शिक्षा का अधिकार (आरटीई) के तहत सूबे के अंग्रेजी माध्यम प्राइवेट स्कूलों में गरीब और वंचित वर्गो के बच्चों की पढ़ाई को सालाना छह हजार रुपये प्रति बच्चे की दरकार है, दूसरी ओर कड़वा सच यह भी है कि सरकारी व्यवस्था में प्रति छात्र तकरीबन 15 हजार रुपये खर्च उठाया जा रहा है।
शिक्षा महकमे में हर साल बढ़ रहे खर्च की तुलना में पढ़ाई की गुणवत्ता में जरूरी सुधार नहीं होने से सरकार और आम आदमी के होश फाख्ता हैं। सरकारी भारी-भरकम राशि खर्च करने के बाद भी आम आदमी का विश्वास नहीं जीत सकी। अंग्रेजी माध्यम और पब्लिक स्कूलों के प्रति बढ़ता क्रेज इसका उदाहरण है। सरकारी शिक्षा की व्यवस्था पर जितना खर्च किया जा रहा है, उसकी तुलना में हर बच्चे को अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में तकरीबन आधी से कम राशि में पढ़ाया जा सकता है। इसकी तस्दीक महकमे के आंकड़े खुद-ब-खुद करते हैं। सूबे के 4270 प्राइवेट स्कूलों में तकरीबन 91.70 हजार से से ज्यादा छात्र-छात्राएं अध्ययनरत हैं। शिक्षा का अधिकार एक्ट के मुताबिक अब प्रत्येक निजी स्कूल को 25 फीसदी सीटें वंचित वर्गो के बच्चों के लिए आरक्षित करनी हैं। इस एक्ट के तहत प्रति छात्र फीस के लिए छह हजार रुपये की दरकार है। एक अनुमान के मुताबिक उक्त स्कूलों में आरटीई के तहत तकरीबन 23 हजार छात्र-छात्राओं की पढ़ाई पर करीब 14 करोड़ की राशि खर्च होगी।
वहीं सबसे बड़े महकमे शिक्षा पर हो रहे भारी-भरकम खर्च से तुलना करने पर तस्वीर चौंकाने वाली है। आखिरी दौर में पहुंच चुके इस वित्तीय वर्ष में शिक्षा का बजट 30 अरब का आंकड़ा छू रहा है। प्राइमरी से माध्यमिक तक 20 लाख छात्र-छात्राओं की पढ़ाई के बंदोबस्त पर अरबों खर्च किए जा रहे हैं। इस हिसाब से प्रति विद्यार्थी तकरीबन 15 हजार रुपये खर्च हो रहे हैं। तुलना की जाए तो यह राशि आरटीई के तहत अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में बच्चों की फीस पर प्रस्तावित खर्च के मुकाबले ढ़ाई गुना ज्यादा है। हालांकि, राज्य के सामने प्राइवेट स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई पर खर्च होने वाली 14 करोड़ की राशि जुटाने की चुनौती है। इसके लिए केंद्र सरकार के दर पर पुरजोर पैरवी की जाएगी(रविंद्र बड़थ्वाल,दैनिक जागरण संवाददाता,देहरादून,19.3.11)।
होली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ|
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