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05 अप्रैल 2010

दीक्षांत समारोह और गाउन

हाल ही में,जयराम रमेश जी द्वारा एक दीक्षांत समारोह में गाउन उतार फेंकने पर आज नई दुनियाने अपने संपादकीय में लिखा है कि भारत में आज भी एक बड़ा वर्ग है जिसे लोकतंत्र ठीक से नहीं सुहाता। वह या तो राजा-महाराजाओं के युग में जीता है या औपनिवेशिक स्वप्न मे-
"पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश कभी गलत या सही कारणों से हमेशा विवाद में रहते हैं। अभी भोपाल में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फारेस्ट मैनेजमेंट (भारतीय वन प्रबंधन संस्थान) के दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने वह गाऊन उतार फेंका, जो ऐसे अवसरों पर पहनने की औपनिवेशिक परंपरा ब्रिटिशकाल से चली आ रही है। उनकी यह कार्रवाई नाटकीय जरूर थी क्योंकि वे चाहते तो दीक्षांत समारोह से पहले भी यह गाऊन उतार कर फेंक सकते थे और कौन उन्हें इससे रोक सकता था? लेकिन यह काम उन्होंने समारोह को संबोधित करते हुए किया ताकि टेलीविजन चैनलों और अखबारवालों का इस पर ठीक से ध्यान जाए और जो उन्होंने किया है, वह एक घटना बने, समाचार बने। आजकल मीडिया समाचार बनाता है तो नेता-अभिनेता भी जान गए हैं कि समाचार वे खुद कैसे बन सकते हैं वरना एक छोटा-सा समाचार कहीं छपता कि मंत्रीजी ने इस मौके पर यह-यह कहा। अब क्या कहा, यह समाचार छपा भी होगा तो किसी कोने में छपा होगा वरना सब जगह समाचार यह है कि मंत्री ने उस मौके पर क्या किया।

वैसे जो उन्होंने किया, ठीक ही किया। उनके इस "शो" पर तत्काल तालियां बजीं और कुलपति आदि यह दृश्य भौंचक होकर देखते रह गए। जयराम रमेश ने इस "शो" को गाऊन उतारकर ही नहीं, सख्त शब्दों के इस्तेमाल से भी "प्रदर्शनीय" बनाया। इस गाऊन को "बर्बर औपनिवेशिक परंपरा" का नाम भी दिया। उन्होंने कहा कि इसे पहनकर हम सब पादरी या पोप नजर आते हैं।

निश्चित रूप से भारत में आज भी एक बड़ा वर्ग है जिसे लोकतंत्र ठीक से नहीं सुहाता। वह या तो राजा-महाराजाओं के युग में जीता है या औपनिवेशिक स्वप्न में वरना तेरहवीं सदी में जो परंपरा ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से शुरू हुई थी, वह इक्कीसवीं सदी तक कैसे और क्यों चली आई? विश्वविद्यालय तो बौद्धिकता की पीठ होते हैं, नए विचारों-प्रयोगों के अधिष्ठान होते हैं, उनमें क्यों यह औपनिवेशिक परंपरा बिना सोचे-समझे चलती चली आ रही है और चलाई जा रही है? क्या तूफान आ जाएगा, अगर कल दीक्षांत समारोह में छात्र और अध्यापक आदि सादे कपड़े पहनकर आएं? हद से हद उन्हें एक पहचानपत्र जैसा कुछ दिया जा सकता है जिससे वे अन्य छात्रों-अतिथियों आदि से उस दिन अलग लगें, यह दिखाई दे कि वे आज डिग्री से सम्मानित होने वाले हैं। अगर देश के सर्वोच्च सम्मान राष्ट्रपति से ग्रहण करते समय किसी "ड्रेस-कोड" की जरूरत नहीं है, सिवाय इसके कि शरीर ठीक से ढंका हो तो विश्वविद्यालय में इस औपनिवेशिक-परंपरा की क्या जरूरत है? क्यों एक मंत्री को नाटकीय हरकत करके इस औपनिवेशिकता पर चोट करनी पड़ती है? क्या हमारे प्राध्यापक आदि दिमागी रूप से इतने स्वतंत्र भी नहीं हैं कि इस औपनिवेशिक बोझ को अपने सिर से स्वतः उतार फेंकते? क्या यह मौका नहीं है इस मसले पर अंतिम रूप से निर्णय लेने का? लेकिन सिर्फ विश्वविद्यालय ही औपनिवेशिकता के शिकार नहीं हैं, पूरा अंग्रेजी पढ़ा-लिखा वर्ग और जो अंग्रेजी ठीक से नहीं जानता है, वह वर्ग भी शिकार है।

बरसों से इस बात पर विचार होता रहा है कि अदालत में काला कोट पहनने की वकीलों को क्या जरूरत है? क्या वे भी एक पहचानपत्र जैसा अपनी कमीज या अपने कुर्ते पर टांक नहीं सकते? क्या अप्रैल-मई की गर्मी में काला कोट-टाई पहनना एक बड़ी सजा नहीं है? ब्रिटेन या पश्चिम के ठंडे मुल्कों के लिए काला कोट-टाई पहनना मुफीद हो सकता है, लेकिन भारत में इसकी क्या जरूरत है? ठंड के दिनों में कोट पहनना जरूरी है तो वकील साधारण-सामान्य कोट क्यों नहीं पहन सकते? और अगर खुदा-न-खास्ता ऐसा लगता है कि अदालत में वकीलों को कोई पोशाक पहनकर आना ही चाहिए तो वह हमारे यहां के मौसम के अनुकूल क्यों नहीं हो सकती? वह धोती-कुर्ता न हो मगर पैंट-कमीज तो हो सकती है जो कि हिंदुस्तानी पुरुष सामान्य रूप से पहनते हैं। महिला वकील क्या सिर्फ साड़ी पहनें तो पर्याप्त नहीं है या देसी-सूट?

औपनिवेशिक परंपरा को निबाहते देश में ऐसे तमाम क्लब हैं, उनके भी अपने "ड्रेस-कोड" हैं। कई बार ऐसे महत्वपूर्ण लोगों को भी क्लब में आने नहीं दिया गया है जो तथाकथित "पोशाक-परंपरा" का पालन नहीं कर रहे थे। याद आता है कि एक बार मकबूल फिदा हुसेन को एक क्लब ने इसलिए लौटा दिया था कि वे नंगे पैर रहते हैं। दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर ने तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव को अपनी सदस्यता देने से इसलिए इनकार कर दिया था कि वे उस किस्म के सभ्य-सुशील-पढ़े-लिखे नहीं हैं जिस किस्म के लोग अकसर इस क्लब के सदस्य बनते हैं। और यह औपनिवेशिकता हमारे पहनाव में ही नहीं है, सोच में भी है। हमारे ज्यादातर जिलाधीश अब भी अपने को राजा समझते हैं। हमारे ज्यादातर अंग्रेजीदां अपने को अधिक सभ्य समझते हैं हालांकि होते ही हैं, इसमें संदेह करने के अनेक कारण हैं। कई-कई बार उनके "असभ्य" होने के सबूत भी मिले हैं, जबकि सभ्यता कपड़ों में नहीं बसती, अंग्रेजी के ज्ञान में नहीं होती, उस संस्कृति में होती है जो विनम्रता तथा दूसरों के प्रति आदर सिखाती है, जो प्रदर्शन से दूर रहती है- चाहे वह ज्ञान का हो, धन का हो या ताकत का हो।"
(चित्र एनडीटीवी से साभार)

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