार देखिएः
परीक्षार्थियों को बड़ी राहत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत परीक्षा की कॉपी देखी जा सकती है। एक परीक्षार्थी को इसका पूर्ण अधिकार है। असल में स्कूल, कॉलेज और खासकर प्रतियोगिता परीक्षाओं में अपने प्रदर्शन को लेकर स्टूडेंट्स हमेशा संशय में रहा करते थे। उन्हें समझ में नहीं आता था कि आखिर किन कारणों से उनके नंबर कम आए, या क्यों नहीं उनका नौकरी में चयन हो पाया। स्कूल-कॉलेजों में तो पुनर्मूल्यांकन की कुछ न कुछ व्यवस्था की गई है, पर विभिन्न नौकरियों के लिए चयन परीक्षाएं आयोजित करने वाले संस्थानों ने तो इसे रहस्य बना रखा था। उन्हें मंजूर नहीं था कि कोई उनकी चयन प्रक्रिया को जानने की कोशिश करे या उस पर सवाल उठाए। उनकी दलील रही है कि वे उत्तर पुस्तिकाओं के संरक्षक हैं, जो उनके पास विश्वास के आधार पर सुरक्षित रहती हैं। 

लेकिन अदालत ने इसे नहीं माना। दरअसल यह मामला पहले कलकत्ता हाईकोर्ट में आया था। हाईकोर्ट ने भी यही कहा था कि परीक्षा आयोजित करवाने वाले निकाय उत्तर पुस्तिकाओं के संरक्षक होने का दावा कर उन्हें सार्वजनिक करने से इनकार नहीं कर सकते। उत्तर पुस्तिकाएं भी एक सूचना हैं, जिन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इसमें गोपनीयता नहीं होनी चाहिए। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर मुहर लगा दी है। इस बात पर विशेषज्ञों में विवाद होता रहा है कि परीक्षा की वर्तमान पद्धति उचित है या नहीं। लेकिन तमाम बहसों के बावजूद अभी तक हम इसका विकल्प नहीं ढूंढ पाए हैं। 

ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि वर्तमान ढांचे को ही बेहतर बनाया जाए और इसी में यथासंभव प्रयोग किए जाएं। इसका एक रास्ता है -इसे पारदर्शी बनाना। जब एक परीक्षार्थी अपनी कॉपी देखेगा, तभी तो अपने प्रदर्शन का मूल्यांकन कर सकेगा। अपनी खूबियों-खामियों को समझ सकेगा। इससे उसे अगली तैयारी में सहायता मिल सकेगी। इससे परीक्षकों पर भी दबाव पैदा होगा। अभी कौन परीक्षक क्या करके निकल जा रहा है, इसकी मॉनिटरिंग की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। यह मानकर चला जाता है कि किसी विषय के विशेषज्ञ ने सही ही फैसला किया होगा। लेकिन जब जांची हुई कॉपियों के देखने की व्यवस्था होगी तो वे सचेत रहेंगे ताकि कोई उन पर कोई उंगली न उठा सके। 

अभी न जाने कितने परीक्षार्थी किसी परीक्षक की लापरवाही या अगंभीर रवैये का खमियाजा भुगतते होंगे। सच कहा जाए तो अदालत के इस फैसले ने कई बंद दरवाजे खोल दिए हैं। अब बहस सिलेबस और प्रश्नपत्र के पैटर्न से आगे बढ़कर जांच के तरीके पर भी जाएगी, खासकर सब्जेक्टिव प्रश्नों के संदर्भ में। शिक्षा और परीक्षा को जितना खोला जाएगा, उसमें उतनी ही वैज्ञानिकता, व्यापकता और ताजगी आएगी। दरअसल इस क्षेत्र को उन कूढ़मगज नौकरशाहों से मुक्त करने की जरूरत है, जो सारी चाबियां अपनी मुट्ठी में रखना चाहते हैं और इसलिए नई पहलों का रास्ता रोके रखते हैं।

दैनिक भास्कर ने इस विषय पर कल ही अपना संपादकीय लिखा थाः
अपनी उत्तर पुस्तिका मांगना अब हर विद्यार्थी का अधिकार है। इससे सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत नागरिकों के सशक्तीकरण की परिघटना एक कदम और आगे बढ़ी है। अब यह उम्मीद करने की पूरी वजह है कि इसका सकारात्मक प्रभाव शिक्षा के हर चरण पर पड़ेगा। 

सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि जांची गई कॉपियां ‘सूचना’ की परिभाषा के तहत आती हैं और इसलिए इसे आरटीआई के तहत उपलब्ध कराना सार्वजनिक अधिकारियों का कर्तव्य है। इस तरह अब कोई भी परीक्षा, जिसे चाहे कोई भी एजेंसी आयोजित करती हो, उसकी कॉपियां आरटीआई के तहत उस एजेंसी को देनी होंगी। 

इससे अनेक छात्रों की इस पुरानी शिकायत का निवारण हो सकेगा कि उन्होंने लिखा तो अच्छा था, लेकिन नंबर नहीं आए। ऐसे कई छात्रों की शिकायत में दम रहता है। इसका कारण यह है कि अक्सर उत्तर पुस्तिकाओं की जांच को परीक्षा एजेंसियां गंभीरता से नहीं लेती हैं। 

कॉपी जांचने के लिए हास्यास्पद रूप से कम पैसा दिया जाता है। नतीजतन, शिक्षकों के लिए कॉपी जांचना किसी तरह निपटा देने का एक काम बन जाता है। बाहरी लोगों से कॉपी जंचवाने के बढ़ते चलन के साथ स्थिति और बदतर हो गई है। 

ऐसे में अब जबकि जांची कई कॉपियों पर गोपनीयता का आवरण नहीं रहेगा, परीक्षा एजेंसियां पहले जैसी ‘आजादी’ नहीं बरत पाएंगी। आरटीआई ने पहले से ही शिक्षा संस्थानों को ज्यादा जवाबदेह बनाया है, लेकिन अब खासकर उस क्षेत्र को ही ध्यान में रखकर दिया गया फैसला उन पर और परीक्षा व्यवस्था पर निगरानी का कारगर जरिया बन सकता है। 

सर्वोच्च न्यायालय ने इन एजेंसियों की यह दलील नहीं मानी कि अगर उत्तर पुस्तिकाएं मांगना छात्रों का अधिकार बन गया, तो ऐसी अर्जियों की बाढ़ आ जाएगी और उनके लिए काम करना मुश्किल हो जाएगा। अदालत ने इन व्यावहारिक दिक्कतों पर पारदर्शिता को तरजीह दी। यह स्वागतयोग्य है।

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