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22 अगस्त 2014

भारतीय भाषाओं के पुनर्वास का प्रश्न

नई सरकार के आते ही हिंदी वर्ग विशेष के लेखकों और वक्ताओं की सक्रियता का कारण तो समझ आता है,लेकिन ऐसे अधिकतर लेख पढ़ कर निराशा ही होती है कि अब भी ये निष्कर्ष हिंदी समर्थक या हिंदी-विरोधी पक्षों से आगे जाते दिखाई नहीं देते। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय भाषाओं की क्या भूमिका होनी चाहिए? क्यों यह प्रश्न वैचारिक विश्लेषण का हिस्सा नहीं बनता? यह अफसोस की बात है कि भाषा के प्रश्न को सामाजिक न्याय और बराबरी के पहलुओं से जोड़ कर देखने के प्रयास नहीं किए जाते। 
कोई भी भाषा गंभीर विचार-विमर्श का आधार बन सकती है बशर्ते कि उस भाषा में वे सभी साधन विकसित किए जाएं। आखिर कब तक यह दोहरापन जारी रहेगा कि दादा-दादी और नाना-नानी से बात करने के लिए तो अपनी भाषाएं याद आती हैं लेकिन ज्ञान की बात करने के लिए सिर्फ अंगरेजी का आलाप आरंभ हो जाता है। मानो अगर यह आलाप आप नहीं लगा सकते तो आपके विचारों में कोई ताकत ही नहीं होगी।
क्यों प्रत्येक वर्ष टीवी पर बजट की समीक्षा करने के लिए अच्छे हिंदी वक्ताओं का टोटा पड़ जाता है? क्यों फिर ऐसे विश्लेषण सुनने पड़ते हैं जिनमें अटपटी हिंदी और हिंग्लिश की शब्दावली की भरमार होती है? अंतत: बजट समीक्षा इस कदर बोझिल हो जाती है कि बजट जैसी आर्थिक प्रक्रिया की बारीकियां तो छोड़िए उसके प्रमुख बिंदुओं को समझने में भी असमंजस पैदा होने लगता है। लगभग यही स्थिति उन सभी विषयों पर लागू होती है जिनमें भाषा संबंधी विशिष्ट जानकारी की जरूरत होती है। इसलिए यह समझना बहुत जरूरी है कि भारतीय भाषाओं में और विशेषकर हिंदी में ज्ञान के विविध पक्षों के लिए विशिष्ट शब्दावली का जो अभाव नजर आ रहा है वह बहुत हद तक बदलते परिवेश का परिणाम है जिसमें हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में विविध विषयों की जानकारी का लेन-देन घटता जा रहा है। यह प्रमुख चिंता का विषय बनना चाहिए।
अपनी भाषाओं के द्वारा ज्ञान का प्रसार ही पश्चिमी देशों को भूमंडलीय स्तर पर आर्थिक और व्यापारिक मामलों में चौधराहट का अवसर प्रदान करता है। इस भूमिका को अख्तियार करने में इन देशों की शैक्षिक संस्थाओं की प्रमुख भूमिका रहती है। इन शैक्षिक संस्थाओं के द्वारा ही शोध और उसके द्वारा भाषा गढ़ने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में भाषा की अहम भूमिका बनती है जो उसके वैज्ञानिक स्वरूप को ही सुनिश्चित नहीं करती, बल्कि पूरी दुनिया में उसकी भाषा के प्रसार को भी सुनिश्चित करती है। टेलिफोन का आविष्कार या फिर मोबाइल का प्रचलन महज पश्चिमी ज्ञान का प्रसार नहीं है, बल्कि उस भाषा का भी प्रसार है जिसके  माध्यम से ‘टेलि’ जैसे शब्द (जो ग्रीक भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है ‘दूर’) का प्रयोग टेलीफोन और टेलीविजन जैसे शब्दों को गढ़ने के लिए किया गया।
पश्चिमी देशों ने भाषाओं को ज्ञान का आधार बनाने के साथ ही अन्य देशों में भी इस ज्ञान के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया, लेकिन यह भी सुनिश्चित किया कि यह ज्ञान उनकी अपनी भाषा में प्रसारित हो। इसी का परिणाम है कि आज हजारों भारतीय जो विदेशों में उच्च शिक्षा के लिए जाते हैं, इस तथ्य की तसदीक के लिए कि वे अंगरेजी भाषा जानते हैं, उन्हें इन देशों की कई परीक्षाएं पास करनी पड़ती हैं। टॉफल और आइइएलटीएस जैसी परीक्षाओं का संचालन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है, जिसके बिना कोई भी भारतीय इंग्लैंड या अमेरिका में उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकता। 
इसके विपरीत क्या हम अपने देश में भाषा की ऐसी किसी मानक परीक्षा का समावेश कर पाए हैं? हम इस तरह का मानक नहीं खड़ा कर पाए हैं, क्योंकि हमने किसी भारतीय भाषा को उच्च शिक्षा के लिए निर्मित करने का प्रयास ही नहीं किया। उच्च शिक्षा की भाषा के लिए हमने अंगरेजी को ही जारी रखा, जिसके  कई दूरगामी परिणाम निकले हैं और भविष्य में भी इसके विपरीत परिणाम सामने आएंगे।
यह आश्चर्य की बात नहीं है कि विदेशी छात्र, जो भारतीय विषयों पर शोध करते हैं, वे जब भारत आते हैं तो उन पर कोई शर्त लागू नहीं होती कि वे भारत में आने से पहले कोई भारतीय भाषा सीखें। अधिकतर विदेशी छात्र भारत में बिना शोध-वीजा के दाखिल होते हैं और तमाम नियमों को ताक पर रख कर अपना काम करते हैं। क्या किसी भारतीय छात्र के लिए ऐसा करना संभव होगा कि वह ब्रिटेन जाकर बिना शोध-वीजा के शोध कर सके? क्या आप कल्पना करेंगे कि अंगरेजी ज्ञान के बिना बिटेन या अमेरिका के पुस्तकालयों में जाकर काम कर सकें?
भारत के बड़े शहरों में रहने वाले ऐसे अनेक विदेशी छात्र मिल जाएंगे जो बिना भाषा जाने इन शहरों में रह रहे हैं, बल्कि अब तो वे भारतीय अर्थव्यवस्था का लाभ उठाने से भी नहीं चूकते। ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जो बताते हैं कि भारतीय भाषाओं के महत्त्व को गंभीरता से न लेने के कितने विपरीत परिणाम निकल रहे हैं। इस संदर्भ में नई सरकार द्वारा भारतीय भाषाओं और विशेषकर हिंदी के महत्त्व को उभारना अहम कदम साबित हो सकता है।

यह कदम सही दिशा में उठेगा, तभी उन प्रदेशों के नौनिहालों के साथ न्याय किया जा सकेगा जिनके पूर्वजों को पहले राष्ट्रीयता के नाम पर और फिर उत्तर भारत के शिक्षित वर्गों ने हिंदी के नाम पर राष्ट्रीय आंदोलन की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया। उत्तर भारत के उन तमाम वर्गों ने अपनी बोलियों को दरकिनार करके हिंदी का दामन थामा   था, इस विश्वास के साथ कि आजादी के बाद वे अंगरेजी के चंगुल से मुक्त हो पाएंगे। लेकिन हिंदी समेत भारतीय भाषाओं को उच्च शिक्षा के माध्यम के तौर पर स्वीकार न किया जाना यह दर्शाता है कि इन भाषाओं को राजनीतिक उत्साह जगाने के लिए तो प्रयोग किया गया, लेकिन कभी भी इन्हें गंभीर विषयों के लिए तैयार नहीं किया गया।
नई सरकार का भाषाई सपना तब तक साकार नहीं हो सकता, जब तक वह भारतीय भाषाओं को ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में प्रोत्साहित नहीं करेगी। भारतीय भाषाओं को ज्ञान-विज्ञान की भाषाएं बनाए बिना हम कमजोर तबकों के लिए विकास को अर्थपूर्ण दिशा नहीं दे पाएंगे। तब तक विकास की किसी भी परियोजना को बेमानी ही माना जाएगा जब तक उसमें इन वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित नहीं की जाएगी। अंगरेजी भाषा की पृष्ठभूमि से आने वाले लोग विशिष्ट सामाजिक और आर्थिक वर्ग से आते हैं। अंगरेजी को ही गुणवत्ता का आधार मानना केवल इस वर्ग के लोगों को लाभ पहुंचाना है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विजय महज एक राजनीतिक दल और उसकी विचारधारा की जीत नहीं है, बल्कि यह उस व्यक्तित्व की भी जीत है जिसने अखिल भारतीय स्तर पर संवाद के लिए अंगरेजी को नहीं, बल्कि हिंदी और गुजराती को आधार बनाया। उनके लंबे चुनावी अभियान में उनके वक्तव्यों और तर्कों की भाषा के पीछे हिंदी और गुजराती के संस्कार भी थे जिसके  द्वारा उन्होंने विरोधी दलों पर हमले बोले। इस पहलू को दूसरे नजरिए से भी देखा जा सकता है कि विरोधी दलों के नेता जिन पर वंशवाद के आरोप लगे, उनकी हार के पीछे उनके दस वर्षीय शासन की विफलताएं रहीं, लेकिन किसी भी एक भाषा में प्रभावी संवाद कायम न कर पाने की उनकी अकुशलता को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। अभी इन पक्षों को विश्लेषण का आधार बनाने के लिए सामाजिक मंच भी तैयार नजर नहीं आते। 
कांग्रेसी नेतृत्व द्वारा जनता के साथ किए गए संवाद इस कदर प्रभावहीन थे कि अवाम को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाए। जनता की इस अस्वीकृति के पीछे भाषा के पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगर कहें कि कांग्रेसी नेता अंगरेजी और हिंदी दोनों ही भाषाओं के प्रभावी इस्तेमाल में अक्षम रहे तो यह गलत नहीं होगा। 
दरअसल, उत्तर भारत में भूमंडलीकरण के बाद नौजवान मतदाता की भूमिका ने वर्तमान चुनाव परिणामों को तय करने में अहम भूमिका निभाई। युवाओं की इस भूमिका को भाषा और संवाद के तरीकों से जोड़ कर भी देखा जा सकता है। तकनीकी विकास और सूचना तंत्र का प्रसार कई अर्थों में अंगरेजी शिक्षा की तरह महज प्राइवेट स्कूलों तक केंद्रित नहीं रहा, बल्कि यह गैर-अंगरेजी नौजवानों का हथियार भी बना है।
सत्तर के दशक में भारतीय भाषाओं में पढ़ने वाले छात्रों में अंगरेजी न जानने की हीन भावना इन भाषाओं के लिए समर्थन जुटाने में आड़े आती रही। लेकिन इक्कीसवीं सदी के गैर-अंगरेजी भाषी नवयुवकों के बीच तकनीकी विकास की विशेष भूमिका रही है। अंगरेजी के अभाव में यह वर्ग अब भी मौजूद है, लेकिन अब वह हीन भावना से ग्रस्त नहीं है जिस तरह वह सत्तर या अस्सी के दशक में दिखाई देता था। उसके पास तकनीक और सूचना का औजार है जिसके माध्यम से वह अंगरेजी-प्रभाव का मुकाबला करने की क्षमता दिखा रहा है। वह अंगरेजी अधूरी ही बोलता है, लेकिन तकनीकी शब्दावली की ढाल के सहारे अंगरेजी के वार को बेकार करने की क्षमता रखता है। भारतीय बोलियों को बरतने वाले ये नौजवान सूचना तंत्र के प्रभावी वाहक बन कर उभरे हैं। अब भी ये वर्ग संवाद के लिए भारतीय भाषाओं पर ही निर्भर हैं। 
यह केंद्र और प्रदेशों की सरकारों को तय करना है कि भारतीय भाषाओं को भविष्य में कैसे ज्ञान-विज्ञान की भाषाएं बनाया जा सकता है। लेकिन इस तथ्य से भी हम मुंह नहीं मोड़ सकते कि भाषा कोई भी हो, उसको बरतने में आलोचनात्मक और विश्लेषणात्मक दृष्टि अपनाए बिना उसे सक्षम नहीं बनाया जा सकता। भारतीय भाषाओं को ज्ञान-विज्ञान की भाषाएं बनाने के लिए विविध संस्थाओं को उनके प्रति ईमानदारी से पेश आना होगा। अगर अपनी भाषाओं के प्रति अनुशासन और गंभीरता नहीं है तो महज पौराणिक कथाओं के आधार पर भारतीय अतीत की श्रेष्ठता का गुणगान काफी नहीं है। अपनी भाषाओं को ज्ञान-विज्ञान के विविध अनुशासनों से जूझना होगा। फिर यह लक्ष्य हिंग्लिश से तो कभी भी प्राप्त नहीं किया जा सकता(ऐश्वर्ज कुमार,जनसत्ता,दिल्ली,21 अगस्त,2014)

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपका आलेख एकदम सटीक है पर केवल लेख लिख देने से काम नहीं चलेगा. हम सभी को कुछ करना पड़ेगा

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  2. आशा है नई सरकार भारतीय भाषाओं को ज्ञान-विज्ञान की भाषा बनाने का प्रयास करेगी।

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