चिकित्सा विविद्यालय के नव नियुक्त डाक्टरों ने नयी सेवा नियमावली को मानने से इनकार कर दिया है। नौकरी की नयी सेवा शतरे के कारण एक विभाग में डाक्टर ने ज्वाइन करने से इनकार कर दिया। इस विभाग में डाक्टर का पद खाली होने की वजह से एमसीआई की तलवार लटक गयी है। चिकित्सा विविद्यालय के विभिन्न विभागों में रिक्त पड़े पदों पर लगभग डेढ़ सौ डाक्टरों की तैनाती की गयी है। चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब इन्हें ज्वाइन कराया जा रहा है, लेकिन प्रशासन की बनायी गयी नयी सेवा नियमावली इनकी राह में रोड़ा बन रही है। चिकित्सा विविद्यालय प्रशासन की मनमानी से अब तक एक दर्जन से अधिक वरिष्ठ डाक्टर संस्थान छोड़कर जा चुके हैं। इन डाक्टरों के जाने के बाद चिकित्सा विविद्यालय के आधे से ज्यादा विभागों में चल रही परास्नातक की डिग्रियों पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। इसको दूर करने के लिए हाल ही में चिकित्सा विविद्यालय में नियुक्तियां की गयीं हैं। हालात यह है कि चिकित्सा विविद्यालय प्रशासन की मनमानी के कारण दंत संकाय में रिक्त पदों पर दो बार चयन प्रक्रिया पूरी करने के बाद भी यह अब तक भरे नहीं जा सके हैं। यही स्थिति मेडिकल संकाय की है। ऐसे में नयी सेवा शतरे ने नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। नयी सेवा नियमावली में डाक्टरों का प्रोबेशन समय एक साल से बढ़ाकर दो साल, तीन साल से पहले नौकरी छोड़ने पर पांच लाख जुर्माना, पांच साल तक शैक्षिक अवकाश नहीं आदि शत्रे लगायी गयी हैं। बुधवार को सर्जिकल आंकोलॉजी विभाग के नव नियुक्त डा.संजीव सिंघल ने ˜इन शर्तों के कारण विभाग में ज्वाइन करने से मना कर दिया। इसको लेकर विभाग में नयी समस्या खड़ी हो गयी है। विभाग में डाक्टरों के चार पदों पर मात्र दो ही डाक्टर तैनात हैं। प्रो.आईडी शर्मा सेवानिवृत्त हो चुके हैं और प्रो. अरुण चतुव्रेदी विभाग छोड़कर जा चुके हैं। ऐसे में विभाग के परास्नातक की सीटों के मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया से अमान्य होने का संकट गहरा गया है। इसकी जानकारी कार्यवाहक कुलपति प्रोफेसर जेवी सिंह को भी दी गयी है। नयी सेवा नियमावली को लेकर अन्य विभागों के डाक्टरों ने भी विरोध जताया है। इन्होंने ने भी संस्थान छोड़ने की तैयारी शुरू कर दी है(राष्ट्रीयसहारा,लखनऊ,10.3.11)।
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