उत्तर प्रदेश में जाट भले ही पिछड़े वर्ग की सूची में शामिल हों। अब केंद्रीय सेवाओं में पिछड़ा वर्ग के आधार पर आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन भी चला रखा है। लेकिन प्रदेश सरकार की फाइलों में दर्ज राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की यह नोटिंग काबिलेगौर है- जाट प्रथम दृष्टया आर्थिक एवं सामाजिक दृष्टिकोण से पिछड़े नहीं दिखते, इसलिए आयोग उन्हें पिछड़ा वर्ग में शामिल किए जाने की मांग से सहमत नहीं है। आयोग ने यह नोटिंग जिस वक्त की थी, राम प्रकाश गुप्त मुख्यमंत्री थे। सरकार ने आयोग की इस नोटिंग को नजरअंदाज करते हुए दो मार्च-2000 को कैबिनेट की बैठक बुला ली। जाट जाति को पिछड़ा वर्ग में शामिल करने के प्रस्ताव को सीधे कैबिनेट से मंजूरी दिला दी।
जल्दबाजी की वजह :
जाटों को पिछड़े वर्ग में शामिल करने का मुद्दा आयोग में वर्ष 1997 से लंबित चल रहा था। नवंबर 1999 में राम प्रकाश गुप्त मुख्यमंत्री बने। उन्होंने एक जनसभा में जाटों को पिछड़ा वर्ग में शामिल करने की घोषणा कर दी। इसके बाद सरकार की तरफ से आयोग को एक पत्र आया कि मुख्यमंत्री ने घोषणा कर दी है। कैबिनेट में प्रस्ताव जाने के लिए आयोग की सिफारिश चाहिए। इसलिए जल्द संस्तुति की अपेक्षा है। आयोग ने ऐसा करने से मना कर दिया।
आयोग का तर्क :
वर्ष 1997 में यह प्रकरण जब आयोग के विचारार्थ आया तो आयोग ने सरकार को लिखा था कि प्रथम दृष्टया जाट पिछड़े नहीं दिखते। अगर सरकार इस पर आयोग का स्पष्ट मत चाहती ही है तो उसे आयोग को संसाधन उपलब्ध कराने होंगे ताकि वस्तृत सर्वे करा सके।
सरकार का तर्क :
सरकार का कहना था कि जाटों की संख्या पूरी जनसंख्या के दो प्रतिशत से भी कम है। सरकारी नौकरियों में भी उनका प्रतिनिधित्व कम है। इस जाति का मुख्य पेशा खेती है। बढ़ते परिवारों के कारण कृषि योग्य पर्याप्त जमीन नहीं मिल पा रही है। इससे उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हुई। उन्हें पिछड़ा वर्ग में शामिल करना अपरिहार्य है। सरकार ने यह भी कहा,उसे आयोग की सिफारिश के बगैर भी किसी जाति को पिछड़ा वर्ग में शामिल करने या बाहर करने का अधिकार हासिल है(नदीम,दैनिक जागरण,लखनऊ,15.3.11)।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
टिप्पणी के बगैर भी इस ब्लॉग पर सृजन जारी रहेगा। फिर भी,सुझाव और आलोचनाएं आमंत्रित हैं।