'शोध' समाज को नई दिशा देते हैं और देश में विकास के नए आयाम स्थापित करते हैं, लेकिन वर्तमान में हो रहे ज्यादातर शोध कागजों के पुलिंदे बनकर रह जाते हैं। विज्ञान संकाय में देश के नाम कोई बड़ी उपलब्घि नजर नहीं आती। शैक्षणिक नगरी कोटा में भी उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए तीन विश्वविद्यालय तो स्थापित कर दिए गए, लेकिन ये विश्वविद्यालय अपने वास्तविक उद्देश्यों पर कितना खरा उतर रहे हैं, यह किसी से छिपाने की जरूरत नहीं है।
पैकेज की चाह
शैक्षणिक नगरी हो या देश के अन्य शहर, पढ़ाई तो सभी जगह हो रही है, लेकिन पढ़ाई के उद्देश्य बदलते जा रहे हैं। आईआईटी, आईआईएम और एम्स में अध्ययन को पहले शोध में सहायक माना जाता था, लेकिन अब इन संस्थानों में प्रवेश का उद्देश्य सिर्फ नौकरी में वेतन का बड़ा पैकेज प्राप्त करना ही रह गया है।
शिक्षा पर असर
औपचारिक शोध और पैकेज की चाह का असर शिक्षा पर भी नजर आ रहा है। स्नातक उपाघि प्राप्त करने के साथ ही युवा कंपनियों में रोजगार के लिए आवेदन कर देते हैं और आगे की पढ़ाई पर ध्यान कम हो जाता है।
डॉक्टर सा'ब कहलाने की चाह
शिक्षाविदों के अनुसार, वर्तमान में अधिकांश शोधार्थियों का उद्देश्य समाज को कुछ देना या अध्ययन-अध्यापन के जरिए किसी निष्कर्ष तक पहुंचना नहीं है। वे बस अपने नाम के आगे डॉक्टर लगाना चाहते हैं। ऎसे में सिर्फ औपचारिकतावश शोध पूर्ण कर लिया जाता है।
सिर्फ परीक्षाएं करवानी हैं
शहर के विश्वविद्यालयों की हालत आज परीक्षा करवाने वाली एजेंसी से बढ़कर नहीं रह गई है। तीनों विवि के सामने सबसे बड़ी चुनौती शोध के क्षेत्र में आगे बढ़ना नहीं, बल्कि समय पर परीक्षा करवाना और उनका समय पर परिणाम देना ही रह गया है। इसके लिए बहुत हद तक सरकार भी जिम्मेदार है, जिसने यहां संसाधन उपलब्ध नहीं करवाए।
सुविधाएं पर्याप्त नहीं
ज्ञान की शताब्दी में शोध को बढ़ावा दिए बिना देश का भला नहीं कर सकते। शोध को महत्व नहीं दिया जा रहा है। शोधार्थियों के लिए जो सुविधाएं दी जा रही हैं, वे पर्याप्त नहीं हैं। दूसरा पहलू यह भी है कि पैसे की कमी नहीं है, लेकिन लोग प्रयास भी नहीं करते। अनुभवी फैकल्टीज को इसके लिए ज्यादा आगे आना चाहिए। -प्रो.आर.पी. यादव, कुलपति, तकनीकी विवि
कुछ हद तक दिखावा
यह सही है कि कुछ हद तक शोध सिर्फ दिखावा बन गया है। हमारा प्रयास रहता है कि शोध की गुणवत्ता बनी रहे। इसके लिए परीक्षाएं भी आयोजित करवाई जा रही है। शोधार्थी व शोध निदेशक दोनों की तरफ से गुणवत्ता में कमी आ रही है। सुधार तभी हो सकता है, जब सकारात्मक परिणाम को आधार मानकर शोध किया जाए। -प्रो.एस.सी. राजोरा, शोध निदेशक, कोटा विश्वविद्यालय
शैक्षणिक नगरी में हाल तकनीकी विश्वविद्यालय
प्रदेश में तकनीकी शिक्षा का सबसे बड़ा संस्थान राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय यहां स्थापित है, लेकिन यहां शोध की गतिविघियां विश्वविद्यालय की स्थापना के पांच साल बाद शुरू हो सकी है। यहां करीब 1.75 लाख विद्यार्थी पंजीकृत हैं, जबकि गत दो वर्षो में सिर्फ 12 विद्यार्थियों का शोध के लिए पंजीयन हुआ है।
कोटा विश्वविद्यालय
सामान्य शिक्षा के इस विश्वविद्यालय में करीब डेढ़ लाख विद्यार्थी पंजीकृत हैं। यहां वाणिज्य वर्ग में 35, विघि अध्ययन में 13, कला वर्ग में 280 व विज्ञान वर्ग में शोधार्थियों की संख्या 88 है। शोधार्थियों के लिए संसाधनों के अभाव भी है।
वर्द्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कड़े नियमों के बाद दूरस्थ शिक्षा से शोध कार्य बंद कर दिया गया। यहां गत दो वर्षो में शोध के लिए कोई पंजीयन नहीं हुआ।
(प्रमोद मेवाड़ा,राजस्थान पत्रिका,कोटा,25.7.11)
इस देश मे स्कूल स्तर पर बच्चा कोई इन्नोवेटिव काम कर ले तो उसे भी रोक देते हैं नहीं विशवास आता तो यह देखें
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