संगीत विद्यालय कभी संगीत साधना के मंदिर रहे होंगे लेकिन आज रेवड़ियों की तरह डिग्रियां बांटने वाले संस्थान में तब्दील हो चुके हैं। कुकुरमुत्तों की तरह खुले ज्यादातर संगीत विद्यालय अपने मानक की कसौटी पर खरे नहीं उतर रहे हैं। इन विद्यालयों में संगीत की तालीम बस जैसे-तैसे ही दी जाती है और परीक्षाएं भी ठीक से नहीं होती हैं। नतीजतन इन विद्यालयों से निकलने वाले विद्यार्थी अच्छी तरह से शिक्षित नहीं हो पाते। परीक्षकों और केन्द्र संचालकों की उदासीनता या उनके अधकचरेपन से इन विद्यालयों से निकलने वाले संगीतज्ञ नीम हकीमों की तरह होते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के उद्धारक विष्णुद्वय (स्व. पं. विष्णु दिगम्बर एवं स्व. पं. विष्णु नारायण भातखंडे) ने जब संगीत विद्यालयों की स्थापना की थी तब उन्हें इस बात का कतई अहसास न रहा होगा कि आने वाले दिनों में संगीत विद्यालय फ र्जी डिग्रियां बेचने वाली दुकानें बन जायेंगी। पटना सहित पूरे सूबे में ज्यादातर संगीत प्रशिक्षण केंद्र जेबों और झोलों में चल रहे हैं और तमाम संगीत विद्यालय परीक्षाओं की कमाई पर हैं। इस तरह के सैकड़ों परीक्षा केंद्र हैं। इन विद्यालयों को इलाहाबाद, चंडीगढ़ आदि के संगीत विद्यालयों की मान्यता प्राप्त है। विद्यालयों में अपने विद्यार्थियों के नाम रजिस्टर पर चढ़ाये जाते हैं और पैसे लेकर डिग्रियां बांटी जाती हैं। परीक्षा केंद्रों पर पच्चीस से लेकर डेढ़ सौ तक विद्यार्थी होते हैं। इनमें से ज्यादातर पास-पड़ोस के गांवों ,क स्बों और शहरों से आते हैं। केंद्र संचालकों का यह साइड बिजनेस है। परीक्षा के दिनों में विश्वविद्यालयों के बाहर से आये परीक्षकों को खिला-पिला कर,समझा-बुझा कर व्यापारी किस्म के संगीत शोषक अपने विद्यार्थियों को डिग्री दिला देते हैं। जब सैद्धांतिक परीक्षा होती है तो विद्यार्थियों को प्रश्नों के हल के लिए किताबें थमा दी जाती हैं। एक ही किताब से सभी विद्यार्थी उत्तर उतार लेते हैं। चूंकि इन विद्यार्थियों में भाषा की परिपक्वता नहीं होती इसलिए भाषांतर भी नहीं कर पाते। नतीजतन सभी विद्यार्थियों के उत्तर बगैर फुलस्टॉप, कॉमा बदले एक ही होते हैं। इसी तरह व्यावहारिक परीक्षा में परीक्षकों की बेहतर खिदमत होती है और अंतत: विद्यार्थियों को अतिरिक्त रुपये खर्च करके डिग्री मिल जाती है। कुल मिला कर केंद्र को आमदनी, विद्यालय को आमदनी और इसके साथ साथ परीक्षकों को भी अतिरिक्त आमदनी हो जाती है। इसके बाद डिग्रीधारी संगीतज्ञ भारतीय संगीत के उन्नयन और उत्थान में लग जाते हैं। इधर-उधर कहीं न कहीं किसी न किसी स्कूल में नौकरी पा जाते हैं। रोजी-रोटी का जुगाड़ हो जाता है। कागज पर सब चीजें केवल संगीत के विकास में लगी हुई दिखती हैं। संगीत विद्यालयों के पाठय़क्रमों में परीक्षाओं के लिए इतने रागों (कु छ परीक्षाओं के लिए तो सत्तर रागों तक) की जानकारी अनिवार्य मानी जाती है। यदि परीक्षार्थी या स्वयं परीक्षक को भी इतना कुछ आ जाये तो वह कुशल संगीतज्ञ ही नहीं बल्कि देश के गिने चुने संगीतज्ञों की श्रेणी में आ सकते हैं। लेकिन कमाल यह है कि हर वर्ष कागज पर उतने रागों की जानकारी वाले ऐसी निपुण और प्रवीण डिग्रियां पाने वालों की तादाद मे लगातार इजाफा होता जा रहा है।
आधी सदी पहले छोटे-छोटे शहरों में सौ-दो सौ रुपये महीने पर संगीत शिक्षक मिल जाते थे। वह पूरे परिवार के बच्चों को संगीत का सामान्य ज्ञान करा देते थे।अब वह हजार-पांच सौ में भी दुर्लभ हैं। अब सिर्फ वही अपने बच्चों को संगीत की शिक्षा दिलाना चाहते हैं जो आगे चलकर अपने लड़के-लड़कियों को अन्य कायरे के अयोग्य मानकर संगीत शिक्षक बनाना चाहते हैं या जिन्हें लड़कियों के विवाह पूर्व एक अतिरिक्त योग्यता प्राप्त कराने की जरूरत होती है। पहले घरानेदार गायकों के पास इल्म या हुनर सीखने वालों को अपनी उम्र का एक बहुत बड़ा हिस्सा भेंट कर देना पड़ता था। फिर भी वे उस्ताद से बहुत कुछ पा लें ,यह उस्ताद की इनायत पर निर्भर होता था।अब तो संगीत का इल्म पाने के लिए गंडा बंधवाना,खिदमत करना बगैरह आउट आफ डेट हो चुके हैं। बस परीक्षकों को खुश करके म्युजिक टीचर तैयार कर लिए जाते हैं। उन्हें खुश करके डिग्रियां हासिल की जाती हैं। उस्ताद भी अपनी रोजी-रोटी के लिए शागिदरे की तलाश खुद कर लेते हैंं। सुवह से शाम तक टय़ूशन। लगे हाथ किसी सरकारी या गैर सरकारी स्कूल में पक्की या पार्ट टाइम नौकरी। पहले के उस्ताद एक ही राग में पूरे संगीत का परिचय करा देते थे। नए म्युजिक टीचर को कोर्स पूरा करवाना पड़ता है। परीक्षा दिलवानी पड़ती है। अभिभावकों को प्रसन्न करने के लिए छह महीने में दस रागों को सिखाकर फिट करना पड़ता है। जबकि पुराने संगीतकारों का कहना है कि महज "सा" को साधने में वर्षों लग जाते हैं।
आधी सदी पहले छोटे-छोटे शहरों में सौ-दो सौ रुपये महीने पर संगीत शिक्षक मिल जाते थे। वह पूरे परिवार के बच्चों को संगीत का सामान्य ज्ञान करा देते थे।अब वह हजार-पांच सौ में भी दुर्लभ हैं। अब सिर्फ वही अपने बच्चों को संगीत की शिक्षा दिलाना चाहते हैं जो आगे चलकर अपने लड़के-लड़कियों को अन्य कायरे के अयोग्य मानकर संगीत शिक्षक बनाना चाहते हैं या जिन्हें लड़कियों के विवाह पूर्व एक अतिरिक्त योग्यता प्राप्त कराने की जरूरत होती है। पहले घरानेदार गायकों के पास इल्म या हुनर सीखने वालों को अपनी उम्र का एक बहुत बड़ा हिस्सा भेंट कर देना पड़ता था। फिर भी वे उस्ताद से बहुत कुछ पा लें ,यह उस्ताद की इनायत पर निर्भर होता था।अब तो संगीत का इल्म पाने के लिए गंडा बंधवाना,खिदमत करना बगैरह आउट आफ डेट हो चुके हैं। बस परीक्षकों को खुश करके म्युजिक टीचर तैयार कर लिए जाते हैं। उन्हें खुश करके डिग्रियां हासिल की जाती हैं। उस्ताद भी अपनी रोजी-रोटी के लिए शागिदरे की तलाश खुद कर लेते हैंं। सुवह से शाम तक टय़ूशन। लगे हाथ किसी सरकारी या गैर सरकारी स्कूल में पक्की या पार्ट टाइम नौकरी। पहले के उस्ताद एक ही राग में पूरे संगीत का परिचय करा देते थे। नए म्युजिक टीचर को कोर्स पूरा करवाना पड़ता है। परीक्षा दिलवानी पड़ती है। अभिभावकों को प्रसन्न करने के लिए छह महीने में दस रागों को सिखाकर फिट करना पड़ता है। जबकि पुराने संगीतकारों का कहना है कि महज "सा" को साधने में वर्षों लग जाते हैं।
(राष्ट्रीय सहारा,पटना,14.3.11)
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