मुख्य समाचारः

सम्पर्कःeduployment@gmail.com

08 जनवरी 2013

ये योग्यताएं हैं रोज़गार की गारंटी

भारत में नये साल के शुरुआती 6 महीने नौकरियों के लिहाज से उम्‍मीदें जगाने वाला नहीं रहने वाले हैं। अधिकतर कंपनियों ने मार्च 2013 या जून 2013 तक अपने यहां भर्तियां बंद कर रखी हैं। वहीं, नौकरी खोजने वालों की संख्या में पिछले साल की तुलना में इस साल 28 फीसदी इजाफा होने की उम्मीद है। भारतीय अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार भी नई नौकरियों के रास्ते में रोड़ा बनी हुई है। ऐसे में कंपनियां बहुत जरूरत पड़ने पर लंबी और टफ प्रोसेस के तहत कर्मचारियों को रिक्रूट कर रहीं हैं। 

जॉबः रिसर्च कंपनी माईहाइरिंगक्लबडॉटकॉम ने कहा है कि वैसे तो 2013 में करीब 10 लाख नई नौकरियां मिलेंगी, लेकिन शुरुआती महीनों में नौकरियों का हाल 2012 की तरह ही रहने वाला है। पिछले साल नौकरियों में 21 फीसदी की कमी आई थी। दिलचस्प है कि साल 2012 में 7 लाख लोगों को ही नौकरियां मिली हैं, जबकि हर जॉब पोस्ट के लिए करीब 240 से भी ज्यादा आवेदन आए। इस बार यह औसत और ज्‍यादा होने की संभावना है। ऐसे में नए साल की शुरुआत में नौकरी खोजना मुश्किल भरा हो सकता है। लेकिन फिर भी आपको नई नौकरी की जरूरत है या फिर अच्छी नौकरी की तलाश कर रहे हैं, तो नौकरीदाता कंपनियों की जरूरत को समझना बहुत जरूरी है। जानें कंपनियों की उन जरूरतों को जिसे पूरा कर आप नो जॉब जोन में भी नौकरी हासिल कर सकते हैं। 

लंबी प्रक्रिया: वैसे तो देश की अधिकतर कंपनियों में मार्च 2013 तक भर्तियां बंद हैं, लेकिन बहुत ज्यादा जरूरत पड़ने पर कुछ कंपनियां बेहतर कैंडीडेट को जॉब दे रही हैं। जॉब एक्सपर्ट के मुताबिक बेहतर कैंडीडेट को खोजने और उन्हें नौकरी पर रखने के लिए कंपनियां लंबी प्रक्रिया को अपना रहीं हैं। ऐसे में नौकरी खोजने वालों को इस लंबी प्रक्रिया के लिए पहले से ही तैयार रहना होगा। साथ ही इंटरव्यू की टफ प्रोसेस भी देखने को मिल सकती है। रिक्रूटमेंट फर्म मैनपावर ग्रुप के एमडी ए. जी राव का कहना है कि अगले 6 महीने तक बाजार में नौकरियों का ऐसा ही हाल रहने वाला है। ऐसे में जल्दबाजी करना जॉब सर्च करने वालों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। 

हाई एक्सपेक्टेशन: वर्तमान समय में जॉब देने वाली कंपनियां नए इम्प्लाई से ज्यादा से ज्यादा आउटकम मिलने की एक्सपेक्टेशन कर रहीं हैं। रिक्रूटमेंट फर्म ग्लोबलहंट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के सीईओ सुनील गोयल के मुताबिक कंपनियों की डिमांड है कि नए लोग दिन या लेट नाइट तक फ्लेक्सिबल वर्किग ऑवर में काम करें। साथ ही एक से ज्यादा डिपार्टमेंट का नॉलेज रखने वालों को तरजीह दी जा रही है। ऐसे में शुरूआती 6 महीनों में उन्हीं लोगों के नौकरी पाने के ज्यादा चांसेज हैं जो टेक्नीकल सहित कई फील्ड के एक्सपर्ट हैं।

ट्रैवल: अगर आप नई नौकरी पाने के अपने चांसेज बढ़ाना चाहते हैं तो वर्तमान दौर में कहीं भी रिलोकेट होने के लिए तैयार हो जाइए। जॉब में रिलोकेशन नौकरी पाने के चांसेज बढ़ाता है। रिक्रूटमेंट फर्म हेड होंचोस के चीफ एक्जीक्यूटिव उदय सोड़ी के मुताबिक मंदी के दौर में अधिकतर कंपनियां रिमोट एरिया से कर्मचारियों को सस्ते में हायर कर रही हैं और उन्हें अपने अलग-अलग ऑफिसों या फैक्ट्री में ट्रांसफर कर देती हैं। विप्रो और टीसीएस जैसी कंपनियों ने तो छोटे जगह पर लोगों को रिक्रूट करने के लिए साउथ में विशाखापट्टनम और सेंट्रल इंडिया के लिए एमपी में इंदौर में यूनिट बनाई हुई है। ऐसे में नौकरी पाने के चांसेज बढ़ाने के लिए रिलोकेशन के लिए हमेशा तैयार रहें। 

पैसा: अगर आप ज्यादा सैलरी पाने की लालच में नौकरी बदलने की सोच रहे हैं तो आपके हाथ निराशा ही लगेगी। जहां कुछ महीनों पहले तक जॉब स्विच करने पर लोगोकं को 25 फीसदी तक बढ़ी सैलरी मिल जाती थी, वहीं अब कंपनियों की ओर से इस इजाफे को 15 फीसदी पर ही सीमित कर दिया है। गोयल के मुताबिक कई कंपनियां लोगों को उनकी पिछली जॉब के बराबर सैलरी ही ऑफर करती हैं। इतना ही नहीं, अगर आप नई कंपनी से बोनस मिलने की उम्मीद रखते हैं तो पुरानी नौकरी छोड़ने की जरूरत नहीं है। वर्तमान में कंपनियों ने बोनस देना भी बंद कर दिया है। ऐसे में अगर आपको नई नौकरी करनी है तो कम सैलरी और बिना बोनस के ही संतोष करने के लिए तैयार रहना होगा(दैनिक भास्कर,8.1.13)।

आगे बढ़ें...

04 जनवरी 2013

महिलाओं की सुरक्षा को लेकर आईटी और बीपीओ कंपनियां परेशान

दिल्ली-एनसीआर में कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा चिंता यहां की आईटी-बीपीओ कंपनियों के ऑपरेशंस पर भी असर डालने लगी है। एसोचैम के सर्वे में कहा गया है कि बीते दो हफ्ते में इन कंपनियों की प्रॉडक्टिविटी 40 फीसदी तक गिर गई है। कई कंपनियों ने बेहद जरूरी पोर्टफोलियो पर काम कर रही महिलाओं के वर्किंग आवर्स उनकी डिमांड के मुताबिक अजस्ट किए हैं, जबकि कई को ब्रांच ट्रांसफर पर भी विचार करना पड़ रहा है। बीते दिनों दिल्ली में हुए आंदोलनों में शामिल कामकाजी महिलाओं में सबसे ज्यादा इन्हीं सेक्टरों की थीं और कई महिला कर्मी अब तक छुट्टी से काम पर नहीं लौटी हैं। 

एसोचैम के सेक्रेटरी जनरल डी एस रावत ने बताया, 'दिल्ली-एनसीआर की 2,000 से ज्यादा आईटी, बीपीओ, केपीओ कंपनियों में करीब 2.5 लाख महिलाएं काम करती हैं, जो कुल वर्कफोर्स का 30 से 35 फीसदी है। उनके मन में किसी भी तरह की दहशत न सिर्फ उनकी मानसिक सेहत बल्कि इंडस्ट्री की वित्तीय सेहत भी खराब कर सकती है।' उन्होंने बताया कि आईटी-बीपीओ की महिला कमिर्यों पर आधारित सर्वे में करीब 38 फीसदी ने कहा कि वे कंपनी के अंदर या बाहर के सुरक्षा हालात से खुश नहीं हैं और उन्होंने अपनी किसी न किसी चिंता से कंपनी को वाकिफ कराया है। 52 फीसदी महिला कमिर्यों ने माना कि बेहतर सैलरी पैकेज की वजह से ही वे शिफ्ट में काम करना चाहती हैं, लेकिन हाल की घटनाओं के बाद नाइट शिफ्ट में काम करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहीं। हालांकि, 62 फीसदी महिला कर्मियों ने बताया कि इस हादसे और उनकी शिकायतों के बाद कंपनियों ने सुरक्षा बंदोबस्त को लेकर पहल और इंतजाम किए हैं, जिससे वे संतुष्ट हैं। 

दिल्ली के अलावा नोएडा, गुड़गांव, फरीदाबाद, गाजियाबाद की कई फर्मों ने माना पिछले एक पखवाड़े में उनके यहां छुट्टी लेने वाली महिला कर्मियों की तादाद सबसे ज्यादा रही। एसोचैम के मुताबिक, बीपीओ फर्मों में काम करने वाली ज्यादातर महिलाएं 21 से 28 उम्र वर्ग की हैं, जिनके साथ छेड़छाड़, यौन उत्पीड़न या हिंसक वारदात की आशंका सबसे ज्यादा होती है। इंडस्ट्री की बहुत सी ऑपरेशनल और कमर्शल जरूरतें इसी वर्किंग क्लास पर निर्भर करती हैं। 89 फीसदी महिला कर्मियों ने माना कि उन्होंने घर से दफ्तर की दूरी ज्यादा और असुरक्षित होने के चलते ड्यूटी आवर्स में बदलाव पर जोर दिया है और वे शाम ढलने से पहले घर पहुंच जाना चाहती हैं। 

एसोचैम की जॉइंट डायरेक्टर मंजू नेगी ने बताया, 'हमने सर्वे के बाद कई बीपीओ और आईटी फर्मों में बीते दिनों की हलचल का जायजा लिया और पता चला कि महिलाओं की सुरक्षा चिंता के कारण किसी न कसी तरह से कंपनी का कामकाज, प्रॉडक्टिविटी और प्रॉफिट घटा है। इससे दूसरे कर्मचारियों की परफॉर्मेंस भी खराब हुई है। इन कंपनियों ने कम से कम 40 फीसदी प्रॉडक्टिविटी घटने की बात मानी है।' एसोचैम ने कहा कि पिछले कुछ सालों में आईटी-बीपीओ सेक्टर में काम करने वाली महिलाओं की तादाद बढ़ी है। 2008-09 में आईटी-बीपीओ की कुल वर्कफोस में 32 फीसदी महिलाएं थी, जो साल 2011-12 में 52 फीसदी हो गईं। एंट्री लेवल पर यह तादाद 4 साल में 48 फीसदी से बढ़कर 62 फीसदी पहुंच गई। दिल्ली-एनसीआर में इस सेक्टर की करीब 82 फीसदी महिलाएं नाइट शिफ्ट में काम करती हैं, जबकि बंगलुरू में यह आंकड़ा 82, मुंबई में 76 और हैदराबाद में 82 फीसदी है। 

सर्वे में यह भी कहा गया कि मल्टि-नैशनल और कुछ बड़ी कंपनियों को छोड़कर ज्यादातर कंपनियां अपने कर्मचारियों को बेहतर और सेफ ट्रांसपोर्टेशन मुहैया नहीं कराने की स्थिति में नहीं हैं। हालांकि, ज्यादातर कंपनियां महिलाओं को पिक ऐंड ड्रॉप की सुविधा देती हैं, लेकिन इसके लिए वे ट्रैवल कॉन्ट्रैक्ट के तहत बाहरी ट्रांसपोर्ट कंपनियों की सेवाएं लेती हैं और महिलाओं को रास्ते में किसी वारदात का डर सताता रहता है(नभाटा,दिल्ली,4.1.13)।

आगे बढ़ें...

हरियाणाःनीट को दरकिनार किया प्राइवेट कॉलेजों ने

नैशनल एलिजीबिलिटी ऐंड एंट्रेस टेस्ट (नीट) को नजरअंदाज करके प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों ने एंट्रेंस टेस्ट के लिए विज्ञापन दिए हैं। कुछ ने टेस्ट की डेट भी घोषित कर दी है। हालांकि, मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए नीट-2012 परीक्षा हाल ही में हुई थी। इसके आधार पर सभी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश होना था। 

नीट का नतीजा आने से पहले ही प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों ने अपने तरीके से एंट्रेंस टेस्ट के लिए विज्ञापन जारी किया है। मेडिकल में एडमिशन लेने वाले स्टूडेंट असमंजस में हैं कि प्राइवेट कॉलेजों की परीक्षा में बैठें या नहीं। प्राइवेट संस्थाओं ने नीट को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है, जिसकी सुनवाई 15 से 17 जनवरी तक चलेगी। मेडिकल काउंसल ऑफ इंडिया और केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के अनुमोदन से राष्ट्रीय परीक्षा का आयोजन करवाया था ताकि छात्र-छात्राओं को जगह-जगह भटकना न पड़े। 

इस स्थिति से निपटने के लिए और छात्रों को राहत पहुंचाने के लिए संकल्प मेडिकोज मूवमेंट असोसिएशन का गठन किया है, जिसके संस्थापक अध्यक्ष डॉ. (मेजर) गुलशन गर्ग हैं। उन्होंने बताया कि 15 जनवरी से पहले वह सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करेंगे और 'नीट' के पक्ष में दलील प्रस्तुत करेंगे। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री को भी ज्ञापन देकर 'नीट-2012 पी.जी. परीक्षा को बचाने की अपील की गई है। 

छात्रों के अनुसार प्राइवेट महाविद्यालय पहले प्रवेश परीक्षा हर वर्ष फरवरी और मार्च में लेते थे परंतु अब जानबूझ कर जनवरी में ही ले रहे हैं। उधर, सर्वोच्च न्यायालय ने इन प्राइवेट संस्थाओं को परीक्षा लेने की अनुमति तो दे दी है, लेकिन परिणाम निकालने पर अगले फैसले तक प्रतिबंध लगा दिया है। डॉ. गुलशन गर्ग का कहना है कि उनकी असोसिएशन 'नीट' के पक्ष में जनमत तैयार कर रही है और भविष्य में मेडिकल प्रफेशनल्स और सभी मेडिकल समुदायों से जुड़ी समस्याओं के समाधान का प्रयास किया जाएगा(नभाटा,हिसार,3.1.13)।

आगे बढ़ें...

पब्लिक पॉलिसी में करिअर

दो साल पहले तक अमित सेठ मल्टिनैशनल आईटी और मैनेजमेंट कंसल्टिंग फर्म लॉजिका के यूरोपियन ऑपरेशंस से जुड़े हुए थे। उनका रोल पब्लिक सेक्टर स्ट्रैटिजी कंसल्टिंग में सरकारी अफसरों से संपर्क करना था। इस दौरान उन्हें पब्लिक पॉलिसी में खुद को एनरोल कराने की जरूरत महसूस हुई। वह चीजों को अच्छी तरह समझना चाहते थे। सेठ के मुताबिक, आईआईएम बेंगलुरू ने उन्हें दो साल के पब्लिक पॉलिसी मैनेजमेंट प्रोग्राम में दाखिल होने के लिए बढ़ावा दिया। सेठ ने पिछले साल यह कोर्स पूरा किया और वह स्टार्टअप मॉडर्न फैमिली डॉक्टर में डायरेक्टर, स्ट्रैटिजिक अलायंस ऐंड कंसल्टिंग के तौर पर काम कर रहे हैं। 

इस स्टार्टअप का मकसद आस-पड़ोस के अस्पतालों और फार्मेसी के जरिए सस्ती हेल्थकेयर सर्विस देना है। उन्होंने बताया, 'आईआईएम बेंगलुरु ने मुझे ब्यूरोक्रेट्स के साथ मिलने, चीजें समझने और नेटवर्किंग का मौका दिया।' ब्यूरोक्रेट और ऐडमिनिस्ट्रेटिव अफसरों के अलावा सेठ जैसे लोग ऐसे रोल की ओर देख रहे हैं, जिनमें वह सरकार के साथ करीबी ढंग से काम कर सकें। वे पब्लिक पॉलिसी को अच्छी तरह समझना चाहते हैं। आईआईएम में आईआईएम बेंगलुरु (आईआईएम-बी) अकेला ऐसा इंस्टिट्यूट है, जो दो साल का फुल-टाइम एमबीए प्रोग्राम पब्लिक पॉलिसी में ओपन कैंडिडेट्स और ब्यूरोक्रेट्स के लिए चला रहा है। इंस्टिट्यूट ने फैसला किया है कि अगले साल के दो साल के बैच के लिए सीटों की संख्या डबल कर दी जाए। 

यह प्रोग्राम पहले केवल सरकारी अधिकारियों और सिविल सर्वेंट्स के लिए था। 2008 में इसे सबके लिए खोला गया। आईआईएम-बी के 'पोस्ट ग्रैजुएट प्रोग्राम इन पब्लिक पॉलिसी मैनेजमेंट' के चेयरमैन प्रफेसर जी रमेश के मुताबिक, 'जिन चीजों पर पॉलिसी का ज्यादा असर होता है, उनमें प्रफेशनल की दिलचस्पी बढ़ रही है। प्राइवेट सेक्टर अब इंफ्रास्ट्रक्चर, यूटिलिटी और म्यूनिसिपल सर्विसेज जैसे सेक्टरों से जुड़ा है। इस वजह से यह ट्रेंड बढ़ रहा है।' 2013 में आईआईएम-बी इस प्रोग्राम में 30 कैंडिडेट्स पब्लिक सेक्टर से लेगा। 30 लोग बाहर से होंगे। इस प्रोग्राम में कुल 60 सीटें हैं। इस साल तक बैच साइज 25-35 लोगों का था। इस प्रोग्राम में प्रफेशनल्स को पॉलिसी ऐनालिसिस स्किल्स और सॉफ्ट स्किल्स की सीख भी दी जाती है। 

आईएसबी भी जनरल मैनेजमेंट प्रोग्राम में ऑप्शनल सब्जेक्ट के तौर पर पब्लिक पॉलिसी को शामिल करेगा। वह अपने मोहाली कैंपस में अगले साल से इसकी शुरुआत कर रहा है। प्राइवेट कंपनियों को अब ऐसे लोगों की जरूरत है, जिन्हें सरकारी पॉलिसी की समझ हो और जो उससे बेहतर तालमेल बना सकें(अनुमेहा चतुर्वेदी,नभाटा,दिल्ली,12.12.12)।

आगे बढ़ें...

कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी से करियर की संभावना

दो हफ्ते पहले नए कंपनी बिल ने कंपनियों के लिए कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) को अनिवार्य बना दिया है। इसके तहत कंपनियों को नेट प्रॉफिट का 2 फीसदी सोशल वेलफेयर पर खर्च करना होगा। इससे सीएसआर के इंडिपेंडेंट स्ट्रीम के रूप में उभरने की उम्मीद है। 

कुछ कंपनियां सीएसआर में ज्यादा इंडिपेंडेंट प्रफेशनल लोगों को शामिल करने के लिए मौजूदा प्रोग्राम को रिव्यू कर रही हैं। इससे कॉम्पिटिटिव सैलरी, जॉब क्रिएशन और टॉप पर ज्यादा ताकतवर प्रफेशनल की जरूरत पैदा होगी। मैरिको के सीएफओ मिलिंद सरवटे ने कहा, 'इस अमेंडमेंट से इंडिया में सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी सेक्टर को ज्यादा कॉर्पोरेट अटेंशन अट्रैक्ट करने में मदद मिलेगी। इससे फाइनैंशल और ह्यूमन कैपिटल में ज्यादा इन्वेस्टमेंट होगा।' 

एस्सार ग्रुप के प्रेज़िडेंट (एचआर) आदिल मलिया ने कहा, 'अगर शुरुआत में टॉप पर थोड़ी हलचल देखने को मिलती है, तो भी आखिरकार इससे कॉर्पोरेट्स में सीएसआर की बड़ी टीम बनेगी। ब्रांड स्ट्रैटिजी के साथ सीएसआर को अजस्ट करने पर पिरामिड के टॉप पर ज्यादा जॉब्स क्रिएट होंगे।' हालिया घटनाक्रम के बाद डाबर अपने मौजूदा सीएसआर प्रोग्राम को रिव्यू कर रही है। कंपनी के एग्जेक्युटिव डायरेक्टर (एचआर) ए सुधाकर ने कहा कि अगर कंपनी को मौजूदा प्रोग्राम को बढ़ाने की जरूरत महसूस होती है, तो वह और प्रफेशनल्स हायर करेगी। 

जो कंपनियां ऐवरेज नेट प्रॉफिट का 2 फीसदी सीएसआर पर खर्च नहीं कर पाएंगी, उन्हें इसकी वजह बतानी होगी। उन पर कार्रवाई की जा सकती है। पेनल्टी भी लगाई जा सकती है। अभी ज्यादातर कंपनियों में सीएसआर ऐक्टिविटीज दूसरे मैनेजमेंट एरिया मसलन- एचआर, मार्केटिंग और कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन का हिस्सा हैं। कुछ कंपनियां कम्युनिटी के साथ मिलकर इसके लिए काम कर रही हैं। वहीं, कुछ इसे सिर्फ टैक्स चुकाने की तरह कानूनी खानापूर्ति मानती हैं। हालांकि, कुछ ऐसी भी कंपनियां हैं, जिनके बिजनेस से सीएसआर गहरा जुड़ा हुआ है। 

जो कंपनियां सोशल डिवेलपमेंट में पहले से कंट्रिब्यूट कर रही हैं, उनका कहना है कि बिल का उन पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। टाटा ग्रुप, आदित्य बिड़ला गुप, एस्सार ग्रुप, मैरिको सहित कुछ कंपनियां सिस्टेमैटिक तरीके से इस तरह के काम कर रही हैं। आदित्य बिड़ला ग्रुप में एचआर डायरेक्टर और कार्बन ब्लैक बिजनेस के सीईओ संतृप्त मिश्रा ने कहा, 'जो कंपनियां पहले से इस एरिया में काम कर रही हैं, उनका सिर्फ पेपरवर्क थोड़ा बढ़ जाएगा(रीका भट्टाचार्य/अनुमेहा चतुर्वेदी,नभाटा,दिल्ली,31.12.12)।'

आगे बढ़ें...