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01 जुलाई 2010

इंजीनियरिंग में पास, नौकरी में फेल

हर साल बढ़ रही इंजीनियरिंग कॉलेजों और छात्रों की संख्या के कारण इंजीनियरिंग ग्रेजुएट की मार्केट वैल्यु तेजी से गिर रही है। निजी निवेश को बढ़ावा देते हुए राज्य सरकार हर साल 20 से 30 नए इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने की अनुमति दे रही है।

यही कारण है कि पिछले पांच साल में इंजीनियरिंग कॉलेज और छात्रों की संख्या तीन गुना के लगभग बढ़ गई है। 40% पर दाखिले, कमजोर फैकल्टी व इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण छात्र बड़ी कंपनियों की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। अवसरों की तुलना में इंजीनियर ग्रेजुएट भी ज्यादा निकल रहे हैं। नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विस कंपनीज (नॉस्काम) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक देश में हर साल निकलने वाले 7.50 लाख इंजीनियर ग्रेजुएट में से महज 26 फीसदी ही कैंपस भर्ती में चयनित होते हैं। 40 फीसदी को पहले साल तक तथा 22 फीसदी को दो साल तक जॉब ही नहीं मिल पाता। इसी तरह के हालात राज्य में हैं।

इसलिए नहीं आती कंपनियां : इंफोसिस, आईबीएम व टीसीएस जैसी बड़ी कंपनियां राज्य के 7-8 स्तरीय सरकारी कॉलेजों में ही कैंपस भर्ती आयोजित करती हैं। नए प्राइवेट कॉलेजों में कैंपस भर्ती नहीं होने से वहां के छात्र सीधे आवेदन करने के बाद इंटरव्यू प्रक्रिया में पिछड़ जाते हैं। इसके अलावा प्राइवेट कॉलेज छात्रों को प्रैक्टिकल में 90 फीसदी अंक तक दे देते हैं, जबकि थ्योरी में वे 35 फीसदी अंक भी नहीं ला पाते।

कई छात्र बीटेक के बाद जॉब नहीं मिलने पर एमबीए करने लगते हैं, जबकि उन्हें एमटेक या पीएचडी जैसी तकनीकी दक्षता हासिल करनी चाहिए। मल्टीनेशनल कंपनियों में तकनीकी विशेषज्ञों की डिमांड ज्यादा है। कम्यूनिकेशन स्किल भी सुधारना होगा। - सत्य शर्मा, टैक्नोलॉजी हेड (एशिया),आईबीएम

डिमांड कम, सप्लाई ज्यादा

बड़ी संख्या में नए इंजीनियरिंग कॉलेज खुलने से डिमांड कम और सप्लाई ज्यादा हो गई। नए कॉलेजों में मापदंडों के अनुसार फैकल्टी व इंफ्रास्ट्रक्चर ही नहीं है। डिग्री की गुणवत्ता बढ़ेगी, तभी अच्छे जॉब मिल सकेंगे।
- एसके सिंह, निदेशक, राज.तकनीकी शिक्षा बोर्ड, जोधपुर

न्यूनतम 60 प्रतिशत अंकों पर हो प्रवेश

तकनीकी शिक्षा में गुणवत्ता बढ़ाने के लिए आरटीयू एक रेगुलेटरी बॉडी है, उसे ताकतवर बनाना होगा। इंजीनियरिंग कॉलेजों में न्यूनतम 60 प्रतिशत अंकों पर प्रवेश दिए जाएं, जिससे योग्य छात्र आगे बढें और डिग्री की साख बढ़ सके।- प्रो. दामोदर शर्मा, पूर्व कुलपति, राजस्थान टेक्निकल यूनिवर्सिटी

देशभर में यही स्थिति : तमिलनाडु में 100 में से 20 इंजीनियरिंग छात्रों को ही नौकरी मिलने से चिंतित राज्य सरकार 454 इंजीनियरिंग कॉलेजों से निकलने वाले 1.92 हजार छात्रों के भविष्य को लेकर चिंतित है। कर्नाटक, केरल व तमिलनाडु में इंजीनियरिंग कॉलजों में दाखिले के लिए न्यूनतम कटऑफ मार्क्‍स 45 से 50 फीसदी से बढ़ाकर 60 फीसदी तक करने पर विचार किया जा रहा है। राजस्थान में कटऑफ मार्क्‍स मात्र 40 फीसदी है।

आखिर क्यों नहीं मिलता रोजगार

नास्कॉम की रिपोर्ट के अनुसार एंट्री लेवल पर 84% ग्रेजुएट्स कम्यूनिकेशन स्किल, सॉफ्ट स्किल, प्रॉब्लम सॉल्विंग एबिलिटी और तकनीकी दक्षता की कमी से जॉब के लिए क्वालिफाई नहीं कर पाते। कॉलेजों में थ्योरी आधारित सिस्टम और डिग्री के बाद इंटर्नशिप के बिना सीधे जॉब में जाने से छात्र इंडस्ट्री के मापदंडों पर विफल हो जाते हैं। राज्य के नए कॉलेजों में 40% पर दाखिला और क्वालीफाइड फैकल्टी की कमी भी मुख्य कारण है। बड़ी कंपनियां कैंपस भर्ती के लिए 10वीं, 12वीं और बीटेक में 60% अंक वाले छात्रों को प्राथमिकता देती है। इंजीनियरिंग शिक्षा में गिरावट की स्थिति यह है कि बीटेक प्रथम सेमेस्टर में 50% छात्र पांच पेपर भी एक साथ उत्तीर्ण नहीं कर पाते। बेक मिलने से डिग्री पर धब्बा लग जाता है। जिससे बड़ी कंपनियां योग्यता के मापदंड पर उन्हें फेल कर देती हैं(दैनिक भास्कर,कोटा,1.7.2010)।

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