मुख्य न्यायाधीश जगदीश चन्द्र भल्ला और मनीष भंडारी की खंडपीठ ने झुंझुनूं जिले के सीताराम शर्मा की याचिका को निर्णीत करते हुए राजस्थान पंचायत राज अधिनियम में किए गए संशोधन का अवैध एवं संविधान की भावना के विपरीत बताया। याचिकाकर्ता के वकील अनूपचंद ढंढ ने अधिनियम की धारा 15 (5) (6) एवं धारा 16 (5) में संशोधन को चुनौती दी थी जिसमें महिलाओं का आरक्षण 33 से बढाकर 50 प्रतिशत करने का प्रावधान किया गया था। इसी तरह धारा 19(ए) जोडकर 21 से 35 वर्ष के युवाओं को पंचायतों में 20 प्रतिशत आरक्षण देने की व्यवस्था की गई थी। इसी तरह राज्य में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की आबादी कम होने के बावजूद आरक्षण की सीमा 33 से 50 प्रतिशत बढाने पर कुल आरक्षण 75 से 80 फीसदी हो जाएगा और सामान्य वर्ग के लिए महज 20 प्रतिशत आरक्षण शेष रहेगा। यह धारा 14 के समानता के संवैधानिक अधिकार के विपरीत है। खंडपीठ ने दोनों पक्षों की सुनवाई और याचिकाकर्ता के तथ्यों को स्वीकार करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णयानुसार किसी भी सूरत में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण का प्रावधान नही होना चाहिए। इस आधार पर खंडपीठ ने राजस्थान पंचायत अधिनियम में संशोधन को अवैध माना है(राजस्थान पत्रिका,जयपुर,20 मई,2010)राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने पंचायतों में युवाओं को 20 प्रतिशत और आनुपातिक जनसंख्या के आधार पर महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण को आज अवैधानिक करार दिया है।
राज्य सरकार द्वारा निकाय चुनावों में प्रस्तावित आरक्षण पर हाईकोर्ट ने गत पांच मार्च को स्थगन दिया था। एडवोकेट अनूपचंद ढंढ ने अदालत में यह तर्क दिया कि विशेष आयु वर्ग के युवाओं के लिए अलग से आरक्षण का भारतीय संविधान में कोई प्रावधान नहीं है।
मुख्य समाचारः
20 मई 2010
पंचायत में युवाओं और महिलाओं का आरक्षण गैर-कानूनीःराजस्थान हाईकोर्ट
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