सीमांचल में शिक्षा क्रांति लाने के लिए एएमयू कैम्पस का निर्माण समय की जरूरत है। लेकिन आश्र्चय की बात है कि एएमयू शाखा पर स्वार्थ की राजनीति हो रही है, जिसका मैं खुले दिल से विरोध करता हूं। जहां सीमांचल शिक्षा के मैदान में काफी पिछड़ा है, वहीं गरीबी के कारण मेधावी छात्र उच्च शिक्षा नहीं ले पाते हैं। ऐसे में एएमयू कैम्पस निर्माण गरीब विद्यार्थियों के लिए आशा की किरण है। उक्त बातें पूर्व मंत्री व जनता दल-यू के वरिष्ठ नेता तथा एमएलए मो. सरफराज आलम ने रोजनामा राष्ट्रीय सहारा के कार्यालय में एक विशेष बातचीत में कही। उन्होंने कहा कि तीन टुकड़ों में दिये गए जमीन का कोई मामला नहीं है। कोशिश यह होनी चाहिए कि एक-दूसरे पर कीचड़ न उछालें बल्कि शिक्षा लेने वाले विद्यार्थियों की रुकावटें दूर हो। उन्होंने विशेष तौर पर कहा कि सीमांचल क्षेत्र आज भी शिक्षा के साथ दूसरे क्षेत्रों में पिछड़ा है जबकि यह मुस्लिम बहुल क्षेत्र है, ऐसे में कई सहुलियतें होनी चाहिए जो नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कैंपस निर्माण के लिए प्रयासरत हैं तथा हर संभव प्रयास कर रहे हैं। इस अवसर पर सहारा न्यूज नेटवर्क के रीजनल हेड नैयर खुर्शीद, रोजनामा उर्दू के स्थानीय संपादक तथा राष्ट्रीय सहारा के वरिष्ठ उपसंपादक केशव किशोर भी मौजूद थे। नैयर खुर्शीद ने पूर्वमंत्री तथा वर्तमान एमएलए सरफराज आलम को विश्वास दिलाया कि सहारा मीडिया परिवार ने हमेशा सच्चाई तथा सामाजिक कल्याण के साथ-साथ नीतीश शासन के कायरे को प्रमुखता दी है।(राष्ट्रीय सहारा,पटना,19.3.11)
नई दुनिया की रिपोर्टः
भाजपा के साथ सरकार बनाने के बाद भी बिहार के मुसलमान नीतीश कुमार के खासे मुरीद हैं। इसलिए उन्होंने पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को घास तो नहीं ही डाला, भाजपा के उम्मीदवार तक पर नजरें इनायत कर दी। इसके लिए उन्हें केंद्र सरकार की वक्र दृष्टि का सामना करना पड़ रहा है। शायद इसीलिए विज्ञान भवन में शुक्रवार को हुए राज्यों के अल्पसंख्यक आयोगों के वार्षिक सम्मेलन में बिहार के पास सबसे ज्यादा शिकायतें थीं। बिहार अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन नौशाद अहमद ने बिहार के अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव को लेकर केंद्र सरकार की भरपूर खिंचाई की।
"नईदुनिया" से बातचीत में नौशाद ने कहा कि बिहार के मुसलमानों के साथ केंद्र सरकार का भेदभाव साफ दिखता है। बानगी देखिए- केंद्र सरकार ने देश के तीन राज्यों में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय कैंपस खोलने की घोषणा की थी। बंगाल और केरल में कैंपस बनने का काम शुरू हो गया है लेकिन बिहार को छोड़ दिया गया। बजट में इस मद में एक पैसे का प्रावधान नहीं किया गया है। अहमद ने बताया कि नीतीश सरकार ने इस कैंपस के लिए २४६ एकड़ जमीन मुहैया कराने में जरा भी कोताही नहीं की थी लेकिन अब केंद्र सरकार की इसमें कोई रुचि ही नहीं दिख रही है। इस बात को लेकर बिहार के मुसलमान अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं। अब दूसरा उदाहरण देखिए- राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास वित्तीय निगम ने कहा था कि एक बार में बकाए का भुगतान करने की स्थिति में निगम सूद माफ कर देगा। राज्य सरकार ने एक बार में भुगतान कर दिया लेकिन निगम ने सूद माफ नहीं किया। वहीं असम के मामले में सूद माफ करने में जरा भी देरी नहीं हुई। यह सूद राजद के जमाने का ही है। बहुक्षेत्रीय विकास योजना के तहत देश में जिन ९० मुस्लिम बहुल जिलों को चुना गया है, उनमें बिहार के ७ जिले हैं। यहां भी केंद्र सरकार अपनी मनमानी कर रही है। इस मामले में केंद्र सरकार हमें सड़क, बिजली खंभा एवं नाले के मद में पैसे देने पर उतारू है। यह लाभ तो हमें राज्य सरकार से मिल ही जाएगा। हम कह रहे हैं कि हर जिले की जरूरत के हिसाब से केंद्र हमें पैसा दे। ऐसा नहीं कि हमें जरूरत है पैंट शर्ट की और हमें दे रहे हैं जूते।
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