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05 अक्टूबर 2010

उत्तराखंडःगरीब छात्रों का यूं तो पूरा नहीं होगा सपना

केंद्र सरकार गरीब बच्चों को भी महंगे स्कूलों में शिक्षा प्राप्त कराने की बात कर रही है,लेकिन क्या निजी स्कूलों की मनमानी रुक पाएगी? गौरतलब है कि सरकारी फरमान पब्लिक स्कूलों के ठेंगे पर ही रहे हैं। मामला फीस वृद्धि का हो या पाठ्यक्रम बदलने का इन स्कूलों ने कभी सरकारी फरमान नहीं माने। ऐसे में सबको शिक्षा का आधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत क्या ये स्कूल 25 प्रतिशत सीटें आसानी से निर्धन बच्चों को दे देंगे? यह सवाल इस लिए भी बड़ा है क्योंकि कानून का पालन कराने के लिए न तो शासन प्रशासन के पास इच्छा शक्ति है और न ही ताकत। राजधानी देहरादून की बात करें तो यहां के पब्लिक स्कूल इस बार भी सरकार के फैसलों को ठेंगे पर ही रखेंगे। जी हां, अधिकांश स्कूलों में आगामी सत्र के लिए प्रवेश प्रक्रिया शुरू हो गई है और जो बचे हैं उनमें भी इस सप्ताह प्रवेश शुरू हो जाएंगे। जबकि प्रशासन अभी रणनीति बनाने और योजनाओं का खाका तैयार करने में ही लगा है। जब तक रणनीति बनेगी तब तक सीटें भर चुकी होंगी। वहीं, निजी स्कूलों ने इसको लेकर अपने मंसूबे भी साफ कर दिए हैं। सबको शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत उन्होंने केंद्र सरकार के फैसले पर सहमति तो जताई पर साथ ही निर्धन बच्चों के लिए अलग कक्षाएं चलाने की बात कहकर अपनी मानसिकता भी बता दी है। हम बात कर रहे हैं अधिनियम के तहत 25 फीसदी सीटें आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को दिए जाने की, इस मामले में निजी स्कूलों ने केंद्र सरकार से अलग कक्षाएं संचालित करने की अनुमति मांगी थी। देहरादून में छोटे-बडे़ करीब ढ़ाई सौ निजी स्कूल हैं। ये स्कूल हमेशा शासन, प्रशासन और सरकार के लिए सिरदर्द रहे हैं। बीते वर्षो के मामलों पर गौर करें तो बेतहाशा फीस वृद्धि, स्टॉल लगाकर किताबें यूनिफार्म बेचने, मनमानी कर विभिन्न मदों में हजारों रुपये वसूलने, घटिया सुविधाओं का स्तर आदि तमाम मामलों में जिला प्रशासन से लेकर शिक्षा विभाग और सरकारी मशीनरी पूरी तरह फेल रही है। ऐसे में केंद्र सरकार गरीब बच्चों को महंगे स्कूलों में शिक्षा दिलाने का सपना कितना सच होगा और किस तरह सच होगा कहना मुश्किल है। अभी तक शिक्षा विभाग ने इस मामले में कोई रणनीति तय नहीं की है। सरकारी गति से रणनीति बनी तो शायद इन स्कूलों में कक्षाएं शुरू हो चुकी होंगी और आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों का महंगे स्कूलों में शिक्षा का सपना अगले सत्र में एक बार फिर सपना बन कर ही रह जाएगा(दैनिक जागरण,देहरादून,5.10.2010)।

1 टिप्पणी:

  1. गरीबों के हित मे कौन सी सरकार सोचती है। सब को अपनी जेबें भरने की चिन्ता है। अच्छी जानकारी है। धन्यवाद।

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