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26 मई 2012

गांवों में बालिका-उच्चशिक्षा सिर्फ आधी हकीकत है

हमारे देश में जहां आबादी का बड़ा प्रतिशत गांवों में रहता है वहां लड़कियों की दशा अभी भी सोचनीय है। शहरी लड़कियों की तुलना में गांव में रहने वाली लड़कियों को पढ़ाई के लिए अधिक जद्दोजहद करनी पड़ती है। ज्यादातर ग्रामीण परिवारों में पढ़ाई को दूसरे विकल्प के तौर पर लिया जाता है। लड़कियों के लिए घर के काम सीखने व करने ज्यादा जरूरी माने जाते हैं। सफाई-बुहारी, चूल्हा-चौका, पालतू पशु की देखरेख जैसे- दूध दोहना, उपले बनाना, चारे का इंतजाम इत्यादि के बाद पढ़ाई का नंबर आता है। उनकी शिक्षा को उतनी तवज्जो नहीं मिल पाती जितनी लड़कों को मिलती है। ज्यादातर गांवों में लड़कियों को दसवीं या बारहवीं तक शिक्षा के पश्चात् घर बैठा दिया जाता है। बहुत हुआ तो स्नातक की पढ़ाई कर ली। प्रोफेशनल कोर्सेज तथा बी.एड. इत्यादि करने वाली गांव की लड़कियों की संख्या आज भी बेहद कम है। प्रारंभिक शिक्षा के पश्चात् गांवों में लड़कियों की जल्दी शादी कर दी जाती है। ऐसे ग्रामीण परिवार आज भी विरले हैं जिनमें लड़कियां शिक्षा प्राप्त कर अपना समुचित विकास कर पाती हैं। हालांकि भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के प्रसार के नतीजे अब धीरे-धीरे सामने आने लगे हैं। किसान, मजदूर अन्य कामगार अपने बच्चों को शिक्षित बनाने में रुचि लेने लगे हैं। लड़कों के साथ-साथ, बालिकाओं की स्कूल जाने की दर में भी इजाफा होने लगा है। हालांकि प्राथमिकता अभी भी दो जून की रोटी के जुगाड़ को ही दी जाती है। यह एक मजबूरी भी है परन्तु मिड-डे मील जैसी योजनाओं के लागू होने से ग्रामीण अपनी संतानों को स्कूल भेजने लगे हैं। जहां तक बात महिलाओं की उच्च शिक्षा की है उसके लिए हर स्तर पर प्रयास बेहद जरूरी हैं। ग्रामीण महिलाओं की संपूर्ण उन्नति के लिए आवश्यक है कि हमारी सोच में परिवर्तन आये। शहरी लड़कियों की तुलना में देखा जाए तो ग्रामीण लड़कियां अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करने के कारण अधिक मजबूत हो जाती हैं। 

लड़कियां व महिलाएं आज हर क्षेत्र में पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती दे रही हैं परन्तु इसमें अधिकतर शहरों व नगरों का योगदान है। शिक्षा, तकनीकी,विज्ञान, प्रशासन, सेना, पुलिस, खेल इत्यादि सभी क्षेत्रों में स्त्रियों के लिए द्वार खुले हैं। ग्रामीण स्तर पर इस सामाजिक चेतना की बहुत ज्यादा जरूरत है, जब बालिकाएं स्कूल, कालेज से आगे निकलकर अपने व देश के भविष्य को उज्ज्वल बना सकेंगी।

सरकारें अपनी तरफ से प्रयास करती रही हैं। हाल ही में हमें मौलिक शिक्षा का अधिकार प्राप्त हुआ है। परन्तु महिलाओं, लड़कियों की शिक्षा के स्तर पर क्रांति की दरकार है। आम जनता की भागीदारी से ही यह कार्य मुमकिन है(शायनी,शिक्षालोक,दैनिक ट्रिब्यून,1.5.12)।

1 टिप्पणी:

  1. समाज के वि‍भि‍न्‍न अंगों को सम्‍मि‍लि‍त कि‍ये बि‍ना बदलाव बहुत मुश्‍कि‍ल है

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