विश्वव्यापी मंदी को आए दो साल से अधिक हो चुके हैं, मगर कोई राजनेता या अर्थशास्त्री दावे के साथ कहने को तैयार नहीं है कि वह कब खत्म होगी। इधर कुछ दिनों से अमेरिका में ‘डबल डिप रिसेशन’ की आशंका प्रकट की जा रही है। यानी मंदी से उबरने के लक्षण दिखने के बाद फिर गिरावट का खतरा मंडरा रहा है। इस अवधारणा के तकनीकी पहलुओं को देखने के बजाय हम श्रमिकों की स्थिति को देखें, जो अति मंदी से सबसे अधिक पीड़ित और ‘डबल डिप रिसेशन’ से बेहद घबराए हुए हैं। हो सकता है कि आने वाले समय में अर्थव्यवस्था मंदी से बाहर आ जाए, किंतु श्रम उसके कुप्रभावों से वर्षों तक जूझता रहेगा। यह आशंका हाल में नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में संपन्न हुए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के आयोजन में जाहिर की गई थी।
इन संगठनों ने रेखांकित किया है कि अति मंदी का असर दीर्घकाल तक रहेगा और आने वाली पढ़ियां भी उसके कुपरिणामों को भोगेंगी। इसने दुनिया भर में 21 करोड़ लोगों को बेरोजगार बना दिया है। इतनी बेरोजगारी पहले कभी नहीं देखी गई। आज विश्व की 80 प्रतिशत आबादी को सामाजिक सुरक्षा देने वाले कानूनी प्रावधान उपलब्ध नहीं है। एक अरब 20 करोड़ लोगों यानी दुनिया की 40 प्रतिशत आबादी की कमाई आज इतनी नहीं हो रही कि वह अपने और अपने परिवार के लोगों का भरण-पोषण कर सके। इनकी दैनिक आय दो डॉलर या उससे कम है। वर्ष 2007 से अब तक पूरी दुनिया में बेरोजगारों की संख्या में तीन करोड़ का इजाफा हुआ है। जो परिस्थितियां बनी हैं, उन्हें देखते हुए नहीं लगता कि यह संख्या जल्दी घटेगी।
इस बेरोजगारी का सबसे बुरा असर युवा वर्ग पर पड़ा है। यह सचाई अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा ओस्लो सम्मेलन के ठीक एक महीने पूर्व जारी 86 पृष्ठों की एक रिपोर्ट में उजागर हुई है। रिपोर्ट में जिन युवाओं की बात की गई है, वे मोटे तौर पर 15 वर्ष से 24 वर्ष के हैं। वे जब पढ़-लिखकर, दक्षता एवं कौशल से परिपूर्ण हो वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में अपना योगदान करने के लिए आते हैं, तब उनका उद्देश्य अपने समाज को आर्थिक रूप से समृद्ध बनाते हुए सम्मानजनक जीवनयापन के लिए समुचित आय प्राप्त करना होता है। लेकिन जब उन्हें पता चलेगा कि उनकी योग्यता के मुताबिक रोजगार उपलब्ध नहीं हैं, तब उनको भारी निराशा होगी। वे न केवल अपने परिवार और समाज, बल्कि अपनी नजर में गिर जाएंगे। उनमें से कुछ आत्महत्या कर लेंगे या मनोरोगी बन जाएंगे। हो सकता है कि उनमें से कुछ विशुद्ध अपराध और आतंकवाद की दुनिया में दाखिल हो जाएं।
इस रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल दुनिया भर में 62 करोड़ कार्य सक्षम युवा थे, जिनमें से करीब आठ करोड़ 10 लाख यानी 13 प्रतिशत बेरोजगार थे, जो वैश्विक युवा आबादी का 13 प्रतिशत थे। गौरतलब है कि वर्ष 2007 में यह दर 11.9 फीसदी थी। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन से जुड़े अर्थशास्त्री स्टीवेन काप्सोस के मुताबिक, इतने बड़े पैमाने पर युवा बेरोजगारी अभूतपूर्व है। हालांकि चालू साल के दौरान इस दर के बढ़कर 13.1 प्रतिशत से ऊपर जाने की आशंका व्यक्त की जा रही है। कहने की जरूरत नहीं कि अति मंदी के इस दौर में सबसे अधिक मार युवा वर्ग पर पड़ी है। वयस्क बेरोजगारी में हालांकि यत्र-तत्र थोड़ी-बहुत कमी दिखी है, लेकिन युवा बेरोजगारों को कोई राहत नहीं मिली है। जो युवा अपना रोजगार बचा पाए हैं, उनके काम के घंटे बढ़ाकर मजदूरी कम कर दी गई है। स्पेन और ब्रिटेन सहित अनेक यूरोपीय देशों में युवा बेरोजगारों ने रोजगार के नए अवसर ढूंढने बंद कर दिए हैं। सबसे बुरी स्थिति विकासशील देशों में है। दक्षिण एशिया में वर्ष 2000 में जितने लोग युवा श्रम शक्ति में शामिल थे, वर्ष 2010 में उतने नहीं रह गए हैं। पुरुषों की तुलना में महिलाओं की स्थिति कहीं ज्यादा खराब है। उन्हें रोजगार के अवसर पाने में अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
इसी महीने ओस्लो में आयोजित सम्मेलन में, जिसका जिक्र पहले किया गया है, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रमुख ने कहा था कि अति मंदी ने बेरोजगारी की कष्टदायक विरासत छोड़ी है और यह करोड़ों लोगों के जीवन-यापन, सुरक्षा और प्रतिष्ठा के लिए खतरा बन गया है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन को इस चुनौती का सामना करने के लिए खड़ा होना चाहिए। यही समय है कि हम एकजुट होकर कदम उठाएं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अध्यक्ष का कहना था कि यद्यपि मंदी से उबरने के लक्षण दिख रहे हैं, फिर भी वैश्विक स्तर पर करोड़ों लोगों और उद्यमों के लिए संकट जस का तस है। श्रम संगठन के अनुसार, बेरोजगार न सिर्फ अपनी कमाई से हाथ धो बैठते हैं, बल्कि उनकी औसत आयु भी घटती है। उनकी अपने परिवार के सदस्यों सहित रोगों से मुकाबला करने की क्षमता कम हो जाती है। उनके बाल-बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में खलल पैदा होता है या पूरी तरह रुकावट आ जाती है। बेरोजगारी लोगों के नजरिये, जीवन मूल्य और सामाजिक साहचर्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है। इसने अमेरिका में हुए अध्ययनों का हवाला देते हुए रेखांकित किया है कि मंदी खत्म होने के 15-20 साल बाद भी कमाई में औसतन 20 प्रतिशत कमी रह जाती है। छंटनी के असर को हृदयरोग तथा मनोरोगों में बढ़ोतरी के रूप में देखा जा सकता है। यह भी अलग से रेखांकित करने लायक बातहै कि हमारे यहां क्रिकेट या बॉलीवुड पर जितना ध्यान दिया जाता है, उतना बेरोजगारी के संत्रास पर नहीं(गिरीश मिश्र,अमर उजाला,दिल्ली,30.9.2010)।
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30 सितंबर 2010
संकट में रोजगार
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