शिक्षक की नियुक्ति बच्चों को पढ़ा-लिखा कर समाज व देश का भविष्य संवारने के उद्देश्य से की जाती है. मगर स्थिति यह है कि शिक्षण कार्य में कम और गैर शैक्षणिक कार्यो में इनका समय अधिक व्यतीत होता है. सरकारी आदेश व राष्ट्रहित में ये कुछ कह भी नहीं सकते.
नतीजा यह होता है कि स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित होती है. शैक्षणिक सत्र 2010-11 को ही लें, तो सत्र के 365 दिनों में 234 दिन शिक्षक पठन-पाठन को छोड़ स्कूल से बाहर रहे.अप्रैल में मैट्रिक की परीक्षा है, लेकिन अब भी कई शिक्षक जनगणना कार्य से पूर्णत निवृत्त नहीं हो पाये हैं.
हालांकि जनगणना कार्य के दौरान स्कूलों में छुट्टी नहीं थी. इस कार्य में करीब 78 दिन शिक्षकों को लगाया गया है. इसलिए यदि 234 में से इतने दिन घटा भी दिये जायें, तो भी शिक्षक स्कूल से 156 दिन बाहर रहे हैं.
जनगणना के दौरान स्कूलों का समय बदला गया था, जिसमें कार्यावधि हाफ डे के समान थी. कार्यावधि आधी होने व दो-दो कार्यभार की वजह से पठन-पाठन प्रभावित हुआ है. माना जाता है कि इसका असर इस वर्ष की मैट्रिक परीक्षा के रिजल्ट पर भी पड़ेगा है(प्रभात खबर,जमशेदपुर,10.3.11).
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