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04 जुलाई 2011

जड़ों की तलाश में प्रवासी हिन्दी लेखन

प्रवासी साहित्य की नई धारा खुद को मुख्यधारा के हिन्दी लेखन में स्थापित करने के लिए मचल रही है। ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका, आबूधाबी, पोलैंड, फिजी व कैरेबियन आदि तमाम देशों में रहकर अनेक साहित्यसेवी हिन्दी साहित्य की रचना कर रहे हैं। उनके प्रयास से हिन्दी विकास का नया क्षितिज तथा भौगोलिक विस्तार पा रही है। भाषा और संस्कृति में जहां ऐसे लोगों की हैसियत एक भारतीय की है वहीं आर्थिक-राजनीतिक हैसियत अनिवासी भारतीय की। विदेश में रहकर हिन्दी की सेवा करने वाले साहित्यकारों की सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि उन्हें प्रवासी लेखक कहा जाता है। उनका मानना है कि इस तरह की अलग श्रेणी बना देने से हिन्दी साहित्य के इतिहास में उन्हें किसी छोटे पैराग्राफ में समेट दिया जाएगा, जबकि वे पूरी मेहनत व लगन से साहित्य रचना कर रहे हैं। वे खुद को प्रवासी के स्थान पर भारत-वंशी कहलाने का आग्रह प्रस्तुत करते हैं। वर्तमान में दिव्या माथुर, उषा राजे सक्सेना, जगमोहन कौर, तेजेंद्र शर्मा, स्नेहा ठाकुर, अभिमन्यु अनत, अर्चना पैन्यूली, अचला शर्मा, जाकिया जुबैरी, कृष्ण बिहारी, सुषम बेदी और पूर्णिमा वर्मन आदि विदेश में बसे तमाम साहित्यकार निरंतर हिन्दी में कहानियां, उपन्यास तथा कविताएं रच रहे हैं। विदेश में बसे इन रचनाकारों का भारत से गहरा संबंध बना हुआ है क्योंकि अंतत: भारत का हिन्दी भाषी वर्ग तथा पत्रिकाएं ही उनके लेखन संबंधी पहचान का आधार हैं। खुद प्रवासी लेखकों ने अपनी कई पत्रिकाएं तथा वेबसाइट तैयार कर ली हैं। पत्रिकाओं में ‘प्रवासी संसार’ व ‘अक्षरम’ तथा ‘अभिव्यक्ति’ और ‘प्रवासी दुनिया’ जैसी वेबसाइट इस समय प्रवासी साहित्य को प्रकाश में लाने का महत्वपूर्ण काम कर रही हैं। प्रवासी लेखकों का एक वर्ग निर्मल वर्मा, उषा प्रियंवदा तथा कृष्ण बलदेव वैद, जिन्होंने लंबा समय विदेश में रहते हुए लेखन किया, के माध्यम से अपनी परंपरा निर्मिंत करने की कोशिश में जुटा है। निर्मल वर्मा ने दस साल प्राग (चेकोस्लवाकिया) में बिताए थे और वैद ने कई साल अमेरिकी विविद्यालयों में अध्यापन किया। पर सच यह है कि निर्मल वर्मा तथा वैद ने कभी भारतीय संवेदना के बरक्स अपनी कोई प्रवासी अस्मिता नहीं बनाई। उषा प्रियंवदा भी विदेश में तब बसीं जब वे अपनी कई महत्वपूर्ण कृतियों की भारत में रहते हुए रचना कर चुकी थीं। उनकी नई कहानी आंदोलन की प्रतिनिधि कहानी ‘वापसी’ भी प्रवास की नहीं बल्कि ठेठ भारतीय यथार्थ की कथा है। जबकि प्रवासी लेखकगण जहां एक ओर देश की मुख्यधारा में शामिल होना चाहते हैं तो दूसरी ओर प्रवासी अस्मिता से जुड़े कई लाभ भी नहीं त्यागना चाहते। दोहरी नागरिकता के सिद्धांत को वह साहित्य में भी लागू करना चाहते हैं। यानी एक नागरिकता मुख्यधारा के हिंदी लेखन की तो दूसरी प्रवासी लेखन की। हिन्दी प्रवासी लेखकों की स्थिति भारतीय अंग्रेजी लेखकों से भिन्न है। भारतीय अंग्रेजी लेखक अपनी पहचान को लेकर कम असुरक्षित हैं जबकि प्रवासी हिन्दी लेखक हिन्दी के मुख्यधारा के लेखन से अपने को अलग महसूस करने के चलते सशंकित तथा चिंतित रहते हैं। इन लेखकों के लिए नोस्टेल्जिया और जड़ों की तलाश मुख्य संचालक शक्ति है क्योंकि पीछे छूटे गांव, घर, बचपन तथा पेड़ उनकी भावनाओं को निरंतर मथते रहते हैं। इन लेखकों ने ‘नोस्टेल्जिया’ को साहित्य लेखन में शक्तिशाली उपकरण की तरह भी प्रयोग किया है। निर्वासन की पीड़ा को मनुष्यता की व्यापक पीड़ा में समाहित कर दिया है क्योंकि निर्वासन व विस्थापन लगभग सभी की सामान्य नियति बन चुका है। भूमंडलीकरण की अवस्था में प्रवास के बावजूद अपने मूल स्थान से सतत लगाव अधिक संभव हुआ है, इसलिए प्रवासी साहित्य को भी नया आधार मिला है। इन दिनों उद्योग से लेकर मनोरंजन व तकनीक तक में निवेश के मकसद से एनआरआई का स्वागत- अभियान चल रहा है और उसी तरंग में प्रवासी लेखन भी भारत में अपनी जमीन तलाश रहा है। ऐसे में भारत के ही साहित्य व आलोचना तंत्र में सक्रिय एक खास वर्ग के अवसरवाद की भी आशंका है जो प्रवासी लेखन को महत्व दिलाने के नाम पर स्वयं अपने लिए विदेश के सैर-सपाटे तथा अन्य लाभ उठाने की फिराक में है। प्रवासी लेखकों के पास संघषर्शील आम निम्न मध्यवर्गीय हिन्दी लेखकों की तुलना में अधिक संसाधन भी हैं। प्रवासी लेखन में प्रवासी मानसिकता की आलोचना अनेक कहानियों को खासतौर पर प्रासंगिक बनाती है। इनसे पता चलता है कि विदेश में रहकर भारतीय कौन से अपराध, निम्न आचरण तथा धूर्तता करते हैं। नौकरानियों का शोषण, नागरिकता पाने व दिलाने के लिए अवैध विवाह, जाली दस्तावेजों के बल पर अमेरिका-इंग्लैंड जाना तथा अवैध संपत्ति निर्माण जैसे कार्य आम हैं। इसी तरह भारत आकर अपने को खास वीआईपी रु तबे के साथ पेश करना तथा असल हालात पर मुंह बिचकाना भी ठेठ प्रवासी मानिसकता है, जिसकी आलोचना प्रवासी लेखकों की कहानियों में मिल जाती है। तेजेंद्र शर्मा की हंस में प्रकाशित कहानी ‘दीवार थी, दीवार नहीं थी’ इसी मानिसकता को उघाड़ती है। पर कुछ विषय अब भी अछूते रह गए हैं। जैसे निर्वासन का दर्द उनके लेखन में है पर निर्वासन किस हद तक स्वैच्छिक तथा स्वार्थ प्रेरित है, इसकी झलक तक नहीं मिलती है। आलम यह है कि प्रवासी लेखक भारत को याद तो बहुत करते हैं पर भविष्य उन्हें विदेश में ही दिखता है। वे लाख नकारें पर भारत उनके लिए पर्यटन तथा मेहमान बने रहने का देश बन चुका है। वे भारत व भारतीयों को विषय बनाकर तो कथा-साहित्य की रचना अधिक करते हैं पर विदेश का परिवेश उनके लेखन में कम सामने आता है। यूके के किसी अंग्रेज परिवार या अरब देश की संस्कृति से उनके संबंध या विलगाव की विषयवस्तु उनके लेखन में नहीं के बराबर है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि अगर ठेठ भारतीय परिवेश व विषय ही उनके लेखन के आधार हैं तो प्रवासी साहित्य को पाठक क्यों पढ़े? इन विषयों पर तो मुख्यधारा का साहित्य निरंतर अपनी बात कहता आ रहा है। चुभती हुई बात है पर सच यही है कि प्रवासी लेखन अभी कोई बड़ी कृति नहीं दे सका है जिसको आधार बनाकर उसकी विशेषताओं को चिह्नित किया जा सके। वर्णित परिवेश बदला है पर प्रवासी लेखन की दुनिया उस मध्यवर्ग तक सीमित है जिस पर पहले ही हिंदी में बड़ी मात्रा में लेखन मौजूद है। प्रेमचंद, रेणु, यशपाल, नागार्जुन, शमशेर व गोरख पांडे आदि के लेखन के माध्यम से साहित्य में सामंतवाद-साम्राज्यवाद विरोध तथा समानतामूलक राष्ट्रवाद के जो प्रत्यय विकसित हुए थे, उन प्रत्ययों का भी प्रवासी लेखन भूमंडलीकरण के गैर- आलोचनात्मक समर्थन से निषेध कर देता है। इसके अलावा फिलहाल हिन्दी साहित्य में विस्थापित आदिवासी, वंचित दलित तथा उत्पीड़ित स्त्रियों का जीवन-चितण्रअभिव्यक्ति की कसौटी बन चुका है और प्रवासी लेखन के पास इस कसौटी के लिए विशेष सहानुभूति नहीं है। सौंदर्यशास्त्र के उथलेपन को देश-प्रेम की भावुकता से अधिक दिनों तक नहीं ढका जा सकता, इसलिए अपने कोरे आत्मजन्य अनुभवों तथा परिवेशगत सीमाओं का अतिक्रमण करने में ही प्रवासी लेखन की परीक्षा होगी। जेम्स क्लीफोर्ड नामक अमेरिकन स्कालर ने विस्तार से बताया है कि डायस्पोरा (अनिवासी) के लिए स्थानीयता का क्या महत्व होता है और किसी नेटिव (मूल निवासी) के लिए उसका कितना अलग महत्व होता है। मूल निवासी के लिए स्थानीयता ठोस यथार्थ है तो अनिवासी के लिए वह एक रूमानी स्मृति। यह स्मृति भी इसीलिए अधिक आह्लादकारी तथा प्रिय है क्योंकि स्थानीय यथार्थ की दिक्कतों का रोज सामना नहीं करना पड़ रहा है। उसकी स्मृति तथा संस्कृति में दरार आ चुकी है जबकि मूल निवासी की स्मृति तथा संस्कृति अभी जुड़ी हुई है। 70 के दशक के बाद प्रवासी मानिसकता तथा गृह-स्मरण के कुछ और कारण भी रहे हैं। उनमें से यह भी है कि पश्चिमी देशों ने उदारवाद के तहत ‘बहुसंस्कृतिवाद’ की नीति को अपनाया है जिसमें प्रवासियों पर अपनी भाषा, धर्म, प्रजाति की संस्कृति को पराई संस्कृति में विलोपन करने के दबावों का कम सामना करना पड़ा है। जबकि इससे पहले जो लोग भी विदेश जाते थे, उनके ऊपर राजनीतिक तथा नस्लीय दबाव डालकर अपने ‘होमलैंड’ से सभी संबंध विच्छेद करने के लिए कहा जाता था। इसने प्रवासी लेखकों को अपनी संस्कृति से जुड़े रहने के लिए ठोस राजनीतिक- सांस्कृतिक आधार मुहैया कराया है। आज का प्रवासी लेखन निस्संदेह नए मांग-पत्रों के साथ अपना कद बढ़ा रहा है पर भविष्य में उसकी परख प्रवासीपन के भावुक आग्रहों से नहीं बल्कि साहित्यिक समृद्धि के बल पर ही होगी(वैभव सिंह,राष्ट्रीय सहारा,3.7.11)।

1 टिप्पणी:

  1. अच्छी सोंच लिखते रहिये , ऐसे लोगों के साहित्य और हिन्दी प्रेम को नमन बधाई

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