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18 फ़रवरी 2011

बिहारःअंग्रेजी जीतने चलीं बेटियां

आपने मेट्रो शहरों की फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती युवतियों को देखा होगा। जो अंग्रेजी भाषा पर अपनी पकड़ से ज्यादा अपने अंग्रेजीयत रंग-ढंग के प्रदर्शन के प्रति कुछ ज्यादा ही उत्सुक होती हैं। लेकिन इसके ठीक उलट सूबे के गवंई और अत्यंत पिछड़े क्षेत्रों की बेटियां अंग्रेजीयत की जगह अंग्रेजी भाषा को 'जीतने' की राह पर चल पड़ी हैं।
यह बाजार के कुचक्रों से बचे और उदारीकरण की दौड़ से पीछे छूट गये लोगों का नया हौसला है और बेटियां इस हौसले की वाहक बनी हैं। यह पहल हुई बिहार राज्य शिक्षा शोध एवं प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) की सक्रियता से। ब्रिटिश लिंगुआ, नई दिल्ली के सहयोग से एससीईआरटी ने प्रदेश के सभी 38 जिलों के प्लस टू स्कूलों में 'स्पोकेन इंग्लिश स्किल एंड कैपेसिटी बिल्डिंग प्रोग्राम' लागू किया है। जिसकी शुरुआत महिला शिक्षकों को अंग्रेजी में दक्ष करने के साथ हुई। जिलावार 30-30 महिला शिक्षकों के जत्थे को अंग्रेजी बोलचाल और क्षमता निर्माण का आवासीय प्रशिक्षण दिया गया। फिर इनकी मदद से सुदूर गंवई क्षेत्रों के स्कूलों में छात्राओं को अंग्रेजी बोलचाल के गुर सिखाकर उनका आत्मविश्वास बढ़ाया गया। तीन-चार माह के प्रयास में अंग्रेजी बोलचाल में दक्ष छात्राओं का आत्मविश्वास आज बुलंदी पर है। इस समय राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों की डेढ़ लाख से ज्यादा लड़कियां कान्वेंट स्कूलों के बच्चों की तरह फर्राटेदार अंग्रेजी में बतियाने की कवायद में जुटी हैं। अंग्रेजीयत के मोहपाश में बंधे बिना आज ये अंग्रेजी को जीत रही हैं।


राजकीय कन्या विद्यालय (पटना) की छात्राएं आत्मविश्वास के साथ कहती हैं- 'सर, वी आर लर्निग इंग्लिश..' (और भी बहुत कुछ)। पूछने पर छात्रा अंजली, रीता द्विवेदी और मानवी कहती हैं-'पहले तो अंग्रेजी का नाम सुनकर डर लगता था, मगर अब तो घर-मोहल्ले में अंग्रेजी बोलचाल आम हो गया है..।' बाबूलाल यादव उच्च विद्यालय, एकडारा (मधुबनी) की शिक्षिका सुभद्रा यादव कहती हैं- 'ग्लोबल विलेज (वैश्विक समाज या गांव) के इस दौर में अंग्रेजी की महत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता। यह एक सराहनीय पहल है। अंग्रेजी बोलचाल की शिक्षा देने से ग्रामीण क्षेत्र की बच्चियों का आत्मविश्वास बढ़ेगा।'

आज आजीविका के लिए अंग्रेजी जरूरत बन चुकी है। इस पहल से लड़कियों में अंग्रेजी बोलने के प्रति आत्मविश्वास जगा है। साथ ही नारी सशक्तिकरण की अवधारणा को भी बल मिला है। इसके पहले अंग्रेजी बोलने में कमजोर शिक्षिकाओं को एक माह का आवासीय प्रशिक्षण दिया गया। यह कार्यक्रम शुरू होने के बाद स्कूलों की छात्राएं अंग्रेजी बोलचाल में पारंगत होने लगी हैं-हसन वारिस,निदेशक, एससीईआरटी

स्पोकेन इंग्लिश प्रोग्राम ने बिहार के उन बच्चों में आत्मविश्वास जगाया है, जो अंग्रेजी नहीं बोल पाने से मन में हीन भावना रखते थे। लेकिन इस पहल ने बहुत कुछ बदला है। सरकारी स्कूलों में यह प्रयोग जारी रहना चाहिए।
बीरबल झा, निदेशक, ब्रिटिश लिंगुआ(दीनानाथ साहनी,दैनिक जागरण,पटना,18.2.11)

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