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24 अगस्त 2010

डीयू का व्यक्तित्व विकास कार्यक्रमःबेहतर जॉब की पहली सीढ़ी

रोजगार के बाजार में खुद को बेहतर ढंग से पेश करने के लिए आजकल पर्सनेलिटी का अहम रोल है। इसकी कमी हीनता और असफलता को न्योता देती है। इसी बात को समझते हुए इंस्टीटय़ूट ऑफ लॉन्ग लर्निग ने पर्सनेलिटी डेवलपमेंट का कोर्स शुरू किया है। कोर्स में फिलवक्त दाखिले की प्रक्रिया जारी है।

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रों को रोजगार के बाजार में प्रभावशाली ढंग से पेश आने के लिए व्यक्तित्व विकास के भी गुर सिखा रहा है। इसके लिए इंस्टीटय़ूट ऑफ लॉन्ग लर्निग ने पीडीपी यानी पर्सनेलिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम ऑफर किया है। 80 घंटे के इस कोर्स में दाखिले की प्रक्रिया जारी है।

दाखिला किसे

दाखिला पहले आओ पहले पाओ के आधार पर मिलेगा। कोर्स में दाखिला उन्हीं छात्रों को मिलेगा, जो दिल्ली या किसी अन्य विश्वविद्यालय के किसी कोर्स में अध्ययनरत हैं। सितम्बर के पहले सप्ताह से कक्षाएं भी यहीं शुरू होंगी। कक्षाएं सप्ताह में दो से तीन दिन दोपहर बाद आयोजित की जाएंगी।

क्या कहते हैं शिक्षक

कोर्स के कोऑर्डिनेटर प्रो. एनके चड्ढा कहते हैं, व्यक्तित्व विकास के लिए यह जरूरी नहीं कि आप हर दिन जिम जाकर कसरत करें या बहुत लंबे हों और डील-डौल अच्छा दिखे। अगर ऐसा नहीं है तो भी हीन महसूस न करें। इन सबके बावजूद आप अपने व्यक्तित्व को आकर्षक व प्रभावशाली बना सकते हैं। यह सब होगा कुछ बातों को आत्मसात करने से, उन्हें व्यवहार में लाने से। व्यक्तित्व का विकास कई मनोवैज्ञानिक पहलुओं से जुड़ा है। इसकी कई कड़ियां आपस में मिल कर किसी के व्यक्तित्व में निखार लाती हैं। उसकी छवि को दूसरों के सामने चुंबकीय यानी आकर्षक व प्रभावशाली बनाती हैं। इन कड़ियों को जोड़ने के गुर ही आमतौर पर छात्रों को एक कोर्स के रूप में किसी भी संस्थान में बताए जाते हैं।

कोर्स की कड़ियां-

खुद और दूसरे को समझों

व्यक्तित्व विकास की यह महत्त्वपूर्ण कड़ी है। अपने को समझने से मतलब है अपनी जरूरतों को समझना। अपनी क्षमताओं का आकलन करना। ऐसा करने से आपको अपनी सीमाएं भी पता चलेंगी। साथ ही दूसरों को भी समझना, ताकि दोनों के बीच बेहतर संबंध कायम हो सकें। इससे जुड़ा व्यक्तित्व मूल्यांकन का भी पक्ष है। किसी के व्यक्तित्व में कमजोर पक्ष और मजबूत पक्ष क्या हैं, इसे जानने और उनका समाधान करने की विधि भी बताई जाएगी। यह साइकोलॉजिकल टैस्ट की मदद से किया जाएगा।

मोटिवेशन व लक्ष्य का निर्धारण

अपने गोल यानी जीवन के लक्ष्य को तय करना भी जरूरी है। लक्ष्य को तय करने और फिर उसे पाने के लिए दो तरह के मोटिवेशन की जरूरत है। एक अंदर और दूसरा बाहर से। ऐसा इसलिए, ताकि तय लक्ष्य को पाया जा सके।

अंतर-वैयक्तिक संबंध का निर्माण

व्यक्तित्व विकास में यह भी अहम रोल निभाता है। मनोवैज्ञानिकों की मानें तो अंतरवैयक्तिक संबंध कैसे बनते हैं, कैसे बिगड़ते हैं, उनकी बाधाएं कौन-कौन सी हैं, ताकि जिन्दगी में प्रभावशाली ढंग से अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें।

नेतृत्व क्षमता और कंफ्लिक्ट मैनेजमेंट

आज किसी संस्थान को मैनेजर ही नहीं, नेतृत्व क्षमता से लैस व्यक्ति भी चाहिए। किसी भी व्यक्ति में नेतृत्व क्षमता पैदा कैसे हो, वह प्रबंधक से कैसे अलग दिखे और बने, इसका गुर भी सिखाया व बताया जाता है। ऐसा करने के लिए नेता की क्या जिम्मेदारी होती है, उसकी क्या पहचान है, इस चीज पर फोकस किया जाता है। दो व्यक्तित्वों की सोच व काम करने की शैली अलग होती है। उनमें टकराव के बाद समन्वय की जरूरत पड़ती है। कंफ्लिक्ट मैनेजमेंट के तहत दो परस्पर विरोधी व्यक्तित्वों में सामंजस्य स्थापित करने और दोनों को साथ लेकर काम करने की कला सिखाई जाती है।

स्ट्रेस मैनेजमेंट और टाइम मैनेजमेंट

तनाव पैदा होने के स्रोत कौन-कौन से हैं। यह खुद के अंदर, नौकरी, परिवार व समुदाय आदि कई तरफ से पैदा होता है। इसका असर मनोवैज्ञानिक व शारीरिक, दोनों स्तरों पर पड़ता है। मसलन स्टमक अल्सर, हार्ट अटैक, माइग्रेन, एलर्जी, टेम्प्रेचर, डायरिया और लूज मोशन जैसी चीजें इस तनाव से कहीं न कहीं जुड़ी होती हैं। इससे बचाव के उपाय बताए जाते हैं। साथ ही तनाव कम करने या समाप्त करने की रणनीति के साथ ही साथ किसी भी व्यक्ति में टाइम मैनेजमेंट का भी होना जरूरी है। अगर किसी को पचास काम या कई बैठक करनी हैं तो उनके लिए समय प्रबंधन कैसे करें, इसकी कला आनी जरूरी है। ऐसा इसलिए, ताकि बाद में आंतरिक रूप से तनाव पैदा न हो।

समूह चर्चा व साक्षात्कार

व्यक्तित्व विकास के एक आयाम के रूप में समूह चर्चा व साक्षात्कार से निपटने की बेहतर रणनीति भी बताई जाती है। इन सबमें सफल होने, प्रभावशाली बनने के लिए पहले जरूरी है कि किसी भी विषय या मुद्दे पर आपकी सोच स्पष्ट होनी चाहिए। आपकी वाणी उभरते नेतृत्व का संकेत दे, यह देखना जरूरी है। दूसरे से कैसे बात करें और दूसरे की राय को किस तरह से आदर दें, यह समूह चर्चा में विशेष तौर पर बताया जाता है। इसी कड़ी में साक्षात्कार का सामना कैसे करें, किसी को शुक्रिया अदा कैसे करें या धन्यवाद कैसे दें, किसी प्रश्न को किस रूप में समझों और उसका उत्तर कैसे दें, यह जानना जरूरी है।

रचनात्मकता का विकास

अपने अंदर रचनात्मकता का विकास करना या इनोवेशन को लाने के लिए किन-किन उपायों को किया जाना जरूरी है, इस पर मनोवैज्ञानिक विशेष जोर देते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि रचनात्मकता किसी व्यक्ति को दूसरे से अलग करती है और एक नई पहचान देती है। जिन्दगी में कुछ नया करने के लिए इनोवेशन का भी अहम रोल है।

कम्युनिकेशन स्किल

संवाद किसी भी व्यक्ति की छवि को दूसरे के सामने रखता है। यह संवाद दूसरे से कैसे हो। इसके दो रूप हैं। पहला वर्बल यानी औपचारिक और दूसरा नॉन वर्बल मतलब अनौपचारिक। 30 फीसदी संवाद औपचारिक और 65 फीसदी अनौपचारिक संवाद होते हैं। संतुलित व्यक्तित्व के लिए दोनों में सामंजस्य होना जरूरी है। यह सामंजस्य कैसे स्थापित करें, इसकी तरकीब प्रायोगिक तौर पर मनोवैज्ञानिक बताते हैं। संतुलन व सामंजस्य के रास्ते में कौन-कौन सी बाधाएं, बोलचाल में दूसरे का हावी होना, कर्कश आवाज जैसी कई चीजों के बीच संवाद को बेहतर ढंग से पेश करने की कला इसके तहत सिखाई जाती है।

रेज्यूमे राइटिंग

कोर्स में प्रभावशाली तरीके से रेज्यूमे तैयार करने की कला भी सिखाई जाएगी। किस तरह के रेज्यूमे प्रचलन में हैं, इस पर भी चर्चा होगी(आनंद,हिंदुस्तान,दिल्ली,24.8.2010)।

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