राज्य सरकार कहती है कि विश्वविद्यालय अधिनियम को प्रभावशाली बनाने के लिए संशोधन विधेयक पारित कराया गया है जबकि राजभवन और कुलपतियों को इस पर ऐतराज हैविश्वविद्यालय अधिनियम में संशोधन के बाद राज्य में बवाल मचा है । राज्य सरकार कहती है कि कानून को और प्रभावशाली बनाने के लिए संशोधन विधेयक पारित किया गया है जबकि कुलपति इसे विश्वविद्यालय की स्वायत्तता पर संकट बताते हैं । कुलपतियों ने राजभवन से गुहार लगाई और राज्यपाल देवानंद कुंवर ने विधेयक राज्य सरकार को लौटा दिया । शिक्षक संगठन और शिक्षाविद् भी इस संशोधन विधेयक के खिलाफ हैं । राजभवन और सरकार में ठन गई है । हालांकि संवैधानिक मजबूरियों के तहत राज्यपाल विधेयक पर हस्ताक्षर के लिए बाध्य हो सकते हैं लेकिन विधेयक लौटाकर उन्होंने अपनी नाराजगी जाहिर कर दी है । दरअसल, विश्वविद्यालय को लेकर राज्यपाल और सरकार की खींचतान पुरानी है । राज्य सरकार विश्वविद्यालय पर सीधा नियंत्रण चाहती है जो वर्तमान कानून में संभव नहीं है । वर्तमान में विश्वविद्यालयों को स्वायत्तता मिली हुई है और राज्यपाल ही कुलाधिपति के रूप में विश्वविद्यालयों के बारे में निर्णय लेते रहे हैं । जब राज्य सरकार के मानव संसाधन सचिव ने कुलपितयों को निदर्ेेश जारी करना शुरू किया तो कुलपतियों ने राजभवन से इसकी शिकायत की । राज्यपाल ने इसे परोक्ष रूप से अपने अधिकारों में कटौती समझा । लिहाजा तकरार पैदा होनी लाजिमी थी ।
ताजा विवाद बिहार विश्वविद्यालय संशोधन १९७६ और पटना विश्वविद्यालय अधिनियम १९७६ में संशोधन से पैदा हुआ है । इन विधेयकों से राज्य सरकार ने विश्वविद्यालयों पर नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश की है । इससे पहले मानव संसाधन विभाग के सचिव जब भी कोई पत्र जारी करते थे तो कुलपति उस पत्र पर कुलाधिपति के रूप में राज्यपाल से मार्गदर्शन मांगने लगे । राज्यापाल ने मानव संसाधन विभाग के सचिव और प्रधान सचिव को बुलाकर विश्वविद्यालय में हस्तक्षेप से मना किया । चुनावी साल में राज्य सरकार विश्वविद्यालय शिक्षकों की सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाकर ६५ साल करना चाहती है । इस संशोधन विधेयक से राज्य सरकार को यह अधिकार हासिल हो रहा है । कुलाधिपति ने विश्वविद्यालयों और विभागों को पत्र जारी कर सरकार के हस्तक्षेप पर ऐतराज जताया था । लिहाजा सरकार ने कानून में संशोधन कर अधिकार हासिल कर लिए । शिक्षक असंतोष को रोकने के लिए राज्य सरकार ने विश्वविद्यालय शिक्षकों को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का वेतनमान देने का ऐलान कर दिया है । विधानसभा में इस विधेयक पर बहस के दौरान चर्चाओं को उत्तर देते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि राज्य सरकार शिक्षकों के हित में कई फैसले करना चाहती है जिसमें पुराने नियम कुछ अ़ड़चन पैदा कर रहे थे इसलिए संशोधन विधेयक लाना पड़ा ।ᅠविश्वविद्यालयों के कर्मचारियों को राज्य सरकार के कर्मचारियों के समान वेतन देना है । इसके लिए कमेटी गठित कर दी गई है । कमेटी की रिपोर्ट के अनुरूप कार्रवाई होगी । उन्होंने कहा कि राज्य सरकार का इरादा विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता खत्म करने का नहीं है । दरअसल, इस विधेयक में विश्वविद्यालयों के लिए वित्तीय सलाहकार नियुक्त करने का अधिकार राज्य सरकार ने अपने हाथों में ले लिया है । राजद नेता और प्रोफेसर रामचंद्र पूर्वे आशंका जताते हैं कि वित्तीय और कानून सलाहकार नियुक्त कर सरकार सिंडिकेट और सीनेट को कमजोर करना चाहती है । राज्य सरकार की मशक्कत के बाद विधानसभा में ४९ के मुकाबले ८२ मतों से विधेयक पारित हो गया लेकिन अब राजभवन को इस पर आपत्ति है । वित्तीय सलाहकार की सेवा का निर्धारण राज्य सरकार करेगी और उनका कार्यकाल तीन साल का होगा । इसके अलावा कानूनी सलाहकार की नियुक्तिराज्य सरकार करेगी । यह पद न्यायिक सेवा के पदाधिकारी अथवा किसी ऐसे अधिवक्ता से भरा जा सकेगा जो उच्च न्यायालय में सरकारी सलाहकार रह चुके हों ।
इतना ही नहीं, यदि कुलपति अथवा सिंडिकेट द्वारा कानूनी सलाहकार की सलाह के विपरीत फैसले किए जाते हैं तो ऐसे मामले राज्य सरकार के पास आ जाएंगे और तब सरकार का फैसला अंतिम होगा । देश के सभी न्यायालयों में विश्वविद्यालयों के मुकदमों के संबंध में अधिवक्ताओं के पैनल भी कानूनी सलाहकार ही बनाएंगे । विधेयक के तहत धर्म और भाषा पर आधारित संबद्ध अल्पसंख्यक महाविद्यालयों के शासी निकाय के संबंध में भी राज्य सरकार के अधिकार बढ़ा दिए गए हैं । शासी निकाय ही शिक्षकों की नियुक्तिकरेंगे तथा उन्होंने सेवा से हटाने का अधिकार भी हासिल होगा । शासी निकाय अनुशासनिक कार्रवाई भी कर सकेगा ।
(राघवेन्द्र नारायण मिश्र,संडे नई दुनिया,दिल्ली,18.4.2010)
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