राज्य की निजी डेंटल कॉलेजों में एमडीएस कोर्स के लिए स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय की प्री-पीजी परीक्षा से चयनित अभ्यर्थियों के प्रवेश पर लगी अंतरिम रोक उच्च न्यायालय ने हटा दी है। हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय एवं अन्य की स्थगन आदेश निरस्त करने की अर्जी मंजूर करते हुए यह आदेश पारित किया।
विश्वविद्यालय की ओर से अधिवक्ता मनीष सिसोदिया, अन्य पक्षकारों की ओर से अधिवक्ता एमआर सिंघवी व पीएस भाटी तथा राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता जीआर पूनिया ने इस मामले में निजी कॉलेजों के संगठन 'फेडरेशन ऑफ प्राइवेट मेडिकल एण्ड डेंटल कॉलेजेज' की दलीलों का विरोध किया। उनका कहना था कि डेंटल काउंसिल ऑफ इण्डिया ने वर्ष 2007 एमडीएस कोर्स के लिए नियमों में संशोधन कर दिया था।
इसमें कुल सीटों की 15 प्रतिशत सीटें एनआरआई अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित है। शेष 85 प्रतिशत सीटों में से आधी-आधी निजी डेंटल कॉलेजों एवं राज्य सरकार द्वारा भरी जानी है। बावजूद इसके फेडरेशन ने सभी सीटें अपने स्तर पर भरने की प्रक्रिया शुरू कर दी। इसके उलट फेडरेशन का कहना था उच्चतम न्यायालय ने उन्हें सभी सीटें भरने की छूट के सम्बन्ध में पहले ही व्यवस्था कायम कर दी है। सरकार या स्वास्थ्य विवि को इसमें हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है।
इसके जवाब में विवि व सरकार की ओर से यह मामला उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक पीठ के विचारार्थ होने की बात कही गई। सुनवाई के बाद न्यायाधीश टाटिया ने 35 पृष्ठ के अपने महत्वपूर्ण आदेश में गत 16 अप्रेल 2010 को निजी कॉलेजों में स्वास्थ्य विश्वविद्यालय की काउंसलिंग से चयनित अभ्यर्थियों के प्रवेश पर लगाई अंतरिम रोक हटा दी(राजस्थान पत्रिका,जोधपुर,20 मई,2010)
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