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11 मार्च 2011

जलपाईगुड़ीःआदिम टोटो जनजाति की भाषा के संरक्षण की पहल

वीरपाड़ा-मदारीहाट प्रखंड के भारत-भूटान सीमा से लगा एक गांव है टोटोपाड़ा। यहां उत्तर बंगाल की सबसे आदिम जनजाति टोटो निवास करती है। इस गांव की आबादी केवल 1383 है जिसमें पुरूषों की संख्या 740 और महिलाओं की 623 है। टोटो समुदाय का आज एकमात्र पैतृक निवास यही टोटोपाड़ा गांव है। इस समुदाय को आदिम जनजाति के बतौर मान्यता मिली है। इस विलुप्त हो रही जनजाति की भाषा व संस्कृति के संरक्षण के लिए खुद टोटो समुदाय के लोग आगे आ रहे हैं। टोटोपाड़ा तक पहुंचने के लिए आज तक कोई निश्चित सड़क नहीं बन सकी। तीन नदियों से होते हुए पहाड़ी रास्ते को पार कर टोटोपाड़ा गांव पहुंचा जाता है। टोटो बोली की अपनी कोई लिपि नहीं है। इसे बांग्ला या रोमन लिपि में लिखा जाता है। ग्रामीण बैंक में कार्यरत स्थानीय भक्त टोटो टोटो बोली का शब्दकोष तैयार कर रहे हैं जो अब तैयारी होने के करीब है। भक्त टोटो ने बताया कि इस बोली की कोई निर्धारित लिपि नहीं है। इनके अनुसार टोट्पा शब्द से टोटो शब्द की उत्पत्ति हुई है। यहां के निवासी जगदीश टोटो धुपगुड़ी सुकांत महाविद्यालय में बांग्ला विषय में स्नातकोत्तर कर रहे हैं। वही यहां के सबसे शिक्षित व्यक्ति हैं। वे टोटो संस्कृति पर शोधपरक कार्य कर रहे हैं। टोटो भाषा में कविता रचते हैं। इनके अलावा समाज सेवी धनीराम टोटो व सत्यजित टोटो भी कविताएं लिखते हैं। धनीराम की चचिर्त कविता है कुंगलोंग जिसका शाब्दिक अर्थ है 'हमारा गांव'। टोटो जनजाति के लोग अपनी परंपरा व संस्कृति के संरक्षण के लिए यथासाध्य प्रयास कर रहे हैं। टोटो जनजाति व उनकी सभ्यता संस्कृति पर गहन शोध करने वाले डा. विमलेंदु मजूमदार ने कई महत्वपूर्ण तथ्यों का पता लगाया है। उनके शोध का ही परिणाम है कि आज टोटो जनजाति के प्रति विश्व का ध्यान गया है। डा. मजूमदार के अनुसार टोटो भाषा टिबेटन-बर्मी समूह की एक बोली है। इसकी अपनी भाषा है। इनकी लोक कथाओं का प्रचार करना जरूरी है। इनकी भाषा व संस्कृति के संरक्षण के लिए और प्रयास करने की जरूरत है(दैनिक जागरण,वीरपाड़ा,11.3.11)।

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