धूमल सरकार द्वारा आईएएस अधिकारियों की जगह करीब आधा दर्जन पदों पर आईएफएस व आईपीएस अफसरों की तैनाती से राज्य में बवाल मचा है। इसकी वजह इन पदों पर अब तक आईएएस संवर्ग के अधिकारियों की ही तैनाती का चलन होना है। इससे आईएएस और आईएफएस अफसरों में उबाल है,लेकिन सर्विस मैटर होने के कारण कोई जुबान नहीं खोल रहा। इस फैसले से आईएएस संवर्ग के अफसरों को लगता है कि उनके पर कतरे गए हैं,एचएएस अफसर इसलिए नाराज है कि जिन अफसरों को आईएएस की जगह नियुक्तियों दी गई हैं वह गैर हिमाचली हैं। आईएफएस संवर्ग के अफसरों का रोना यह है कि वरिष्ठों को दरकिनार कर उनके जूनियरों को वरीयता दी गई हैं। इन अफसरों का मानना है कि यदि वह चुप रहे तो आगे यह चलन भी हो सकता है और यदि ऐसा हुआ तो फिर उनकी हैसियत खत्म हो जाएगी। इस सबके बीच अफसरों का एक वर्ग ऐसा भी है जो अंदर ही अंदर सरकार के इस फैसले से खासा खुश है। यह वर्ग यह मानकर चल रहा है कि हुजूर की मेहरबानी से कभी उनका भी दांव लग सकता है। ठीक वैसे ही जैसे कभी कैलाश चंद महाजन का दांव लगा था और उनको ऊर्जा सचिव बनाया गया था। वैसे आईएएस कैडर के पदों पर दीगर संवर्ग के अफसरों की नियुक्तियों का आधार महाजन की नियुक्ति को ही बनाया गया बताया जाता है। सरकार के इस फैसले के बाद माहौल खासा गर्म है। आईएएस अधिकारी अंदरखाने एकजुट हो रहे हैं। विरोध जताने के लिए एसोसिएशन के माध्यम से बात बढ़ाने की तैयारी भी हो रही है। इस संबंध में प्रधान सचिव कार्मिक अजय मित्तल कहते हैं किसी भी आईएफएस को उपायुक्त (डीसी) नहीं बनाया गया है। जहां तक प्रश्न सचिव पद पर आईएएस की तैनाती का है तो ऐसी कोई अनिवार्य शर्त नहीं है। वह कहते हैं कि वर्तमान में आईएएस संवर्ग के अधिकारियों की कमी चल रही है। इसकी वजह गत कुछ वर्षो में एचएएस अधिकारियों की पदोन्नतियां नहीं हो पाना हैं। इसके चलते हमें आईएफएस/आईपीएस अधिकारियों को तैनात करना पड़ा है(रचना गुप्ता,दैनिक जागरण,शिमला,30.9.2010)।
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