अमर शहीद भगवान बिरसा मुंडा एवं सिद्दो कान्हू के सपनों के झारखंड में ओदवासियों की भाषा को राज्य की प्रादेशिक राजभाषा के प में दर्जा नहीं देना शहीदों की बलिदानों को अस्वीकार करने जैसा है. संताली को हरहाल में राजभाषा का दर्जा देना ही होगा. इसके लिए संतालों को कोई भी कदम उठाना पड़े, पीछे नहीं हटेंगे. उक्त बातें बुधवार को करनडीह दिशोम जाहेरथान में संताली राजभाषा सेमिनार को संबोधित करते हुए समाजसेवी सह भाषा आंदोलनकारी सुजेन बेसरा ने कही.
उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल प्राय सभी भाषा साहित्य के विकास के लिए राज्य में भाषावार साहित्य अकादमी का गठन हुआ है. किंतु दुर्भाग्य की बात है झारखंड के एकमात्र संताली भाषा साहित्य अकादमी का गठन तक नहीं किया जा सका है. संताली भाषा महज भाषा नहीं है बल्कि झारखंडियों की पहचान है. पहचान को मिटाने की कोशिश कतई बर्दाश्त नहीं की जायेगी. राष्ट्रीय झारखंड संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष दिलबहादूर ने कहा कि संताली भाषा-भाषी पूर्वी भारत के संपूर्ण क्षेत्र में बसे हुए हैं.
जिसमें झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा, त्रिपुरा, असम और मणिपुर है तथा विदेशों में भी संताल हैं जो संताली भाषा बोलते हैं. इस तरह संताली अंतरराष्ट्रीय भाषा है. लेकिन ओदवासी केंद्रित राज्य में संताली भाषा की दशा दिशा विहीन हो गयी है. राज्य गठन के10 वर्ष बीत चुके हैं. लेकिन पहचान नहीं मिल पायी है. सेमिनार में शैलेंद्र महतो, वैद्यनाथ मार्डी, उमलेन टोपनो, भोगला सोरेन, लखाई बास्के, रमेश हांसदा समेत अन्य वक्ताओं ने अपने विचार रखे.
सात सदस्यीय केंद्रीय सलाहकार समिति गठितसंताली राजभाषा आंदोलन की मॉनिटरिंग के लिए सात सदस्यीय केंद्रीय समिति गठित हुई. जिसमें प्रो दिगंबर हांसदा, बीएम लाल, देश परगना बैजू मुर्मू, जदुमणि बेसरा, भोगला सोरेन, दिलबहादूर प्रधान एवं रशिक बास्के को शामिल किया गया है. संताली भाषा आंदोलन का केंद्रीय महासचिव रमेश हांसदा, कार्यालय सचिव मधु सोरेन एवं कोषाध्यक्ष भुवा हांसदा को बनाया गया है(प्रभात खबर,जमशेदपुर,1.7.2010).
उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल प्राय सभी भाषा साहित्य के विकास के लिए राज्य में भाषावार साहित्य अकादमी का गठन हुआ है. किंतु दुर्भाग्य की बात है झारखंड के एकमात्र संताली भाषा साहित्य अकादमी का गठन तक नहीं किया जा सका है. संताली भाषा महज भाषा नहीं है बल्कि झारखंडियों की पहचान है. पहचान को मिटाने की कोशिश कतई बर्दाश्त नहीं की जायेगी. राष्ट्रीय झारखंड संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष दिलबहादूर ने कहा कि संताली भाषा-भाषी पूर्वी भारत के संपूर्ण क्षेत्र में बसे हुए हैं.
जिसमें झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा, त्रिपुरा, असम और मणिपुर है तथा विदेशों में भी संताल हैं जो संताली भाषा बोलते हैं. इस तरह संताली अंतरराष्ट्रीय भाषा है. लेकिन ओदवासी केंद्रित राज्य में संताली भाषा की दशा दिशा विहीन हो गयी है. राज्य गठन के10 वर्ष बीत चुके हैं. लेकिन पहचान नहीं मिल पायी है. सेमिनार में शैलेंद्र महतो, वैद्यनाथ मार्डी, उमलेन टोपनो, भोगला सोरेन, लखाई बास्के, रमेश हांसदा समेत अन्य वक्ताओं ने अपने विचार रखे.
सात सदस्यीय केंद्रीय सलाहकार समिति गठितसंताली राजभाषा आंदोलन की मॉनिटरिंग के लिए सात सदस्यीय केंद्रीय समिति गठित हुई. जिसमें प्रो दिगंबर हांसदा, बीएम लाल, देश परगना बैजू मुर्मू, जदुमणि बेसरा, भोगला सोरेन, दिलबहादूर प्रधान एवं रशिक बास्के को शामिल किया गया है. संताली भाषा आंदोलन का केंद्रीय महासचिव रमेश हांसदा, कार्यालय सचिव मधु सोरेन एवं कोषाध्यक्ष भुवा हांसदा को बनाया गया है(प्रभात खबर,जमशेदपुर,1.7.2010).
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
टिप्पणी के बगैर भी इस ब्लॉग पर सृजन जारी रहेगा। फिर भी,सुझाव और आलोचनाएं आमंत्रित हैं।