हैदराबाद की एक कंपनी में काम करने वाले विकलांग कर्मचारी को उसके बॉस ने इसलिए निकाल दिया था कि वह खुले में नित्य क्रिया से निवृत्त हुआ था और इसका कारण यह था कि शौचालय में विकलांग के अनुकूल सुविधा नहीं थी। इस तरह के कई ऐसे मामले प्रकाश में आते रहते हैं। केरल की एक आईटी कंपनी ने नोटिस बोर्ड पर साफ लिख दिया था कि फलां दिन कंपनी में कुछ विदेशी तकनीशियनों के साथ मीटिंग का आयोजन है इसलिए उस दिन कंपनी के विकलांग भाई दफ्तर न आएं। इससे आप खुद अनुमान लगा सकते हैं कि विकलांग व्यक्तियों के साथ कितना भेदभाव किया जाता है।
विकलांग व्यक्तियों को कब तक दया, उदारता, लाचारी का पात्र समझा जाएगा, इस प्रश्न का जवाब कोई भी देने को राजी नहीं है। इसी रूढ़िवादी पारंपरिक सोच के चलते देश के विकलांग भगवान द्वारा दी गई सजा को भोग रहे हैं। इनके लिए विशेष कार्य का क्षेत्र आज विशेष रूप से प्रतिबंधित है। अगर हम सही ढंग से देखें तो विकलांग लोग महज नाम के विकलांग हैं, असली विकलांग तो आज की सरकारें एवं कानून हैं जो बैसाखियों के सहारे चल रहे हैं।
विकलांग लोगों को हर क्षेत्र में लाभ उठाने का पूरा अधिकार है, चाहे सरकारी संस्थान हों या निजी संस्थान पर शारीरिक और मानसिक दृष्टिकोण संबंधी बाधाओं के चलते इनका लाभ अन्य लोग उठा रहे हैं। सरकारी नौकरियों में कई रिक्त स्थान जो विकलांगों के लिए निर्धारित किए जाते हैं, उन पर शारीरिक क्षमता वाले लोग विराजमान हो जाते हैं।
वर्ष १९४७ में मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा इस बात पर जोर देती है कि सभी मनुष्य स्वतंत्र पैदा हुए हैं और बराबर प्रतिष्ठा और अधिकार के पात्र हैं। हमारे संविधान में शामिल विभिन्न अधिकार और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून लिंग, जाति और विकलांगता इत्यादि के आधार पर बिना किसी भेदभाव के सभी व्यक्तियों से संबधित हैं पर इस तरह के प्रावधानों एवं कानूनों का इन व्यक्तियों के असली जिंदगी में कोई मतलब नहीं होता, समाज लाचार ही समझता है।
दफ्तरों में आज भी विकलांग लोगों के लिए अलग शौचालयों एवं बैठने का उचित प्रबंध नहीं है। विकलांग व्यक्तियों के लिए मौजूदा कानूनों के साथ-साथ इनके अधिकारों को कड़ाई से लागू करने की जरूरत के साथ ही प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण, जागरूकता बढ़ाने तथा विकास के सभी क्रियाकलापों में जरूरत है। कार्यान्वयन के सभी चरणों में विकलांगों को शामिल करने की जरूरत है।
इसके अलावा इनके अधिकारों पर राष्ट्र संघ प्रगतिशील प्रावधानों के मद्देनजर घरेलू कानूनों को भी संगतपूर्ण बनाने की बहुत जरूरत है। इन प्रयासों से ही उनका सशक्तिकरण होगा तथा सम्मिलित समाज का सृजन हो पाएगा(रमेश ठाकुर,नई दुनिया,दिल्ली,7.9.2010)।
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