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05 अप्रैल 2010

अनिवार्य शिक्षा कानून पर संपादकीय

(हिंदुस्तान,दिल्ली,2.4.2010)

एक सपना साकार होने जा रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा कानून (आरटीई) देश के करोड़ों बच्चों के जीवन में नई रोशनी लाएगा। निश्चय ही यह यूपीए सरकार की एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन असली चुनौतियां तो अब आने वाली हैं। सरकार का काम कानून पास करा लेने भर से ही समाप्त नहीं हो गया है। इस कानून की सार्थकता तब मानी जाएगी जब यह एक सामाजिक अभियान की शक्ल ले और सरकार के साथ पूरा समाज इसमें शामिल हो जाए। लेकिन लोगों का इससे
जुड़ाव तभी बनेगा जब सरकारी तंत्र सबको शिक्षा दिलाने के प्रति अपनी इच्छाशक्ति और ईमानदारी दिखाएगा।

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने राष्ट्र को संबोधित कर यह संदेश देने को कोशिश की है कि सरकार इसे लेकर बेहद गंभीर है। गौरतलब है कि इस कानून के जरिए मुफ्त और अनिवार्य बुनियादी शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा दे दिया गया है। इसके तहत अब 6 से 14 वर्ष तक की उम्र के बच्चों को मुफ्त शिक्षा मुहैया कराई जाएगी। स्कूल प्रबंधन समिति या स्थानीय प्राधिकरण बीच में ही पढ़ाई छोड़ने वाले और स्कूल तक कभी पहुंच ही न पाने वाले छह साल से अधिक उम्र के बच्चों की पहचान करेंगे और विशेष प्रशिक्षण देने के बाद उनकी उम्र के मुताबिक उचित कक्षाओं में उनका दाखिला कराएंगे।

अब कोई भी सरकारी स्कूल किसी बच्चे का दाखिला करने से इनकार नहीं कर पाएगा। आरटीई कानून में कहा गया है कि सभी स्कूलों में पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित शिक्षक होने चाहिए। स्कूलों के लिए खेल के मैदान और कुछ अन्य बुनियादी सुविधाएं अनिवार्य कर दी गई है। जाहिर है, कानून के जरिए सरकार प्राथमिक शिक्षा का कायाकल्प करना चाहती है। लेकिन क्या यह इतना आसान है? क्या रातोंरात नौकरशाही का रवैया और उसकी कार्यसंस्कृति बदल जाएगी? सबको शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए अगले छह महीने में करीब बारह लाख प्रशिक्षित शिक्षकों की जरूरत पड़ेगी। इसी तरह अभी कार्यरत अनेक शिक्षकों को प्रशिक्षण उपलब्ध कराना होगा। फिर सभी स्कूलों में क्लासरूम, खेल के मैदान, लाइब्रेरी, शौचालय, पीने का पानी जैसी सुविधाएं उपलब्ध करानी होगी।

अभी तो आलम यह है कि महानगरों तक में अनेक सरकारी स्कूल टेंट में चल रहे हैं। गांवों और कस्बों में तो कई स्कूल बस कागज पर ही हैं। कई जगहों पर स्कूल हैं तो सड़कें नहीं हैं कि शिक्षक वहां पहुंच सकें। कहीं शिक्षक हैं तो बच्चे नहीं हैं। यह नहीं भूलना चाहिए कि एजुकेशन का संबंध हमारी सामाजिक-आर्थिक स्थिति से है। आज देश का एक बड़ा वर्ग अपने बच्चों से काम करवाने को मजबूर है। वह चाहकर भी उन्हें पढ़ने नहीं भेज पाता। इसलिए शिक्षा में सुधार के लिए समग्र बदलाव जरूरी है। लेकिन इसका यह भी अर्थ नहीं कि हम शिक्षा में मूलभूत बदलाव की पहल न करें। अगर सरकार और समाज प्रतिबद्धता दिखाएं तो आरटीई कानून का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
(नवभारत टाइम्स,2 अप्रैल,2010)
शिक्षा के अधिकार कानून का लागू होना देश को प्रगति के पथ पर ले जाने की कोशिश के रूप में एक मील का पत्थर है। देर से ही सही, छह से चौदह साल के हर बच्चे को शिक्षा प्रदान करने का संकल्प जताना उत्साह का संचार करने वाला है। विलंब और विसंगतियों के बावजूद मनमोहन सिंह सरकार को इसका श्रेय दिया जाएगा कि उसने एक ऐसे फैसले को लागू किया जिसकी प्रतीक्षा दशकों से की जा रही थी। इस फैसले की महत्ता का पता इससे चलता है कि इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संदेश जारी किया। चूंकि शिक्षित समाज राष्ट्र के रूपांतरण की सुनिश्चित गारंटी होता है इसलिए यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि इस कानून पर अमल के लिए राज्य सरकारें वैसी ही प्रतिबद्धता प्रदर्शित करेंगी जैसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने की। इस स्वाभाविक अपेक्षा के बावजूद यथार्थ की अनदेखी भी नहीं की जा सकती। वर्तमान में छह से चौदह वर्ष की आयु वर्ग के करीब 90 लाख बच्चे ऐसे हैं जो शिक्षा से वंचित हैं। यह एक बड़ी संख्या है और इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि स्कूल न जाने वाले बच्चों की वास्तविक संख्या और अधिक हो सकती है। एक अनुमान के अनुसार इतने बच्चों को शिक्षित करने के लिए करीब 1.71 लाख करोड़ रुपये की जरूरत होगी। इसमें से 55 प्रतिशत धनराशि केंद्र सरकार और शेष 45 प्रतिशत राज्य सरकारों को खर्च करनी होगी। प्रधानमंत्री के इस आश्वासन पर यकीन न करने का कोई कारण नहीं कि सभी बच्चों को शिक्षित करने में धन की कमी आड़े नहीं आने दी जाएगी, लेकिन इसमें संदेह है कि राज्य सरकारें अपने हिस्से के धन का प्रबंध कर पाएंगी। यदि किसी तरह धन का प्रबंध हो भी जाए तो भी यह आवश्यक नहीं कि राज्य सरकारें स्कूलों, शिक्षकों और अन्य संसाधनों की कमी दूर करने में तत्परता दिखाएंगी। वैसे भी धन की उपलब्धता किसी कार्य के संपन्न होने की गारंटी नहीं और इसका एक बड़ा प्रमाण सर्व शिक्षा अभियान है, जो दस्तावेजों में जितना सफल है यथार्थ के धरातल पर उतना ही असफल। यह सही है कि केंद्र को शिक्षा अधिकार कानून के अमल में बाधा बनने वाली चुनौतियों का भान है, लेकिन राज्य सरकारों का रवैया निराश करने वाला है। यह किसी त्रासदी से कम नहीं कि देश की तस्वीर बदल सकने वाले एक महत्वाकांक्षी कानून को अमल में लाने की घोषणा पर राज्य सरकारों का रवैया यह आभास नहीं कराता कि वे एक महती जिम्मेदारी का निर्वाह करने जा रही हैं। चंद राज्यों को छोड़कर ज्यादातर राज्य सरकारों ने शिक्षा अधिकार कानून का कायदे से स्वागत भी नहीं किया। उलटे कुछ राज्यों ने इस कानून की खामियां गिनानी शुरू कर दी हैं। कुछ धन की कमी का रोना रो रहे हैं तो कुछ ऐसी उदासीनता दिखा रहे हैं जैसे यह कानून किसी और देश में लागू हुआ हो। यह अफसोस की बात है कि राज्य सरकारें शिक्षा अधिकार कानून को अपनी जिम्मेदारी कम, एक बोझ मानने के संकेत अधिक दे रही हैं। क्या यह विचित्र नहीं कि अधिकांश राज्यों ने किसी भी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करने की भी जरूरत नहीं समझी? माना कि इस कानून को अमल में लाने में केंद्र को विशेष सक्रियता दिखानी होगी, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि राज्यों को कुछ करने की जरूरत ही नहीं।
(दैनिक जागरण,3 अप्रैल,2010)
एक अप्रैल का दिन ऐतिहासिक दिन कहा जाएगा। इस दिन से देश में नई जनगणना की शुरुआत हुई है और शिक्षा के अधिकार का कानून भी लागू होने जा रहा है। वैसे आज से आठ साल पहले ही २००२ में ८६वें संविधान संशोधन विधेयक के जरिये प्राथमिक शिक्षा को बुनियादी अधिकार का दर्जा दे दिया गया था लेकिन इसे कार्यरूप देने के लिए मुफ्त तथा अनिवार्य शिक्षा का बच्चों को अधिकार (आर.टी.ई.) विधेयक को पारित कराने की जरूरत भी थी, जिसमें अगले सात साल का समय लग गया। यह कानून पिछले वर्ष ही संसद ने पारित किया है। अब इससे संबंधित नियम बनने के बाद इसे कल से लागू कर दिया गया है। वैसे तो यह काम बहुत पहले हो जाना चाहिए था। संविधान के निदेशक सिद्धांतों में १४ वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त तथा अनिवार्य शिक्षा देने के लिए अगले दस वर्ष का समय दिया गया था लेकिन इसे कार्यरूप देने में छह दशक लग गए। इस विधेयक की अपूर्णताओं-कमियों पर भी उंगलियां उठाई गई हैं। उदाहरण के लिए छह वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए ऐसी ही कोई कानूनी व्यवस्था क्यों नहीं है? उनके प्रति राज्य की आखिर जिम्मेदारियां क्या हैं? या कोई नहीं है? उन्हें पर्याप्त पोषक भोजन मिले, स्वास्थ्य की सुविधाएं मिले, स्कूल-पूर्व शिक्षा मिले, क्या यह जरूरी नहीं है? इसके अलावा १४ वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों के प्रति दायित्व किसका होगा? क्या किसी का नहीं? बहरहाल, मानना यह चाहिए कि इस कानून में जो सुविधाएं, जो अधिकार दिए गए हैं, जो दायित्व सरकार को दिए गए हैं, उनका पालन ठीक से होगा। जो लड़के, जो लड़कियां बचपन से ही तमाम कामों में उनके मां-बाप द्वारा आर्थिक मजबूरियों के तहत लगा दिए गए हैं, उन तक न केवल शिक्षा पहुंचेगी बल्कि गुणात्मक रूप से बेहतर शिक्षा पहुंचेगी। इस कानून में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का प्रावधान भी पहली बार किया गया है। कानून कहता है कि बच्चों को रट्टूतोता बनाने के बजाय गतिविधियों में शामिल किया जाए, उनमें अन्वेषण की, खोज की, जानने की प्रवृत्ति विकसित की जाए। इस कानून में छात्रों को दंडित करने, स्कूल से निकालने को प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसमें सरकार को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह हर एक किलोमीटर पर घर के आसपास स्कूल उपलब्ध कराए, स्कूल में खेल आदि की सुविधाएं हों, छात्र-अध्यापक अनुपात ३०ः१ से अधिक न हो, अध्यापक प्रशिक्षित हों, शिक्षण सामग्री हो तथा दोपहर के भोजन की व्यवस्था भी हो। अगर ऐसा नहीं होता है तो राज्य को कानूनी ढंग से इसके लिए बाध्य किया जा सकता है। निजी तथा बिना सहायता प्राप्त स्कूलों को भी २५ प्रतिशत स्थान शिक्षा से वंचित गरीब बच्चों को देना होगा। हर स्कूल में शिक्षा की स्तरीयता को सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय अधिकारियों, पालकों, अध्यापकों की समितियां बनाने का प्रावधान भी इसमें है जिसमें ५० प्रतिशत भागीदारी महिलाओं की होगी। अतः अपनी सीमाओं के बावजूद यह एक बड़ा कदम है। देर हुई है मगर अंधेर न हो, इससे सुनिश्चित करना सरकार का ही नहीं, पूरे समाज का भी कर्तव्य है।
(नई दुनिया,दिल्ली,2.4.2010)

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