केंद्रीय विद्यालयों के स्टूडेंट्स के हल्के बस्ते को देखकर अब वे पैरंट्स भी इसकी मांग करने लगे
हैं जिनके बच्चे प्राइवेट व अन्य स्कूलों में पढ़ते हैं। कुछ निजी स्कूलों के पदाधिकारियों के मुताबिक पैरंट्स टीचर्स मीटिंग (पीटीएम) में पैरंट्स अब हल्के बस्ते की बात उठाने लगे हैं। पैरंट्स अब स्कूलों की सलाह देने लगे हैं कि केंद्रीय विद्यालय की नीति अपनाना पैरंट्स, स्टूडेंट्स और टीचर के भी हित में है। जिला शिक्षा कार्यालय में जाकर भी पैरंट्स अब इस तरह की मांग करने लगे हैं।
गौरतलब है कि केंद्रीय विद्यालय ने इस सत्र से कुछ ऐसे कदम उठाए हैं जिससे स्टूडेंट्स के बैग का बोझ लगभग 60 प्रतिशत तक कम हो गया। स्कूलों की बुक्स को 3 या 4 पार्ट में कर दिया गया है। इतना ही नहीं, क्लास वर्क के लिए कॉपी की जगह पेज ने ले ली है। फाइल बच्चों के घरों में रहती है। होमवर्क कॉपी भी 100 पेजों से अधिक की नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा गत्तों की बाइंडिंग की जगह पेपर की बाइंडिंग को महत्व दिया गया है। छोटे बच्चों के लिए आधे लीटर की वॉटर बोतल और बड़ों के लिए एक लीटर की अनिवार्य कर दी गई है।
केंद्रीय विद्यालय से जुड़े पैरंट्स क्या कहते हैं
बच्चों की हित में स्कूल के छोटे-छोटे फैसले बड़ी राहत दिलाती है। पहले बच्चे थके हुए घर लौटते थे। जबसे बस्ते का बोझ हल्का हो गया है, उनके चेहरे पर थकान नजर नहीं आते। वे अब हंसते-खेलते आते हैं। स्कूल बैग का बोझ कम होने से हमारे बच्चे को खुश हैं ही हमारी भी टेंशन काफी हद तक खत्म हो गई।
- भावना , पैरंट्स , राजीव नगर
वाकई अन्य स्कूलों को भी ऐसे कदम उठाने चाहिए। बच्चों का बोझ काफी कम हो गया है। इससे बच्चों में थकावट कम होती है और वह पढ़ाई में अधिक मन लगा पाते हैं। पहले तो इतने भारी बैग होते थे कि पैरंट्स भी उसे उठाकर थक जाते थे।
- रेखा अग्रवाल , पैरंट्स , राजीव नगर
क्या कहते है केंद्रीय विद्यालय के स्टूडेंट्स
हल्के बैग लेकर आना बेहद अच्छा लगता है। घर के आसपास के दोस्तों में सबसे हल्का बैग मेरा ही है। इससे काफी राहत मिली है। पहले चलने में काफी परेशानी होती थी , लेकिन अब पता भी नहीं चलता कि पीठ पर बैग टंगा हुआ है या नहीं।
- सिकंदर , 10 वीं
बैग का वजन इस साल से करीब 60 प्रतिशत तक कम हो गया है। क्लास वर्क के लिए कॉपी की जगह पेज लाने से कॉपियों का वजन काफी कम हो गया है। इसके अलावा बुक्स को कई हिस्सों में बांट देना काफी अच्छा है। इससे किताबें भी कम वजन की रह गई हैं।
- रंजन , 10 वीं
पहले मुझे बैग उठाने में परेशानी होती थी। स्कूल के गेट तक आने में मैं थक जाती थी , लेकिन अब तो स्कूल बैग्स का बोझ काफी कम हो गया है। जिसकी वजह से थकावट भी कम होती है।
- अदिती , 9 वीं
हां , इस कदम से हमें राहत मिली है। अन्य स्कूलों को भी ऐसे कदम उठाने चाहिए ताकि बच्चों के बैग्स का वजन कम हो। बस्ते का वजन जरूरत से अधिक हो जाने से शारीरिक तकलीफें तो बढ़ती ही हैं , मानसिक रूप से भी बच्चे परेशान रहते हैं।
अनूपलता, 11वीं(पूनम गौड़,नवभारत टाइम्स,गुडगाँव,24.10.2010)
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